गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

👉 सोच

एक गांव में दो बुजुर्ग बातें कर रहे थे....

पहला :- मेरी एक पोती है, शादी के लायक है... BA  किया है, नौकरी करती है, कद - 5"2 इंच है.. सुंदर है
कोई लडका नजर मे हो तो बताइएगा..

दूसरा :- आपकी पोती को किस तरह का परिवार चाहिए...??

पहला :- कुछ खास नही.. बस लडका MA/M.TECH किया हो, अपना घर हो, कार हो, घर मे एसी हो, अपने बाग बगीचा हो, अच्छा job, अच्छी सैलरी, कोई लाख रू. तक हो...

दूसरा :- और कुछ...

पहला :- हाँ सबसे जरूरी बात.. अकेला होना चाहिए..
मां-बाप,भाई-बहन नही होने चाहिए..
वो क्या है लडाई झगड़े होते है...

दूसरे बुजुर्ग की आँखें भर आई फिर आँसू पोछते हुए बोला - मेरे एक दोस्त का पोता है उसके भाई-बहन नही है, मां बाप एक दुर्घटना मे चल बसे, अच्छी नौकरी है, डेढ़ लाख सैलरी है, गाड़ी है बंगला है, नौकर-चाकर है..

पहला :- तो करवाओ ना रिश्ता पक्का..

दूसरा :- मगर उस लड़के की भी यही शर्त है की लडकी के भी मां-बाप,भाई-बहन या कोई रिश्तेदार ना हो...
कहते कहते उनका गला भर आया..
फिर बोले :- अगर आपका परिवार आत्महत्या कर ले तो बात बन सकती है.. आपकी पोती की शादी उससे हो जाएगी और वो बहुत सुखी रहेगी....

पहला :- ये क्या बकवास है, हमारा परिवार क्यों करे आत्महत्या.. कल को उसकी खुशियों मे, दुःख मे कौन उसके साथ व उसके पास होगा...

दूसरा :- वाह मेरे दोस्त, खुद का परिवार, परिवार है और दूसरे का कुछ नही... मेरे दोस्त अपने बच्चो को परिवार का महत्व समझाओ, घर के बडे ,घर के छोटे सभी अपनो के लिए जरूरी होते है... वरना इंसान खुशियों का और गम का महत्व ही भूल जाएगा, जिंदगी नीरस बन जाएगी...

पहले वाले बुजुर्ग बेहद शर्मिंदगी के कारण कुछ नही बोल पाए...

दोस्तों परिवार है तो जीवन मे हर खुशी, खुशी लगती है अगर परिवार नही तो किससे अपनी खुशियाँ और गम बांटोगे....

.....अच्छी सोच रक्खे ...अच्छी  सीख  दे ......


Humari Hriday Ki Awaaz Anurodh,Prarthna Suniye
Pt. Shriram Sharma Acharya
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https://youtu.be/pssU6OFaQI0

👉 आज का सद्चिंतन 14 Feb 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Feb 2019


👉 दूसरों की बात भी सुनें

लोग सोचते हैं कि हमारे पास जितना धन अधिक होगा , जितनी संपत्ति, जितने साधन अधिक होंगे, उतना हम अधिक सुखी हो जाएंगे। जबकि यह कोरी भ्रांति है। संसार में देखा यह जा रहा है कि जिसके पास जितनी अधिक संपत्ति है वह उतना ही अधिक दुखी, परेशान और चिंता ग्रस्त है। उसे अपनी संपत्ति खो जाने चुरा लिए जाने और लूट लिए जाने का भय है। तो कृपया इस भ्रांति से बाहर निकलें, कि बहुत धन संपत्ति होने पर बहुत सुखी हो जाएंगे। वास्तविकता तो यह है कि यह भौतिक धन संपत्ति केवल जीवन रक्षा मात्र के लिए सहयोगी है, इससे अधिक नहीं। इससे कोई आत्मिक आनंद मानसिक शांति नहीं मिलती। हाँ, जीवन रक्षा अवश्य होती है।

जीवन रक्षा के लिए तो बहुत थोड़े साधन चाहिएँ। उसके बाद तो व्यक्ति केवल अपनी इच्छाएं ही पूरी करता रहता है। और आश्चर्य की बात यह है कि जितनी इच्छाएं पूरी करता जाता है इच्छाएं उतनी ही बढ़ती जाती हैं। फिर इच्छाओं का कोई अंत नहीं आता। इसलिए व्यक्ति सदा दुखी रहता है। और यदि वह अपनी इच्छाओं को थोड़ा नियंत्रित करके दूसरों के लिए कुछ त्याग करे, सेवा करे, माता-पिता का आदर सम्मान करे, बुजुर्गों एवं  विद्वानों के निर्देश का पालन करे, उनकी सेवा करे, प्राणियों की रक्षा करे, सच्ची विद्या का प्रचार करे, सच्चाई और ईमानदारी से जिए, यदि इस प्रकार के कार्य करें और इसमें तप त्याग तपस्या करे, तो उसे जो आनंद और शांति मिलेगी, वह संसार के किसी बाजार में धन से नहीं खरीदी जा सकती। इसलिए आनंद और शांति के लिए त्याग करें, लोभ नहीं।

बहुत से लोगों को हमेशा यह शिकायत रहती है कि मेरे घर के लोग, मेरे मित्र, रिश्तेदार मुझे समझते ही नहीं। मेरी भावनाओं को नहीं समझते, मेरी बातों को नहीं समझते , जो मैं चाहता हूं वह करते नहीं। यदि ध्यान से देखा जाए तो वास्तव में इस शिकायत में में काफी कुछ सच्चाई भी है। लोग वास्तव में दूसरे की बात को पूरे ध्यान से सुनते नहीं हैं।

प्रायः देखा जाता है कि वे अपनी बात कहने में ज्यादा रुचि रखते हैं, दूसरे की बात सुनना उनको पसंद नहीं । इसलिए वे दूसरे की बात सुनते ही नहीं। जब सुनते ही नहीं, तो उस पर विचार क्या करेंगे? जब विचार ही नहीं करेंगे तो क्या समझेंगे? जब समझते ही नहीं तो दूसरे के अनुकूल व्यवहार कैसे कर पाएंगे?

इसलिए जब लोग एक दूसरे के अनुकूल व्यवहार नहीं करते, तो आपस में शिकायत बढ़ती जाती है। और बढ़ते बढ़ते एक दिन बारुद की तरह विस्फोट होता है। और उसके बहुत दुष्परिणाम सामने आते हैं। लड़ाई होती है झगड़े होते हैं कोर्ट केस होते हैं। और कभी-कभी लोग दुखी परेशान होकर हत्या या आत्महत्या तक भी कर लेते हैं।
तो इन सब दुष्परिणामों से बचने के लिए दूसरों की बात ध्यान पूर्वक सुनें, उनके सही अभिप्राय को समझने की कोशिश करें, और ठीक-ठीक समझकर न्याय पूर्वक व्यवहार करें। तभी आप सबका जीवन सुखमय हो सकता है।

👉 नचिकेता का तीसरा वर

यमराज द्वारा नचिकेता की निष्ठा पर प्रसन्न होकर उन्हें तीन वर दिये गये। उन्होंने मृत्यु भय से मुक्त होने के स्थान पर पिता के क्रोध की शान्ति पहला वर माँगा, परलोक के लिए स्वर्ग के साधनरूप अग्नि विज्ञान का दूसरा वर प्राप्त करके उन्होंने तीसरे वर के रूप में आत्मा के यथार्थ स्वरूप

और उसकी प्राप्ति का उपाय जानना चाहा। यमराज द्वारा वचन बद्ध होते हुए भी तीसरे वर का उसे पात्र न मानने के कारण उन्होंने उसे सब प्रकार के प्रलोभन दिए व बदले में कुछ और माँगने को कहा। पर आत्मतत्व तथा आत्मा के मरणोपरांत अस्तित्व संबंधी अनुभूति ज्ञान के अतिरिक्त उसने कुछ न मांगा। चयन की स्वतंत्रता सामने होते हुए भी नचिकेता ने सुखोपभोग, मुक्ति, पुनर्जीवन जैसे लाभ एक ओर होते हुए भी ब्रह्मविद्या व आत्म विद्या के ज्ञान को जानने को ही प्राथमिकता दी। पंचाग्नि विद्या को आत्मसात् कर साधना पथ का मार्गदर्शन मानव मात्र के लिए कर सकने में वे सफल हुए। ऐसे सौभाग्यशाली बिरले ही होते हैं।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १


बड़े कार्य के लिये सहयोगी चाहिये
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/UZ2ypr0UAXE

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 5 से 10

एकदा हृदये तस्य जिज्ञासा समुपस्थिता ।
ब्रह्मविद्यावगाहाय काल उच्चैस्तु प्राप्यते ॥५॥
सञ्चितैश्च सुसंस्कारै: कठोरं व्रतसाधनम् ।
योगाभ्यासं तपश्चापि कुर्वन्त्येते यथासुखम् ॥६॥
सामान्यानां जनानां तु मनस: सा स्थिति: सदा ।
चंचलासित न ते कर्तुं  समर्था अधिकं क्वचित्॥७॥
अल्पेSपि चात्मकल्याणसाधनं सरलं न ते।
वर्त्म पश्यन्ति पृच्छामि भगवन्तमस्तु तत्स्वयम्॥८॥
सुलभं सर्वमर्त्यानां ब्रह्मज्ञानं भवेद यथा।
आत्मविज्ञानमेवापि योग-साधंनमप्युत॥९॥
नातिरिक्तं जीवचर्या दृष्टिकोणं नियम्य वा ।
सिद्धयेत्प्रयोजन लक्ष्यपूरकं जीवनस्य यत्॥१०॥

टीका- एक बार उनके मन में जिज्ञासा उठी-'उच्चस्तर के लोग तो ब्रह्मविद्या के गहन-अवगाहन के लिए समय निकाल लेते हैं। संचित सुसंस्कारिता के कारण कठोर व्रत-धारण, योगाभ्यास एवं तपसाधन भी कर लेते हैं। किन्तु सामान्य-जनों की मन:स्थिति-परिस्थिति उथली होती है। ऐसी दशा में वे अधिक कर नहीं पाते। थोडे़ में सरलतापूर्वक आत्मकल्याण का साधन बन सके ऐसा मार्गदर्शन उन्हें प्राप्त नहीं होता। अस्तु भगवान से पूछना चाहिए कि सर्वसधारण की सुविधा का ऐसा ब्रह्मज्ञान, आत्म-विज्ञान एवं योग साधन क्या हो सकता है जिसके लिए कुछ अतिरिक्त न करना पडे़, मात्र दृष्टिकोण एवं जीवन-चर्या में थोडा परिवर्तन करके ही जीवन-लक्ष्य को पूरा करने का प्रयोजन सध जाय' ॥५-१०॥

व्याख्या- जनमानस को स्तर की दृष्टि से दो भागों में विभाजित किया जाता है । एक वे जो तत्वदर्शन, साधन तपश्चर्या के मर्म को समझते हैं । कठोर पुरुषार्थ करने योग्य पात्रता भी उन्हें पूर्व जन्म के अर्जित संस्कारों व स्वाध्याय परायणता के कारण मिल जाती है परन्तु देवर्षि नारद न जन-जन में प्रवेश करके पाया कि दूसरे स्तर के लोगों की संख्या अधिक है जो जीवन व्यापार में उलझे रहने के कारण अथवा साधना विज्ञान के विस्तृत उपक्रमों से परिचित होने का सौभाग्य न मिल पाने के कारण अध्यात्मविद्या के सूत्रों को समझ नहीं पाते, व्यवहार में उतार नहीं पाते तथा ऐसी ही उथली स्थिति में जीते हुए किसी तरह अपना जीवन शकट खींचते हैं ।

विशेष लोगों के लिए तो विशेष उपलब्धियाँ हैं। ऐसे असाधारण व्यक्तियों की तो बात ही अलग हैं । उनके जीवन-उपाख्यान यही बताते हैं कि वें विशिष्ट विभूति सम्पन्न होते हैं ।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 6

 
आपके पूर्व संस्कारो से हमने आप को ढूंढा है
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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https://youtu.be/v-bV4h-X9Eg

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...