शनिवार, 10 मार्च 2018

👉 शेख सादी की सूक्तियाँ

🔶 “ऐ कनाअत तदन्गरम गरदाँ। क वराये तो हेच नेमत नेस्त॥”
“ऐ सन्तोष! मुझे दौलतमंद बना दें, क्योंकि संसार की कोई दौलत तुझसे बढ़कर नहीं है।”

🔷 एक अफ्रीकी सानिया कपड़ा बेचने वालों के कूचे में इस तरह कह रहा था, “ऐ धनी लोगों ! अगर तुम लोगों में न्याय होता और हम लोगों में संतोष होता, तो संसार से भीख माँगने की प्रथा ही उठ जाती।” हे संतोष ! मुझे धनी बना दे क्योंकि तेरे बिना कोई धनी नहीं है। लुकमान ने एकाँतवास में संतोष धारण किया था। जिसके दिल में संतोष नहीं है, उसमें तत्वज्ञान की हिकमत नहीं है।

🔶 तात्पर्य यह है कि जगत में ‘संतोष’ ही सबसे बड़ा धन है। जिसमें संतोष नहीं है, वह भारी से भारी धनी होने पर भी निर्धन है। जिसके हृदय में असंतोष नहीं है वही सदा सुखी है। लाख, करोड़ और अरब-खरब की सम्पदा होने पर भी जो संतोषहीन है वह परम दुखी है। सन्तोषी मनुष्य ही सब सुख भोग सकता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आत्म-भाव का विस्तार

🔶 इस संसार का अणु-अणु एक दूसरे से संबंधित है। एक दूसरे को पकड़े हुए है। यह कण यदि आपस में बँधे न रहें सहयोग न करें। परस्पर बँधे रहने की प्रक्रिया से मुँह मोड़ ले तो सृष्टि क्रम ही बिखर जायेगा, प्रत्येक पदार्थ के भीतर विघटन आरम्भ हो जायेगा और वह अपने अस्तित्व को ही खो बैठेगा। एकता के बंधनों का ऐसा ही महत्व है। जड़ जगत में ही नहीं सब चैतन्य प्राणियों विशेषतया मानव-समाज में यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि एकता, प्रेम और आत्मीयता के आधार पर उनका बल तथा विस्तार सुदृढ़ होता है। जो जितना ही आत्मीयता की भावनाओं से ओतप्रोत है वह उतना ही विकसित कहा जा सकता है। उदारमना महापुरुष-वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को अपनाते हैं, उन्हें सभी अपने ही दिखाई पड़ते हैं। जिसका स्वार्थ-आत्मभाव जितना छोटा है, जितना संकीर्ण है उस व्यक्ति को उतना ही तुच्छ माना जायेगा।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 March 2018


👉 Be Good and Do Good

🔶 The truth behind performing good deeds to gain entry into heaven may be debatable. There are some references about such idea in the scriptures but its fundamental aim is to motivate people to follow the path in life which is moral and good for the self and the society at large.Getting a sick child take medicine is a great challenge. A mother has to resort to cajoling the child into taking medicine by saying that she would reward him with a toy. The child does not know the worth of the medicine, but he does know the worth of a toy. In the hope of getting rewarded with a toy, he takes the medicine which works in his best interest.

🔷 Similarly, an average individual does not appreciate the worth of living a high ideal life. Sensual pleasures are what interests him more. He can visualize his interest of securing the heavens which is the happiness he is seeking for. The prospects of heaven makes him take up a worthy course in life. This can’t be thought of as a deceit or a lie as it would indeed usher him in the direction which has much more to offer than the said reward.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Saṁsṛti saṅjivani Srimad-Bhagwata evam Gita Vangmay 31 Page 5.18

👉 कर भला हो भला

🔶 अच्छा काम करने पर स्वर्ग आदि का फल मिलने की बात कहीं जाती है यह कहाँ तक सच है। यह तो प्राणियों को श्रेय मार्ग पर ले जाने के लिए कहीं जाती है। जैसे बच्चों को दवा पिलाने के लिए कह देते हैं बेटा! प्रेम से पीलो तो तुम्हें खिलौने मिलेंगे। बच्चा आराम का महत्त्व नहीं समझता, खिलौनों का महत्त्व समझता है, उस बहाने से अपने हित का काम स्वीकार कर लेता है।

🔷 सामान्य मनुष्य भी श्रेष्ठ जीवन क्रम के लाभ नहीं समझता - उसे विषयों के सुख मालूम होते हैं। स्वर्ग में विषय सुख मिलने की बात से अपने लाभ का अन्दाज लग जाता है और वह उस मार्ग पर चल पड़ता है। ऐसा कहना झूठ भी नहीं है - क्योंकि जो कहा जाता है उससे अधिक ही लाभ उस मार्ग पर चलने वाले को प्राप्त होता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 संस्कृति- संजीवनी श्रीमदभागवत एवं गीता - वांग्मय 31 पृष्ठ 5.18

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 2)

🔶 बहुमूल्य मानव जीवन का एक-एक क्षण अनमोल है। हर साँस को हीरे मोतियों से तोला जा सकता है। जिसने इस तथ्य को जाना, समझना चाहिए उसने जो सबसे अधिक महत्त्व का था उसे जान लिया। बुद्धिमत्ता की प्रशंसा तब है जब समय के सदुपयोग का उच्चस्तरीय निर्धारण बन सके। जिसकी भी प्रज्ञा ने इस प्रकार का अनुग्रह अनुदान प्रदान किया है, उसे सच्चे अर्थों में भाग्यवान कहना चाहिए। अन्यथा लोग ऐसे ही नर वानरों की तरह जीते और ज्यों-त्यों करके दिन गुजारते हैं।

🔷 ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा को कौड़ी मोल गँवा देने वाले तीन भूल करते हैं-एक यह कि आलस्य-प्रमाद, विलास-विनोद में समय काटते हैं। दूसरे ललक लिप्सा की पूर्ति के लिए धन बटोरने में लगे रहते हैं। आम आदमी का अधिकांश समय नियोजन प्रायः इन्हीं दो कामों के लिए होता है। तीसरे स्तर के कुछ उद्धत प्रकृति के ऐसे भी होते हैं जो विनाश विध्वंस में लगे रहते हैं अथवा दर्प दिखाने, ठाठ बनाने के लिए, प्रशंसा सुनने के लिए ऐसे कृत्य करते हैं जिसमें प्रवंचना और विडम्बना के अतिरिक्त और कोई सार तत्व नहीं होता।

🔶 इन प्रयोजनों की परिणति पर ध्यान दिया जाय और महामानवों द्वारा अपनाई गई गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि दोनों के मध्य जमीन-आसमान जितना अन्तर है। दोनों की उपलब्धियों में इतना अन्तर है जिन्हें काँच और हीरे जैसा कहा जा सके। आलसी, प्रमादी, अनगढ़, पिछड़ी परिस्थितियों में पड़े रहते हैं। तृष्णातुर उद्यमी तो होते हैं, पर उनकी योग्यता उस अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग में लग जाती है जिसकी निरर्थकता को सहज समझा जा सकता था और देखा जा सकता था कि ललक में जिस सुखोपभोग की आशा की गई थी, उसकी छाया ही दिवास्वप्न की तरह लुभाती रही। पल्ले खीज़ और थकान के अतिरिक्त और कुछ लगा नहीं। बड़प्पन और दर्प की विडम्बना और भी अधिक उपहासास्पद है।

🔷 इस नक्कारखाने में तूती की क्या बिसात? एक से एक प्रतापी, कठपुतली जैसा नाच दिखाकर बाजीगर के झोली में घुस गये। यहाँ कौन किसका बड़प्पन मानता है? अपनी चिन्ता, समस्याओं से फुरसत नहीं फिर कौन किसका दर्प देखे और किसलिए, किस-किस समय किसी को सराहें? अपनी ओर ध्यान खींचने और चकाचौंध उत्पन्न करने की लिप्सा को बचकानी बालक्रीड़ा के अतिरिक्त और कुछ कहते नहीं बनता। यही हैं वे ललक लिप्साएँ जिसमें जिन्दगी का बहुमूल्य अवसर ऐसे ही गुम जाता है। विदाई के दिनों जब ईश्वर प्रदत्त अनुदान को किस निमित्त उपयोग किया गया, यह सोचने का अवसर मिलता तो प्रतीत होता कि भूल ही भूल में उस वैभव को गँवा दिया गया, जिसके सही सदुपयोग की बात यदि सूझ पड़ी होती तो सार्थकता का स्वरूप ही दूसरा होता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 4)

Expensive arrangements should become a laughing stock

🔶 Cost of living has increased, so has the list of items on the dinner menu. Today, we see people spending as much as Rs. 800-2400 per plate during the wedding dinners. This is partly because of the demand in the hotels due to limited muhurats available. This has undoubtedly led to boom in the hotel business; banquet halls are minting money; pundits who perform the weddings are in great demand, but the pockets of the people are getting lighter.

🔷 Can anyone say – this is my money and I will spend it the way I want; I can blow it off in smoke just like the crackers. No, it does make a difference. This money belongs to the entire society. This is not the money of an individual. They have extracted this money from the society, but are spending it according to their whims and fancies and setting up a very bad example indeed. This is a tradition that is working against our culture and the progress of the nation. This is an insult to the values of the society.

📖 From Akhand Jyoti
✍🏻 Pranav Pandya

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!

🔶 उन्नति के मार्ग पर सबसे बड़ी रुकावट वह है, जिसके कारण से हमारे पैर रुक जाते हैं। प्रायश्चित की प्रक्रिया इसीलिए है कि हमने भूतकाल में जो गलतियाँ की हैं, उनकी रोकथाम कर सकें। इस संसार का यह नियम है कि जो गलतियाँ होती हैं, भूलें होती हैं, उसका दण्ड तो मिलता-ही है। हमारे लिए सबसे बड़ा व्यवधान यही है कि पिछली गलतियाँ, वह रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है और हमको उन्नति नहीं करने देतीं। अगर हम अपने ध्यान, जप और साधना में समर्थ हो जाएँ तब? तब फिर उन गलतियों का दण्ड कैसे मिलेगा? पापों का प्रायश्चित कैसे होगा? उज्ज्वल भविष्य तो सुख और शान्ति का हो जाएगा, फिर पापों का क्या होगा?

🔷 पाप इतनी छोटी बात नहीं हैं कि आप गंगा नहा करके या उसका प्रायश्चित करके, प्रार्थना करके खत्म कर सकें। वह आपके जीवन की कोई महत्त्वहीन घटना नहीं है। बुरे कामों का। अच्छे फलों की ही क्यों आशा करते हैं? जब आप अच्छे फलों की आशा करते हैं कि हमने यह अच्छा किया है, विद्या पढ़ी है, तो हमको उत्तीर्ण होना चाहिए, हमने मेहनत की है, तो हमको इनाम मिलना चाहिए, हमने ब्याह-शादी की है, तो हमारी घर-गृहस्थी चलनी चाहिए। जब आप श्रेष्ठ कामों के बारे में यह विश्वास करते हैं, कि हमको अपने कर्मों का अच्छा फल मिलना ही चाहिए, फिर आप एक और बात क्यों भूल जाते हैं कि हमने जो बुरे कर्म किये हैं या भूलें की हैं, उनका दण्ड मिलना चाहिए।

🔶 उसके बारे में फिर क्यों उपेक्षा करते हैं? इसकी उपेक्षा कीजिए न कि हम खेती करेंगे नहीं, पैदा हुआ तो क्या हुआ, हम विद्या पढ़ेंगे नहीं, पढ़ना आया तो क्या हुआ? आप यह क्यों सोचते हैं कि हमारे अच्छे कर्मों का फल तो हमको मिलना चाहिए और बुरे कर्मों के बारे में इतने ज्यादा लापरवाह हैं कि आप यह ख्याल कर लें कि हम राम नाम लेंगे, पंचामृत पी लेंगे, गंगाजी में डुबकी मार लेंगे, फलाना कर लेंगे, तो ऐसे दिल्लगी, मजाक जैसे छोटे-छोटे कारणों से आप छुटकारा पा जाएँगे?

🔷 ऐसा कैसे हो सकता है? यह मुमकिन नहीं है। जहर खाया है, तो आपको मरना पड़ेगा अथवा जहर को सारी नसों में से निकालना पड़ेगा। नहीं साहब, जहर खा लिया है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे, फाँसी लगा ली है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे, रेल की पटरी पर बैठ करके सिर कटा लिया है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे। नहीं भाईसाहब, ऐसी कल्पना मत कीजिए बच्चों जैसी। आप जरा समझदारों की तरह बात कीजिए। पाप भी आपके जीवन की एक इकाई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 61)

👉 मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम्

🔶 परम पूज्य गुरुदेव की भावमयी मूर्ति ध्यान का मूल है। उनके चरण कमल पूजा का मूल हैं। उनके द्वारा कहे गए वाक्य मूल मंत्र हैं। उनकी कृपा ही मोक्ष का मूल है॥ ७६॥ गुरुदेव ही आदि और अनादि हैं, वही परम देव हैं। उनसे बढ़कर और कुछ भी नहीं। उन श्रीगुरु को नमन है॥ ७७॥ सप्त सागर पर्यन्त जितने भी तीर्थ उन सभी के स्नान का फल गुरुदेव के पादप्रक्षालन के जल बिन्दुओं का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं है॥ ७८॥ यदि भगवान् शिव स्वयं रूठ जायें, तो श्री गुरु की कृपा से रक्षा हो जाती है; लेकिन यदि गुरु रूठ जाएँ, तो कोई भी रक्षा करने में समर्थ नहीं होता। इसलिए सभी प्रकार से कृपालु सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए॥ ७९॥ ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव रूप यह जो जगत् है-वह गुरुदेव का ही स्वरूप है।  गुरुदेव से अधिक और कुछ भी नहीं है। इसलिए सब तरह से गुरुवर की अर्चना करनी चाहिए॥ ८०॥

🔷 सद्गुरु चेतना की महिमा का गायन करने वाले इन मंत्रों में आध्यात्मिक जीवन के कई रहस्यों की दुर्लभ झलकियाँ हैं। गुरुदेव का ध्यान, उन्हीें की पूजा, उनके ही वाक्यों के अनुुसार जीवन एवं उनकी ही कृपा से परम पद की प्राप्ति-यह साधना का सहज पथ है। वही सब कुछ है। इस सृष्टि में जो भी विस्तार है, वह ब्राह्मी चेतना के साकार रूप गुरुदेव का ही है। गुरुदेव प्रसन्न हों तो काल को भी अपने पाँव पीछे लौटाने पड़ते हैं। जो शिष्य अपने सद्गुरु की कृपा छाँव में रहता है, उसका भला कौन क्या बिगाड़ सकता है? अपने शिष्य के जीवन के लिए ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर गुरुदेव के सिवा और कोई भी नहीं। परम समर्थ एवं परम कृपालु गुरुदेव से अधिक शिष्य के लिए और कुछ भी नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 98

👉 जीव के चार प्रकार

🔶 जीव चार प्रकार के कहे गए हैं – बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य। संसार मानो जाल है और जीव मछली। ईश्वर, यह संसार जिनकी माया है, मछुए हैं। जब मछुए के जाल में मछलियाँ पड़ती हैं, तब कुछ मछलियाँ जाल चीरकर भागने की अर्थात् मुक्त होने की कोशिश करती हैं। उन्हें मुमुक्षु जीव कहना चाहिए।

🔷 जो भागने की चेष्टा करती हैं, उनमें से सभी नहीं भाग सकतीं। दो-चार मछलियाँ ही धड़ाम से कूदकर भाग जाती हैं। तब लोग कहते हैं, वह बड़ी मछली निकल गयी। ऐसे ही दो-चार मनुष्य मुक्त जीव हैं। कुछ मछलियाँ स्वभावत: ऐसी सावधानी से रहती हैं कि कभी जाल-सहित इधर से उधर भागती हैं, और सीधे कीच में घुसकर देह छिपाना चाहती हैं। भागने की कोई चेष्टा नहीं, बल्कि कीच में और गड़ जाती हैं। ये ही बद्ध जीव हैं। बद्ध जीव संसार में अर्थात् कामिनी कांचन में फँसे हुए हैं, कलंकसागर में मग्न हैं, पर सोचते हैं कि बड़े आनन्द में हैं !

🔶 जो मुमुक्षु या मुक्त हैं, संसार उन्हें कूप जान पड़ता है, अच्छा नहीं लगता। इसीलिए कोई-कोई ज्ञान-लाभ, ईश्वरलाभ हो जाने पर शरीर छोड़ देते हैं, परन्तु इस तरह का शरीरत्याग बड़ी दूर की बात है।

🔷 ‘‘बद्ध जीवों – संसारी जीवों को किसी तरह होश नहीं होता। कितना दुख पाते हैं, कितना धोखा खाते हैं, कितनी विपदाएँ झेलते हैं, फिर भी बुद्धि ठिकाने नहीं आती। ऊँट कटीली घास को बहुत चाव से खाता है। परन्तु जितना ही खाता है उतना ही मुँह से धर-धर खून गिरता है, फिर भी कँटीली घास को खाना नहीं छोड़ता! संसारी मनुष्यों को इतना शोकताप मिलता है, किन्तु कुछ दिन बीते कि सब भूल गए।

राम कृष्ण परमहंस

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...