रविवार, 11 मार्च 2018

👉 प्रेम की कसौटी

🔶 नारदजी को अभिमान हो गाया कि मैं भगवान को बहुत प्यार करता हूँ। भगवान ने इस बात को जाना और अभिमान के निवारण का प्रयत्न किया क्योंकि अभिमान ही अध्यात्म मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

🔷 भगवान नारद को साथ लेकर भ्रमण को चल दिये। चलते-चलते एक तपस्वी ब्राह्मण मिला जो सूखे पत्ते खाकर तप कर रहा था। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था। फिर भी कमर में तलवार लटकाए था।

🔶 भगवान साधारण वेश में थे। उनने तपस्वी से पूछा “आपके पत्ते खाने और तलवार धारण करने का क्या कारण है?”

🔷 तपस्वी ने कहा- पत्ते इसलिए खाता हूँ कि मेरे भगवान की प्रजा को अन्न दूध आदि वस्तुऐं पर्याप्त मात्रा में मिले। मेरे खाने के कारण किसी जीव के आहार में कमी न पड़े, और तलवार इसलिए बाँधे हुए हूँ कि संसार में तीन भक्ति को कलंकित करने वाले है, ये कभी मिल जायें तो इस तलवार से उनका सिर काट दूँ।

🔶 नरवेशधारी भगवान ने पूछा- भक्ति को कलंकित करने वाले तीन भला वे कौन-कौन है? तपस्वी ने कहा-एक अर्जुन जिसने मेरे भगवान से अपने स्वार्थ के लिए रथ हँकवाया; दूसरी, द्रौपदी जिसके चीर को बढ़ाने के लिए भगवान को नंगे पैरों दौड़ना पड़ा; तीसरा, नारद जिसे आत्मज्ञान पर संतोष नहीं, कभी कुछ कभी कुछ पूछकर मेरे भगवान का सिर खाता रहता है।

🔷 दोनों तपस्वी को प्रणाम करके चल दिए। नारद की समझ में अब आया कि उच्च कोटि के प्रेम का क्या लक्षण है? अपने प्रेमी को ही नहीं उसके प्रिय जनों को भी अपने कारण कुछ कष्ट न पहुँचने देना और अपने सुख के लिये किसी प्रकार की भी प्रेमी से याचना न करना।

🔶 नारद ने अपने प्रेम की तुलना उस तपस्वी के प्रेम से की तो उनका अभिमान चूर हो गया।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 March 2018

👉 आज का सद्चिंतन 12 March 2018


👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

👉 सूत्र नं० 1

🔶 श्लोक-
योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।
सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।


🔷 अर्थ-
हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।

🔶 सूत्र –
धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा। मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 3)

🔶 दूरदर्शी विवेकशीलता, महाप्रज्ञा यदि किसी बड़भागी पर अनुग्रह करे तो उसका स्वरूप एक ही होना चाहिए कि वह जीवन सम्पदा की गरिमा समझें और उसके सदुपयोग की बात सोचे। इस चिन्तन से एक ही निष्कर्ष उभरकर ऊपर आता है कि समय को प्रत्यक्ष सौभाग्य माना जाय और इसके उपयोग का जो सर्वश्रेष्ठ निर्धारण सम्भव हो उसे कर गुजरने का साहस अपनाया जाय।

🔷 महामानवों के पराक्रम का उपयोग दो प्रयोजनों के निमित्त होता रहा है। एक में उनने अपनी क्षमता एवं वरिष्ठता का अभिवर्धन किया है और दूसरे में उनने विश्व वसुधा के साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्वों को संकल्प पूर्वक निभाया है। इन्हीं दो कार्यों को आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण के नाम से जाना जाता है। कोई चाहे तो उसे आत्मा और परमात्मा को प्रसन्नता उपलब्ध कराने वाली साधना भी कह सकता है। इनमें से एक स्वार्थ है और दूसरा परमार्थ। इनके समन्वय से ही मनुष्य जन्म सार्थक और कृत-कृत्य होता है।

🔶 आत्म-कल्याण का तात्पर्य है-व्यक्तित्व का निखार परिष्कार। इसके लिए आन्तरिक संघर्ष करना पड़ता है और गुण, कर्म, स्वभाव की वरिष्ठता सम्पादित करने वाले निर्धारणों का जीवनचर्या में समावेश करना पड़ता है। संचित कुसंस्कारों का एक पहाड़ हर किसी के सामने है। प्रचलन, वातावरण, स्वजन और आदतों का एक ऐसा जाल-जंजाल है जिसके रहते न कुछ उच्चस्तरीय सोचते बनता है और न करते धरते। इससे बाहर निकल सकना परम पुरुषार्थ है। जीवन से सम्बन्धित समस्याओं का स्वरूप सही अर्थों में समझ सकना आत्मबोध है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए वर्तमान चिन्तन प्रवाह को एक प्रकार से उलटना ही पड़ता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन जैसे उच्चस्तरीय पुरुषार्थों में मन को बलपूर्वक नियोजित करना पड़ता है। साधना-उपासना भी इसी एक प्रयोजन के लिए की जाती है। यह अध्यात्म क्षेत्र का मानसिक पराक्रम हुआ जिसके लिए समय भी लगाना पड़ता है और श्रम भी करना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 5)

Some statistics that will touch your hearts

🔶 I feel like presenting some more statistics to you. According to an estimate, the annual average income of an individual is around Rs 25000. But the same society buys around 800 tonnes of gold per year (note that the cost of gold has become more than 18000/- for 10gms). 600 tonnes of gold is exclusively used for making jewellery. In this country, a mere 3% of the people pay income tax every year. Then where does this huge amount come from? So, definitely the money being spent in profligate weddings must be the savings of the family. These savings can be brought into circulation through various mediums. This amount is beyond any kind of taxation. In the name of celebration and public merry-making, is this not a display of our sick mindset? Each and every intelligent person in the society should think about this.

🔷 More than 70 crores of our country’s population eke out a living with less than Rs. 30 income per day. More than 39 crores of the people are below the poverty line. Clean drinking water is not available for more than 60 crore people. 35 crore do not have access to primary education. 62 crores do not have their own houses. 20 crore sleep on the city footpaths.  15 crore are living out of compensation. On the contrary, political leaders have an average annual income of 9 lakh rupees. The annual income of about 30 crore of the population is more than Rs. 2 crores.  In India, 15 crore people are millionaires and 24 are billionaires. 25 crore people spend about 50 crore rupees on bottled water. 1.5 crore like to live in hotels while 7 crore own more than one house.

🔶 Aren’t these statistics an eye opener? But they depict a little less than the entire truth. Where do these expensive weddings take birth? This can be understood. Will group conflicts not rise in such situations? Why are divorces becoming more rampant? Why is domestic and social violence continuing on women? Why are social thinkers mum on this issue?

✍🏻 Pranav Pandya
📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 2)

🔶 आपने गलतियाँ की हैं और अपने शरीर को कमजोर बना डाला है। आप पापकर्म से कैसे बचेंगे? पढ़ेंगे के समय में और पढ़ने के दिनों में लापरवाही बरती आपने और पढ़ने से इनकार कर दिया। अब आप बिना पड़े हैं, दम्भ से बचिए न जरा। नहीं साहब, हम तो प्रार्थना करेंगे, भगवान की पूजा करेंगे और विद्वान हो जाएँगे। आपने विद्वान बनने के लिए जो करना चाहिए था, वह किया था क्या? नहीं किया था। फिर क्या मतलब है? नहीं, हम तो पूजा करने मात्र से बन जाएँगे। नहीं भाईसाहब, ऐसा नहीं हो सकता। आप वास्तविकता को समझिए तो सही। यहाँ आ करके भी वास्तविकता को नहीं समझेंगे, आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद भी वास्तविकता और सच्चाई अगर आपकी समझ में न आ सकी, तो इसमें प्रवेश करने का क्या फायदा हुआ? आप अज्ञान में ही फँसे रहे, भ्रम में ही फँसे रहे और आप अज्ञान और भ्रमों को ही छाती से लगाए रहे, तो क्या बात बनी? आप यहाँ अध्यात्म को सच्चाई का प्रतीक मानिये और यह मानकर चलिए कि कर्मफल एक वास्तविकता है और उसमें जो भूतकाल के कर्म हैं, वह भी ज्यों के त्यों हैं।

🔷 पिताजी ने आपके लिए कर्ज लिया था और उससे आपने डिग्री हासिल की थी, लेकिन पिताजी के मरने के बाद में वह डिग्री आपको भुगतानी पड़ेगी, चाहे आपका मकान बिके या आपकी जमीन बिके। साहब हम तो क्षमा माँगेंगे, पुरानी बात तो पुरानी हो गई। पुरानी बात कैसे हो गई? बैंक से आप कर्जा लाए थे और बैंक का कर्जा बढ़ते-बढ़ते दुगुना हो गया है, अब आप चुकायेंगे कि नहीं, चुकायेंगे। नहीं साहब, बैंक मैनेजर से प्रार्थना करेंगे, हाथ जोड़ेंगे, पैर छुएँगे, पंचामृत पिलाएँगे और माफ करा लेंगे। आप यह बेकार की बात मत कीजिए। बेकार की बात करने से आपको भ्रमित, घृणित और अज्ञानियों की श्रेणी में गिना जाएगा।

🔶 आप भ्रमग्रस्त मत रहिए और अज्ञानियों की श्रेणी में अपने आपको शामिल मत कराइए। भूतकाल के पापों से या भूतकाल की घटनाओं से आप प्रभावित हैं, तो भूतकाल को मजाक में नहीं उड़ा सकते। भूतकाल में जो आपने किया था, लड़ाई-झगड़े किए थे, किसी आदमी का कत्ल कर दिया था, तो आप पर मुकदमा चलेगा और आप फाँसी के लिए तैयार रहिए। नहीं साहब, भूतकाल को छोड़िए, जो मार डाला, सो मार डाला और मर गया, सो मर गया। आप यों कहेंगे कैसे? भूतकाल ऐसे मजाक की चीज है? मजा की चीज नहीं है। आप ऐसा मत कीजिए। आप वास्तविकता से इतनी दूर रहेंगे, तो फिर वहाँ नहीं पहुँच सकेंगे, जहाँ आपको वास्तविकता के सहारे पहुँचना है। पापों का प्रायश्चित एक बहुत बड़ी बात है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 62)

👉 मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यम्

🔶 इस सत्य को बताने वाली एक बहुत ही प्यारी घटना है, जिसे जानकर शिष्यगणों को सहज ही गुरुदेव की महिमा का बोध होगा। यह सत्य घटना बंगाल के महान साधक सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के बारे में है। बनर्जी महाशय उन दिनों सर्वेयर के पद पर कार्यरत थे। इस पद पर उनकी आमदनी तो ठीक थी। पर पारिवारिक जीवन समस्याओं से घिरा था। पहले बेटी का मरना, फिर पत्नी का लम्बी बीमारी के बाद देहत्याग! इन विषमताओं ने उन्हें विचलित कर दिया था। ऐसे में उनकी मुलाकात महान् सन्त सूर्यानन्द गिरी से हुई। सुरेन्द्र नाथ के विकल मन ने सन्त की शरण में छाँव पाना चाहा। इसी उद्देश्य से वह उन संन्यासी महाराज की कुटिया में गए और दीक्षा देने की प्रार्थना की।

🔷 इस प्रार्थना को सुनकर संन्यासी महाराज नाराज हो गए और उन्हें डपटते हुए बोले-  ‘आज तक तुमने सत्कर्म किया है, जो मेरा शिष्य बनना चाहते हो। जाओ पहले सत्कर्म करो।’ उनकी इस झिड़की को सुनकर सुरेन्द्रनाथ विचलित नहीं हुए और बोले- आज्ञा दीजिए महाराज! संन्यासी सूर्यानन्द गिरी ने कहा- इस संसार में पीड़ित मनुष्यों की संख्या कम नहीं है। उन पीड़ितों  की सेवा करो। जो आज्ञा प्रभो! सुरेन्द्र नाथ ने कहा- मैंने सम्पूर्ण अन्तस् से आपको अपना गुरु माना है, आपके द्वारा कहा गया प्रत्येक वाक्य मेरे लिए मूलमंत्र है। आपके द्वारा उच्चारित प्रत्येक अक्षर मेरे लिए परा बीज है।

🔶 ऐसा कहकर सुरेन्द्रनाथ कलकत्ता चले आए और अभावग्रस्त, लाचार, दुःखी मनुष्यों की सेवा करने लगे। उन्हें अस्पताल ले जाकर भर्ती करने लगे। निराश्रितों के सिरहाने बैठकर सेवा करते हुए वे गरीबों के मसीहा बन गए। धीरे-धीरे पास की सारी रकम समाप्त हो जाने पर वे कुली का काम करने लगे। उससे जो आमदानी होती, उससे अपाहिजों की सहायता करने लगे। ऐसी दशा में उनके कई वर्ष गुजर गए। इस बीच संन्यासी सूर्यानन्द गिरी से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई।

🔷 एक दिन जब वे कुली का काम करके जूट मिल से बाहर निकले, तो देखा कि सामने गुरुदेव खड़े हैं। सुरेन्द्र के प्रणाम करते ही उनसे गुरुदेव ने कहा-सुरेन्द्र, तुम्हारी परीक्षा समाप्त हो गयी है, अब मेरे साथ चलो।  इस आदेश को शिरोधार्य करके वे चुपचाप गुरु  के पीछे-पीछे चल पड़े। गुरुदेव उन्हें बंगाल, आसाम पार कराते हुए बर्मा के जंगलों में ले गए। यहीं से उनकी साधना का क्रम शुरू हुआ। गुरु- कृपा से वह महान् सिद्ध सन्त महानन्द गिरी के नाम से प्रसिद्ध हुए। परवर्ती काल में जब कोई उनसे साधना का रहस्य जानना चाहता, तो वे एक ही बात कहते, ‘मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं’ गुरु वाक्य मूल मंत्र है। इसकी साधना से सब कुछ स्वयं ही हो जाता है। सचमुच ही गुरुदेव की महिमा अनन्त व अपार है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 99

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८१)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि...