शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ९)

भक्ति से व्यक्तित्व बन जाता है अमृत का निर्झर
    
क्रतु के इस सूत्र को थाम कर भृत्सभद कहने लगे- ‘‘कितने दारूण थे सागर मन्थन के प्रारम्भिक पल। अमृत की आस में देव और असुर दोनों ही महासागर को मथ रहे थे। भगवान् कूर्म की पीठ पर मन्दराचल घूम रहा था। उसके घर-घर के रव से ब्रह्माण्ड आलोड़ित था। सभी आशान्वित थे कि रत्नाकर के गर्भ से अमृत निकलेगा, परन्तु निकला महाविष। अमृत के आकांक्षी तो सभी थे, परन्तु विष की ज्वाला में जलने को कोई भी  तैयार न था। निखिल सृष्टि त्राहि-त्राहि करने लगी। प्राणि मात्र में व्याकुलता फैल गयी। जन्तुओं की कौन कहे, इस विष के आतप से वनस्पतियाँ भी झुलसने लगीं। सभी को केवल एक ही तारणहार दिखे- भगवान् सदाशिव। सब के सब भागे-भागे उन्हीं के पास गए। उस समय उन प्रभु की चेतना पराचेतना की भक्ति में लीन थी। भक्ति की भावसमाधि में डूबे थे भगवान्। माता जगदम्बा चित्शक्ति उनकी सेवा में लीन थीं। उन्होंने देवों-असुरों, ऋषियों के मुख से यह व्यथा सुनी। प्रेममयी सृष्टिजननी अपनी सन्तानों की पीड़ा से व्याकुल हो गयीं।
    
उन्होंने ही भगवान् भोलेनाथ को समाधि से व्युत्थित किया। प्रभु समाधि से जागे। उनके नेत्रों से करुणा झर रही थी। सभी की व्यथा ने उन्हें द्रवित कर दिया। उस समय उन महादेव को जिसने भी देखा उसी ने अनुभव किया कि भक्ति में केवल भावों की सजलता ही नहीं महाशक्ति की प्रचण्डता भी रहती है।’’ अपनी बात कहते-कहते महर्षि भृत्समद एक पल के लिए ठिठके और बोले- ‘‘उस समय आप भी तो थे देवर्षि, आप भी कुछ कहें।’’ ऋषि भृत्समद की वाणी ने परम भागवत नारद की स्मृतियों को कुरेदा। वे कहने लगे- ‘‘तप तो सभी करते हैं, देव, दानव, मानव, परन्तु इनका तप इनकी अहंता-ममता के इर्द-गिर्द ही रहता है, उसमें शिवमयता नहीं होती। जबकि भगवान शिव का तप पल-पल सृष्टि में प्राणों का संचार करता है। उसकी ऊष्मा एवं ऊर्जा से सृष्टि को गति एवं लय मिलती है।    
    
उन पलों में भी जब सृष्टि की लय बिगड़ रही थी, इसकी गति का क्रम टूट रहा था। डमरूधर, शूलपाणि भगवान सृष्टि का शूल हरने के लिए उठ खड़े हुए और क्षणार्द्ध से भी कम समय में वहाँ जा पहुँचे, जहाँ सागरमंथन का उपक्रम हो रहा था। उन्हें देखकर सभी के मन में आशा का सूर्य उगा। भोलेनाथ ने महाज्वाला उगलते उस महाविष को देखा और एक ही क्षण में उसे निगल गये। उस क्षण ऐसा लगा जैसे कि सब कुछ थम गया। जो उनकी महिमा से सुपरिचित थे, वे शान्त रहे, परन्तु जो शंकालु थे, वे सोच में पड़ गये। उन्होंने यह भी सोच लिया कि कहीं स्वयं सदाशिव भी तो इस विष-ज्वाला से नहीं झुलस जायेंगे।    
    
लेकिन जिसे भावभक्ति ने अमर कर दिया हो उसे भला विष स्पर्श भी क्या करेगा। जिसके हृदय में भक्ति की पवित्र ज्योति जलती है उसे संसार का अंधेरा छू भी नहीं सकता। सागरमंथन के समय सभी ने भगवान शिव की भक्ति का चमत्कार देखा। सभी ने उनके महातप की महिमा को पहचाना। सभी ने जाना- जहाँ सारी शक्तियाँ, दिव्य विभूतियाँ निरर्थक, निस्सार सिद्ध होती हैं, वहाँ केवल भक्ति की सार्थकता ही समर्थ सिद्ध होती है। भक्तिगाथा में उभरे इस शिवतत्त्व के मानसिक संस्पर्श ने सभी को दिव्य अनुभूति से भर दिया। सबके सब शिव स्मरण में लीन हो उठे-
यस्याङ्के च विभाति भूधरसूता च गरलं देवावभ्रामस्तके,
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा,
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशंकरः पातुमाम्॥        
    
जिनके अंक पर माँ हिमाचल सुता, मस्तक पर गंगा जी, ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा, कण्ठ में हलाहल विष, वक्षःस्थल पर सर्पराज श्री शेष जी सुशोभित हैं; वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर भक्तों के पापनाशक, सर्वव्यापक, कल्याणरूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्री शंकरजी सदा मेरी रक्षा करें।    
    
भावभरे इस गायन ने हिमालय के कण-कण को आन्दोलित कर दिया। सभी के अंतस् में विद्यमान भक्तितत्त्व सघन होने लगा और फिर पलों में ही स्तुतिगान में वर्णित स्वरूप लेकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हो गये। उनके साथ पराम्बा भी थीं। उन्होंने सभी को आशीष दिया- ‘‘तुम सभी का कल्याण हो, तुम सब सदा-सदा संसार में कलुषित हो रही भावनाओं को निर्मल बनाने में सहायक  बनो। भगवान शिव एवं माता जगदम्बा का यह आशीष पा कर सभी के अंतस् भक्ति से भीगे थे। देवर्षि नारद की चेतना तो एक गहरी भावसमाधि में डूब गयी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २२

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ९)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

यह बात कहने, सुनने और जानने, मानने में बड़ी विचित्र लगेगी कि संसार के किसी पदार्थ में कोई रंग नहीं है। हर वस्तु रंग रहित है। किन्तु यह विशेषता अवश्य है कि प्रकाश की किरणों में जो रंग है उनमें से किसी को स्वीकार करें किसी को लौटा दें। बस इसी कारण हमें विभिन्न वस्तुएं विभिन्न रंगों की दीखती हैं। पदार्थ जिस रंग की किरणों को अपने में सोखता नहीं वे उससे टकराकर वापिस लौटती हैं। वापसी में वे हमारी आंखों से टकराती हैं और हम उस टकराव को पदार्थ का अमुक रंग होने के रूप में अनुभव करते हैं। पौधे वस्तुतः हरे नहीं होते, उनका कोई रंग नहीं, हर पौधा सर्वथा बिना रंग का है, पर उसमें प्रकाश की हरी किरणें सोखने की शक्ति नहीं होती अस्तु वे उसमें प्रवेश नहीं कर पाती। वापिस लौटते हुये हमारी आंखों को इस भ्रम में डाल जाती हैं कि पौधे हरे होते हैं। हम उसी छलावे को शाश्वत सत्य मानते रहते हैं और प्रसंग आने पर पूरा जोर लगाकर यह सिद्ध करते रहते हैं कि पौधे निश्चित रूप से हरे होते हैं। कोई उससे भिन्न बात कहे तो हंसी उसी की बुद्धि पर आवेगी, भ्रांत और दुराग्रही उसी को कहेंगे। यह जानने और मानने का कोई मोटा आधार दिखाई नहीं पड़ता है कि हमारी ही आंखें धोखा खा रही हैं—प्रकृति की जादूगरी, कलाबाजी हमें ही छल रही हैं। पेड़ का तो उदाहरण मात्र दिया गया। हर पदार्थ के बारे में हम रंगों के सम्बन्ध में ऐसे ही भ्रम जंजाल में जकड़े हुए हैं। जिन आंखों को प्रामाणिक मानते हैं, जिस मस्तिष्क की विवेचना पर विश्वास करते हैं यदि वही भ्रमग्रस्त होकर हमें झुठलाने लगें तो फिर हमारा ‘प्रत्यक्षवाद’ को तथ्य मानने का आग्रह बेतरह धूल धूसरित हो जाता है।

हमारी दृष्टि में काला रंग सबसे गहरा रंग है और सफेद रंग कोई रंग नहीं है। पर यथार्थता इस मान्यता से सर्वथा उलटी है। किसी भी रंग का न दीखना काला रंग है और सातों रंगों सम्मिश्रण सफेद रंग। अंधेरा वस्तुतः ‘कुछ भी नहीं’ कहा जा सकता है जबकि वह घेर-घना छाया दीखता है और उसके कारण कुछ भी सूझ न पड़ने की स्थिति आ जाती है। वैशेषिक दर्शन ने अंधेरे को कोई पदार्थ मानने से इनकार किया है, जबकि दूसरे दार्शनिक उसे एक तत्व मानने का जोर-शोर से प्रतिपादन करते हैं। कालापन सभी प्रकाश किरणों को अपने भीतर सोख लेता है। फलतः हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़ता है और अंधेरे में ठोकर खाते हैं—घनी कालिमा छाई देखते हैं।

किसी भी रंग की किरणें सोख सकने में जो पदार्थ सर्वथा असमर्थ हैं वे ही हमें सफेद दीखते हैं। कारण यह है उनसे टकरा कर तिरस्कृत प्रकाश तरंगें वापस लौटती हैं और उनके सातों रंगों का सम्मिश्रण हमारी आंखों को सफेद रंग के रूप में दीखता है। कैसी विचित्र, कैसी असंगत और कैसी भ्रम जंजाल भरी विडम्बना है यह। जिसे न उगलते बनता है न पीते। न स्वीकार करने को मन होता है अस्वीकार करने का साहस। अपने ही अपूर्ण उपकरणों पर क्षोभ व्यक्त न करते हुये मन मसोस कर बैठना पड़ता है। वैज्ञानिक सिद्धियों को अस्वीकार कैसे किया जा सकता है। हलका, भारी, गहरा, उथला कालापन भी एक पहेली है। अन्धकार कहीं या कभी बहुत गहरा होता है और कहीं या कभी उसमें हलकापन रहता है यह भी उतने अंशों में प्रकाश को सोखने न सोखने की क्षमता पर निर्भर रहता है। काले रंग में प्रकाश का सारा अंश सोख लेने की क्षमता का एक प्रमाण यह है कि वह धूप में अन्य पदार्थों की अपेक्षा अधिक मात्रा में और अधिक जल्दी गरम होता है।

अब एक नया प्रश्न उभरता है कि प्रकाश किरणों में रंग कहां से आता है? इस स्थल पर उत्तर और भी विचित्र बन जाता है। प्रकाश लहरों की लम्बाई का अन्तर ही रंगों के रूप में दीखता है। वस्तुतः रंग नाम की कोई चीज समस्त विश्व में कहीं कुछ है ही नहीं। उसका अस्तित्व सर्वथा भ्रामक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १३
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 तौर बदलना होगा


सुनो साथियों, समय कठिन है, संभल-संभल कर चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रिय जन, अब तो तौर बदलना होगा।।

है विनाश की काली छाया, दुनिया में दहशत फैलाया।
यह अदृश्य होकर है लड़ता, छुपा हुआ दुश्मन है आया।।
जीवन पर संकट आया है, हर क्षण हमें संभलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

शत्रु है यह बड़ा सयाना, तनिक नहीं इससे घबराना।
सावधान होकर  है लड़ना, हम सबको है  इसे हराना।।
श्वास-प्राण से युद्ध है इसका, मास्क लगाकर चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

प्राणायाम है बहुत जरुरी, नींद करो अपनी सब पूरी।
सट कर मत चल मेरे भाई, दो गज दुरी बहुत जरुरी।।
इधर उधर न छूना कोई, हाथ समय पर धोना होगा।   
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन,अब तो तौर बदलना होगा।।

गरम गुनगुना पानी पीओ, सर्दी खांसी रहित हो जिओ।
हल्दी का दूध सबसे उत्तम, रोज रात में कप भर पीओ।।    
प्रण लो भाई बिना काम के, घर से नहीं निकलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

हंसी ख़ुशी जीवन है जीना, सदा संतुलित भोजन लेना।
डॉक्टर के सलाह लेकर ही, कोई भी ओषधि  है लेना।।
जीत हमारी सदा सुनिश्चित, सावधान हो चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

उमेश यादव

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रह...