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शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (अन्तिम भाग)

🔶 भारत के नागरिकों की कारों, मोटर साइकिल और यहां तक कि रिक्शों, तांगों में गाते हुए रेडियो सेट तथा ट्रांजिस्टरों को देखकर संसार का कौन-सा देश इस बात पर विश्वास कर लेगा कि भारत एक गरीब देश है और मित्रों की सहायता का अधिकारी है? और यदि वह उसको गरीब समझ कर उसके कारणों पर सोचेगा तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि भारत की गरीबी के प्रमुख हेतुओं में से एक उसके नागरिकों की, फैशनपरस्ती और फिजूलखर्च है। यह एक राष्ट्रीय अपमान है, देश की गौरव गरिमा पर लांछन है। इस पर हम सबको और खासतौर पर भारतीय नौजवानों को गम्भीरता से विचार ही नहीं करना है बल्कि अपनी बालवृत्तियों में सुधार कर कलंक मिटाने का प्रयत्न करना है। यदि हम कपड़ों लत्तों में फैलसूफ हैं तो अपने परिवार वालों अथवा परोक्ष रूप से अपने अनेक देश बन्धुओं को नंगा रहने पर मजबूर करते हैं।

🔷 सुन्दरता, वस्त्रों अथवा वेशविन्यास की विचित्रता अथवा अपव्ययता में नहीं है वह व्यवस्था एवं करीने में है। मोटे तथा सस्ते कपड़े भी यदि ठीक सिले-धुले और पहने गये हैं तो वे मनुष्य के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देंगे। अपनी तथा अपने देश काल के अनुसार ही रहन-सहन रखना बुद्धिमानी, भद्रता तथा सज्जनता है। फैशन के नशे में सब कुछ समझने पर भी पैसा खोना सरासर नादानी है। उस पैसे को बचाकर हम सबको अपने-अपने परिवार तथा राष्ट्र की उन्नति पर खर्च कर जीवन से प्रदर्शन का कलंक धो डालने में ही कल्याण है, शोभा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 112

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 3)

🔷 इन जलते राष्ट्रीय सत्यों को भारतीय नौजवान वर्ग नहीं समझ पा रहा और न वह तब तक समझ ही पायेगा जब तक प्रयत्नपूर्वक उसके मस्तिष्क में यह विचार नहीं भरे जायेंगे कि फैशनपरस्ती मानसिक न्यूनता का द्योतक है, आन्तरिक दरिद्रता का विज्ञापन है। उसका यह विचार कि बनाव-शृंगार अथवा प्रदर्शनपूर्ण, वेश-विन्यास से वह अपने व्यक्तित्व को ऊंचा कर रहा है—भ्रमपूर्ण है। बाहरी आडम्बरों से विरचित व्यक्तित्व स्वयं इसका गवाह है कि व्यक्ति व्यक्तित्वहीन है, ओछा और बालवृत्ति वाला है। मनुष्य का व्यक्तित्व आत्मा की उच्चता है जो चेहरे पर आकर्षण बन कर बोलती है वस्त्रों की तड़क-भड़क व्यक्तित्व की छटा नहीं है और न उससे किसी के हीन व्यक्तित्व में महानता का समावेश ही होता है। उसे यह भ्रान्त धारणा हृदय से निकाल देनी चाहिए कि वेशविन्यास की विलक्षणता उसे विलक्षण सिद्ध कर सकेगी।

🔶 मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास, विद्या, बुद्धि तथा आत्मा की उत्कृष्टता का अनुगामी है। व्यक्तित्व विकास के लिये कपड़ों लत्तों का सहारा लेना एक घातक फिजूलखर्ची है। इस प्रकार के सार्थक विचार विश्वास से ही नवयुवक वर्ग कुछ सोचने समझने में समर्थ हो सकेगा नहीं तो आधुनिकता के अपनाने में वह प्रदर्शन की मरु-मरीचिका में ही भटकता रहेगा।

🔷 आज किसी भी देश के नागरिकों के लिए किसी भी देश के द्वार बन्द नहीं हैं। सब जगह जा सकते हैं। किसी देश की कोई भी बात किसी से छिपी नहीं है। संसार के उन्नतिशील देशों के नागरिक जब भारत के निरक्षर लोगों को सूट, पैंट पहने और टाई, चश्मा लगाये देखते होंगे तो उनकी बालबुद्धि पर हंसते हुए क्या यह न कहते होंगे कि आज के सभ्य युग में भी भारतीय कितने असभ्य हैं कि वे पहनने ओढ़ने की आवश्यकता तथा चीजों के उपयोग का भी ज्ञान नहीं रखते। जब किसी प्रगतिशील देश वाले यहां के लोगों को फटी चप्पल, सिकुड़ी पेन्ट पहनने और हाथ में ट्रांजिस्टर लटका देखते होंगे तो क्या मन ही यह उपहास से न मान जाते होंगे कि भारतीय अत्यधिक महत्वपूर्ण उपयोग की चीज को भी खिलौना समझते हैं और कोई आवश्यकता न होने पर भी उसे बचकाने मोह के साथ हाथ में लिए घूमते हैं। वे यह भी नहीं जानते कि किसी चीज का अपना एक मूल्य, महत्व तथा समय होता है उसका अपना एक स्थान होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 111

बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 2)

🔶 ट्रांजिस्टर रेडियो तो आज के भारतीय नौजवानों का ‘बगल-बच्चा’ बन गया है। जिसे देखो, बैग की तरह लटकाये, झोले की तरह कन्धे पर डाले, पुस्तक की तरह हाथ में लिए अथवा किसी बड़े पूजा-पात्र की तरह दोनों हाथों में संभाले घूम रहा है, जब कि उनके पास उसका कोई उपयोग नहीं है। महज एक फैशन तथा दिखावा भर है। अन्य नागरिकों को तो छोड़ दीजिए न जाने कितने रिक्शे, तांगे वाले, ट्रांजिस्टर सेटों को अपने तांगों तथा रिक्शों में लटकाये दीखते हैं। इस प्रकार के बचकाने फैशन बनाने अथवा प्रदर्शनों में लोग कौन सा सौन्दर्य और कौन-सी विशेषता समझते हैं? उन्हें अपने तथा अपनी इन क्रियाओं के बीच असंगति का भी तो बोध होता नजर नहीं आता। वे यह बात तनिक भी तो अनुभव नहीं कर पाते कि उनका यह मूर्खतापूर्ण प्रदर्शन उनको उपहासास्पद बना देता है।

🔷 पहनावों तथा कपड़ों का फैशन तो आज पराकाष्ठा से भी आगे निकल गया है। कपड़ों की किस्मों की यदि आज सूची बनाई जाये तो वह एक बड़े पुराण से भी मोटा ग्रन्थ बन जायेगा और इससे भी मोटी वस्त्रों की सिलाई के प्रकारों की सूची बनेगी। आज शायद ही कोई ऐसा बदकिस्मत फूल अथवा फिल्म ऐक्टर-ऐक्ट्रैस हो। इतना ही नहीं साधु-सन्तों के रामनामी दुपट्टों की तरह अभिनेताओं के नामांकित कपड़े पहनने में लोग गौरव अनुभव करते हैं। फिल्मों के दृश्य तक आज नौजवानों के वस्त्रों पर अंकित देखे जा सकते हैं। जहां कभी अधिक से अधिक कपड़ों पर फूल-पत्तियां हंस, मयूरों अथवा पेड़ पौधों की छाप हुआ करती थी और जिनको भी भद्र लोग पसन्द नहीं करते थे, वहां आज अश्लील फिल्मों के अश्लील चित्र छपे दिखलाई देते हैं और नौजवान नागरिक उन्हें शौक से पहनते और शान समझते हैं। न जाने क्या हो गया है इस भारत को—भारत के नौजवान वर्ग को?

🔶 आज का भारतीय नौजवान यह क्यों नहीं सोच पाता कि उसका देश गरीब है, आज उसे उसकी फैशनपरस्ती की आवश्यकता नहीं है, उसे जरूरत है उसकी मेहनत, मशक्कत और परिश्रम-परिश्तिस की! उसे इस बात से आत्मग्लानि क्यों नहीं होती कि आज उसका अर्धनंगा भूखा राष्ट्र अन्य राष्ट्रों से अन्न की भीख मांग रहा है और वह इस प्रकार के फिजूलखर्च फैशन प्रदर्शन में अन्धा बना हुआ है! वह यह जानने समझने की कोशिश क्यों नहीं करता कि वह जिस देश का नागरिक है और जिसके उत्थान पतन का कुछ दायित्व उसके कन्धों पर भी है, उसकी औसत आय पांच-छः आना प्रति-दिन से अधिक नहीं है। आज उसके टूटी सड़कों और फूटे मकानों वाले देश में टेरालीन, डेकरौन और नाइलौन जैसे कपड़ों की क्या शोभा है? धूल उड़ाती गलियों और दुर्गन्धित बस्तियों के बीच उसके इन वस्त्रों की क्या संगति है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 110

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

👉 फैशन का कलंक धो डालिये (भाग 1)

🔷 यह बात सही है कि कोई भी मनुष्य नहीं चाहता है कि वह किसी दूसरे की दृष्टि में भद्दा, कुरूप अथवा अनाकर्षक लगे। प्रत्येक व्यक्ति की यही इच्छा रहती है कि वह देखने वालों की नजरों में समाये। लोग उसे देख कर अनुभव करें कि यह कायदे-करीने का विशेष व्यक्ति है। यथा-शक्य दर्शनीय बनने का लोग प्रयत्न भी करते हैं।

🔶 आकर्षक दिखाई देने की इच्छा अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। हर प्रबुद्ध प्राणी सौन्दर्य-प्रेमी होता है। जब हम या आप ऐसी वेश-भूषा में दीखते हैं जो आकर्षक हो तो एक प्रकार से लोगों की सौन्दर्य दृष्टि को सन्तुष्ट करते हैं, उन्हें प्रसन्न करते हैं, जिससे सद्भाव एवं सौहार्द का वातावरण उत्पन्न होता है। समाज में स्वच्छता, सुन्दरता और समीचीनता की प्रवृत्तियां बढ़ती हैं। इसलिए भली प्रकार का रहन-सहन किसी प्रकार से आलोचना का विषय नहीं माना जाता।

🔷 किन्तु जब यही अच्छी बात अपनी अपेक्षित सीमा के बाहर चली जाती है, तब बुराई की संज्ञा पाकर आक्षेप का विषय बन जाती है।

🔶 आज ढंग से रहने-सहने का अर्थ फैशन मान लिया गया है। अधिक से अधिक प्रदर्शन के साथ सजे बजे रहने में ही सुन्दरता, सुरूपता तथा आकर्षण का निवास समझना आज की एक विशेष अल्पज्ञता है। अंग्रेजी का ज्ञान तो दूर—भाषा का भी एक अक्षर न जानने वाले निरक्षर व्यक्ति तक कोट-पैंट, टाई और हैट-बूट में देखे जाते हैं। जाने कितने लोग बेजरूरत सैर-सपाटे और दिखावे के ही लिए मोटरें, बघ्घियां, हाथी, घोड़े आदि सवारियों को रखा करते हैं। अनेक बड़े आदमी अपनी मोटरकारों में रेडियो, ट्रांजिस्टर लगाये हुये शहर की सड़कों पर बजाते हुए चले जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 109
 

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 4)

🔶 बहुत से धार्मिक कहे जाने वाले चित्र भी इसी श्रेणी में आते हैं। सीता-राम, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, लक्ष्मी-विष्णु आदि युगल देवों के चित्र बहुधा बड़े ही अश्लील रूप में, अर्धनग्न या गन्दे हाव भावों के साथ मिलते हैं। चित्रकार एवं प्रकाशक का इनके पीछे क्या उद्देश्य रहता है इसकी हम चर्चा नहीं करना चाहते लेकिन साफ रूप से इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अन्य भद्दे चित्रों की तरह ये चित्र भी मनुष्य को भद्दी प्रेरणा देते हैं। बहुत से मन्दिर में देव मूर्तियां भी अश्लील स्थिति में बनी रहती हैं, वे भी इसी श्रेणी में आती हैं।

🔷 कोई भी चित्र, दृश्य चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक कलाकृति हो या किसी चलचित्र का अंश यदि वह अश्लील, भद्दा और फूहड़ है तो उससे बचने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि इनसे मनुष्य में पाशविक प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलता, जागृत होती हैं। दूषित कामनायें भड़क उठती हैं, गन्दी प्रेरणायें मिलती हैं जो मनुष्य के चरित्र-आचरण, स्वभाव, प्रकृति को दूषित बना देते हैं।

🔶 अपने निवास स्थान, अध्ययन कक्ष, दुकान कहीं के भी लिए आदर्श चित्रों का चुनाव करें। जिन पर उठते बैठते, चलते फिरते हर समय आपकी नजर पड़ती रहे। इनसे आप को उत्कृष्ट प्रेरणा मिलेगी। अच्छे चित्र, अच्छी पुस्तक का प्रभाव तो उसे पढ़ने उस पर मनन चिन्तन करने पर ही पड़ता है लेकिन चित्र तो देखने पर ही मनुष्य को प्रभावित करता है। गन्दे-अश्लील चित्र देखने से बचें। गांधीजी के बन्दर की तरह बुराई की ओर से आंख मीच लें और अच्छाई को देखें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 139

शनिवार, 29 सितंबर 2018

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 3)

🔷 चित्र दर्शन की इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझकर ही हमारे पूर्वजों ने नित्य मन्दिरों में भगवान की मूर्ति के दर्शन, साधु महात्माओं के दर्शनों का विधान बनाया होगा। एक भारतीय नागरिक का धर्म कर्तव्य है कि वह प्रातः सायं भगवान् तथा गुरुजनों के दर्शन करें उन्हें प्रणाम करें। सोने पूर्व, उठने पर शुभ दर्शन एक आवश्यक धर्म कर्तव्य माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे धार्मिक चित्र बहुत समय से हमें उच्च आदर्शों, सामाजिक मर्यादाओं त्याग, वैराग्य, संयम, बल, पौरुष, कर्तव्य आदि की उत्कृष्ट प्रेरणा देकर आत्म-विकास की ओर अग्रसर करते रहे हैं।

🔶 खेद है आज कला के नाम पर, चलचित्रों के माध्यम से, धन के लोभ के लिये समाज में बहुत ही भद्दे अश्लील चित्रों की बाढ़ सी आ गई है। यत्र-तत्र बाजार में इस तरह के चित्र अधिक मिलते हैं जिनमें दूषित हाव-भाव, भड़कीले पोशाक शारीरिक अंगों का फूहड़ प्रदर्शन मुख्य होते हैं। सिनेमा में तो अभिनेता और अभिनेत्रियों के अर्धनग्न शरीर उनकी अश्लील मुद्रायें भड़काने वाले तथा कथित ‘ऐक्टिंग‘ दर्शक पर कैसा प्रभाव डालता होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। समाज में बढ़ती हुई अश्लीलता, फूहड़पन, फैशनपरस्ती का एक कारण सिनेमा में दिखाये जाने वाले भद्दे चित्र भी हैं।

🔷 बाजार में खुले आम इस तरह की पत्र-पत्रिकायें बिकती देखी जा सकती हैं जिनमें बहुत ही गन्दे उत्तेजित चित्र होते हैं। भोले-भाले, अनुभवहीन यौवन में पैर रखने वाले युवक इनसे बहुत जल्दी ही प्रभावित हो जाते हैं। पैसा खर्च करके खरीदते हैं लेकिन ये गन्दे चित्र उनमें कामोत्तेजना भड़काने, कई दुर्गुण पैदा करने का बहुत बड़ा काम करते हैं। एक बुराई से अनेकों बुराइयां पैदा होती हैं और पतन का पथ प्रशस्त बन जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 138

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 2)

🔶 शान्त गम्भीर मुद्रा में महान् तत्व के चिंतन में लीन किसी महापुरुष का चित्र देखकर उससे मनुष्य को गम्भीरता शान्ति की प्रेरणा मिलती है। किसी वीर योद्धा का चित्र देख कर हृदय में शौर्य और साहस के भाव उत्पन्न होते हैं। किसी जनसेवी, परमार्थ परायण शहीद की प्रतिमा देख कर समाज के लिए मर मिटने की भावना जागृत होती है। किसी देवी-देवता या अवतार की प्रतिमा देखकर, किसी मन्दिर, मस्जिद, गिर्जाघर में जाने पर, परमात्मा और उसके दिव्य गुणों का स्मरण होता है। ठीक इसी तरह भद्दे अश्लील कहे जाने वाले, अर्द्धनग्न, असामाजिक, हाव भाव मुद्रा तथा शारीरिक अंगों के भड़कीले प्रदर्शन वाले चित्र मनुष्य में कई नैतिक बुराइयां पैदा करते हैं। उसकी पाशविक वृत्तियों को जगाकर बुराइयों की ओर प्रेरित करते हैं। कोई भी गन्दा या अश्लील चित्र-दृश्य देखने पर मनुष्य के मन में भी गन्दगी, अश्लीलता भड़क उठती है।

🔷 किसी भी चित्र को बार-बार देखने पर उसमें निहित विचार, आदर्शों की छाप मनुष्य में गहरी होती जाती है। ऐसी स्थिति में कोई दृश्य विशेष उसके सामने न हो तब भी उसकी कल्पना मानस पटल पर पूरा चित्र अंकित कर लेती है, पूर्व स्मृति के आधार पर और वैसी ही प्रेरणा मनुष्य को देती है, जब भी मनुष्य का मन विश्राम में होता है तो पूर्व में देखे गए चित्रों, दृश्यों की कल्पना जागृत होकर उस समय उन्हें प्रत्यक्ष देखने जैसी अनुभूति होती है। इसलिए चित्रों को देख लेने से ही बात समाप्त हो जाती हो ऐसा नहीं है। वे धीरे-धीरे मानव प्रकृति के अंग बन जाते हैं और उसे समय-समय पर वैसी ही प्रेरणा देते रहते हैं। अन्तर में छिपी पड़ी इन प्रेरणाओं के अनुसार बहुधा मनुष्य काम भी करने लगता है।

🔶 इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम जो कुछ भी देखते हैं उसका हमारी प्रकृति, व्यवहार-आचरण आदि पर भारी प्रभाव पड़ता है। अच्छे चित्र देखने पर जीवन में अच्छाइयां पैदा होती हैं। बुरे चित्र देखने पर बुराइयां। आवश्यकता इस बात की है कि बुरे चित्र, बुरे दृश्य देखने के बजाय उधर से आंख मींच लेना, बुराइयों को न देखना ही श्रेयस्कर होता है। गांधीजी के आंख मीचने वाले बन्दर से हमें यही प्रेरणा मिलती है।

🔷 अच्छे या बुरे चित्रों का चुनाव करना हमारी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। यदि हमें अपने जीवन में अच्छे आदर्श, उच्च प्रेरणा, दिव्य गुणों को प्रतिष्ठापित करना हो तो इस सम्बन्ध में अच्छे चित्रों का चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। महापुरुषों के, शहीदों के, तपस्वी त्यागी सन्त महात्माओं के चित्र ढूंढ़ने पर सफलता से मिल जाते हैं। इसी तरह की कोई उत्कृष्ट ऐतिहासिक घटनाओं, त्याग बलिदान का दृश्य जिनमें अंकित हों ऐसे चित्र भी मिल जाते हैं। प्रेरणा-प्रद आदर्श वाक्यों का चुनाव भी अच्छे चित्रों का काम दे सकता है। इस तरह हम उत्कृष्ट चित्रों का संग्रह करके अपनी जीवन शिक्षा की महत्वपूर्ण सामग्री जुटा सकते हैं इनसे हमें उठते-बैठते सोते जागते उत्कृष्ट प्रेरणा, महान शिक्षा मिल सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 137

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 1)

🔷 आपने कहीं न कहीं महात्मा गांधी के साथ या अलग से उन तीन बन्दरों का चित्र अवश्य देखा होगा जिसमें एक बन्दर दोनों हाथों से अपनी आंख बन्द किए है। जिसका तात्पर्य है ‘‘बुरी बात मत देखो’’ ‘‘बुराई की तरफ से अपनी आंखें बन्द करलो’’। किसी चित्र या दृश्य को देख कर उससे संबंधित अच्छाई या बुराई का प्रभाव अवश्य पड़ता है। बुरे चित्र देखने पर बुराइयां और अच्छे दृश्य देखने पर अच्छाइयां पनपती हैं।

🔶 वस्तुतः जो कुछ भी हम देखते हैं उसका सीधा प्रभाव हमारे मन में और मस्तिष्क पर पड़ता है। किसी चित्र या दृश्य विशेष को बार बार देखने पर उसका सूक्ष्म प्रभाव हमारे अन्तर मन पर अंकित होने लगता है। और जितनी बार उसे देखा जाता है उतना ही वह स्थाई और परिपक्व बनता जाता है। हमारा अव्यक्त मन कैमरे की प्लेट के समान है जिस पर नेत्रों के लेन्स से जो छाया गुजरती है वही उस पर अंकित हो जाती है! हम अच्छा या बुरा जो कुछ भी देखते हैं। उसका सीधा प्रभाव हमारे अन्तरमन पर, सूक्ष्म चेतना पर होता है।

🔷 प्रत्येक चित्र का अस्तित्व केवल उसके आकार प्रकार तथा रंग रूप तक ही सीमित नहीं रहता वरन् उसके पीछे कुछ आदर्श होते हैं कुछ विचार, धारणायें और मान्यतायें होती हैं। ये अच्छी भी हो सकती हैं और बुरी भी किन्तु होती अवश्य हैं। वस्तुतः चित्र की अपनी एक भाषा होती है जिसके माध्यम से चित्रकार समाज में अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। प्रत्येक चित्र में उससे हाव, भाव, भंगिमा, पोशाक, अंग प्रत्यंग, मुख, मुद्रा आदि में कुछ संकेत भरे होते हैं। चित्र या दृश्य देखने के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित अच्छी बुरी धारणा, संकेत भी मनुष्य के मन पर अंकित हो जाते हैं। हमारा मन इन आदर्शों, संकेतों को चुपचाप ग्रहण करता रहता है। चित्र दर्शन के साथ-साथ उसमें निहित अच्छाई भी मानस पटल पर अंकित हो जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 136

बुधवार, 13 जून 2018

👉 वेष-भूषा की मनोवैज्ञानिक कसौटी (अन्तिम भाग)

🔷 आज पाश्चात्य देशों में अमेरिका में सर्वाधिक भारतीय पोशाक-साड़ी का तो विशेष रूप से तेजी से आकर्षण और प्रचलन बढ़ रहा है दूसरी ओर अपने देश के नवयुवक और नवयुवतियां विदेशी और सिनेमा टाइप वेष-भूषा अपनाती चली जा रही हैं। यह न केवल अन्धानुकरण की मूढ़ता है वरन् अपनी बौद्धिक मानसिक एवं आत्मिक कमजोरी का ही परिचायक है।

🔶 यदि इसे रोका न गया और लोगों ने पैंट, कोट, शूट, बूट, हैट, स्कर्ट, चुस्त पतलून सलवार आदि भद्दे और भोंडे परिधान न छोड़े तो और देशों की तरह भारतीयों का चारित्र्यक पतन भी निश्चित ही है। श्री हेराल्ड लिखते हैं—कि सामाजिक विशेषताओं को इस सम्बन्ध में अभी विचार करना चाहिये अन्यथा वह दिन अधिक दूर नहीं जब पानी सिर से गुजर जायेगा।

🔷 भारतीय दर्शन में आत्म कल्याण के लिये बहुत उपाय हैं सैकड़ों योग साधनायें हैं वैसे ही लोक-कल्याण के लिए भी अनेक परम्परायें मान्यतायें और आचार-विचार प्रतिस्थापित किये गये हैं उन सबका उद्देश्य जीवन को सशक्त और संस्कारवान बनाना रहा है अब जो परम्परायें विकृत हो चुकी हैं उनमें वेष-भूषा भी कम चिन्ताजनक नहीं हमें अनुभव करके ही नहीं इस मनोवैज्ञानिक खोज से भी सीखना चाहिये कि अपनी वेष-भूषा ओछापन नहीं बड़प्पन का ही प्रतीक है। हां काले अंग्रेज और काली मैम बनना हो तब तो कुछ भी पहना और ओढ़ा जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 84

मंगलवार, 12 जून 2018

👉 वेष-भूषा की मनोवैज्ञानिक कसौटी (भाग 1)

🔶 एक दो नहीं संपूर्ण 6 वर्ष तक उसने पार्कों, थियेटरों, छविग्रहों और दूसरे-दूसरे सार्वजनिक स्थानों के चक्कर काटे। एक नहीं हजारों फोटोग्राफ लिये और जिस। जिस के फोटोग्राफ लिये उन-उन के व्यक्तिगत जीवन का परिचय और अध्ययन किया। सोचते होंगे होगा कोई व्यर्थ के कामों में समय गंवाने वाला फक्कड़, पर नहीं वह हैं लन्दन के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक— श्रीनेक हेराल्ड जिन्होंने इतने वर्ष के अध्ययन से महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला कि वेष-भूषा का मनुष्य के चरित्र, स्वभाव, शील और सदाचार से गहनतम सम्बन्ध है।

🔷 पुरुषों की तरह की वेष-भूषा धारण करने वाली नवयुवतियों का मानसिक चित्रण और उनके व्यवहार की जानकारी देते हुए श्री हेराल्ड लिखते हैं—ऐसी युवतियों की चाल-ढाल, बोल-चाल, उठने-बैठने के तौर तरीकों में भी पुरुष के से लक्षण प्रकट होने लगते हैं। वे अपने आप को पुरुष सा अनुभव करती हैं जिससे उनके लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों का ह्रास होने लगता है। स्त्री जब स्त्री न रह कर पुरुष बनने लगती है तब वह न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्व निबाहने में असमर्थ हो जाती है वरन् उसके वैयक्तिक जीवन की शुद्धता भी धूमिल पड़ने लगती है। पाश्चात्य देशों में दाम्पत्य जीवन में उग्र होता हुआ अविश्वास उसी का एक दुष्परिणाम है।”

🔶 श्री हेराल्ड ने अपना विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय आचार्यों ने वेष-भूषा के जो नियम और आचार बनायें वह केवल भौगोलिक अनुकूलता ही प्रदान नहीं करते वरन् स्त्री-पुरुषों की शारीरिक बनावट का दर्शक पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सूक्ष्म विज्ञान को दृष्टि में रखकर भी बनाये गये हैं वेष-भूषा का मनोविज्ञान के साथ इतना बढ़िया सामंजस्य न तो विश्व के किसी देश में हुआ न किसी संस्कृति में, यह भारतीय आचार्यों की मानवीय प्रकृति के अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन का परिणाम था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 83

सोमवार, 11 जून 2018

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (अन्तिम भाग)

🔷 स्वजन के शोक के साथ मृतक-भोज की अनावश्यक, अपव्ययता के दोहरे दण्ड से बच कर वह न जाने कितना खुश होगा। हां इसमें थोड़ी सी यह बात अवश्य हो सकती है कि इस भोज के मृतक का सम्बन्धी स्वजनों एवं जातीय लोगों के आगमन से अपने तथा अपने घर को पवित्र होने की जो धारणा रखता है उसको कुछ ठेस लगेगी। इसके स्थान पर पवित्रीकरण के लिए थोड़ा कर्मकांड एवं थोड़ा दान-पुण्य स्वेच्छापूर्वक किया जा सकता है।

🔶 अब मृतक-भोज के समर्थकों एवं परिपालकों को सोचना चाहिए कि वे अपने किसी सजातीय बन्धु पर मृतक-भोज देने के लिए दबाव डाल कर कितना बड़ा अत्याचार करते हैं। किसी का घर बरबाद कर देना सामाजिकता अथवा सजातीयता इसमें है कि मृतक भोज का दण्ड देने के बजाय अपने जातीय बन्धु को अधिक से अधिक सान्त्वना दी जाये, उसे न घबराने के लिए ढांढस बंधाया जाये और यदि घर का संचालक दिवंगत हो गया है तो उसकी विधवा तथा बच्चों की यथासंभव सहायता की जाये। चाहिए तो यह कि उसकी जाति-बिरादरी के लोग और बन्धु-बांधव अपने शोक-संतप्त भाई को सान्त्वना एवं सहायता दें किन्तु लोग उससे मृतक-भोज लेकर मरे को और मार डालते हैं यदि कोई इस दण्ड का भार वहन नहीं कर पाता तो उसकी जाति बाहर करके दीन-दुनियां के अयोग्य बना देते हैं।

🔷 अपने किसी सजातीय अथवा बन्धु-बांधव की इस प्रकार उभय प्रकारेण हत्या ठीक नहीं। इससे सामाजिक एवं जातीय ह्रास होता है। बन्धु-वध जैसा पाप लगता है। अस्तु, आवश्यक है कि मृतक भोज खाने वाले इसे हर प्रकार से अनुचित समझकर इसका सर्वथा बहिष्कार करके समाज एवं जाति का उपकार करें।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 86

रविवार, 10 जून 2018

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 4)

🔶 समाज में मृतक-भोज की कुप्रथा इसी प्रकार की प्रतिगामिनी विचारधारा के कारण ही अब तक चली आ रही है नहीं तो इसकी निःसारता, निरर्थकता तथा अहितकारिता बहुत पहले सिद्ध हो चुकी है और लोग इसके दुःखद परिणामों से बहुत अधिक त्रस्त हो चुके हैं। अब यह कुप्रथा अन्ध-विश्वास के एक कच्चे सूत्र के आधार पर टिकी है। अब आवश्यकता केवल इस बात की है कि समाज के बुद्धिमान् साहसी लोग इसका प्रचलन उठा कर मृत्यु भोज के बहिष्कार की नई स्वस्थ एवं हितकर परम्परा का सूत्रपात कर दें। सूत्रपात भर की देर है बाकी समाज के लोग तो भेड़चाल की आदत वाले होने से यों ही बहिष्कार करने लगेंगे। अब देखना यह है कि मृतक भोज के बहिष्कार का प्रथम सूत्रधार बनकर श्रेय कौन साहसी कहां और किस समय लेता है?

🔷 असलियत वास्तव में यह है कि अपने किसी स्वजन सम्बन्धी की मृत्यु पर किसी को प्रसन्नता होती नहीं जिसमें वह इस प्रकार के भोज करने के लिये उत्साहित हो। यह मृतक-भोज वह खुशी से नहीं करता बल्कि उसमें जबरदस्ती कराया जाता है। यदि मृतक-भोज खाने वाले भोजन करने को तैयार न हों तो किसी भी शोक संतप्त व्यक्ति को उत्साह न होगा कि वह एक बड़ी दावत का आयोजन करे ही और लोगों को खाने के लिए सानुरोध आमन्त्रित करे। यदि लोग एक बार खाने से इन्कार करें तो भोज देने को विवश—मृतक का सम्बन्धी खुशी-खुशी दस बार अपनी बर्बादी बचाने को तैयार हो जाये और लोगों का आभार माने।

🔶 यदि एक बार किसी खुशी के अवसर पर कोई किसी भोज का आयोजन करता है और उसके इष्ट-मित्र सम्बन्धी तथा सजातीय लोग आने और खाने से इन्कार कर दें तब तो अवश्य कुछ दुःख का विषय हो सकता है। मृतक-भोज के लिये आने और भोजन करने से इन्कार किये जाने पर आयोजक के दिन दुःखने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह तो उसकी प्रसन्नता का प्रसंग होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 85

शुक्रवार, 8 जून 2018

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 3)

🔶 इस पाप-पुण्य की सूक्ष्म बात को छोड़ कर यदि साधारण सामाजिकता की स्थूल बात भी ले ली जाय तब भी मृतक भोज खाने की प्रथा उचित नहीं। अब आज के अर्थाभाव एवं महार्घता के समय में किसी के मरने पर मृतक भोज में इतना धन खर्च कर सकना कौन बुद्धिमानी की बात है। जहां कठिनता से नमक रोटी जुड़ती हो, वहां साधारण स्थिति का कोई व्यक्ति इतने रुपये किस प्रकार बचा कर रख सकता है कि शोक-संयोग आने पर वह घर से तत्काल निकाल कर मृतक-भोज आदि में खर्च कर सके।

🔷 निश्चय ही उसे इस प्रथा पिशाचिनी की भेंट-पूजा के लिये कर्ज लेना होता है और एक बार एक सामान्य आदमी के लम्बी रकम कर्ज लेने का अर्थ है अपने को आजीवन मूल तो दूर ब्याज के हाथ बेच देना। बच्चों के पालन पोषण और परिवार के संचालन के लिए आवश्यक कमाई का अधिकांश नियमित रूप से महाजन के हवाले करते रहना। अथवा अपनी जमीन-जायदाद, गहने, बर्तन बेचने के लिए मजबूर होना। मृतक-भोज की प्रथा ग्रस्त लोगों पर यह आर्थिक आपत्ति आये दिन ही रहती है, जिसको सभी प्रथा पालक देखते-सुनते ही रहते हैं।

🔶 खेद का विषय है कि किसी एक विषय में खुद तो लोग कुछ जानते नहीं, केवल आंख मीचे हुये लकीर पीटे चले आ रहे हैं और यदि कोई विचारशील व्यक्ति उनकी हित चिन्ता से कुछ बता कर सुधार करने का परामर्श देता है तो सुधार करना तो दूर उसकी बात भी ध्यान से नहीं सुनना चाहते। इसे समाज का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जा सकता है?जिन समाजों के सदस्य इस प्रकार के प्रतिगामी समाजों के सुधार के लिये उसके जागरूक तथा सम्पन्न व्यक्तियों को आगे निकल कर सामाजिक मूढ़ता के विरुद्ध सुधार का अभियान छेड़ ही देना चाहिये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 84

गुरुवार, 7 जून 2018

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 2)

🔷 इस मान्यता में कोई तथ्य नहीं कि घर में बहुत लोगों के भोजन करने से सूतक दूर होता और घर पवित्र होता है। कई बार इसी मान्यता के कारण बहुत से भाई किसी एक भाई के घर जाकर और खाकर पवित्र करते हैं। यदि ऐसा ही हो तो एक बड़े भोज का दण्ड देने के बजाय किसी ऐसी वस्तु की व्यवस्था की जा सकती है जिसमें किसी गरीब आदमी का बहुत कुछ खर्च न हो। ऐसी वस्तुओं से शक्कर या गुड़, शरबत जैसी वस्तुओं तक सीमित रहा जा सकता है।

🔶 पुण्य पर प्रभाव पड़ने के कारण ही अच्छे और सच्चे सन्त महात्मा किसी का दान लेने अथवा अन्न खाने से यथासम्भव बचा करते हैं दान लेना और दान रूप अन्न को खाना पचाना सबके वश की बात नहीं है। इन दोनों चीजों का प्रभाव मनुष्य की आत्मा पर अवश्य पड़ता है वह सुनिश्चित तथ्य एवं सत्य है। किन्तु इसका प्रभाव इतने परोक्ष एवं सूक्ष्म रूप से पड़ता है कि साधारण विवेक का व्यक्ति उसे देख जान नहीं पाता। उसका पता तब चल पाता है जब सारे संस्कार विकृत हो जाते हैं और मनुष्य अपने आचरण में एक बड़ा और विपरीत परिवर्तन पाता है। किन्तु तब तक प्रभाव इतना गहरा हो चुका होता है कि उसको मिटा सकना टेढ़ी खीर बन जाता है। यही कारण है कि बुद्धिमान लोग दान रूप अन्न को समझ बूझकर ही खाते हैं।

🔷 यह व्यवस्था तो उस अन्न की है जिसमें देने अथवा खिलाने वाले की आत्मिक श्रद्धा तथा प्रसन्नता रहा करती है। इसके विपरीत जिन अन्य भोजन अथवा अन्न दान में देने वाले की श्रद्धा भक्ति तो दूर उल्टे पीड़ा पूर्ण आहें जुड़ी रहती हैं उसके भयंकर प्रभाव का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता और निश्चय ही मृतक भोज का दण्ड भुगतने वाले की आत्मा के आंसू उसमें सम्मिलित रहते हैं। भले ही मजबूरन कोई प्रथा-पालन की विवशता में मृतक भोज दें और कितनी ही प्रसन्नता क्यों न दिखाये और खाने वालों को धन्यवाद देकर आभार प्रकट करे, पर वास्तविकता यही होती है कि यह सारा शिष्टाचार ऊपरी होता है भोज देने वाला मन ही मन रोया करता होगा। एक तो जिसका कोई स्वजन मर गया हो दूसरे उसे ऊपर से अपनी सामर्थ्य के बाहर मृतक भोज जैसे आर्थिक दण्ड को भुगतना पड़े और तब जब किसी की मृत्यु में उसका कोई अपराध नहीं, कोई हाथ नहीं, तो वह रोयेगा नहीं क्या हंसेगा, खुश होगा? वह न सही उसकी मूक आत्मा अवश्य ही इसके लिये समाज को कोसेगी। इसलिये, इस प्रकार मृत्यु-भोज का अन्न किसी भी खाने वाले के लिये हितकर नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 83

बुधवार, 6 जून 2018

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 1)

🔶 यह बात नितान्त सत्य है कि किसी मृतक व्यक्ति का सम्बन्धी मृतक भोज खुशी से नहीं देता। वह इस अनुचित एवं अपव्ययी दण्ड को मजबूरन सहन करता है—क्योंकि समाज में इसकी प्रथा चल रही है और वह एक सामाजिक व्यक्ति है, समाज की रीति-नीतियों का उल्लंघन कर सकना उसके वश की बात नहीं है।

🔷 किसी अमीर आदमी की बात तो छोड़ दीजिए। वह अपने मरों के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं, बांट सकते हैं, लुटा सकते हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। ‘‘समरथ को नहीं नहीं दोष गुसाईं’’ के अनुसार उन्हें तो कोई भी प्रदर्शन एवं शोन-शेखी जेवा देती है। प्रश्न उन साधारण व्यक्तियों का है जो दोनों छाक अपने बच्चों के लिये भोजन भी कठिनता से जुटा पाते हैं और जिनकी संख्या समाज में अस्सी-नब्बे प्रतिशत से कम नहीं होती। इस प्रकार की आर्थिक आत्म–हत्या का प्रश्न उन्हीं सामान्य लोगों के लिये ही है।
समाज में जब तक मृतक-भोज जैसी विनाश कारी प्रथा प्रचलित ही है तब उसको किस प्रकार रोका जाये—इस पर विचार करने से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मृतक-भोज खाने वालों को ही इसका प्रचलन रोकने के लिये उदारतापूर्वक तत्पर होना चाहिये।

🔶 जब किसी का कोई स्वजन मर जाता है तब सामाजिक नियम उसे मृतक भोज देने के लिए तकाजा करता है। इस तकाजे में परोक्ष रूप से उस जातीय बहुमत का दबाव रहता है जो उसके यहां खाने के लिए जाने वाला होता है। यद्यपि यह बहुमत मृतक व्यक्ति के घर जाकर उसके सम्बन्धी से सीधे-साधे भोज की मांग नहीं करता तब भी उसकी यह मांग जातीय बहिष्कार के रूप में नग्न हो उठती है जब कोई आर्थिक कठिनाइयों के कारण मृतक भोज नहीं दे पाता अथवा देने में आना-कानी करता है। इस प्रकार यह दबाव खाने वालों की ओर से ही पड़ा करता है। यदि भोजन का लोभ छोड़ कर जातीय बन्धु थोड़ी उदारतापूर्वक काम लें तो यह समस्या सहज ही हल हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 82

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (अन्तिम भाग)

🔷 इसाइयों से अपने को सुरक्षित समझने वाले बौद्ध, सिक्ख, पारसी, मुसलमान और यहूदी आदि को इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए कि भारत की धर्म-निरपेक्षता तथा हिन्दुओं की उपेक्षापूर्ण धार्मिक सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाते हुए यदि ईसाई मिशनरी इसी तेजी से हिन्दुओं को अपने जाल में फंसाने में सफल होते रहे तो शीघ्र ही उनकी जनसंख्या भारत में बहुत अधिक हो जायगी और तब ऐसी स्थिति में भारत के सारे गैर ईसाई उनकी तुलना में अल्पसंख्यक हो जायेंगे।

🔶 क्या ईसाइयों का यह बहुमत तब शक्ति पाकर सम्पूर्ण भारत को ईसाई देखने के लिए व्यग्र पोप, पादरियों तथा प्रचारकों को अल्पसंख्यक गैर ईसाइयों को अपने में आत्मसात् करने के प्रपंचों के लिए साहस, अवसर तथा प्रोत्साहन नहीं देगा? इसलिए भारत की धर्म-निरपेक्ष नीति, धार्मिक सहिष्णुता तथा राष्ट्रीय स्वरूप को सुरक्षित रखने और लोकतन्त्र की गरिमा बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि भारत के सारे गैर ईसाई जन-समुदाय एक साथ होकर ईसाइयों के इस बढ़ते हुए धार्मिक साम्राज्य को रोकने का प्रयत्न करें।

🔷 हिन्दुओं का तो यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे ईसाइयों के षडयन्त्र से आत्मरक्षा में अपना तन-मन-धन लगा दें और गैर ईसाई मिशनरियों की अराष्ट्रीय गतिविधियों को रोकने में अपना नैतिक समर्थन देकर हिन्दुओं की हिमायत को आगे बढ़ें और आज जो हिन्दुओं को लपेटती हुई ईसाइयत की लपट परोक्ष रूप से उनकी ओर बढ़ रही है, उसे यहीं पर बुझा दें। ऐसा करने से ही भारत में धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक बन्धुत्व तथा सच्चे लोकतन्त्र की रक्षा हो सकेगी, अन्यथा पुनः आजादी को खतरा की सम्भावना हो सकती है।

🔶 यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य देशों की सरकारें तथा संस्थायें भारत में मिशनरियों को एजेन्ट रूप में भेज कर ईसाइयत को बढ़ावा दे रही हैं और एक प्रकार से वे धर्म का आधार लेकर उन देशों का साम्राज्य ही भारत में स्थापित करने का प्रयत्न कर ही हैं। विदेशों के इस धर्मधारी साम्राज्यवाद से बचाव हेतु सम्पूर्ण गैर ईसाइयों को एक मंच पर आकर ईसाइयों के मलीन मन्तव्यों को सफल होने से रोकने के लिए भरसक प्रयत्न करना ही चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 36

रविवार, 3 जून 2018

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (भाग 3)

🔶 ईसाई पादरियों तथा मिशनरियों का ऐसा ज्वलन्त आह्वान और भयानक विचार न केवल भारत के हिन्दुओं अपितु सारी गैर ईसाई जनसंख्या की आंखें खेल देने को एक खुली चुनौती है। अपने धर्म की रक्षा तथा भारतीय राष्ट्र की एकता के लिए क्या यह आवश्यक प्रतीत नहीं होता कि गैर-ईसाई जनता विदेशी मिशनरियों के अनुचित इरादों को असम्भव बना देने के लिए आवाज उठाए। यदि भारत की ईसाई जनसंख्या यों ही विदेशी मिशनरियों की गतिविधियों को उपेक्षा की दृष्टि से देख कर प्रमाद में ही पड़ी ही तो यह असम्भव बात न होगी कि ईसाई ‘ईसाई भारत’ के अपने ध्येय के बहुत कुछ समीप जा पहुंचें और तब तक क्या हिन्दू, क्या मुसलमान और क्या सिक्ख सभी धर्मों के मिट जाने का खतरा पैदा हो सकता है।

🔷 यह बात सही है कि ईसाई मिशनरियों को हिन्दुओं की अपेक्षा अन्य धर्म वालों पर अपना प्रपंच चलाना आसान नहीं पड़ता। वे मुख्यतः हिन्दुओं को ईसाई बनाने में जुटे हुए हैं, इसके दो मुख्य कारण हैं—पहला, अति धर्म-सहिष्णुता, वे धर्म-बन्धुओं के बीच इसी अति के दोष से ईसाइयत का प्रचार सहन करते जा रहे हैं। दूसरा यह कि गैर ईसाई अहिन्दुओं की धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण ईसाई मिशनरियों को उनके बीच जाल बिछाने का अधिक अधिक अवसर नहीं मिलता अहिन्दू गैर ईसाइयों की रूढ़िवादिता उन्हें अपने बीच धंसने का साहस नहीं करने देती। किन्तु इसका यह अर्थ लगाना गलत होगा कि अहिन्दू गैर ईसाई ईसाइयों के धार्मिक षडयन्त्र से सुरक्षित है और यदि वे ऐसा सोचते हैं तो गहरी भूल करते हैं। अहिन्दू गैर ईसाइयों को भी इस षडयन्त्र की, जो ईसाइयों के बीच प्रचार-प्रपंच चला रखा है, उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और समझ लेना चाहिए कि हिन्दुओं पर किया गया आघात परीक्षा रूप में उन पर भी एक आघात है।

🔶 कैथोलिक ईसाई पत्रों के कथनों से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि भारत के गैर ईसाई समुदाय से ईसाई मिशनरियों को ईर्ष्या है और वे उनकी विशाल जनसंख्या को फूटी आंखों भी नहीं देख पा रहे हैं। वे सम्पूर्ण भारत के गैर ईसाइयों को ईसाई बनाकर ‘ईसाई-भारत’ का स्वप्न देखते हैं और उसके लिए हर उचित-अनुचित उपाय करते जा रहे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 35

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (भाग 2)

🔶 भारत में पादरियों का धर्म प्रचार हिन्दू धर्म को मिटाने का खुला षडयन्त्र है जो कि एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है, अब उपेक्षावश और तीव्र तथा प्रबल हो गया है। ईसाई पादरियों के इस धर्म प्रचार का क्या उद्देश्य है? यह समय-समय पर किये उनके कथनों, लेखों तथा वक्तव्यों से सहज ही पता लग जाता है।

🔷 ‘‘लाइट आफ लाइफ’ केथोलिक पत्रिका के 1964 के जुलाई अंक में ईसाई नवयुवकों को परामर्श देते हुए निर्देश किया गया—‘‘ईसाई छात्रों तथा स्नातकों का यह कर्तव्य है कि वे ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिये पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखा करें और इस विषय में वे धर्म निरपेक्ष नीति वाली पत्र-पत्रिकाओं का लाभ उठा सकते हैं। किन्तु यह आवश्यक नहीं कि वे शुरू-शुरू में ही अपने लेखों में ईसाइयत का प्रचार करने लगें। अच्छा तो यह होगा कि पहले वे सामान्य लेख लिख कर आगे चल कर के पत्रों में खुलकर ईसाई विचारधारा का प्रचार करें।’’

🔶 यह क्या है? ईसाई नवयुवकों को धर्मनिरपेक्ष पत्र-पत्रिकाओं में घुसने और उनके माध्यम से भारत में ईसाइयत फैलाने के लिए खुला प्रोत्साहन तथा आह्वान है। इसे धर्मनिरपेक्षता का अनुचित लाभ उठाने के लिए एक षडयन्त्र के सिवाय और क्या कहा जायगा? जहां धर्मनिरपेक्षता की नीति भारत के हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी को एक समान तथा सामान्य राष्ट्रीय विचारधारा में लाने का प्रयत्न कर रही है, वहां विदेशी मिशनरी ईसाई नवयुवकों की धार्मिक भावनाओं को भड़का कर उन्हें अपने षडयन्त्र का सहायक अस्त्र बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। क्या भारत के राष्ट्रीय हित में यह सहन करने योग्य बात है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 34

शनिवार, 2 जून 2018

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (भाग 1)

🔷 ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’—अर्थात् अति का हर क्षेत्र में निषेध है। बुरी बात तो बुरी बात ही होती है, उसमें अति या अनीति का प्रश्न ही क्या? अच्छी बात भी जब अपनी वांछित मर्यादा का उल्लंघन कर जाती है, तो वह बुराई की कोटि में पहुंच जाती है।

🔶 धार्मिक सहिष्णुता एक महान गुण है। किसी दूसरे के धार्मिक विचारों तथा कार्यों में हस्तक्षेप न करना स्वयं ही एक धार्मिकता है। हिन्दुओं ने इस गुण का जितना व्यापक परिचय दिया है, उसका हजारवां भाग भी संसार की कोई अन्य जाति न दे सकी। बल्कि यह कहने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि वेद-धर्म के अनुयायियों को छोड़कर संसार की अधिकांश जातियों ने असहिष्णुता का ही परिचय दिया है।

🔷 हिन्दुओं की इस सहिष्णुता से प्रोत्साहित होकर अन्य धर्मावलम्बियों ने क्या-क्या किया और इससे हिन्दू राष्ट्र को कितनी क्षति हुई है? यह बात किसी से छिपी नहीं है। विगत हानियों तथा अत्याचारों की चर्चा करना बेकार है। किन्तु वर्तमान में हिन्दू-जाति पर ईसाइयों का जो आक्रमण हो रहा है, उसकी ओर से आंखें बंद नहीं की जा सकती हैं।

🔶 भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है और भारत सरकार धर्मनिरपेक्षता की संरक्षिका। विधान की इस धारा के अनुसार भारत में सभी धर्मों को फलने-फूलने और विकसित होने का अधिकार है। किन्तु इसका तह आशय कदापि नहीं कि कोई एक धर्म दूसरे किसी धर्म को मिटाकर फूल-फल सकता है। ईसाई पादरी भारतीय विधान की इस धारा का दुरुपयोग करके हिन्दू धर्म को मिटाकर अपने ईसाई धर्म का विस्तार करने में बुरी तरह जुटे हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 33

शुक्रवार, 1 जून 2018

👉 भारतीय संस्कृति के विनाश का संकट (भाग 3)

🔶 हमारी संस्कृति के लिए विदेशियों द्वारा जहां ईसाइयत के प्रवार का खतरा है, उससे कम खतरा अपने स्वयं के पश्चिमी अनुकरण के प्रयास का भी नहीं है। हम लोग अपने रहन-सहन, जीवन-पद्धति, विचारों की प्रेरणा के लिए पश्चिम की ओर देखते हैं। उनका अनुकरण करते हैं। जहां तक अपनी संस्कृति का सवाल है हम उसे भूलते जा रहे हैं। आज हमारी बोली भाषा वस्त्र, रहने का ढंग विदेशी बनता जा रहा है।

🔷 स्वच्छ और सादा ढीले वस्त्र जो हमारी भौगोलिक स्वास्थ्य सम्बन्धी परिस्थितियों के अनुकूल थे उनकी जगह पश्चिम का अनुकरण करके भारी गर्मी में भी कोट पेन्ट पहनते हैं। आज का शिक्षित समाज ‘वस्त्रों की दृष्टि से पूरा पश्चिमी बन गया है। धोती-कुर्ता पहनने में बहुत से लोगों को शर्म और संकोच महसूस होता है। पढ़े-लिखे लोगों में अंग्रेजी बोलना एक फैशन बन गया है। हिन्दी, संस्कृत या अन्य देशी भाषा बोलने में मानो अपना छोटापन मालूम होता है। दिवाली आदि पर्व त्यौहारों पर, किन्हीं सांस्कृतिक मेलों पर, हममें वह उत्साह नहीं रहा, लेकिन ‘फर्स्ट अप्रैल फूल’ ‘बड़ा दिन’ जैसे पश्चिमी त्यौहार मनाने में हम अपना बड़प्पन समझते हैं।

🔶 एक समय था जब विश्व के विचारक, साहित्यकार भारत से प्रेरणा और मार्ग दर्शन प्राप्त करते थे। इसे अपना आदि गुरु मानते थे। इसे सभी विदेशी विद्वानों ने स्वीकार किया है। लेकिन आज हमारे देश में इससे विपरीत हो रहा है। आज हम साहित्यिक विचार साधना के क्षेत्र में पश्चिम का अनुकरण करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें वहां के साहित्य का अध्ययन नहीं करना चाहिए, यह तो किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिए आवश्यक है। किन्तु अपने मौलिक सांस्कृतिक तथ्यों, प्रेरणाओं को भुलाकर पश्चिम का अन्धानुकरण करना हमारी संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है। इससे वह कमजोर होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 18

👉 छिद्रान्वेषण की दुष्प्रवृत्ति

छिद्रान्वेषण की वृत्ति अपने अन्दर हो तो संसार के सभी मनुष्य दुष्ट दुराचारी दिखाई देंगे। ढूँढ़ने पर दोष तो भगवान में भी मिल सकते है, न हों तो...