गुरुवार, 11 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 27)

ऐसी ही एक घटना यहाँ शब्दों में पिरोयी जा रही है। वर्षों पूर्व घटी इस घटना में एक बच्चे के माता- पिता, परम पूज्य गुरुदेव के पास आए। उनके साथ उनका बच्चा भी था। जो कुछ समय से ज्वर से ग्रसित था। यह ज्वर था कि किसी चिकित्सक की औषधि से ठीक ही नहीं हो रहा था। हां, इसके दुष्प्रभाव हाथ, पांव सहित समूचे शरीर पर पड़ने शुरू हो गए थे। एक तरीके से उसका शरीर लुंज- पुंज हो गया था। बच्चे की दिमागी हालत भी बिगड़ने लगी थी। समूचा स्नायु संस्थान निष्क्रिय पड़ता जा रहा था। माता- पिता ने अपने बच्चे की सारी व्यथा गुरुदेव को कह सुनायी। उन्होंने सारी बातें ध्यान से सुनी और मौन हो गए।

बच्चे के माता- पिता बड़ी आशा भरी नजरों से उनकी ओर देख रहे थे। पर यहाँ गुरुदेव की आँखें छलक उठी थीं। वह उस बच्चे की पीड़ा से, माता- पिता के सन्ताप से विह्वल हो गए थे। थोड़ी देर बाद वह भाव भरे मन से उन लोगों से बोले, बेटा- तुम लोगों ने हमारे पास आने में देर कर दी। इसके प्रारब्ध का दुर्योग अब एकदम पक गया है। ऐसी स्थिति में कुछ भी करना सम्भव नहीं। वैसे भी यह बच्चा है, यदि हम इस पर अपनी विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रयोग करेंगे तो इसका शरीर सह नहीं पाएगा। बहुत सम्भव है कि यह मर ही जाए।

गुरुदेव की इन बातों ने माता- पिता को निस्पन्द कर दिया। वे निराशा से विगलित हो गए। उन्हें इस तरह पीड़ित देखकर गुरुदेव बोले, तुम लोग मेरे पास आए हो, तो इस असम्भव स्थिति में थोड़ा- बहुत तो मैं करूँगा ही। इसमें पहली चीज तो यह कि बच्चे का दिमाग एकदम ठीक हो जाएगा। अपाहिज स्थिति में भी यह प्रतिभावान होगा। अभी जो यह लगभग गूँगा हो गया है, आपसे बातचीत कर सकेगा। शारीरिक अपंगता की यह स्थिति होने के बावजूद इसमें कई तरह के कौशल विकसित होंगे। बस बेटा! इस स्थिति में इसके लिए इससे ज्यादा कुछ भी सम्भव नहीं। गुरुदेव के इन शब्दों ने बच्चे के माता- पिता को जैसे वरदान दे दिया। थोड़े ही महीने के बाद पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रभाव उस बच्चे के जीवन में प्रकट हुए। अपाहिज होते हुए भी वह प्रतिभावान कलाकार बना। उसके प्रारब्ध का अटल दुर्योग टला तो नहीं पर पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक चिकित्सा ने उसे रूपान्तरित तो कर ही दिया। इस आश्चर्यजनक प्रक्रिया के संकेत आज भी महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक ग्रन्थों में देखे जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 40

👉 लक्ष्य में तन्मय हो जाइए

मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल । इसलिए उसकी समस्त शक्तियाँ छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

सिंहगढ़ जीतने के लिए मराठों के एक दल ने उस पर चढ़ाई कर दी। प्रसिद्ध तानाजी राव इसके सेनानी थे। अपने सैनिकों के साथ किले की दीवार पर रस्सी टाँगकर चढ़ गये। शत्रुओं के साथ घोर युद्ध होने लगा। तानाजी खेत रहे। इस पर वीर मराठा चंचल हो गये और एकाग्रता भंग होते ही उन्होंने भागना आरम्भ कर दिया, जिस रास्ते आये थे उसी रास्ते से उतरने का प्रयत्न करने लगे। तानाजी के भाई सूर्याजी ने उस रास्ते को बन्द करने के लिए रस्सी को काट दिया और कह दिया कि भागने का रास्ता बन्द हो गया। भागने का रास्ता बन्द हो जाने पर जीत का ही रास्ता खुला मिला, इस लिए जो शक्ति भागने में लग गई थी उसने फिर जीत का बाना पहना। और सिंहगढ़ पर विजय प्राप्त की।

मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं। शास्त्रों में इस सफलता को पाने के लिए बाण के समान गतिवाला बनने का आदेश दिया है-
“शर वत् तन्मयो भवेत्”
बाण की तरह तन्मय होना चाहिए।

धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुँचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आँख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आँख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूँजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950

👉 आज का सद्चिंतन 11 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 July 2019


👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 1)

व्यक्तियों की गतिविधियाँ जब श्रेष्ठता से समन्वित रहती है तो उनके श्रम, समय, मनोयोग एवं साधनों का उपयोग सत्प्रयोजनों में होता है, फलतः सुखद परिस्थितियाँ बढ़ती जाती हैं, निरर्थक कार्यों में लगने से पिछड़ेपन की और अनर्थ कार्यों से अधःपतन की परिस्थितियाँ बनती हैं। जब जन प्रवाह पतनोन्मुख होता है तो स्वभावतः अभाव, संकट एवं विद्रोह बढ़ते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया का कुचक्र चलता है और बुरे युग के- पाप युग, नरक युग के समस्त लक्षण सर्वत्र दृष्टिगोचर होते है। सत्प्रयत्नों के सत्परिणाम तो स्पष्ट ही हैं। धर्मराज्य, सतयुग आदि ऐसे ही समय को कहा जाता है। युग कैसा है? कैसा होगा? इन प्रश्नों का उत्तर यह पर्यवेक्षण करके दिया जा सकता है कि लोग क्या कर रहे है और क्या करने की तैयारियों में लग रहे हैं।

कुविचार और कुकर्म बढ़ने लगे तो वातावरण में भावनात्मक विषाक्तता उत्पन्न होनी स्वाभाविक है। उसका प्रतिफल व्यापक रूप से दुखद दुर्घटनाओं के रूप में परिलक्षित होता है। यही कलियुग है। चन्दन वृक्ष सुगन्धित होते है, उन्हें छूकर जो पवन चलता है वह दूर- दूर तक सुवास बिखेरता है। पुष्प वाटिका भी अपने समीपवर्ती क्षेत्र में सुगन्धित और जीवन दायिनी प्राण वायु बिखेरती हैं। सज्जनों को चन्दन वृक्ष और पुष्प पादपों की संज्ञा दी जा सकती है। वे स्वयं तो आन्तरिक प्रसन्नता और साथियों की सद्भावना से सुखी सन्तुष्ट रहते ही हैं, अपनी गरिमा का उपहार सारे वातावरण को प्रदान करते है। कीचड़ और कूड़े से, सड़े नाले से बदबू उठती है, विषाणु बढ़ते हैं, कुरुचिपूर्ण वातावरण बनता है और बीमारियाँ फैलती है मनुष्यों के व्यक्तित्व यदि सड़े नाले और कूड़े के ढ़ेर जैसे बने रहे तो उनकी विकृतियाँ उन अकेले को ही कष्ट नहीं देगी, वरन् समूचे वातावरण में अवांछनीय विक्षोभ उत्पन्न करेंगी। यही कलियुग का- पाप युग का स्वरूप है। युगों के भले- बुरे होने में व्यक्तियों का स्तर ही प्रधान कारण होता है। जन समूह के द्वारा अपनाई गई दुष्प्रवृत्तियाँ अपनी प्रतिक्रिया से समूचे वातावरण में ऐसी ही विषाक्तता उत्पन्न करती हैं, जो सबके लिए सब प्रकार दुखदायी परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करती चली जाय।

विषाक्तता के वायुमण्डल का दूषित होना पदार्थ विज्ञान के आधार पर स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। अध्यात्म विज्ञान के आधार पर यह जानने में भी कठिनाई न होनी चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों के कारण प्रकृति का सूक्ष्म अन्तराल विक्षुब्ध होता है और उसकी प्रतिक्रिया ऐसी व्यापक परिस्थितियों के रूप में बरसती है, जिनसे संसार को संकटों का सामना करना पड़े। प्रकृति प्रकोप की दुर्घटनाएँ ऐसे ही विक्षुब्ध वातावरण की देन है। आवश्यक नहीं कि जहाँ के लोगों की दुष्प्रवृत्तियाँ हों वही बरसे। सूर्य की गर्मी से समुद्र में बादल उत्पन्न होते हैं आवश्यक नहीं कि वे समुद्र में ही बरसे। वे कहीं भी जाकर बरस सकते है। जब सारी धरती और सारा आसमान एक है तो बादलों को कहीं भी बरसने की छूट रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Absolute Law Of Karma (Last Part)

MISFORTUNES ARE NOT ALWAYS
RESULTS OF PAST MISDEEDS


A student has to face many hardships in course of his education. A mother suffers while bringing up the child. Ascetics, social reformers and righteous persons undergo unbearable hardships while working for reformation of the society and evolution of the human soul. Such voluntarily undertaken hardships, confrontations and problems faced in course of fulfillment of self-assumed
responsibilities cannot be considered as consequences of past misdeeds.

It would not be proper to regard every “happygo- lucky” person as a virtuous person in his past life or every sufferer as a sinner of his past birth. Such a concept would be unjustified and misleading. There is no reason for someone to have self-pity or feel remorseful on such a false premise. The course from karma to prarabdha follows an occult and mysterious process known only to the Creator.

We have to remain ever vigilant towards our duties and responsibilities and leave the rest to impartial Supreme Justice of God. Let us face the misfortunes and good fortunes of life with equanimity. God has made us responsible only for our duties as human beings. There could be many reasons for successes-failure and happiness unhappiness. Only the Creator knows their purpose in His
Absolute Wisdom. Let us entirely offer ourselves to the Divine to be used for the free and unobstructed flow of His Will through us.

.... The End
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 55

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 July 2019


👉 Moments of self-expression

■  अवांछनीय चिंतन और चरित्र अपनाये रहने पर किसी भी पूजा-पाठ के सहारे किसी को दैवी अनुकम्पा का एक कण भी हस्तगत नहीं होता। जब पात्रता को परखे बिना भिखारियों तक को लोग दुत्कार देते हैं, तो बिना अपनी स्वयं की उत्कृष्टता सिद्ध किये कोई व्यक्ति दैवी शक्तियों को बहका-फुसला सकेगा, इसकी आशा नहीं ही करनी चाहिए।

◇ बातों का जमाना बहुत पीछे रह गया है। अब कार्य से किसी व्यक्ति के झूठे या सच्चे होने की परख की जायेगी। कुछ लोग आगे बढ़कर यह सिद्ध करें कि आदर्शवाद मात्र चर्चा का एक मनोरंजक विषय भर नहीं है, वरन् उसका अपनाया जाना न केवल सरल है, बल्कि हर दृष्टि से लाभदायक भी।

★ अक्लमंदी की दुनिया में कमी नहीं। स्वार्थियों और धूर्तों का समुदाय सर्वत्र भरा पड़ा है। पशु प्रवृत्तियों का परिपोषण करने वाला और पतन के गर्त में धकेलने वाला वातावरण सर्वत्र विद्यमान है। इसका घेरा ही भव बंधन है। इस पाश से छुड़ा सकने की क्षमता मात्र बुद्धिमत्ता में ही है। बुद्धिमत्ता अर्थात् विवेकशीलता-दूरदर्शिता, इसी की उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।

◇ अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बड़े लाभ से वंचित हो जाता है वह है-दूसरों की सहानुभूति खो बैठना। स्वार्थी व्यक्ति यों कभी किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पड़ता है, जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक स्नेह-सहयोग पर टिके हुए हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "A Dull Brain Trained For Sharp Memory

There is no parallel to Mr. W J M Baton of England in building up brain-power and memory capacity. Born in Kent county of England, Mr. Baton was so dull that he could not remember what he read. He was very weak and sick, for what he had to leave his school prematurely at the age of 11. What type of memory and wisdom can be expected from him? But inspired by his father, he developed a hobby of memorizing small events occurring around him and then describe to people with date, time and names of the places, just to impress them.

He gradually increased his memorizing capacity to such an extent that started being considered as a walking encyclopedia! He did this with a firm determination to achieve the goal of sharp memory power. With sincere efforts, he acquired such a memory that he became famous around every place. Once he was interviewed by well-known astrologers, politicians and esteemed persons of England, who asked him some details of events believed to be forgotten for a long time. But he replied with accurate data of place and time in perfect chronology that surprised everybody.

Baton became so famous in his time that after his death, one American health institute purchased his head for 10,000 dollars to study the secrets of his extraordinary brain capacity.

Pt. Shriram Sharma Aacharya
Badein Aadmi Nahi, Mahamanav Baniyein
(Not a Big-Shot, Be Super-Human), Page 20

👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...