गुरुवार, 3 मई 2018

👉 जो सहेगा वह चलेगा और लगातार वही चलेगा

🔷 एक नगर मे नन्दु नाम का साधक रहता था साधना करता था पर बाधायें रुकने का नाम नही लेती थी अक्सर वो किसी सन्त के दरबार मे जाया करता था एक बार वो बहुत हताशा और निराशा मे डुबा हुआ आश्रम के बाहर बैठा था तो अन्दर से महात्मा जी बाहर आये!

🔶 महात्मा - बेटा नन्दु लो ये दो टुकडे इनको नगर मे सुनार की दुकान पे ले जाना और कहना की इनका एक कड़ा बना दो और उस कड़े को मैं तुम्हे पहना दूँगा ताकि तुम्हारी समस्या का समाधान हो जायें!

🔷 नन्दु गया वापस आया और कहा हॆ देव दुकानदार ने एक टुकडे को तो फेंक दिया और दुसरे टुकडे को ले लिया!

🔶 महात्मा - पर उन्होंने ऐसा क्यों किया तुमने पुछा नही?

🔷 नन्दु - पुछा देव उन्होंने कहा की इसमे एक सोने का टुकड़ा है और दुसरा लोहे का उन्होने लोहे के टुकडे को फेंक दिया!

🔶 महात्मा - फिर क्या किया वत्स?

🔷 नन्दु - फिर उन्होंने सोने के टुकडे को छिनी और हथोडी से छोटे छोटे टुकडे किये फिर उसे आग मे रखकर पिगलाया फिर हथोडे से उसकी खुब पिटाई की बारबार आग मे तपाये और पिटाई करे बहुत लम्बी प्रक्रिया के बाद ये कड़ा बनकर तैयार हुआ!

🔶 महात्मा - यही तो मैं तुमसे कह रहा हुं वत्स की परीक्षा सोने को ही देनी पड़ती है और आग मे तपना पड़ता है और बहुत लम्बी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद वो गहना बनकर तैयार होता है!

🔷 हॆ वत्स इस कड़े को अपने हाथ मे पहन लो ताकि तुम्हे हमेशा याद रहे की मुझे इस जीवन को ऐसा बनाना है की मेरे सद्गुरु मुझे अपने हाथों मे ले ले! हॆ वत्स एक बात हमेशा याद रखना की जब साधना के मार्ग पर बाधा पे बाधा आये तो समझ लेना की तुम्हारी साधना मे दम है और ऐसे समय मे घबराना मत सद्गुरु का आशीर्वाद लेकर और तेजी से आगे बढ़ना!

🔶 एक बात हमेशा ध्यान रखना की सोने को आग मे तपना पड़ता है गहना बनने के लिये असंख्य चोटें सहनी पड़ती है! हॆ मेरे सत्य के अतिप्रिय साधक चोटों से घबराकर हार कभी मत मानना लड़ते रहना और निरन्तर प्रकाश की ओर बढ़ते रहना! और सहन तो करना पड़ेगा वत्स यदि यहाँ नही तो फिर वहाँ सहन करना पड़ेगा और अच्छा होगा की यही सहन कर ले क्योंकि यहाँ सहन करेंगे तो आगे तरेगे और यदि यहाँ सहन करने से भागेंगे तो आगे की सारी यात्रा मे इधर उधर मारे मारे फिरेंगे!

🔷 हॆ वत्स ये हमेशा याद रखना की भागना जीवन नही है जागना जीवन है और जब जग जाओ तो फिर चलना और सहनशील बनना और सहना क्योंकि जो सहेगा वह चलेगा और लगातार वही चलेगा जो सहेगा ये कभी न भुलना की जो सहेगा वही बनेगा!

👉 आज का सद्चिंतन 4 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 May 2018


👉 आत्मविकास के कुछ उपाय:-

🔶 यदि आप आत्मनिर्भर हैं, तो स्मरण रखिए आपने ऐसी सम्पदा प्राप्त कर ली है, जो सम्पद् में, विपद् और आनन्द के क्षणों में आपको सदैव ऊँचा उठायेगी। बस, आपको आवश्यक यह है कि प्रतिदिन कुछ नवीन, कुछ उपयोगी ज्ञान की अभिवृद्धि करते रहें, ज्ञान के कोष को बढ़ाते रहें, आगे बढ़ते रहें।

🔷 यदि आप आत्म प्रताड़ना करते हैं, अपने विषय में हीनभाव रखते हैं, तो आप भावनाओं की बीमारी से त्रस्त है। यह बीमारी आपको आपकी महत्ता का अनुभव नहीं होने देती। इससे मुक्ति का उपाय यह है कि आप कार्यों को बिना भावना की परवाह किए सम्पन्न करते जाइए। यह नियम बना लीजिए कि अपने किए हुए किसी भी कार्य की बुराई न करेंगे, अपने विषय में उच्च और पवित्र धारणाएँ बना लीजिए और उन्हें पुष्ट करते रहिए। कार्य करने से आप की हीनता लुप्त होगी। अधिक सोचने से वह पुष्ट होती है। सोचिए कम कार्य अधिक कीजिए । जो व्यक्ति अपनी अधिक टीका-टिप्पणी करता है, और गलतियाँ निकाला करता है, वह आपका विकास एवं परिष्कार रोक लेता है।

🔶 आप अपने संतोष और उत्साह के लिए दूसरों पर निर्भर मत रहिए। दूसरों का अनुकरण कीजिए। ऐसा करने से आपकी मौलिकता, गुण और विशेषताएं सभी प्रकट न होंगी। स्वयं सोचिए कि क्या उत्तम है? वही कीजिए चाहे कोई कुछ भी कहे। आपकी विशेषताएं प्रकाश में आयेंगी और लोग चमत्कृत होंगे।

🔷 यदि आप घमंडी, अहंभाव से भरे हुए, दूसरों से प्रशंसा चाहने वाले या क्रोधी हैं, तो उसका अभिप्राय यह है कि आप अंदर ही अंदर अपनी हीनता से डरते हैं। हीनता की प्रतिक्रिया आपके मानसिक जगत् में ही हो रही है।

🔶 अपनी वेशभूषा और शृंगार की अधिक देख-रेख करने वाला व्यक्ति बाहरी टीपटाप में विकास और गंभीरता की कमी छिपाता है। वास्तविक परिपक्वता आन्तरिक एवं बौद्धिक है। जो व्यक्ति सही अर्थों में विकसित हुआ है, उसकी पोशाक साधारण होती है, वह गहरे रंग नहीं पसंद करता, आभूषणों से घृणा करता है, सरल सीधा स्वच्छ और भले मानुषों जैसा पोशाक पहनता है।

🔷 यदि आप अपने प्रति ईमानदार हैं, तो न तो आप अपनी अच्छाई छिपायेंगे, न झूठा शेखी बघारेंगे। आप समझेंगे कि मनुष्य होने के नाते आपकी भी दूसरों की तरह कुछ कमजोरियाँ हैं। आप अपने को दूसरों से यदि अच्छा नहीं समझेंगे, तो बुरा भी न मानेंगे। आप अपनी विशेषताएं प्रकट करेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशेषताएं रखता है। यदि व्यक्तित्व का ठीक तरह अध्ययन किया जाय, तो आप भी महान बन सकते हैं।

🔶 यदि आप झूठे दिखावे को पसन्द नहीं करते हैं, इसका अभिप्राय यह है कि आप अपने मन में आत्मा की आवाज के अनुसार सत्य का अन्वेषण कर रहे हैं। आप उन्नति की ओर उठ रहे हैं।

🔷 यदि आप सच्चे हैं, तो आप अपने या दूसरे किसी के विषय में भी बढ़ा-चढ़ा कर मिथ्या भाषण करेंगे। आपके कार्य कुशलता लिए हुए होंगे और आप दूसरों को दिखाकर व्यर्थ का उपहास न करेंगे। यदि आज अपने प्रति सच्चे नहीं हैं, तो आप स्वार्थ की रीतियों से दूसरों को धोखा देने का प्रयत्न करेंगे। जैसे आप वास्तव में नहीं हैं, वैसा दिखाकर आप अपनी महत्ता कम कर रहे हैं। यदि आप जैसे आप हैं, वैसे ही दूसरों को दिखाते हैं, तो आपका व्यक्ति अपने स्वाभाविक रूप में विकसित होता रहेगा।

🔶 जब तक मनुष्य अपने मानसिक जगत् में परिपक्वता प्राप्त नहीं करता, छोटी-मोटी बातों में फंसा रहता है, अपनी भावनाओं पर संयम नहीं रख पाता तब तक वह बच्चा ही बना हुआ है।

🔷 मानसिक दृष्टिकोण से बालक न बनिए। संसार की विभीषिकाओं, आपत्तियों और संघर्ष को सहन करने की आत्मशक्ति का निरन्तर विकास करते रहिए।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13

👉 इन तीन का ध्यान रखिए (अन्तिम भाग)

🔷 इन तीनों को स्मरण रखो- आरोग्य, सुमित्र और संतोष वृत्ति। ये तीनों ही आड़े समय काम में आने और रक्षा करने वाले है।

🔶 चाहे अन्य बातों में आप पीछे रहें, किन्तु इन स्वास्थ्य और आरोग्य सम्पादकों को प्राप्त करते रहिये। सच्चा मित्र जीवन का सब से बड़ा हितैषी और सहायता है। संतोषवृत्ति मनः शक्ति को परिपुष्ट करने, आन्तरिक समस्वरता को प्रदान करने वाली परमौषधि है।

🔷 इन तीनों का प्राप्त करो-(1) अच्छी पुस्तक (2) अच्छी सोबत और (3) अच्छी आदतें। अच्छे, उपयोगी, चरित्र का परिष्कार एवं आत्म सुधार करने वाले सद्ग्रन्थ जिस व्यक्ति के पास है, उसे अकेलापन, नीरसता, शुष्कता कभी न प्रतीत होगी। पुस्तकें सदा सर्वदा चौबीसों घंटे का आत्मसुधार करने को प्रस्तुत हैं, आपकी सद्शिक्षाएँ देने को मौजूद रहती हैं। इनके सत्संग से अनेक साधारण व्यक्ति महत्ता प्राप्त कर सकते हैं। सत्साहित्य से समाज के ज्ञान का संवर्द्धन चरित्र का संशोधन होता है। उच्च कोटि के साहित्य से ही घर की शोभा है।

🔶 महात्मा गाँधी जी ने कहा है, “अच्छी पुस्तकों के पास रहने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करता गया, उतना ही मुझे उनकी विशेषताएं मालूम होती गईं। जिसे पुस्तकें पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।” लोकमान्य तिलक के अनुसार, “मैं नर्क में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि वे जहाँ होंगी, वहाँ आप ही स्वर्ग बन जायेगा।” अच्छी पुस्तकें ही अच्छी सोहबत और अच्छी आदतें प्रदान कर सकती हैं।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Last Part)

🔶 Yajóa is also supposed to be performed during the programme of katha-kirtan (the recital of a story along with devotional songs), religious celebrations and the occasions of special festivals. For example, Holi, which is celebrated these days as a colour festival was originally a festival of yajóa to celebrate the harvesting of new crop every year. A handful of new grains is supposed to be sacrificed in the “holi- yajóa” as a mark of expressing gratitude to God’s grace. The spirit of purifying the grain before using it in food preparation is also associated with this yajóa.  

🔷 Yajóa is also performed along with religious functions like Satya Narayan Katha, Bhagvat Katha, Ramayan Parayan, etc. Specific yajóas are also invariably linked with the Vedic as well as the tantrika sadhana anusthanas. Gayatri Sadhana is regarded incomplete without yajóa. The number of ahutis offered in the havans or yajóas organized to mark the end of Gayatri anusthana or mahapurashcharanas should at least equal the tenth or hundredth fraction of the number of japas completed everyday in these sadhanas.  Worshiping different manifestations of God is also supposed to be carried out with specific kinds of yajóa, as described in the holy scriptures.  

🔶 The prominence of tirthas, the places of pilgrimage, is also associated with yajóa since the Vedic Age. The places where grand yajóas were organized and conducted by the rishis became tirthas and are still revered as holy destinations of pilgrimage in India.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 दूसरों की नाराज़गी

🔶 यदि हमसे कोई नाराज़ होता है, तो उसका उत्तर वैसी ही नाराज़गी में न देना चाहिए, वरन् गम्भीरता-पूर्वक विचार करना चाहिए कि इसका वास्तविक कारण क्या है। बहुत करके हमें अपने दोष दिखाई नहीं पड़ते और दूसरों पर दोषारोपण आसानी से कर देते हैं। एकान्त में न्यायबुद्धि से आत्म-चिन्तन करने पर यह मालूम हो सकता है कि इस नाराज़गी में हमारा कितना दोष है। अपनी त्रुटियों को सुधारना हर मनुष्य का धर्म है। हमारी भूल से यदि दूसरों को दुख पहुँचता हो, तो अपना सुधार करना चाहिए और नाराज़ होने वाले से निःसंकोच क्षमा माँग लेनी चाहिए।

🔷 किन्तु कई बार इसके विपरीत परिस्थितियाँ भी सामने आती हैं। दूसरे लोग अपनी भूलों का दण्ड हमें देना चाहते हैं। अपनी अनुचित इच्छाओं की पूर्ति के लिए हमारी आत्मा का हनन करना चाहते हैं। ऐसे अवसरों पर गिड़गिड़ाने या परास्त हो जाने से काम न चलेगा। सत्य मार्ग पर पर्वत की तरह दृढ़ता के साथ खड़े होकर अपने कर्तव्य का पालन करना ही योग्य है। बालकों की इच्छानुसार अध्यापक नहीं चलता और न अपराधियों की इच्छानुकूल शासक अपना धर्म छोड़ देता है। कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य भूले भटके और भ्रमवश दोषारोपण करने वालों की रत्ती भर भी परवाह नहीं करता, वरन् उन्हें सुधारने के लिए कड़ुवे कार्यों को भी करता है, फिर भले ही उसे इसके लिए विरोध, उपहास या कष्टों का सामना करना पड़े।
  
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1941

👉 गुरुगीता (भाग 100)

👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है

🔶 गुरूगीता के इन मंत्रों में मुक्त पुरूष का व्यवहार बताया गया है। यह अतिदुर्लभ अवस्था जिसे जहाँ प्राप्त है, वह व्यक्ति तो कृतार्थ है ही। वह भूमि भी धन्य हो जाती है, जहाँ ऐसे लोग रहा करते हैं। ऐसे व्यक्ति संन्यासी हों या गृहस्थ, श्वेताम्बर हो या काषायाम्बर अथवा फिर दिगम्बर सर्वत्र पूजनीय हैं। इन्हें वेष से नहीं, अवस्था से पहचाना जाता है। ये जनक की भाँति राजा भी हो सकते हैं और महामुनि शुकदेव की भाँति सर्वत्यागी भी। परन्तु इनकी अन्तर्चेतना सदा विराट् में विलीन रहती है। हाँ, उन्हें समझ पाना अति कठिन हो पाता है, केवल ज्ञानी जन ही इन्हें जान पाते हैं।

🔷 पुराण कथा के अनुसार राजा जनक को अपने गुरूदेव अष्टावक्र की कृपा से ज्ञान हुआ था। महर्षि अष्टावक्र की कृपा से ही उन्हें सिद्धि मिली थी। साधना से सिद्धि की यात्रा कर लेने के बावजूद वे गुरू आदेश से अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते रहे। उनके लिए सभी कुछ समान था। परन्तु मूढ़ जन इस रहस्य को समझ न पाये और उन्हें साधारण गृहस्थ समझने की भूल करते रहे। इन्हीं दिनों ब्रहर्षि विश्वामित्र ने वेदान्त विदों का एक शिविर मिथिला नगरी में लगाया। इस शिविर में देशभर के ऋषि- मुनि, त्यागी वेश एवं कमण्डलुधारी, संन्यासी सभी पधारे। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, योगी याज्ञवल्क्य, महर्षि अष्टावक्र सरीखें पारदर्शी ज्ञानी वहाँ रोज प्रवचन देते।

🔶 इस प्रवचन कक्षा में राजर्षि जनक भी शामिल होते। परन्तु आडम्बर में घिरे कई वेशधारी संन्यासी उन्हें उपेक्षा की नजर से देखते। यहाँ तक कि उन्हें समझ में ही नहीं आता था कि वे महर्षि जन इस राजा को इतना सम्मान क्यों देते हैं? ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से यह सच्चाई छुपी न रही। उन्होनें इन आडम्बर धारियों की समस्या का निराकरण करने के लिए शिविर स्थल में अपने तपोबल से आग लगा दी। आग लगते ही सबकी झोपड़ियाँ जलने लगी। जिस समय आग लगी, उस समय वेदान्त का प्रवचन चल रहा था। आत्मज्ञान की चर्चा के समय आग लगने से सभी संन्यासी घबरा गये। उन्हें अपनी लंगोटी व कमण्डलु की चिन्ता होने लगी। ये सभी प्रवचन को छोड़कर अपना सामान बचाने के लिए भागे। इस सारे खेल में ब्रहर्षि विश्वामित्र हंस रहे थे।

🔷 यह आग बढ़ती गयी। राजा जनक भी वहीं बैठे थे। परन्तु उनके चित्त में स्थिरता थी। वह बिना किसी परेशानी के वेदान्त चर्चा में भाग ले रहे थे। ब्रहर्षि विश्वामित्र ने उन्हें चेताया- महाराज महाराज! आग लगी है। आप तो राजा हैं। आपका राज्य एवं महल जल रहा है। क्या आपको चिंता नहीं हों रही है? महर्षि के प्रश्न पर राजा जनक स्थिर चित्त से बोले- ऋषियों! आप चिंता न करें। सद्गुरू की कृपा से मैंने सत्य जान लिया है- मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दहति किंचन  केवल मिथिला नगरी जल रही है, मेरा कुछ नहीं जल रहा है। जनक के इस कथन के साथ ही आग बुझ गयी। महर्षि ने अपना खेल समेट लिया। ज्ञान और आसक्ति का भेद स्पष्ट हो गया। सचमुच सद्गुरू की कृपा से क्या नहीं हो सकता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 152

👉 वास्तविक सौंदर्य

राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कईं राजकुमार व राजा उसके साथ विवाह करना चाहते थे, लेकिन वह किसी को पसन्द नहीं करती थी। आखिरकार उन र...