रविवार, 23 मई 2021

👉 अहंकार

एक दिन रामकृष्ण परमहंस किसी सन्त के साथ बैठे हुए थे। ठण्ड के दिन थे। सांयकाल हो गया था। तब सन्त ने ठण्ड से बचने के लिए कुछ लकड़ियां एकट्ठा कीं और धूनी जला दी। दोनों सन्त धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे।

इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ। उसे भी ठण्ड लगी तो उसने भी कुछ लकड़ियां एकट्ठा कर लीं। अब लकड़ी जलाने के लिए उसे आग की आवश्यकता थी। वह तुरन्त ही दोनों संतों के पास पहुंचा और धूनी से जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उठा लिया।

एक व्यक्ति ने सन्त द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया तो सन्त गुस्सा हो गए। वे उसे मारने लगे। संत ने कहा कि तू पूजा-पाठ नहीं करता है, भगवान का ध्यान नहीं करता, तेरी हिम्मत कैसे हुई, तूने मेरे द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया।

रामकृष्ण परमहंस ये सब देखकर मुस्कुराने लगे। जब संत ने परमहंसजी को प्रसन्न देखा तो उन्हें और गुस्सा आ गया। उन्होंने परमहंसजी से कहा, ‘आप इतना प्रसन्न क्यों हैं? ये व्यक्ति अपवित्र है, इसने गन्दे हाथों से मेरे द्वारा जलाई गई अग्नि को छू लिया है तो क्या मुझे गुस्सा नहीं होना चाहिए?’

परमहंसजी ने कहा, ‘मुझे नहीं मालूम था कि कोई वस्तु छूने से अपवित्र हो जाती है। अभी आप ही कह रहे थे कि सभी व्यक्तियों में परमात्मा का वास है। और थोड़ी ही देर पश्चात् आप ये बात स्वयं ही भूल गए।’ उन्होंने आगे कहा, ‘वास्तव में इसमें आपकी गलती नहीं है। आपका शत्रु आपके अन्दर ही है, वह है अहंकार।

घमण्ड के कारण ही हमारा सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है, इसीलिए हमें इससे बचना चाहिए। इस बुराई पर विजय पाना बहुत कठिन है।

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 23 May 2021


👉 भक्तिगाथा (भाग २१)

अनन्यता के पथ पर बढ़ चलें हम
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि अपनी किन्हीं स्मृतियों मे खो गये। इन स्मृतियों की मधुरता उनके होठों पर मुस्कान बनकर खेलने लगी। उनके पास बैठे महर्षि देवल देवर्षि का यह भाव परिवर्तन देख रहे थे। उनसे रहा न गया और उन्होंने पूछ ही लिया- ‘‘किसी भक्त के चरित्र का स्मरण हो आया क्या देवर्षि?’’ नारद ने महर्षि देवल की ओर बड़ी स्नेहिल दृष्टि से देखा और बड़े आत्मीय स्वरों में बोले- ‘‘हाँ महर्षि! वह परम भक्त स्वयं आप हैं।’’ देवर्षि के ये वचन सुनकर देवल थोड़ा संकुचित हुए और कहने लगे- ‘‘भगवन्! भला मैं किस तरह का भक्त हूँ। मेरा अतीत तो आप जानते ही हैं। बस माता जगदम्बा के स्मरण ने मुझे आप सब भगवद्भक्तों का सेवक होने का अवसर दिया है।’’
    
‘‘सो तो ठीक है महर्षि देवल, परन्तु मेरा अनुरोध है कि अपनी भक्तिकथा आप स्वयं सुनायें।’’ देवर्षि के इस कथन पर सभी ने हामी भरी। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तो इस प्रस्ताव पर विभोर हो गये और बोले- ‘‘जिसे पराम्बा जगदीश्वरी ने स्वयं अपना पुत्र कहा है, उनकी कथा हम स्वयं सुनेंगे।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन पर महर्षि देवल ने बड़े विनय भरे स्वरों में कहा- ‘‘यह सच है ऋषिगण कि मैं माँ की ममता से कृतार्थ हुआ हूँ, लेकिन इसका कारण मेरा कोई गुण नहीं, बल्कि माता का अपनी संतान के प्रति प्रेम है।
    
मैं तो बचपन से ही कुसंगति के कारण अनेक बुरे कर्मों में लिप्त हो गया। कुसंस्कार अपने अनुरूप कुसंग, कुप्रवृत्ति, कुकर्म एवं कुपरिणाम देते हैं। मेरे साथ भी यही प्रक्रिया चल रही थी। मेरे दुर्गुणों ने ही मुझे दोषों से घेर लिया था। पाप का अँधेरा था, पीड़ा गहरी थी। अपनी ही दुष्प्रवृत्तियों के कारण देह रोगी हो चली थी और मन संतप्त। किसी दिशा में कोई किरण नहीं नजर आ रही थी। तभी माँ के कृपापुञ्ज बनकर आए देवर्षि ने बड़ी आश्वस्ति से कहा-देवल! माँ की कृपा से सब कुछ सम्भव है। उनकी कृपा से न केवल तुम्हारी पीड़ा का निवारण हो सकता है, बल्कि तुम स्वयं औरों की पीड़ा का निवारण कर सकते हो।
    
इन वचनों के साथ देवर्षि ने मुझे माता सिंहवाहिनी-अष्टभुजा दुर्गा का ध्यान बताया और उनके पावन मंत्र का उपदेश दिया। भगवान विष्णु के परम भक्त नारद के श्रीमुख से दुर्गा का ध्यान एवं मंत्रोपदेश कुछ अचरज सा लगा, परन्तु देवर्षि हँसते हुए बोले-इस अचरज भरे प्रश्न का उत्तर तुम्हें ब्राह्मी अवस्था में पहुँचने पर मिलेगा। विष्णु ही वैष्णवी हैं, दुर्गा ही गायत्री हैं, परन्तु साधना का पथ जन्मांतर के संस्कारों पके अनुरूप निर्धारित होता है। यदि पिछले जन्म के संस्कारों को पहचान कर भक्ति साधना की जाय तो चित्त का निरोध शीघ्र होता है। देवर्षि ने ही बताया कि मुझमें भगवती पराम्बा हिमालय नन्दिनी की भक्ति के संस्कार हैं।
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ४५

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २१)

👉 अपनी अपनी दुनिया

सच तो यह है कि स्वाद की तरह रंगों की अनुभूति में भी हर मनुष्य का अनुभव एक दूसरे से पूरी तरह नहीं मिलता और उसमें अन्तर होता है। यह अन्तर इतना सूक्ष्म होता है कि उसका वर्णन हमारी शब्दावली ठीक तरह से नहीं कर सकती। एक वस्तु की मिठास एक व्यक्ति को जैसी अनुभव होती है, दूसरे को उसकी अनुभूति जैसी होगी, उसमें अन्तर रहेगा और अन्तर इतना हलका है कि सभी लोग गन्ने को ‘मीठा’ कह सकते हैं पर इस मिठास को किसने किस तरह के स्तर का अनुभव किया इस की कोई सूक्ष्म परीक्षा व्यवस्था हो तो सहज ही यह कहा जा सकता है कि एक ने दूसरे से काफी अन्तर वाली मिठास चखी हैं। इसका कारण मुख में रहने वाली रासायनिक द्रवों की संरचना एवं मात्रा में अन्तर होना होता है।

हमारी आंखें जिस वस्तु का जो रंग देखती हैं क्या वस्तुतः वह उसी रंग की है? हमारी आंखों को जिस वस्तु का जो रंग दीखता है क्या अन्य जीवों को भी वैसा ही दीखता है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर बेखटके नहीं दिया जा सकता है।

तथ्य यह है कि वस्तुतः किसी पदार्थ का कोई रंग नहीं है। अणुओं की विशेष प्रकार की संरचना ही सघन होकर विभिन्न प्रकार की वस्तुओं जैसी बनती है। अणुओं का कोई रंग नहीं। फिर रंगीनी क्या है?

वस्तुएं सूर्य की केवल सफेद किरणों को आत्मसात करती हैं और उन किरणों के किसी एक रंग को प्रतिबिम्बित करती हैं। पौधे की पत्तियां रहे रंग की इसलिए दीखती हैं कि वे सूर्य किरणों का हरा रंग पचा नहीं पातीं और उसकी उलटी कर देती हैं। पत्तियों द्वारा किरणों का हरा रंग वापिस फेंक देना यही है उनका हरा रंग दिखाई पड़ना।

तत्व ज्ञानियों का यह कथन एक दृष्टि से सर्वथा सत्य है कि—‘‘हर मनुष्य की अपनी दुनिया है। वह उसकी अपनी बनाई हुई है और उसी में रमण करता है। दुनिया वस्तुतः कैसी है? इस प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है कि वह जड़ परमाणुओं की नीरस और निर्मम हलचल मात्र है। यहां अणुओं की धूल बिखरी पड़ी है और वह किन्हीं प्रवाहों में बहती हुई इधर-उधर भगदड़ करती रहती है। इसके अतिरिक्त यहां ऐसा कुछ नहीं है जिसे स्वादिष्ट अस्वादिष्ट या रूपवान कुरूप कहा जा सके। हमें नीम की पत्ती कड़वी लगती हैं पर ऊंट उन्हें रुचि पूर्वक खाता है संभव है उसे वे पत्तियां बिस्कुट या मिठाई की तरह मधुर लगती हों। वस्तुतः कोई वस्तु न मधुर है न कड़वी हमारी अपनी संरचना ही अमुक वस्तुओं के साथ तालमेल बिठाने पर जैसी कुछ उलटी-पुलटी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है उसी आधार पर हम उसका रंग स्वाद आदि निर्धारण करते हैं।

यही बात प्रिय अथवा अप्रिय के सम्बन्ध में लागू होती है। अपने और बिराने के सम्बन्ध में भी अपनी ही दृष्टि और अपनी ही मान्यता काम करती है। वस्तुतः न कोई अपना है न बिराना। इस दुनिया के आंगन में अगणित बालक खेलते हैं। इनमें से कभी कोई किसी के साथ हो लेता है, कभी प्रतिपक्षी का खेल खेलता है। इन क्षणिक संयोगों और संवेगों को बालबुद्धि जब बहुत अधिक महत्व देने लगती है तो प्रतीत होता है कि कुछ बहुत बड़ी अनुकूलता-प्रतिकूलता उत्पन्न हो गई है। हर्ष शोक के आवेशों में घटना क्रम उतना उत्तरदायी नहीं होता जितना कि  अपना मनःस्तर स्वयं सोचने का दृष्टिकोण। सन्त और चोर के—ज्ञानी और अज्ञानी के—दृष्टिकोण में एक ही स्थिति के सम्बन्ध में जो जमीन आसमान जैसा अन्तर रहता है उसका कारण प्रथक-प्रथक मनःस्थिति ही है। घना क्रम का उतना श्रेय या दोष नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...