शनिवार, 31 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 1 Jan 2017


👉 सतयुग की वापसी (भाग 26) 1 Jan

🌹 बस एक ही विकल्प — भाव-सम्वेदना  

🔴  अनावश्यक सम्पन्नता की ललक ही बेकाबू होने पर उन अनर्थकारी संरचनाओं में प्रवृत्त होती है, जिनके कारण अनेकानेक रंग रूप वाले अनाचारों को व्यापक, विस्तृत और प्रचण्ड होते हुए देखा जा रहा है। लिप्साओं में किसी प्रकार कटौती करते बन पड़े, तो ही वह जुझारूपन उभर सकता है, जो अवांछनीयताओं से गुँथे और पटकनी देकर परास्त कर सके। जिन अभावों से लोग संत्रस्त दीखते हैं, उनसे निपटने की प्रतिभा उनमें उभारी जाए ताकि वे अपने पैरों खड़े होकर, दौड़कर स्पर्द्धा जीतते देखे जा सकें।       

🔵 आर्थिक अनुदान देने की मनाही नहीं है और न यह कहा जा रहा है कि गिरों को उठाने में, सहयोग देने में कोताही बरती जानी चाहिए। मात्र इतना भर सुझाया जा रहा है कि मनुष्य अपने आप में समग्र और समर्थ है। यदि उसका आत्मविश्वास एवं पुरुषार्थ जगाया जा सके , तो इतना कुछ बन सकता है जिसके रहते याचना का तो प्रश्न ही नहीं उठता, बल्कि इतना बचा रहता है, जिसे अभावों और अव्यवस्थाओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में लगाया जा सके।

🔴 इक्कीसवीं सदी भाव-संवेदनाओं के उभरने-उभारने की अवधि है। हमें इस उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान माली की भूमिका निभानी चाहिए। यह विश्व उद्यान इसी आधार पर हरा-भरा फला-फूला एवं सुषमा सम्पन्न बन सकेगा। आश्चर्य नहीं कि वह स्वर्ग लोक वाले नन्दन वन की समता कर सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निःस्वार्थ प्रेम

🔵 यथार्थ ईश्वर भक्त या भगवत् प्रेमी अकेला ही लाखों योद्धाओं की शक्ति रखता है। वह किसी पार्थिव सहायता का मुखापेक्षी नहीं रहता। वह तो केवल उस सर्व-शक्तिमान विश्व-नियामक परमेश्वर की कृपा का ही भिखारी होता है, उस महाशक्ति के प्रभाव सो ही वह प्रेम एवं विरह रहित होकर अपने समस्त कर्तव्यों को पूर्ण करता है। कोई भी दुःख उसे अभिभूत एवं प्रलोभन उसे विपन्न नहीं कर सकता।

🔴 उस भगवद्-भक्त का हृदय किसी निष्फल भाव अथवा किसी विपक्ष चेष्टा से कातर नहीं होता है। इसी प्रकार आरम्भ किये हुए किसी कार्य में वह असफल भी नहीं होता। अतः हे हमारे विरही दीन-हृदय जिससे प्रेम किया है, उस प्रेमी का एक बार परिचय तो दो! अपने उस ईश्वर के लिए तुमने कौन सा कर्तव्य पूर्ण किया है, और किस प्रलोभन के संग्राम में विजय प्राप्त की है, सो तो बताओ। एक बार उसकी महिमा की दीप्ति उज्ज्वल बनाने के लिए किस शत्रु को पराजित किया है, एवं कौन सा दुख सहन कर किस रूप में कीर्ति स्थापित की है, उसका भी तो हिसाब दो। अरे, तुम्हारे मुख का प्रेम केवल शब्द मात्र ही है। तभी तो तुम साधारण से दुःख या तुच्छ से द्वन्द्व अथवा स्वल्प मात्र परिश्रम से शान्त जो जाते हो।

🔵 तुम आक्षेप करते हो कि तुम्हारी शक्ति किसी प्रतिकूलता के सम्मुख ठहर नहीं सकती। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकती। भला, जो प्रेम जीवन की प्रबल शक्ति नहीं होता, उसे मिथ्या के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? जो प्रेम स्वार्थ विमुख (निस्वार्थ) नहीं है, वह नितान्त बलहीन ही होता है।

🌹 योगी अरविन्द
🌹 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969 पृष्ठ 1

👉 आत्मचिंतन के क्षण 1 Jan 2017

 🔴 स्वराज्य देने में यों अंग्रेजों ने भी उदारता दिखाई, पर वह संभव तब हुई जब भारतवासियों ने इसके लिए प्रयत्न और पुरुषार्थ किया। यों उचित तो यही है कि शोषक अपने कुमार्ग छोड़े और पिछले पाप का प्रायश्चित करने के लिए जिसको जो क्षति पहुँचाई हैं उसकी क्षतिपूर्ति करें, पर होना ऐसा कम ही है। भलमनसाहत दुनिया में अभी आयी नहीं है। इसलिए व्यवहारतः शोषितों को भी काटना नहीं तो फुफकारना जरूर पड़ता है। अपने अधिकारों की माँग उन्हें इस प्रकार रखनी होती है कि किसी को उसे अस्वीकार करते बन ही न पड़े।

🔵 उपयोगी साहित्य पढ़ते रहने की अभिरुचि हमारे मस्तिष्क, अंतःकरण एवं व्यक्तित्व को निखारती है। उसे आधार पर हम ज्ञान सम्पदा को सुसंपन्न बनाते हैं और अपना स्तर सहज स्वाभाविक क्रम से आगे बढ़ाते हैं। इसलिए यह समझा और समझाया जाना चाहिए कि धन उपार्जन से भी ज्ञान उपार्जन का मूल्य अधिक है। उसके लिए उसी तरह प्रयत्नशील रहा जाना चाहिए जैसे आजीविका उपार्जन के लिए रहते हैं।

🔴 यदि भीतर से ऐसी हूक, टीस, व्याकुलता और तड़फन उठती है कि एक क्षण भी बर्बाद किये बिना हमें ईश्वरीय प्रयोजन के लिए समर्पित जीवन जीना चाहिए, निर्वाह के स्वल्प साधनों से काम चलाना चाहिए और अपनी सारी क्षमताएँ एवं विभूतियाँ जीवन लक्ष्य की पूर्ति में नियोजित कर देनी चाहिए, इस प्रकार के ज्ञान का उदय ही आत्म-बोध, आत्म-साक्षात्कार अथवा ईश्वर-दर्शन कहा जाता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 10) 1 Jan

🌹अधिक ‘ओंकारों’ का प्रयोग

🔴 कहीं-कहीं ऐसे विधान मिलते हैं कि गायत्री मंत्र के साथ एक से अधिक ॐकारों का प्रयोग करना चाहिए। कोई तीन और कोई पांच ॐकार लगाने की भी बात कहते हैं। आदि में, मध्य में—अन्त में, तीन चरणों में से प्रत्येक के पहले—व्याहृतियों के बाद एक या अधिक ॐकार लगाने की बात कही जाती है। इसके लिए यत्र-तत्र के उल्लेख भी उपस्थित किये जाते हैं।

🔵 मतमतान्तरों ने यह भिन्नता किस प्रकार प्रस्तुत की इसकी सही जानकारी तो नहीं मिल सकी, पर ऐसा प्रतीत होता है कि तिलक छाप में अन्तर करके जिस प्रकार अपने सम्प्रदाय की जानकारी कराई जाती है—वेष, वस्त्र आदि से अपने वर्ग का परिचय सर्व साधारण को कराया जाता है, सम्भवतः उसी प्रकार गायत्री जप में न्यूनाधिक ॐकारों का प्रयोग करने की प्रथा चलाई होगी।

🔴 साधारणतया प्रत्येक वेदमन्त्र से पूर्व उसके सम्मान का बोध कराने के लिए एक ‘ॐ’ लगाने का विधान है। जिस प्रकार किसी के नाम का उल्लेख करने से पूर्व ‘श्री’—‘श्रीमती’—‘मिस्टर’—‘कुमारी’ आदि लिखने का, उसके प्रति सम्मान प्रकट करने का शिष्टाचार प्रचलित है, उसी प्रकार प्रत्येक वेदमन्त्र से पूर्व ‘ॐ’ लगाते हैं। तीन व्याहृति आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण और एक ऊंकार—बस इतना ही गायत्री मन्त्र है और वही पूर्ण भी है। जप, यज्ञ आदि में इसी परिपूर्ण मन्त्र का उपयोग होना चाहिए। गुरुमंत्र गायत्री का इतना ही स्वरूप है। विशिष्ट साधना और नित्य कर्म में इतना ही मंत्र-भाग प्रयुक्त होता रहा है। अधिक संख्या में ‘ॐकारों’ का प्रयोग करना सम्भवतः सम्प्रदाय विशेषों में अपनी प्रथकता सिद्ध करने की दृष्टि से ही चला है।

🔵 ‘ॐ’ भगवान का सर्वोत्तम नाम है। उसका अधिक बार गायत्री मंत्र के साथ उपयोग कर लेने में भी कोई हानि नहीं। इसलिए जिन्हें अधिक बार ‘ॐ’ लगाने का मन है, उन्हें रोकने की भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि इसमें अनुचित जैसी कोई बात दिखाई नहीं पड़ती। जहां तक सार्वभौम व्यवस्था—एक रूपता—समस्वरता एवं शास्त्रीय परम्परा का प्रश्न है, वहां मंत्र के आरम्भ में एक बार ‘ॐ’ लगाना ही अधिक सही कहा जायगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 4) 1 Jan

🌹 प्रतिकूलताएं वस्तुतः विकास में सहायक

🔵 नौकर ने सम्बन्धित विषय पर जो तर्क तथ्य प्रस्तुत किये उससे विवाद समाप्त हुआ। एक विद्वान ने नौकर से पूछा ‘महाशय आपने किस विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की?’ नौकर ने बड़ी ही नम्रता के साथ उत्तर दिया। श्रीमान मैंने कई स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की है किन्तु मेरा सबसे अधिक प्रभावशाली शिक्षण विपत्ति रूपी स्कूल में हुआ है।’ यह तेजस्वी बालक ही आगे चलकर ‘जीन जेक रूसो’ के नाम से प्रख्यात हुआ जिसकी क्रान्तिकारी विचारधारा ने प्रजातन्त्र को जन्म दिया।

🔴 प्रसिद्ध विद्वान विलियम कॉवेट अपनी आत्म कथा में लिखा है कि ‘प्रतिकूलताएं मनुष्य के विकास में सबसे बड़ी सहचरी है। आज में जो कुछ भी बन पाया हूं विपन्न परिस्थितियों के कारण ही सम्भव हो सका है। जीवन की अनुकूलताएं सहज ही उपलब्ध होती तो मेरा विकास न हो पाता।’ कावेट के आरम्भिक दिन कितनी कठिनाइयों एवं गरीबी में बीते, यह उसके जीवन चरित्र को पढ़ने पर पता चलता है। वह लिखता है कि ‘‘आठ वर्ष की अवस्था में मैं हल चलाया करता था। ज्ञान अर्जन के प्रति अपार रुचि थी। घर से लन्दन भाग गया तथा सेना में भर्ती हो गया। रहने के लिए एक छोटा सा कमरा मिला जिनमें चार अन्य सैनिक भी रहते थे।

🔵 जो पैसा मिलता था उससे किसी प्रकार दो समय की रोटी जुट जाती थी। मोमबत्ती और तेल खरीदने के लिए पैसा नहीं बचता था। अध्ययन में गहरी रुचि थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए मैंने आधा पेट भोजन करना आरम्भ किया। जो पैसा बचता था, उससे स्याही मोमबत्ती कागज खरीद कर लाता था। स्थानीय लाइब्रेरी से पुस्तकें अध्ययन के लिए मिल जाती थीं। कमरे के अन्य सिपाहियों के हंसने बोलने से मुझे निरन्तर बाधा बनी रहती थी किन्तु इसके बावजूद भी मैंने अध्यवसाय का क्रम सतत जारी रखा। समय को कभी व्यर्थ न गंवाया। आज उसी का प्रतिफल है कि मैं वर्तमान स्थिति तक पहुंच सका हूं। जीवन के संघर्षों से मैं कभी घबड़ाया नहीं वरन् उनको विकास का साधन माना।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...