मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

👉 अन्तःकरण की आवाज सुनो और उसका अनुकरण करो

जब मनुष्य अकेला होता है, उसके पास और आस-पास भी जब कोई नहीं होता है, तब कोई पाप करने से उसे जो भय लगता है, एक शंका रहती है, वह किसके कारण होती है? उसे बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि कोई उसके पाप को देख रहा है? क्यों उसका शरीर पूरे उत्साह से उस पाप कर्म में उत्साहित नहीं रहता? और क्यों बाद में भी वह एक अपराधी की तरह मलीन रहता है? क्या कभी कोई इस पर विचार करता है कि जब उसके पाप को देखने वाला कोई मौजूद नहीं तब उसे भय किसका है वह किससे डर रहा है? कौन उसे ऐसा करने को निःशब्द रोकता और टोकता रहता है? कौन उसके मन, प्राण और शरीर में कंपन उत्पन्न कर देता है?

निःसंदेह यह उसका अपना अन्तःकरण है, जो उसे उस पाप से हटाने के प्रयत्न में विविध प्रकार की शंकाओं, संदेहों व कम्पनादि भयद्योतक अनुभवों से उसे वैसा न करने के लिए संकेत करता जाता है और जो मनुष्य उसकी अवहेलना करके वैसा करता है, उसका अन्तःकरण एक न एक दिन उसकी गवाही देकर उसे दण्ड का भागी बनाता है। यह हो सकता है कि किसी का पाप कर्म दुनिया से छिपा रहे, किंतु उसके अपने अन्तःकरण से कदापि नहीं छिप सकता।

वह उसकी एक-एक क्रिया और विचार का सबसे प्रबल और सच्चा साक्षी होता है। जब किसी कारणवश मनुष्य को अपने पाप का दण्ड किसी और से नहीं मिल पाता तो समय आने पर उसका अन्तःकरण उसे स्वयं दण्डित करता है। हमारे लिए उचित यही है कि अन्तःकरण में विद्यमान परमात्मा की आवाज को सुनें और उसका अनुसरण करें।

महर्षि रमण
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1965 पृष्ठ 1

👉 मनुष्य की महानता का रहस्य

मनुष्य सब प्राणियों से श्रेष्ठ है। शक्तिमान् होना अथवा शक्तिहीन होना मनुष्य के स्वयं अपने हाथ में है।

अपनी प्रत्येक आदत एवं वासना के ऊपर आप नियंत्रण पा सकते हैं, क्योंकि आप अनंत परमात्मा के एक अंश हैं और परमात्मा के बल के आगे ऐसा कुछ भी नहीं है, जो टिक सके। अनेक मनुष्य हलके प्रकार का जीवन इस तरह बिताते हैं, जिसमें व्यक्ति स्वतंत्र होता ही नहीं है। क्या तुम्हें इस संसार में प्रभावशाली बनना है? यदि हाँ, तो आप अपने आप पर निर्भर रहो और स्वतंत्र बनने का प्रयत्न करो। अपने आप को साधारण मनुष्य मत समझो। हम गरीब हैं, हमसे क्या होगा, ऐसा मत कहो।

यदि आप परमात्मा के ऊपर विश्वास रखकर लोगों की आलोचना से नहीं डरोगे, तो प्रभु अवश्य आप को सहायता देगा। यदि लोगों को खुश करने के लिए अपना जीवन बिताएँगे, तो लोगों से आप कदापि खुश नहीं रहेंगे, बल्कि जैसे-जैसे आप उन्हें खुश रखने में लगेंगे, वैसे-वैसे ही आप गुलाम बनते जाऍगे, वैसे-वैसे ही आप से उनकी माँग भी बढ़ती जाएगी।

जो कोई स्वाभाविक रीति से अपनी सामर्थ्य का उपयोग करता है, वह निश्चित रूप से महान् पुरुष है। जिन मनुष्यों को अपनी मूलशक्ति आत्मशक्ति का भान होता है, वे ओछे और बेकार काम करते हुए नहीं दिखाई देते।

📖 अखण्ड ज्योति-मई 1948 पृष्ठ 7

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 6 April 2021

◆ पुरुषार्थ ही हमारी स्वतंत्रता और सभ्यता की रक्षा करने के लिए दृढ़ दुर्ग है जिसे कोई भी बेध नहीं सकता। हमें अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर, पुरुषार्थ के बल पर जीवन संघर्ष में आगे बढ़ना। यदि हमें कुछ करना है, स्वतंत्र रहना है, जीवित रहना है, तो एक ही रास्ता है-पुरुषार्थ की उपासना का। पुरुषार्थ ही हमारे जीवन का मूलमंत्र  है।

◇ लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर लम्बी चौड़ी डींग हाँक कर या बड़े बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है, पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। संसार को सुधारने का प्रधान साधन यही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठायें, चरित्र की दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें। अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है।

◆ सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है? सभी तो अपनी अपूर्णता के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे से फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाय तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सच्ची शिक्षा स्वयमेव हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे।

📖 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...