गुरुवार, 4 नवंबर 2021

👉 दिया धरती का, ज्योति आकाश की

दीपावली पर दीये जलाते समय दीये के सच को समझना निहायत जरूरी है। अन्यथा दीपावली की प्रकाशपूर्ण रात्रि के बाद केवल बुझे हुए मिट्टी के दीये हाथों में रह जाएँगे। आकाशीय-अमृत ज्योति खो जाएगी। अन्धेरा फिर से सघन होकर घेर लेगा। जिन्दगी की घुटन और छटपटाहट फिर से तीव्र और घनी हो जाएगी। दीये के सच की अनुभूति को पाए बिना जीवन के अवसाद और अन्धेरे को सदा-सर्वदा के लिए दूर कर पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन भी है।
    
दीये का सच दीये के स्वरूप में है। दीया भले ही मरणशील मिट्टी का हो, परन्तु ज्येाति तो अमृतमय आकाश की है। जो धरती का है, वह धरती पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो निरन्तर आकाश की ओर भागी जा रही है। ठीक दीये की ही भाँति मनुष्य की देह भी मिट्टी ही है, किन्तु उसकी आत्मा मिट्टी की नहीं है। वह तो इस मिट्टी के दीये में जलने वाली अमृत ज्योति है। हालांकि अहंकार के कारण वह इस मिट्टी की देह से ऊपर नहीं उठ पाती है।
    
मिट्टी के दीये में मनुष्य की जिन्दगी का बुनियादी सच समाया है। ‘अप्प दीपो भव’ कहकर भगवान् बुद्ध ने इसी को उजागर किया है। दीये की माटी अस्तित्त्व की प्रतीक है, तो ज्योति चेतना की। परम चेतना परमात्मा की करूणा ही स्नेह बनकर वाणी की बातों को सिक्त किए रहती है। चैतन्य ही प्रकाश है, जो समूचे अस्तित्त्व को प्रभु की करूणा के सहारे सार्थक करता है।
    
मिट्टी सब जगह सहज सुलभ और सबकी है, किन्तु ज्योति हर एक की अपनी और निजी है। केवल मिट्टी भर होने से कुछ नहीं होता। इसे कुम्भकार गुरु के चाक पर घूमना पड़ता है। उसके अनुशासन के आँवे में तपना पड़ता है। तब जाकर कहीं वह सद्गुरु की कृपा से परमात्मा की स्नेह रूपी करुणा का पात्र बनकर दीये का रूप ले लेती है। ऐसा दीया, जिसमें आत्म ज्योति प्रकाशित होती है। दीपावली पर दीये तो हजारों-लाखों जलाये जाते हैं, पर इस एक दीये के बिना अन्धेरा हटता तो है, पर मिटता नहीं। अच्छा हो कि इस दीपावली में दीये के सच की इस अनुभूति के साथ यह एक दीया और जलाएँ, ताकि इस मिट्टी के देह दीप में आत्मा की ज्योति मुस्करा सके।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ ११३

स्व प्रकाश का प्रेरणा पर्व दीपावली

भारतीय संस्कृति में पर्वों त्योहारों का विशेष महत्त्व है। पर्वों के साथ उल्लासमय क्रिया-काण्ड  एवं प्रेरक सूत्र दोनों समाए हैं। कर्मकाण्ड और उससे जुड़ी प्रेरणाएँ ये दोनों स्कूटर के दो चक्के के समान हैं। अँधे और पंगे की जोड़ी की तरह दोनों के सम्यक् तालमेल से ही लक्ष्य तक पहुँचा जा  सकता है। दीपावली की प्रेरणाएँ की जीवन को दिशाबोध कराती है।
    
दीपावली को पर्वों का राजा कह सकते हैं। भगवान् राम  राष्ट्र के आध्यात्मिक उत्थान अनौचित्य के विनाश तथा औचित्य की स्थापना के लिए राज्य सुख त्याग कर चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार किये थे। जब वे असुरता के प्रतीक रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे, तब उनका स्वागत दीपमालाओं से सजाकर किया गया। कहते हैं कि तभी से लोग दीपावली मनाते आ रहे हैं। आज भी समाज में धर्म के नाम पर वितण्डा फैलाने वाले रावणों, राजनीति के नाम पर राष्ट्र का शोषण करने वाले जरासंधों, कंसों, दुर्योधनों तथा राष्ट्र की अस्मिता का अपहरण करने वाले दुःशासनों की बाढ़ है। हम सबको इनके उन्मूलन के लिए समर्पित भाव से अपनी प्रतिभा, पुरुषार्थ, धन तथा समय सब कुछ न्यौछावर करना चाहिए, ताकि इतिहास हमें भी दीप मालिका सजाकर याद करे।
    
विशेषकर आज के भौतिकवादी युग में जब लोगों की वृत्ति भोगवादी होती जा रही है, लोग बिना कष्ट-कठिनाई सहन किये ऊँची सफलताएँ हस्तगत करना चाहते हो, वहाँ दीपावली के दीपक का महत्त्व बढ़ जाता है। दीपक स्वयं जलता है, कष्ट सहता है और संसार को प्रकाश देता है। हम भी यदि सफलता हस्तगत करना चाहते हैं, अपने भीतर बाहर को प्रकाशित करना चाहते हैं, तो दीपक की भाँति जलना पड़ेगा, तपना पड़ेगा, कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। कविवर गुप्त जी के शब्दों में-
    
जितने कष्ट कण्टकों में हैं, उनका जीवन सुमन खिला।
गौरव गंध उन्हें उतना ही, यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला॥
    
आशावादिता का सबसे सशक्त प्रतीक भी है दीपक। अंधकार चाहे जितना सघन क्यों न हो, नन्हा-सा दीपक उसे सदा चुनौती देता एवं अस्तित्व रहते तक उस पर विजय प्राप्त करता है। हमें भी समाज में व्याप्त अनाचार, अनैतिकता, घूसखोरी, भ्रष्टाचार, आतंकवादी जैसी विसंगतियों से न  घबराते हुए दीपक बनकर इनसे जूझना चाहिए। यदि हम एक सच्चे दीपक बन गये, तो निश्चय ही  अपने चारों ओर व्याप्त अंधकार पर विजय प्राप्त कर सकेंगे। हमें देखकर और भी प्रेरित होंगे, तब दीप से दीप चलते चले जाएँगे और जिधर चल पड़ेगे कारवाँ चल पड़ेगा। सामयिक कवि श्री वीरेश्वर उपाध्याय ने शब्दों में कहें तो-
जीवन पथ जो कण्टकमय हो, अंधकारों का घोर प्रलय हो, किन्तु साधना एक यही बस, पग प्रति पग गतिमान चाहिए। माँ बस यह वरदान चाहिए।
    
दीपावली लक्ष्मी का पर्व है। युग निर्माण योजना मिशन के संस्थापक पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने धन को माँ के दूध की संज्ञा देते हुए कहा है कि हम लक्ष्मी को माँ समझकर अपने जीवन को विकसित, सामर्थ्यवान बनाने के लिए उपयोग करें, न कि भोग विलास तथा ऐशोआराम के लिए। हम इस पर्व में लेखा-जोखा तो करते हैं, वर्ष भर के लाभ-हानि का विचार भी करते हैं, किन्तु यहीं तक सीमित न रहकर हमें अर्थ के संयमित उपभोग की प्रेरणा भी लेनी चाहिए। ईशोपनिषद् में उपनिषद्कारों ने यही प्रेरणा दी है-
ईशावास्यामिदं सर्वं यत्किंचजगत्यांजगत।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृदः कस्य स्विद्धनम्॥
    
वस्तुतः दीपावली प्रकाश का पर्व है। युगों से हम इसे मानते आ रहे हैं, किन्तु उक्त संकल्पों एवं प्रेरणाओं के अभाव में हमारी दीपावली प्राणहीन होती जा रही है। पूजा-पाठ करना, दीपक जलाना आदि श्रद्धा एवं उत्साह प्रकट करने के सारे उपक्रम निरर्थक हो जाते हैं यदि हमारे अन्दर अंधकार से जूझने की प्रेरणा नहीं उभरी। अतः इस पर्व पर हम सब संकल्प लें, दीपक बनने का, प्रकाश स्तंभ बनने का, मील का पत्थर बनने का तभी दीपावली पर्व सार्थक होगा।  हर संकल्वान व्यक्ति को नेपोलियन के ये शब्द Nothing is impossible हमेशा याद रखना चाहिए।
शैल दीदी पण्ड्या

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