मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 April 2017


👉 Amrit Chintan 12 April

🔴 Soul realization is a great job. If one have loaded himself with big stones in his bag, it becomes difficult to climb over a bill. So in human life, if we are engaged in vices and weaknesses – realization is not possible with rituals. When we adopt restrain in life, and earn virtues. Any sadhana will be effective positively. It is not simple vocal repentance which is enough, but we will have to pay all prices for the loss and injury inflicted to the society. This is the open secret for attaining higher spiritual values known as “Siddhis.”

🔵 Self introspection, Self refinement, Self development and Self expansion are important four steps for spiritual development. Man has three bodies. One is anatomical, other is subtle, which include mind emotions and evil of this or past life effect this part of body radiation from causal body can only be availed after above rectification, rituals of observing fast. Anusthan, Jap are preliminary preparation of the body and mind.

🔴 Nations grow on the character, strength and scientific development of the citizens of that country. Individual’s character develops his virtues of sympathy, simplicity is all his life.  What is man inside is his emotions and sacredness, which reflects outside as his noble nature  i.e. ‘Soujanyata’ means goodwill and co-operation.

🌹 ~Pandit Shriram Sharma Acharya

👉 तुम्हारी जन्मपत्री मैंने फाड़ दी

🔴 श्री शम्भूसिंह कौशिक को क्षय रोग हो गया। उन्हें सेनिटोरियम में भरती कराया गया। चिकित्सा हुई। कुछ समय बाद उन्हें लाइलाज घोषित कर सेनिटोरियम से छुट्टी दे दी गई। वे कोटा राजस्थान के निवासी थे। मरणासन्न स्थिति में दिन काट रहे थे। ज्योतिषियों ने भी जन्म पत्री देखकर मारकेश बताया था, सो मुत्यु की प्रतीक्षा के अतिरिक्त कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था।

🔵 जिसके जवान इकलौते बेटे को डॉक्टरों ने जवाब दे दिया हो और ज्योतिषियों ने उसकी मृत्यु के निकट होने की भविष्यवाणियाँ की हों, उस माँ की स्थिति क्या होती है, यह विज्ञजन स्वयं समझ सकते हैं। कौशिक जी की माँ दिन- रात अपने इष्टदेव से यही विनती करती रहती थी कि कैसे भी करके उनका बेटा ठीक हो जाए। ईश्वर भले ही उसके प्राण ले लें पर उनके बच्चे को जीवन दान दे दें।

🔴 शायद इसी आर्त पुकार की ही परिणति थी कि पूज्य गुरुदेव वहाँ पहुँच गए। उन्हीं दिनों कोटा राजस्थान में एक विशाल यज्ञायोजन किया गया था। उसे सम्पन्न कराने के लिए स्वयं गुरुदेव वहाँ पहुँचे हुए थे। दुखियारी माँ को किसी ने सलाह दी मथुरा से एक तपस्वी आए हैं, उनसे मिलो। तुम्हारा बेटा ठीक हो जाएगा वह सब काम छोड़कर दौड़ पड़ीं।

🔵 गुरुदेव के पास पहुँचकर उन्होंने विनती की- गुरुदेव हम लोग बहुत गरीब हैं, आपके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं। हमारी शक्ति आपको बुलाने की तो नहीं है, फिर भी हमारी विनती है कि हमारे बेटे पर आपकी कृपा दृष्टि हो जाए, तो शायद हमारी तकदीर बदल जाए। हम सब ओर से निराश हो गए हैं, गुरुदेव! डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया है और ज्योतिषियों ने भी मारकेश बताया है। कहते- कहते वह फूट- फूट कर रो पड़ी। उसकी रुलाई से सभी द्रवित हो गए। गुरुदेव ने अपने पास खड़े सहयोगी से कहा- बेटा, इसका पता नोट कर, दूसरे के घर जाने को समय मिले या न मिले, इसके घर मैं अवश्य जाऊँगा।

🔴 पूज्य गुरुदेव के इन शब्दों से माँ के मन में आशा की किरण जाग उठी। वे दौड़कर घर वापस गई और जो भी अपनी स्थिति अनुरूप कर सकती थीं, स्वागत सत्कार की तैयारी कर ऋषिवर के आने का इंतजार करने लगीं।

🔵 इधर यज्ञीय कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद अपने विश्राम क्षणों में कटौती कर पूज्य गुरुदेव उस दुखियारी माँ के घर की ओर चल पड़े। घर क्या था, एक कच्चा सा मकान था, छावनी की ऊँचाई भी बहुत कम थी। पूज्य गुरुदेव का कद वैसे भी बहुत लम्बा था। अतः अन्दर घुसने के क्रम में बाँस का एक कोना पूज्यवर के माथे में जा लगा। माथे से खून निकल आया। खून देखकर मेजबान बनी माँ ग्लानि से गड़ गई। अपराधियों की तरह सिर झुकाकर वह स्वयं को धिक्कारने लगी। कहने लगी- यदि मैंने आपको घर आने के लिए नहीं कहा होता......।    

🔴 पूज्य गुरुदेव अपनी पीड़ा को छिपाते हुए हँसते रहे और कहा- बेटे, इस बाँस की इतनी हिम्मत कि इसने मुझे चोट पहुँचाई। अब यह बाँस यहाँ नहीं रहेगा।

🔵 उनके इस कथन का आशय उस समय तो शायद ही किसी की समझ में आया हो, लेकिन कुछ ही दिनों में जब वह कच्चा मकान पक्के मकान में बदल गया, तब जाकर लोगों की समझ में आया कि जैसे पेड़ चोट खाकर भी बदले में फल ही देता है, वैसे ही गुरुदेव ने घायल होकर भी उस परिवार को पक्के मकान का अनुदान दे दिया। जब मकान ही पक्का हो गया तो बेचारा बाँस कहाँ रहेगा।

🔴 पूज्य गुरुदेव अन्दर पहुँचे तो देखा कि वह बीमार इकलौता बेटा मरणासन्न स्थिति में लेटा था। मुश्किल से हाथ जोड़े। आँखों से बहती हुई अश्रुधारा ने बिना कुछ कहे उनकी स्थिति बता दी। गुरुदेव ने ढाढस बँधाते हुए कहा- चिन्ता मत कर। गायत्री माता सब ठीक करेंगी।

🔵 घर के लोगों ने विस्तार से बताना शुरू किया कि इस बीमारी का इलाज कहाँ- कहाँ कराया गया और कितने बड़े- बड़े डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। गुरुदेव मुस्कराते हुए शान्त भाव से सारी बातें सुनते रहे। जब ज्योतिषियों द्वारा कही गई मारकेश की बात बताकर उनकी ओर जन्म पत्री बढ़ाई गई, तो पूज्य गुरुदेव ने तुरन्त जन्मपत्री हाथ में ली, उसे पढ़ा और कहा- बेटे। ज्योतिषियों ने जन्मपत्री में जो मारकेश की बात कही है वह तो सही है, पर देख ले हम इस मारकेश को अभी फाड़ देते हैं।

🔴 इतना कहकर गुरुदेव ने वह जन्मपत्री फाड़कर फेंक दी और कहा- तेरा मारकेश समाप्त, तेरी जन्म पत्री ही मैंने फाड़ दी, अब कहाँ रहेगा मारकेश? फिर उन्होंने कागज- पेन मँगाया और तुरन्त दूसरी जन्म पत्री बनाकर दे दी। बोले अब तुझे बहुत लम्बी आयु देंगे। अपने से भी अधिक, हमारे रहते तुझे कुछ नहीं हो सकता। दुखियारी माँ को मानो वांछित वरदान मिल गया। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसे लगा उसके निर्जीव शरीर में किसी ने अकस्मात् प्राणों का संचार कर दिया हो। स्वागत- सत्कार तो भूल ही गई। निढाल होकर गुरुदेव के चरणों में गिर पड़ी व अन्तरमन से गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने लगी।

🔵 सबको सांत्वना देकर गुरुदेव वापस आए और अन्य कार्यों में व्यस्त हो गए। शम्भु सिंह शनैः- शनैः ठीक होने लगे। स्वयं महाकाल के अवतार ने जिसकी कुण्डली फाड़कर दुबारा बनाई हो, उसे तो ठीक होना ही था। एक माह में वे बिना किसी उपचार के पूर्णतया स्वस्थ हो गए।

🔴 पूज्यवर की अनुकम्पा से नया जीवन प्राप्त हुआ था। वे एक अध्यापक थे। सो कृतज्ञता का भाव लिए हुए उन्होंने नौकरी छोड़ दी व गुरुदेव के दिए हुए जीवन को उन्हीं के श्रीचरणों में समर्पित करने हेतु मथुरा आ गए। यहाँ आकर उन्होंने नरमेध यज्ञ के चार आत्मदानियों में एक बनने का गौरव प्राप्त किया।                    
   
🌹 श्रीमती विमला अग्रवाल शांतिकुंज, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/b.1

👉 आदर्श पर अडिग- श्री विद्यासागर

🔵 बंगाल के लैफ्टिनेंट गवर्नर सर फ्रेड्रिक हैडिले अपनी बैठक में उद्विग्न से टहल रहे थे। उनके मन में तरह-तरह के संकल्प विकल्प उठ रहे थे। श्री ईश्वरचंद्र विद्यासागर को दिए हुए उनके आश्वासन के शब्द उन्हें बार-बार याद आ रहे थे। भारत के वायसराय लार्ड एलेनबरा के आज के पत्र ने उनको परेशानी में डाल दिया था। थोडी देर टहलने के बाद उन्होंने अपने प्राईवेट सेक्रेटरी को बुलाकर श्री विद्यासागर जी को बुलावा भिजवा दिया।

🔴 ईश्वरचंद्र जी की शिक्षण संबंधी सूझ-बूझ तथा व्यवहारिक योजनाओं से सारा देश परिचित हो चुका था। शिक्षा निदेशक से कुछ सैद्धांतिक मतभेद हो जाने के कारण उन्होंने सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया था। उनकी योग्यता से प्रभावित गवर्नर फ्रैड्रिक ने उन्हें समझाकर समझौता कराने का प्रयास किया। वह इतने दुर्लभ व्यक्ति को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे, किंतु ईश्वरचंद्र सैद्धांतिक व्यक्ति थे। उन्होंने नम्रतापूर्वक समझौते की बात से इन्कार कर दिया। उनका कहना था कि-कार्य-पद्धति में हेर-फेर किया जा सकता है-सिद्धांतो में नहीं। अनुशासन के नाते मुझको बडे अधिकारी की बात माननी चाहिए, किंतु अपनी आंतरिक प्रेरणा की उपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है, अतः अकारण अप्रिय प्रसंगों से वातावरण विषाक्त बनाने की अपेक्षा मैंने स्वयं मार्ग से हट जाना ही अच्छा समझा। इस विषय में मुझ पर दबाव न डाला जाए यही ठीक होगा। वैसे मैं हर सेवा के लिए तैयार हूँ।''

🔵 हारकर सर फ्रैड्रिक उनसे बंगाल में शिक्षा-प्रसार के लिए कोई अच्छी योजना बनाने का आग्रह कर रहे थे। योजना को राजकीय स्तर पर कार्यान्वित करने का अपना विचार भी उन्होंने व्यक्त कर दिया। ईश्वरचंद जी ने यह कार्य सहर्ष स्वीकार भी कर लिया। एक विषय में किसी से मतभेद होने का यह अर्थ तो नहीं होता कि अन्य संभावित सहयोग के कार्यो में भी विरोध किया जाए विचारक का विचार साधन-संपन्नों द्वारा प्रसारित किया जाना लाभकारी ही है। देश के उत्थान के लिए यदि विरोधी के साथ मिलकर भी कार्य करने में लाभ दिखता है तो किसी विचारशील को हिचकना नहीं चाहिए। विरोध व्यक्तियों से नहीं, विचारों से ही मानना उचित है। दस विचारों में मतभेद होने पर भी यदि एक में साम्य है, तो कोई कारण नहीं कि उसकी पूर्ति हेतु सम्मिलित प्रयास न करें। यह बात यदि आज के कथित देशसेवियों की समझ में आ सके तो आधी से अधिक समस्याओं का समाधान देखते-देखते निकल आए।

🔴 श्री ईश्वरचंद्र जी ने बडी मेहनत के साथ एक योजना बनाकर गवर्नर साहब को दी। गवर्नर साहब ने उसे देखा तो बहुत प्रसन्न हुए। योजना की व्यवहारिकता देखकर उन्होंने आश्वासन दे दिया कि इसे राज्य के व्यय पर क्रियान्वित किया जा सकेगा और उस योजना को स्वीकृति हेतु वायसराय के पास भेज दिया। उन्हें पूरी आशा थी कि इतनी अच्छी योजना अवश्य स्वीकार कर ली जायेगी।

🔵 किंतु उनकी आशा के विपरीत जब वायसराय ने उस पर नकारात्मक आदेश लिख दिया तो उन्हें बहुत चोट पहुँची। ईश्वरचंद्र जी ने उन्हें सांत्वना दी और कहा-''आप दुःख न मानो। मेरे कार्य अपनी सचाई के आधार पर स्वयं खडे हो सकते हैं।" मेरी योजना में समाज के हित की शक्ति होगी तो वह अपने बल पर भी चल जायेगी और वास्तव में उनकी सार्वजनिक घोषणा पर उस योजना का जनता ने भारी स्वागत किया। शिक्षा प्रेमियों ने भी अपना हर प्रकार का सहयोग उस हेतु दिया। योजना में बंगाल में शिक्षा का व्यापक प्रसार भी हुआ। उपयोगी योजना ने अपना मार्ग स्वयं बना लिया। ईश्वरचंद्र की वह बात आज भी सही है। अपने लाभ की बात जनता अभी भी स्वीकार कर सकती है। आवश्यकता है ऐसी योजना बनाने तथा उसे जनता को समझाने की।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 132, 133

👉 क्रोध को कैसे जीता जाय? (भाग 3)

🔴 इसी प्रकार हमारे देश में प्रचलित एक किंवदंती भी है जिसमें बताया गया है कि क्रोध की दवा क्या है? एक मनुष्य को बहुत क्रोध आता था, एक वैध से उसने इसकी दवा पूछी। वैद्य ने खाली पानी एक बोतल में भर कर उसे दे दिया और कहा कि जब क्रोध आये तो यह दवा मुँह में भर लो और भरे रहो, थोड़ी देर में तुम्हारा क्रोध कम हो जायेगा। तात्पर्य यह कि जब क्रोध आ जाय तो अपने को रोक कर किसी काम में लग जाने पर क्रोध कम हो जाता है।

🔵 मनुष्य जो कुछ दूसरों का अपराध कर बैठते हैं, वह उनके स्वभाव की निर्बलता है, यह सोचने और इस पर ध्यान देने से क्रोध बिल्कुल आता ही नहीं। अगर मनुष्य यह समझ ले कि अपराधी अज्ञान में अपराध करता है, तो क्रोध आये ही नहीं। महान् पुरुषों ने इसी तत्व को हृदयंगम करके ही क्रोध पर विजय प्राप्त की है। ईसा मसीह को जिन लोगों ने उन्हें सूली पर चढ़ाया, उन पर क्रोध करने की अपेक्षा, उनकी अज्ञानता के प्रति उन्हें दया थी। कृष्ण को जब बहेलिए ने अज्ञान वश बाण से बेध दिया तो अपने हत्यारे को देख कर वे केवल मुस्कराये थे और बोले कि इसमें तुम्हारा क्या दोष, यह तो होनहार ही था। संसार प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन ने जीवन भर किसी विषय पर बड़े परिश्रम से खोज की थी। उन गवेषणाओं पर टीका-टिप्पणी करके उसने तमाम कागजात एक मेज पर रखे थे।

🔴 एक दिन वह अपनी अध्ययनशाला में बैठे पढ़ रहे थे कि उसका कुत्ता डायमंड एकदम उचका और जलते हुए लैम्प को गिरा दिया। पलभर में सारे मूल्यवान कागज जलकर भस्म हो गये। जीवन भर का परिश्रम कुत्ते ने नष्ट कर दिया पर न्यूटन शान्त रहे। क्रोध पर उसकी विजय बेमिसाल विजय थी, उसका हृदय भारी था, उसने कुत्ते के सर पर हाथ फेरते हुए उसने कहा- “डायमंड, डायमंड, तुम क्या जानो, तुमने क्या कर डाला।” उसकी जगह पर शायद कोई दूसरा होता तो क्रोध में अंधा होकर कुत्ते को गोली ही मार देता। इन महान व्यक्तियों ने क्रोध पर इसीलिए विजय पाई थी कि वे अपराधी का अपराध को कारण न मानकर, उसकी अज्ञानता को कारण मानते थे। गाँधी जी कहा करते थे- “अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं।”

🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 10

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 April

🔴 अपने संकुचित दृष्टिकोण से जब हम संसार को देखते हैं तो वह बड़ा संकीर्ण और तुच्छ दिखाई पड़ता है। जब उसे स्वार्थ दृष्टि से देखा जाता है तब वह स्वार्थ ग्रस्त दीखता है। किन्तु जब उसे उदार और मित्रता की दृष्टि से देखा जाता है, तो संसार में हमें मित्रता उदारता और सज्जनता की भी कमी दिखाई नहीं देती ।

🔵 आज का नया जन्म अपने लिए एक अनमोल अवसर है। कहते हैं कि चौरासी लाख योनियों के बाद एक बार मनुष्य शरीर मिलता है, उसका सदुपयोग कर लेना ही शास्त्रकारों ने सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता मानी है। अस्तु हमें प्रातःकाल चारपाई पर पड़े पड़े ही विचारना चाहिए कि आज का दिन अनमोल अवसर है, उसे अधिक से अधिक उत्कृष्टता के साथ व्यतीत करना चाहिए। कोई भूल, उपेक्षा अनीति, दुर्बुद्धि उसमें न रहे। आदर्शवादिता का सद्भावना और सदाशयता का उसमें अधिकाधिक समावेश रहे ऐसा दिन भर का कार्यक्रम बना कर तैयार किया जाय।

🔴 निरर्थक काम करते रहने वाले की भर्त्सना की जाती है- उसे मूर्ख ठहराया जाता है क्योंकि कर्तृत्व शक्ति को उपयोगी प्रयत्नों में लगाने की अपेक्षा वह उसे बर्बाद करता है। इससे समय एवं श्रम शक्ति नष्ट होती है और उससे जो लाभ उठाया जा सकता था उससे वंचित रहना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार विचार शक्ति की बर्बादी को भी हानिकारक और अबुद्धिमत्तापूर्ण ठहराया जाना चाहिए। चिन्तन वस्तुतः अदृश्य रूप से किया जाने वाला कर्म ही है। क्रिया शक्ति को बर्बाद करना और विचार शक्ति को निरर्थक बखेरना वस्तुतः एक ही भूल के दो रूप है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 5)

🌹 समय का सदुपयोग करें
🔴 घर गृहस्थी के अनेक झंझटों और बाल-बच्चों की साज-संभाल में दिन भर लगी रहने वाली महिला हेरेट बीधर स्टोव ने गुलाम प्रथा के विरुद्ध आग उगलने वाली वह पुस्तक ‘टाम काका की कुटिया’ लिखकर तैयार कर दी, जिसकी प्रशंसा आज भी बेजोड़ के रूप में की जाती है।

🔵 चाय बनाने के लिये पानी उबालने में जितना समय लगता है उसमें व्यर्थ बैठे रहने के बजाय लांगफैलो ने ‘इनफरलो’ नामक ग्रन्थ का अनुवाद करना शुरू किया और नित्य इतने छोटे समय का उपयोग इस कार्य के लिये नित्य करते रहने से उसने कुछ ही दिन में वह अनुवाद पूरा कर लिया।

🔴 इस प्रकार के अगणित उदाहरण हमें अपने चारों ओर बिखरे हुये मिल सकते हैं। हर उन्नतिशील और बुद्धिमान मनुष्य की मूलभूत विशेषताओं में एक विशेषता अवश्य मिलेगी—समय का सदुपयोग। जिसने इस तथ्य को समझा और कार्य रूप में उतारा उसने ही यहां आकर कुछ प्राप्त किया है। अन्यथा तुच्छ कार्यों में आलस्य और उपेक्षा के साथ दिन काटने वाले लोग किसी प्रकार सांसें तो पूरी कर लेते हैं, पर उस लाभ से वंचित ही रह जाते हैं जो मानव-जीवन जैसी बहुमूल्य वस्तु प्राप्त होने पर उपलब्ध होना चाहिए, या हो सकता था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 33)

🌹 बड़े प्रयोजन के लिये प्रतिभावानों की आवश्यकता

🔵 इन दिनों औसत आदमी संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति में एड़ी से चोटी तक डूबा प्रतीत होता है। उनकी आँखें न सृजन होकर इर्द-गिर्द बिखरे हुए पतन-पराभव को देखती हैं और न ऐसा कुछ सूझता है कि अवाँछनीयता को औचित्य में बदलने के लिये उनसे क्या कुछ बन पड़ सकता है। जिनके कानों में कराह की पुकार ही नहीं पहुँचती है; जिन्हें घुँघरू के बोल ही सुहाते हैं, वे युग की पुकार और ईश्वर की वाणी सुन सकने में किस प्रकार समर्थ हो सकते हैं!

🔴 मानवीय भाव-संवेदना जहाँ से पलायन कर जाती है और जहाँ मरघट जैसी नीरवता और नीरसता ही छाई रहती है, वहाँ शालीनता का स्नेह-सद्भाव कैसे बन पड़ेगा! कैसे उस दिशा में उनके कुछ कदम उठ सकेंगे! ऐसे वातावरण में यदि कोई पुण्य-परमार्थ को वरण करने की बात सोचता है तो समझना चाहिये इसी आकाश में उदीयमान नक्षत्रों की चमक प्रारंभ हुई और रात्रि को भी रत्नजड़ित चाँदनी से सजा देने वाली मंगलमयी वेला का आगमन शुरू हुआ।                        
 
🔵 आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा है, समझना चाहिये कि वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है। बड़े काम बड़े लोग कर पाते हैं। हाथी का वजन हाथी ही उठाता है। गधे की पीठ पर यदि उसे लाद दिया जाए तो बेचारे की कमर ही टूट जाए। क्षुद्र कृमि-कीटक मात्र अपना अस्तित्व बनाये रहने की परिधि में ही क्षमताओं को खपा देते हैं। उनसे यह बन नहीं पड़ता कि आदर्शों की बात सोचें, उत्कृष्टता अपनाएँ और विश्वकल्याण के क्रियाकलापों में रुचि लेकर कुछ ऐसा करें जिसकी युगधर्म ने पुकार लगाई और गुहार मचाई है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 झूठी भावुकता एक अभिशाप है:-

🔵 दूसरों से व्यवहार करने में ठंडा दिमाग चाहिए। अनेक अवसर ऐसे आयेंगे, जब दूसरे तैश में, क्रोध के उफान में, या ईर्ष्या की अग्नि में आप उत्तेजित हो उठेंगे। उत्तेजना और क्रोध का आवेश तीव्रता से आग की ज्वाला की भाँति बढ़ता है। यदि उसे दूसरी ओर से अर्थात् आपकी तरफ से भी वैसा ही वातावरण प्राप्त हो जाय, तो तमाम लौकिक व्यवहार टूट-फूट जायेंगे, आप अनाप शनाप कह बैठेंगे। गुस्से में ऐसी-2 गुप्त बातें आपके मुख से प्रगट हो जायेंगी, जो कदाचित आप कभी उच्चारण करना पसन्द न करते।

🔴 उद्वेग एक तेजी से आने वाले तूफान की तरह है, जिसमें मनुष्य अन्धा हो जाता है। उसे नीर क्षीर का विवेक नहीं रहता। दूसरे को जोश में आया देखकर आप शान्त रहिए। उसकी उत्तेजना को ठंडा होने का अवसर दीजिए। ठंडे दिमाग का महत्व आप स्वयं देखेंगे जब दूसरा अपनी जल्दबाजी, आवेश की उत्तेजना, क्रोध, के आवेश पर क्षमा चाहेगा। आवेश में बुद्धि पंगु हो जाती है। हमें अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं रहता।

🔵 इसी प्रकार झूठी भावुकता के पंजे में फँसकर दयार्द्र, या सहानुभूति में इतने द्रवित न हो जाइये कि दूसरे की आफत आपके गले आ पड़े। भावुकता में बह कर लोग बड़े-2 दान देने का वचन दे बैठते हैं; छात्र वृति के वायदे करते है; संस्थाओं की सहायता का वचन पक्का कर लेते हैं। दीन दुखियों, घर परिवार वालों की सहायता करना ठीक है किन्तु झूठी भावुकता के कारण अपनी मर्यादा या आर्थिक स्थिति से बाहर न निकल जाइये।

🔴 यदि क्रोध, प्रतिहिंसा, तैश बुरे हैं, तो अधिक भावुकता, नर्मी, सहानुभूति, दया आदि भी अधिक अच्छे नहीं हैं। ये दो सीमाएँ हैं। चतुर व्यक्ति को इन दोनों के मध्य में शान्त चित्त होकर अपना दृष्टिकोण स्वभाव तथा आदतें निर्माण करनी चाहिए। न इतने कठोर ही बनिये कि दूसरे आपसे मिलना, बातें करना सलाह लेना पसन्द न करें, न इतने सरल दयावान, भावुक ही बन जाइये कि आपका कोई अस्तित्व ही न रह जाय और उपेक्षा की जाय।

🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड  ज्योति जनवरी 1952

👉 हनुमान जयंती पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

🔴 आज क्षेत्र पूर्णिमा है, इसी दिन को श्री हनुमान जी महाराज का प्राकट्य दिवस माना जाता है। हनुमान जयंती पर्व पर सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

🔵 परम पूज्य गुरुदेव ने अबके अवतार के साथ सभी सहचरों से हनुमान से कम नहीं रहने के लिए कहा है, अत:हनुमान बनने के लिए श्री हनुमान जी महाराज का ध्येय वाक्य -

"राम काज कीन्हें बिन मोहि कहाँ विश्राम"

🔴 हम सबको अपनाना पड़ेगा। आज के दिन हम नियमित रूप से परम पूज्य गुरुदेव के कार्य के लिए समयदान करने को संकल्पित हों, श्री हनुमान जी महाराज हमें शक्ति सामर्थ्य प्रदान करें। यही मंगल कामना है।

जय श्रीराम
जय श्री हनुमान

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...