बुधवार, 3 अप्रैल 2019

👉 हाथी और छह अंधे व्यक्ति

बहुत समय पहले की बात है, किसी गावं में 6 अंधे आदमी रहते थे. एक दिन गाँव वालों ने उन्हें बताया, अरे, आज गावँ में हाथी आया है. उन्होंने आज तक बस हाथियों के बारे में सुना था पर कभी छू कर महसूस नहीं किया था. उन्होंने ने निश्चय किया, भले ही हम हाथी को देख नहीं सकते, पर आज हम सब चल कर उसे महसूस तो कर सकते हैं ना? और फिर वो सब उस जगह की तरफ बढ़ चले जहाँ हाथी आया हुआ था।

सभी ने हाथी को छूना शुरू किया.

मैं समझ गया, हाथी एक खम्भे की तरह होता है, पहले व्यक्ति ने हाथी का पैर छूते हुए कहा। अरे नहीं, हाथी तो रस्सी की तरह होता है. दूसरे व्यक्ति ने पूँछ पकड़ते हुए कहा। मैं बताता हूँ, ये तो पेड़ के तने की तरह है., तीसरे व्यक्ति ने सूंढ़ पकड़ते हुए कहा।

तुम लोग क्या बात कर रहे हो, हाथी एक बड़े हाथ के पंखे की तरह होता है.”, चौथे व्यक्ति ने कान छूते हुए सभी को समझाया। नहीं-नहीं, ये तो एक दीवार की तरह है.”, पांचवे व्यक्ति ने पेट पर हाथ रखते हुए कहा।

ऐसा नहीं है, हाथी तो एक कठोर नली की तरह होता है.”, छठे व्यक्ति ने अपनी बात रखी। और फिर सभी आपस में बहस करने लगे और खुद को सही साबित करने में लग गए.. ..उनकी बहस तेज होती गयी और ऐसा लगने लगा मानो वो आपस में लड़ ही पड़ेंगे।

तभी वहां से एक बुद्धिमान व्यक्ति गुजर रहा था. वह रुका और उनसे पूछा, क्या बात है तुम सब आपस में झगड़ क्यों रहे हो?” हम यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि आखिर हाथी दीखता कैसा है, उन्होंने ने उत्तर दिया.

और फिर बारी बारी से उन्होंने अपनी बात उस व्यक्ति को समझाई। बुद्धिमान व्यक्ति ने सभी की बात शांति से सुनी और बोला, तुम सब अपनी-अपनी जगह सही हो. तुम्हारे वर्णन में अंतर इसलिए है क्योंकि तुम सबने हाथी के अलग-अलग भाग छुए हैं, पर देखा जाए तो तुम लोगो ने जो कुछ भी बताया वो सभी बाते हाथी के वर्णन के लिए सही बैठती हैं।

अच्छा!! ऐसा है.सभी ने एक साथ उत्तर दिया. उसके बाद कोई विवाद नहीं हुआ,और सभी खुश हो गए कि वो सभी सच कह रहे थे।

दोस्तों, कई बार ऐसा होता है कि हम अपनी बात को लेकर अड़ जाते हैं कि हम ही सही हैं और बाकी सब गलत है. लेकिन यह संभव है कि हमें सिक्के का एक ही पहलु दिख रहा हो और उसके आलावा भी कुछ ऐसे तथ्य हों जो सही हों. इसलिए हमें अपनी बात तो रखनी चाहिए पर दूसरों की बात भी सब्र से सुननी चाहिए, और कभी भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहिए. वेदों में भी कहा गया है कि एक सत्य को कई तरीके से बताया जा सकता है. तो, जब अगली बार आप ऐसी किसी बहस में पड़ें तो याद कर लीजियेगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके हाथ में सिर्फ पूँछ है और बाकी हिस्से किसी और के पास हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 3 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2019


👉 अपनी कमजोरियों को दूर कीजिये (भाग 2)

(3) अपनी बुराई-भलाई के विषय में मत सोचा करिए। मनुष्य यदि अपने ही कष्टों और कठिनाइयों पर सोचता रहे तो वह उदासी से किसी प्रकार भी नहीं बच सकता। अन्य मनुष्यों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं पर सोचिए।

परिचित मनुष्यों के स्वभाव के विषय में लिख लीजिए। उनके अद्भुत आचरण और अवगुणों पर ध्यान दीजिए। यह मन बहलाने का बड़ा ही मनोरंजक ढंग है। यदि आप सच्चे मन से ऐसा करेंगे, तो आप अवश्य प्रफुल्लित दिखाई देंगे।

घर पर अथवा आफिस में अकेले मत बैठिए। दूसरे मनुष्यों से मेल बढ़ाइए और अपने विचार बदलिए। बातें अधिक करिए, और सोचिए कम।

आप पर जैसी भी बीते, उसी को सहर्ष स्वीकार कर लीजिये। अपनी असफलता, पराजय, एवं दुर्भाग्य पर अपना ध्यान मत जमाइये।

मनुष्य जैसा कार्य करता है, वैसे ही उसके मन में भाव उठते हैं। अतः कार्य करते समय अत्यन्त प्रसन्न चित्त दिखाई दीजिये, मुस्कुराइये और प्रफुलित रहिये। यदि आप ऐसा करेंगे तो शीघ्र ही प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। इसके विपरीत आप यदि झुककर, लड़खड़ाते हुए, नीचे की ओर आँखें किये, त्यौरियाँ चढ़ाए, उदास भाव से चलेंगे तो आप अवश्य उदास हो जाएंगे। इधर-उधर की छोटी-छोटी सी बातों से असन्तुष्ट होने की अपेक्षा अपने भाग्य को सराहिए और अपने आपको धन्य समझिए। इस सिद्धान्त पर सोचिए कि ‘इससे भी बुरा हो सकता था।’ जो कुछ आपके पास नहीं है, उस पर ध्यान देने की अपेक्षा जो कुछ आपके पास है, उस पर ध्यान दीजिए। आपको अधिकतर यही सोचना चाहिए कि ‘जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान को अनेकों बार धन्यवाद है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 26


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1956/February/v1.26

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 3)

WHO MAINTAINS RECORD OF SINS AND VIRTUES?

In Indian spirituality, karma stands for any physical, verbal, mental or social activity. It means that each karma produces an imprint (Rekha), which cannot be erased before creating a reaction (Karmaphal). There is a belief that the Creator (Lord Brahma) inscribes the destiny on the forehead of a human being and this Divine Inscription cannot be erased by anyone (Vidhi ke likhe ko metanhara). Let us examine this concept from a scientific point of view. Microscopic examination shows innumerable furrows in the grey matter all over the brain. Medical science has not so far come to know the biological implications of these indentations. Comparative microscopic research studies have shown that density of these crenulations in the grey matter of highly evolved persons and thinkers is much more, than in the case of common masses.

It shows that these microscopic lines in the grey matter of the brain are nothing but compact subtle impressions created by external activities, which we take as imprints of mental, vocal and physical actions. This record of activities (good and evil deeds) on the neurons of grey matter proves the existence of an intelligent mechanism, which Hindu Mythology refers to as the deity Chitragupta. In Sanskrit language too, the word “Chitragupta” means “a hidden picture”. It shows that there exists in the human mind a hidden chamber, an inner sentient mechanism (Antaha Chetana) or a subtle state of consciousness (Sookshma Man). (We may compare it with a back-up file of executable programmes in computer parlance).

It is well known that the subtle body (Sookshma Sharir) coexisting with the physical human body has four components “Man” (pronounced as Mun)- the source of desires, longings and aspirations; “Buddhi”- the discriminative faculty which deliberates, takes decisions and determines a course of action; “Chitta”- which stores traits, habits inclinations and temperament and “Ahamkar”- the overall personal sense of selfhood (Ego). It is also established that “Chitta” carries forward its record of good and bad impressions after dissolution of the body. It appears the expression “Chittagupta” of scriptures came to be known as “Chitragupta” in course of time. Hence the internal mechanism of mind, which creates the compact subtle recordings of human activities, could be taken as the deity “Chitragupta” of human mythology. No doubt, this intelligent mechanism (Chitragupta) is continuously engaged in  maintaining records of all living beings. Since each being has its own personal Chitragupta and, therefore, for the entire population of animate beings there is an equal number of Chitraguptas. Thus maintenance of records of innumerable beings does not seem to be an impossibility.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 7

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 April 2019

★ मनुष्य सामाजिक प्राणी है। सामाजिक जीवन का अर्थ है- मिल जुलकर स्नेह, सौहार्द्रपूर्वक रहना। स्वार्थ एवं संघर्ष सामाजिक जीवन के प्रतिकूल भाव हैं। सफल सामाजिक जीवन तभी संभव है, जब उसका प्रत्येक सदस्य सौम्य, सहनशील और शान्त स्वभाव वाला हो। इस स्थिति में सब मिल-जुलकर रह सकते हैं और पारस्परिक सद्भावना, सहयोग के बल पर व्यष्टि एवं समष्टिगत उन्नति भी कर सकते हैं। इसके विपरीत जिस समाज के सदस्य स्वार्थी, क्रोधी, असहिष्णु और असहयोगी होते हैं वे समाज में पारस्परिकता के अभाव में यथास्थान पड़े-पड़े कष्ट-क्लेशों के बीच एड़ियाँ रगड़ा करते हैं।

◆ बुरे विचारों से बचने के लिए अवांछनीय साहित्य का पढ़ना बंद कर देना अधूरा उपचार है। उपचार पूरा तब होता है, जब उसके स्थान पर सद्साहित्य का अध्ययन किया जाय। मानव मस्तिष्क कभी खाली नहीं रह सकता। उसमें किसी न किसी प्रकार के विचार आते ही रहते हैं। बार-बार निषेध करते रहने से किन्हीं गंदे विचारों का तारतम्य तो टूट सकता है, किन्तु उनसे सर्वथा मुक्ति नहीं मिल सकती। अवांछनीय विचारों से पूरी तरह बचने का सबसे सफल उपाय यह है कि मस्तिष्क में सद्विचारों को स्थान दिया जाये। असद्विचारों के  रहने से बुरे विचारों को प्रवेश पाने का अवसर ही मिलेगा।

◇ चिन्ता से मुक्ति का एकमात्र उपाय है-हर समय काम में लगे रहना। निठल्ले व्यक्ति को ही चिन्ता जैसी पिशाचिनी घेरती है। जो व्यक्ति कर्मरत है, प्रगतिशील है, चिन्ताएँ उसे किसी प्रकार भी नहीं घेर सकतीं। चिन्ता का जन्मस्थान एवं निवासस्थान दोनों ही में मनुष्य का चित्त होता है। यदि मनुष्य का चित्त किसी कार्य में व्यस्त रहे तो चिन्ता का जन्म ही न हो सके।

■ किसी भी व्यक्ति अथवा समाज की सभ्यता की गहराई का पता उनके उत्सवों, संस्कारों एवं समारोहों के समय ही चलता है। जिनके खुशी मनाने के तरीके सादे, सरल, शिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण होते हैं, आज के युग में वे समाज ही सभ्य कहे जा सकते हैं।

★ उपासना का सार है- सर्वगुण संपन्न ईश्वर को अपना घनिष्ठतम जीवन सहचर अनुभव किया जाना और अपने शरीर, मन तथा अंतःकरण को ईश्वर अर्पण करके उस पर दिव्य सत्ता का अधिकार स्वीकार करना। जो इस स्तर की उपासना का अभ्यासी होगा, वह मस्तिष्क पर नियंत्रण रखेगा और ध्यान रखेगा कि जब कभी जो कुछ भी सोचा जाय वह ईश्वर स्तर का हो, जो किया जाय उसमें ईश्वरीय गौरव गरिमा की झाँकी मिलती हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 संत की परीक्षा

सन्त पुरन्दर की निर्लोभिता एवं तपश्चर्या की चर्चा विजय नगर के महाराज कृष्णदेवराय ने बहुत सुनी थी- पर, उन्हें सहसा विश्वास नहीं होता था कि क्या ऐसा भी सम्भव है। क्या व्यक्ति स्वयं विद्वान होते हुए तथा साधनों के सहज उपलब्ध  रहते हुए भी उन्हें ठुकरा दे और लोकसेवी का जीवन जिए? गृहस्थ जीवन और लोक सेवा ऐसी गरीबी में कैसे साथ- साथ निभ सकते हैं?

''अपने मन्त्री व्यासराय की सहायता से उन्होंने सन्त की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने सन्त को परीक्षत: कहलवाया कि वे अपनी भिक्षा राजभवन से ले लिया करें। भिक्षा में दिये जाने वाले चावलों में उन्होंने रत्न- हीरे मिला दिये। नित्य उन्हें इसी प्रकार प्रसन्नभाव से आते देख उन्हें शंका हुई, अपने मन्त्री से बोले- ''आइये! जिन सन्त की निस्पृहता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, उसे उनके घर चलकर परखे। '' वहाँ पहुँचे तो बड़ा विचित्र दृश्य देखा। सादगी भरा जीवन जी रहे सन्त व उनकी पत्नी में परस्पर सम्वाद चल रहा था। पत्नी हीरे आदि बीनकर अलग रखती जाती थी व कहती जा रही थी-'' आजकल आप न जाने कहाँ से भिक्षा लाते हैं। इन चावलों में तो कंकड़- पत्थर भरे पड़े हैं। इतना कहकर छद्मवेशधारी राजा मन्त्री के सामने ही उसे वे कचरे के ढेर में फेंक आयीं।

राजा के आश्चर्य व्यक्त करने पर वे बोलीं- 'पहले हम भी यही सोचते थे कि ये हीरे- मोती हैं। पर जब से भक्ति का पथ अपनाया, लोक सेवा की ओर कदम बढ़ाया तो निर्वाह योग्य ब्राह्मणोचित आजीविका से ही काम चल जाता है। अब इस बाह्य सम्पदा का मूल्य हमारे लिए तो हीरो के नहीं, कंकड़- पत्थर के बराबर ही है।''

स्वतन्त्र विवेक बुद्धि ही है जो व्यक्ति को दो मार्गो- आत्मिक प्रगति तथा भौतिक समृद्धि के चयन, अनुपयोग, दुरुपयोग, सदुपयोग के माध्यम से स्वर्ग व नरक के दृश्य इसी जीवन में दिखाती है व उसका भविष्य निर्धारित करती है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 83 से 85


अध्यात्म दर्शन प्रकरण 

एकदा तु हिमाच्छन्ने ह्मत्तराखण्डमण्डने।
अभयारण्यके ताण्ड्यशमीकोद्दालकास्तथा॥१॥
ऋषय: ऐतरेयश्च ब्रह्मविद्या विचक्षणा:।
तत्वजिज्ञासवो ब्रह्मविद्याया: संगता: समे॥२॥
तत्वचर्चारतानां तु प्रश्न एक उपस्थित:।
महत्वपूर्ण स प्रश्न: सर्वेषां मन आहरत्॥३॥
पिप्पलादं पप्रच्छातो महाप्राज्ञमृषीश्वरम्।
अष्टावक्रो ब्रह्मज्ञानी लोककल्याणहेतवे॥४॥

टीका- हिमाच्छादित उत्तराखण्ड के अंभयारण्यक में एक बार ताण्ड्य, शमीक, उद्दालक तथा ऐतरेय आदि ऋषि ब्रह्म-विद्या के गहन तत्व पर विचार करने के उद्देश्य से एकत्र हुए। तत्व-दर्शन के अनेकानेक प्रसंगों पर विचार करते-करते एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया। उसकी महत्ता ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। महाप्राज्ञ ऋषि पिप्पलाद से लोक-कल्याण की दृष्टि से ब्रह्मज्ञानी अष्टाज्ञानी ने पूछा ॥१-४॥

व्याख्या- ऋषि धर्मतन्त्र के प्रहरी माने जाते हैं, सदैव जागरुक एवं सामयिक मानवी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने व उन्हें जन-जन तक पहुँचाने वाले।

ब्रह्मज्ञान को जन-मानस तक पहुँचाने के उद्देश्य से ही कुम्भ मेलों एवं अन्य पर्वों पर ऋषिगण एकत्र होते व परस्पर परामर्श द्वारा दैनन्दिन समस्याओं का हल निकालते थे। सूत-शौनक, शिवजी-काकभुशुण्डि, जनक-याज्ञवल्क्य भरद्वाज-याज्ञवल्क्य सम्वाद इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं।

ऐसे समागम, सत्संग, ज्ञान गोष्ठियों में सदा-सदा से महामानवों के कृत्यों-आचरणों को आधार बनाकर जीवन-क्रम की रूपरेखा बनाई जाती रही है। परस्मर चर्चा में मात्र ब्रह्म विद्या के गूढ़ तात्विक विवेचन को ही स्थान न देकर ऋषिगण हर ऐसी जिज्ञासा में रुचि लेते थे जो उस समय की परिस्थितियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो, भले ही वह साधारण जन-मानस से सम्बन्धित चर्चा क्यों न हो। हर मनीषी उसमें उतनी ही रुचि रखता था, जितनी कि मुक्ति, योग, साधना जैसे विषयों में।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 37

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...