मंगलवार, 4 सितंबर 2018

👉 आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है (भाग 2)

🔶 आध्यात्मिक लाभ के अतिरिक्त संसार की कोई भी उपलब्धि मनुष्य को क्षुद्रता से विराट की ओर और तुच्छता से उच्चता की ओर नहीं ले जा सकती। यह विशेषता केवल आध्यात्मिकता में ही है कि मनुष्य क्षुद्र से विराट और तुच्छ से उच्च हो जाता।

🔷 आध्यात्मिक जीवन आत्मिक सुख का निश्चित हेतु है। अध्यात्मवाद वह दिव्य आधार है जिस पर मनुष्य की आन्तरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार की उन्नतियाँ एवं समृद्धियाँ अवलम्बित हैं। साँसारिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिये भी जिन परिश्रम, पुरुषार्थ, सहयोग, सहकारिता आदि गुणों की आवश्यकता होती है वे सब आध्यात्मिक जीवन के ही अंश है। मनुष्य का आन्तरिक विकास तो अध्यात्म के बिना हो ही नहीं सकता।

🔶 अध्यात्मवाद जीवन का सच्चा ज्ञान है। इसको जाने बिना संसार के सारे ज्ञान अपूर्ण हैं और इसको जान लेने के बाद कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता। यह वह तत्वज्ञान एवं महा-विज्ञान है जिसकी जानकारी होते ही मानव-जीवन अमरता पूर्ण आनन्द से ओत-प्रोत हो जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान से पाये हुए आनन्द की तुलना संसार के किसी आनन्द से नहीं की जा सकती क्योंकि इस आत्मानन्द के लिए किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती। वस्तु-जन्य सुख नश्वर होता है, परिवर्तनशील तथा अन्त में दुःख देने वाला होता है। वस्तु-जन्य मिथ्या आनंद वस्तु के साथ ही समाप्त हो जाता है। जब कि आध्यात्मिकता से उत्पन्न आत्मिक सुख जीवन भर साथ तो रहता ही है अन्त में भी मनुष्य के साथ जाया करता है। वह अक्षय और अविनश्वर होता है, एक बार प्राप्त हो जाने पर फिर कभी नष्ट नहीं होता। शरीर की अवधि तक तो रहता ही है, शरीर छूटने पर भी अविनाशी आत्मा के साथ संयुक्त रहा करता है।

🔷 ऐसे अविनाशी आनन्द की उपेक्षा करके जीवन को क्षणिक एवं मिथ्या सुखदायी उपलब्धियों में लगा देना और उनमें संतोष अथवा सार्थकता अनुभव करना अनमोल मानव जीवन की सबसे बड़ी हानि है। जब आनन्द ही मानव जीवन का वर्तमानकालिक लक्ष्य है तब शाश्वत आनन्द के लिये ही प्रयत्न क्यों न किया जाये? क्यों क्षणभंगुर सुख की छाया-वीथियों में ही भटकते रहा जाये?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1967 जनवरी पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/January/v1.2

👉 विचारों की सृजनात्मक शक्ति

🔶 स्रष्टा ने जन्म के समय ही एक पारसमणि तुम्हें प्रदान की है और वह ऐसी है जिसके आजीवन छिनने या गुमने का कोई खतरा नहीं है।

🔷 इस पारसमणि का नाम है- विचारणा। जो मस्तिष्क की बहुमूल्य पिटारी में इस प्रकार सुरक्षित रखी रहती है, जहाँ किसी चोर की पहुँच न हो सके। इसके रहते तुम्हें किसी पराभव का संकट आने की आशंका नहीं है।

🔶 विचार व्यर्थ के मनोरंजन समझे जाते हैं, पर वस्तुतः उनकी सृजनात्मक शाक्ति अनन्त है। वे एक प्रकार के चुम्बक हैं, जो अपने अनुरूप परिस्थितियों को कहीं से भी खींच बुलाते हैं। साधन किसी को उपहार में नहीं मिले और यदि मिले हों तो टिके नहीं। अपना पेट ही आहार पचाता और जीवित रहने योग्य रस- रक्त उत्पादन करता है। ठीक इसी प्रकार विचार प्रवाह ही व्यक्ति का स्तर विनिर्मित करता है। क्षमतायें उसी के आधार पर उत्पन्न होती हैं, जैसा कि सोचा और चाहा गया था।

🔶 विचारों की सृजनात्मक क्षमता समझना और उन्हें सही दिशा में गतिशील करना ही सौभाग्य है, जिसे उपलब्ध पारसमणि प्राप्त कराती रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 September 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 September 2018


👉 गुस्सा करने से पहले सोचें

🔶 एक बार मेहनती और ईमानदार नौजवान बहुत पैसे कमाना चाहता था। उसका सपना था कि वह मेहनत करके खूब पैसे कमाये और एक दिन अपने पैसे से एक कार खरीदे। जब भी वह कोई कार देखता तो उसका अपनी कार खरीदने का मन करता।

🔷 कुछ साल बाद उसकी अच्छी नौकरी लग गयी। उसकी शादी भी हो गयी और कुछ ही वर्षों में वह एक बेटे का पिता भी बन गया। सब कुछ ठीक चल रहा था मगर फिर भी उसे एक दुख सताता था कि उसके पास उसकी अपनी कार नहीं थी। धीरे – धीरे उसने पैसे जोड़ कर एक कार खरीद ली। कार खरीदने का उसका सपना पूरा हो चुका था और इससे वह बहुत खुश था। वह कार की बहुत अच्छी तरह देखभाल करता था और उसमें शान से घूमता था।

🔶 एक दिन रविवार को वह कार को रगड़ – रगड़ कर धो रहा था। यहां तक कि गाड़ी के टायरों को भी चमका रहा था। उसका 5 वर्षीय बेटा भी उसके साथ था। बेटा भी पिता के आगे पीछे घूम – घूम कर कार को साफ होते देख रहा था। कार धोते धोते अचानक उस आदमी ने देखा कि उसका बेटा कार के बोनट पर किसी चीज़ से खुरच – खुरच कर कुछ लिख रहा है। यह देखते ही उसे बहुत गुस्सा आया। वह अपने बेटे को पीटने लगा। उसने उसे इतनी जो़र से पीटा कि बेटे के हाथ की एक उंगली टूट गयी। दरअसल वह आदमी अपनी कार को बहुत चाहता था और वह बेटे की इस शरारत को बर्दाश्त नहीं कर सका।

🔷 बाद में जब उसका गुस्सा कुछ कम हुआ तो उसने सोंचा कि जा कर देखूँ कि कार में कितनी खरोंच लगी है। कार के पास जा कर देखने पर उसके होश उड़ गये। उसे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह फूट – फूट कर रोने लगा। कार पर उसके बेटे ने खुरच कर लिखा था  I love you Papa.  आई लव यू पापा!

🔶 मित्रों गुस्से में हम अपनी सोचने समझने की शक्ति खो देते हैं और अक्सर गलत फैसले ले लेते हैं। जिससे हमें बाद में बहुत नुकसान उठाना पड़ता है, बहुत पछताना पड़ता है।  इसलिए गुस्से में आकर कोई गलत फैसला लेने से पहले या कोई गलत क़दम उठाने से पहले हमें ये ज़रूर सोंचना चाहिये कि हमारे इस फैसले का अंजाम क्या होगा?

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...