शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

👉 बेवक़ूफ़ : एक गृहणी

🔶 वो रोज़ाना की तरह आज फिर ईश्वर का नाम लेकर उठी थी। रसोई में आई और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया। फिर बच्चों को नींद से जगाया ताकि वे स्कूल के लिए तैयार हो सकें।

🔷 कुछ ही पलों मे वो अपने  सास ससुर को चाय देकर आयी फिर बच्चों का नाश्ता तैयार किया और इस बीच उसने बच्चों को ड्रेस भी पहनाई। फिर बच्चों को नाश्ता कराया।

🔶 पति के लिए दोपहर का टिफीन बनाना भी जरूरी था। इस बीच स्कूल का रिक्शा आ गया और  वो बच्चों को रिक्शा तक छोड़ने चली गई।

🔷 वापस आकर पति का टिफीन बनाया और फिर मेज़ से जूठे बर्तन इकठ्ठा किये। इस बीच पतिदेव की आवाज़ आई की मेरे कपङे निकाल दो। उनको ऑफिस जाने लिए कपङे निकाल कर दिए।

🔶 अभी पति के लिए उनकी पसंद का नाश्ता तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था की छोटी ननद आई और ये कहकर ये कहकर गई की भाभी आज मुझे भी कॉलेज जल्दी जाना, मेरा भी नाश्ता लगा देना।

🔷 तभी देवर की भी आवाज़ आई की भाभी नाश्ता तैयार हो गया क्या? अभी लीजिये नाश्ता तैयार है। पति और देवर ने नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने अपने ऑफिस के लिए निकल चले।

🔶 उसने मेज़ से खाली बर्तन समेटे और सास ससुर के लिए उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी। दोनों को नाश्ता कराने के बाद फिर बर्तन इकट्ठे किये और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी।

🔷 इस बीच सफाई वाली भी आ गयी। उसने बर्तन का काम सफाई वाली को सौंप कर खुद बेड की चादरें वगेरा इकट्ठा करने पहुँच गयी और फिर सफाई वाली के साथ मिलकर सफाई में जुट गयी।

🔶 अब तक 11 बज चुके थे, अभी वो पूरी तरह काम समेट भी ना पायी थी की काल बेल बजी। दरवाज़ा खोला तो सामने बड़ी ननद और उसके पति व बच्चे सामने खड़े थे।

🔷 उसने ख़ुशी ख़ुशी सभी को आदर के साथ घर में बुलाया और उनसे बाते करते करते उनके आने से हुई ख़ुशी का इज़हार करती रही। ननद की फ़रमाईश के मुताबिक़ नाश्ता तैयार करने के बाद अभी वो नन्द के पास बेठी ही थी की सास की आवाज़ आई की बहु खाने का क्या प्रोग्राम हे।

🔶 उसने घडी पर नज़र डाली तो 12 बज रहे थे। उसकी फ़िक्र बढ़ गयी वो जल्दी से फ्रिज की तरफ लपकी और सब्ज़ी निकाली और फिर से दोपहर के खाने की तैयारी में जुट गयी। खाना बनाते बनाते अब दोपहर का दो बज चुके थे।

🔷 बच्चे स्कूल से आने वाले थे, लो बच्चे आ गये। उसने जल्दी जल्दी बच्चों की ड्रेस उतारी और उनका मुंह हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया। इस बीच छोटी नन्द भी कॉलेज से आ गयी और देवर भी आ चुके थे।

🔶 उसने सभी के लिए मेज़ पर खाना लगाया और खुद रोटी बनाने में लग गयी। खाना खाकर सब लोग फ्री हुवे तो उसने मेज़ से फिर बर्तन जमा करने शुरू कर दिये।

🔷 इस वक़्त तीन बज रहे थे। अब उसको खुदको भी भूख का एहसास होने लगा था। उसने हॉट पॉट देखा तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी।

🔶 उसने फिर से किचिन की और रुख किया तभी पतिदेव घर में दाखिल होते हुये बोले की आज देर हो गयी भूख बहुत लगी हे जल्दी से खाना लगा दो।

🔷 उसने जल्दी जल्दी पति के लिए खाना बनाया और मेज़ पर खाना लगा कर पति को किचिन से गर्म रोटी बनाकर ला ला कर देने लगी।
 
🔶 अब तक चार बज चुके थे। अभी वो खाना खिला ही रही थी की पतिदेव ने कहा की आ जाओ तुम भी खालो। उसने हैरत से पति की तरफ देखा तो उसे ख्याल आया की आज मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं।
 
🔷 इस ख्याल के आते ही वो पति के साथ खाना खाने बैठ गयी। अभी पहला निवाला उसने मुंह में डाला ही था की आँख से आंसू निकल आये।
 
🔶 पति देव ने उसके आंसू देखे तो फ़ौरन पूछा की तुम क्यों रो रही हो। वो खामोश रही और सोचने लगी की इन्हें कैसे बताऊँ की ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता हे और लोग इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं।
 
🔷 पति के बार बार पूछने पर उसने सिर्फ इतना कहा की कुछ नहीं बस ऐसे ही आंसू आ गये। पति मुस्कुराये और बोले कि तुम औरते भी बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो, बिना वजह रोना शुरू कर देती हो।

🔶 क्या आपको भी लगता है की गृहणी मुफ़्त की रोटिया तोड़ती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 24 Feb 2018


👉 अपने को पहचानें

🔶 शरीर अनेक सुख-सुविधाओं का माध्यम है, ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा रसास्वादन और कर्मेन्द्रियों के द्वारा उपार्जन करने वाला शरीर ही सांसारिक हर्षोल्लास प्राप्त करता है। इसलिए इसे स्वस्थ, सुन्दर, सुसज्जित एवं समुन्नत स्थिति में रखना चाहिए। इसी दृष्टिï से उत्तम आहार-विहार रखा जाता है, तनिक सा रोग-कष्टï होते ही उपचार कर ली जाती है। शरीर की ज्योति ही मस्तिष्क की उपयोगिता है। आत्मा की चेतना और शरीर की गतिशीलता का भौतिक व आत्मिक समन्वय का प्रतीक है, यह मन मस्तिष्क इसकी अपनी उपयोगिता है। मन की कल्पना, बुद्धि का निर्णय, चित्त की आकांक्षा और अहन्ता की प्रवृत्ति इन चारों से मिलकर अन्त:करण चतुष्टïय बना है।
  
🔷 सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, दीक्षा द्वारा मस्तिष्क को विकसित एवं परिष्कृत करने के लिए हमारी चेष्टïा निरन्तर रहती है क्योंकि भौतिक जगत में उच्चस्तरीय विकास एवं आनन्द उसी के माध्यम से सम्भव है। सभ्य, सुसंस्कृत , सुशिक्षित व्यक्ति ही नेता, कलाकार, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनिरय, वैज्ञानिक, साहित्यकार आदि ही पद प्राप्त कर सकते हैं।
  
🔶 शरीर को समुन्नत स्थिति में रखने के लिए पौष्टिïक आहार, व्यायाम, चिकित्सा, विनोद आनन्द आदि की अगणित व्यवस्थाएँ की गई हैं। मस्तिष्कीय उन्नति के लिए स्कूल, कॉलेज, प्रशिक्षण केन्द्र, गोष्ठिïयाँ, सभाएँ विद्यमान हैं। पुस्तिकाएँ, रेडियो, फिल्म आदि का सृजन किया गया है जिससे कि मस्तिष्कीय समर्थता बढ़े।
  
🔷 मनुष्य का स्थूल कलेवर शरीर और मन के रूप में ही जाना समझा जा सकता है। सो उन्हीं के लिए सुविधा साधन जुटाने में हर कोई जुटा है। यह उचित भी है। इस जगत के लिए जड़ साधनों और चेतन हलचलों को यदि मानवी सुविधा एवं सन्तोष के लिए नियोजित किया जाता है और उसके लिए उत्साहवर्धक प्रयास जुटाया जाता है तो इसमें अनुचित भी क्या हैै?
  
🔶 मनुष्य द्वारा जो कुछ किया जा रहा है, संसार में जो हो रहा है, उसे स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए। यहाँ उसकी निन्दा प्रशंसा नहीं की जा रही है। ध्यान उस तथ्य की ओर आकर्षित किया जा रहा है जो इस सबसे अधिक उत्कृष्टï एवं आवश्यक था उसे एक प्रकार से भुला ही दिया गया। समझ यह लिया गया है कि मनुष्य जो सब कुछ है, वह शरीर और मन तक की सीमित है। इससे आगे, इससे ऊपर और कोई हस्ती नहीं। यदि इससे आगे, इससे ऊपर भी कुछ समझा गया होता तो उसके लिए भी जीवन क्रम में वैसा ही स्थान मिलता, वैसा ही प्रयास होता, जैसा शरीर और मन के लिए होता है, पर हम देखते हैं वह तीसरी सत्ता जो इन दोनों से लाखों, करोड़ों गुनी अधिक महत्त्वपूर्ण है एक प्रकार से उपेक्षित विस्मृत ही पड़ी है और वह लाभ और आनन्द जो अत्यन्त सुखद एवं समर्थ है एक प्रकार से अनुपलब्ध ही रहा है।
  
🔷 रोज ही यह कहा और सुना जाता है कि हमारे शरीर और मन से ऊपर आत्मा है। सत्संग और स्वाध्याय के नाम पर यह शब्द प्रतिदिन आये दिन आँखों और कानों के पर्दों पर टकराते हैं, पर वह सब एक ऐसी विडम्बना बन कर रह जाता है जो मानो कहने-सुनने और पढऩे-लिखने के लिए ही खड़ी की गई हो। वास्तविकता से जिसका कोई सीधा सम्बन्ध न हो। यदि ऐसा न होता तो आत्मा को सचमुच ही महत्त्वपूर्ण माना गया होता। कम से कम शरीर, मन जितने स्तर का समझा गया होता, तो उसके लिए उतना श्रम एवं चिन्तन तो नियोजित किया ही गया होता, जितना कायिक, मानसिक उपलब्धियों के लिए किया जाता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लक्ष्य में तन्मय हो जाइए

🔷 मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल । इसलिए उसकी समस्त शक्तियाँ छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

🔶 मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

🔷 जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

🔶 मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं।

🔷 धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुँचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आँख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आँख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूँजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 10

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 3)

🔷 जंक्शन पर गाड़ियाँ एक लाइन में खड़ी होती हैं। इनमें से किसे, किस दिशा में दौड़ना है, कहाँ पहुँचना है, इसका निर्धारण प्वाइंटमैन लीवर गिराकर करता है। वह दो पटरियों को इस प्रकार मिला देता है कि गाड़ी की दिशा बन सके और फिर उस पर दौड़ते हुए वह अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सके। एक ही लाइन में खड़ी दो गाड़ियाँ साथ-साथ छूटती हैं, पर उनकी दिशा अलग होने के कारण एक बम्बई पहुँचती है तो दूसरी कलकत्ता। दोनों के बीच भारी दूरी है। यह क्योंकर बन गयी? इसका उत्तर लीवर गिराकर पटरियाँ जोड़ने वाला प्वाइंटमैन हर किसी को आसानी से समझा सकता है कि एक समय के उस छोटे से निर्धारण ने कैसा कमाल कर दिया। यह उदाहरण विचारणा को दिशाधारा मिलने के सम्बन्ध में पूरी तरह लागू होता है।

🔶 मनुष्य जिस भी स्तर की विचारणा अपनाना चाहे, उसे वैसे चयन की परिपूर्ण स्वतन्त्रता है। तर्क और तथ्य तदनुरूप ढेरों इकट्ठे किए जा सकते हैं। मित्र सम्बन्धी साथ नहीं देंगे, परिस्थितियाँ प्रतिकूल बनेंगी, घाटा पड़ेगा और भविष्य अन्धकार से घिरा रहेगा, इस स्तर की निराशाजनक कल्पना के पक्ष में अनेकों तर्क सोचे जा सकते हैं। संगति बिठाने वाले ढेरों ऐसे उदाहरण भी मिल सकते हैं जिनमें कल्पित निराशा का समर्थन करने वाले घटनाक्रम घटित हुए हों। निराशा को अंगीकार करने वाला अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए अनेकानेक कारण ढूँढ़ सकता है। साथ ही जोर देकर कह भी सकता है कि उसने जो सोचा है गलत नहीं है।

🔷 रुख बदलते ही दूसरे प्रकार के तर्कों और उदाहरणों का पर्वत खड़ा हो जायेगा। आशा और उत्साह की उमंगें उठें, उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास जमे तो फिर उस स्तर के तर्कों की कमी न रहेगी। हेय परिस्थितियों में जन्मे और पले व्यक्तियों में से कितनों ने असाधारण प्रगति की और आशाजनक सफलता प्राप्त की है, इसके उदाहरणों से न केवल इतिहास के पृष्ठ भरे पड़ें हैं वरन् वैसे उदाहरणों से अपना समय एवं सम्पर्क क्षेत्र भी सूना नहीं मिलेगा। वैसा अपने लिए क्यों नहीं हो सकता? जो काम एक कर सका उसे दूसरा क्यों नहीं कर सकता? इस प्रकार के विधेयक विचारों का सिलसिला यदि मनःक्षेत्र में चल पड़े, तो न केवल वैसा विश्वास बँधेगा वरन् प्रयत्न भी चल पड़ेगा और यह असम्भव न रहेगा कि उत्कर्ष की जो साध संजोयी थी वह समयानुसार पूरी होकर न रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 God among Sufferers

🔶 "Where can I find God?", asked a young man. And saint Namdev said," Come with me in the evening. I shall show you God right before your eyes." The young man waited impatiently. In the evening the saint took him to a hutment and stood in front of a poor old man's hut. They went inside the hut. There on a tattered bed lay a frail sick child whose mother has passed away. He had been diagnosed with T.B. Saint Namdev gave him medicine, attended to him and caressed him. When leaving, the saint promised the boy that he will visit him again the next day.
                                      
🔷 "We have spent the entire evening", said the young man, "where is the God you promised me to show?" And the saint replied, "Oh! Didn't you see Him? That poor sick child was God himself!" Now, the young man understood that serving the humanity is the real worship of God.
                                           
📖 From Pragya Puran

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 13)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! आपको समय से पहले बदल जाना चाहिए, नहीं तो आपको पश्चाताप ज्यादा करना पड़ेगा। जब कोई डाकू चीजें छीन ले जाता है, तो आदमी को ज्यादा अफसोस होता है, लेकिन अगर अपने हाथों से किसी भिखारी को दे देता है, स्कूल की इमारत बनाने के लिए दे देता है, तो उसको संतोष होता है। पैसा तो चला गया न, चाहे वह डाकू ले गया हो तो भी और चाहे स्कूल बनाने के लिए दे दिया तो भी। लेकिन अपने हाथ से देने पर संतोष रहता है। अतः आपको लोगों से यह कहने के लिए जाना है क अब युग बदल रहा है, समय बदला रहा है, युग की धाराएँ बदल रही हैं। धन के बारे में मूल्यांकन बदल रहा है। धन लोगों के पास रहने वाला नहीं है।

🔷 धन बहुत तेजी से चला जाने वाला है। आप देख नहीं रहे हैं क्या? गवर्नमेंट क्या-क्या कर रही है? मृत्यु टैक्स लगा रही है। संपत्ति टैक्स लगा रही है और दूसरे टैक्स लगा रही है। सब अगले दिनों जो गवर्नमेंट आने वाली है, अगले दिनों जो समय आने वाला है, उसमें रशिया वाला कानून लागू हो जाएगा, चाइना वाला कानून लागू हो जाएगा। हमको और आपको बस हाथ-पाँव से मेहनत करनी पड़ेगी, परिश्रम करना पड़ेगा और उस मेहनत के बदले में जो खुराक हमको मिलनी चाहिए, जो रोटी मिलनी चाहिए, वह मिल जाएगी। खुराक की सारी-की-सारी चीजें मिल जाएँगी।

🔶 साथियो! लोगों से कहना कि आपको भगवान् ने जो विभूतियाँ दी हैं, क्षमताएँ दी हैं, उसका सवाब आप उठा सकते हैं, लाभ उठा सकते हैं, जीवात्मा को शांति दे सकते हैं। जीवात्मा की शांति के लिए, पुण्य के लिए अपने आपको तैयार कर लेना चाहिए, ताकि आपका अंतःकरण शांति में रहे और समाज को भी आपके बदले का अनुदान मिले और हमारा सिर भी गर्व से ऊँचा उठ जाए। समय से पहले हम अंगद के तरीके से इसीलिए आपके पास आए हैं, ताकि यह बता सकें कि आपको वक्त रहते बदल जाना चाहिए और लाभ उठा लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 50)

👉 मंत्रराज है सद्गुरु का नाम

🔶 गुरुगीता के गायन से गुरुभक्ति जाग्रत् होती है। शिष्य में समर्पण की सजलता पनपती है। ज्यों-ज्यों इसकी प्रगाढ़ता बढ़ती है, त्यों-त्यों शिष्य की चेतना अपने गुरुदेव में विलीन हो जाती है। शिष्य गुरुमय हो जाता है। यह सब प्रभाव-प्रताप गुरुगीता का है। धन्य हैं वे, जो इसका निरन्तर पठन, चिन्तन व मनन करते हैं। गुरुभक्ति का यह शास्त्र सब भाँति से अद्भुत-अनुपम है। जो अनुभवी हैं, वे इसके मर्म को जानते हैं। जिन्हें अभी इसका अनुभव नहीं मिला है, वे प्रयास करने पर इसका स्वाद चख सकते हैं। शिव के वचन- आदिमाता पार्वती के द्वारा श्रवण से उपजा यह शास्त्र अनेक आध्यात्मिक रहस्यों से भरा है। इसके प्रत्येक मंत्र में सद्गुरु की कृपा का अमृत है।
  
🔷 अमृत सिंचन के उपर्युक्त मंत्र में गुरुगत प्राण शिष्यों ने पढ़ा कि श्रीगुरु की कृपादृष्टि से ही इस जगत् की सृष्टि हुई है। जगत् के सभी पदार्थ इसी से पुष्ट होते हैं। सत्शास्त्रों का सार मर्म इसी में समाया है। गुरुदेव की कृपादृष्टि की अनुभूति होने पर पता चलता है कि जगत् की सभी सम्पदाएँ व्यर्थ हैं। इस दृष्टि से ही शिष्य के अवगुण घुलकर परिमार्जित होते हैं। तत् सत्ता यही है। इसी से साधक में एकत्व से युक्त समत्व दृष्टि विकसित होती है। गुणों को विकसित करने वाली, मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करने वाली, सकल भुवनों की स्थापना का परम कारण यही है। सद्गुरु की दृष्टि में ही पुरुष-प्रकृति एवं अन्य चौबीस तत्त्व समाये हैं। समष्टि की रूपमाला व जीवन के सभी नियम-काल सभी कुछ गुरुदेव की कृपादृष्टि में समाहित हैं।
  
🔶 गुरुकृपा और गुरुदेव के नाम की महिमा के एक नये आयाम को उद्घाटित करते हुए भगवान् साम्ब सदाशिव माता पार्वती से कहते हैं-
  
अग्निशुद्धसमंतात    ज्वालापरिचकाधिया। मंत्रराजमिमं   मन्येऽहर्निशं   पातु  मृत्युतः॥ ६१॥
तदेजति   तन्नैजति    तद्दूरे    तत्समीपके। तदन्तरस्य  सर्वस्य  तदु  सर्वस्य  बाह्यतः॥ ६२॥
अजोऽहमजरोऽहं च अनादिनिधनः स्वयम्।     अविकारश्चिदानन्द  अणीयान्महतो  महान्॥ ६३॥
  
🔷 हे देवि! सद्गुरु का नाम परम मंत्र है। यह मंत्रराज है। इसका जप करने से बुद्धि अग्नि में तपाए सुवर्ण की भाँति शुद्ध होती है। इसके स्मरण-चिंतन से निरन्तर मृत्यु से रक्षा होती है॥ ६१॥ चलते हुए या बैठे हुए, दूर होने पर, पास रहने पर, बाहर होने पर अथवा अन्दर रहने पर गुरु नाम का यह महामंत्र समूची सामर्थ्य से रक्षा करता है॥ ६२॥ जो इस मंत्रराज की साधना करता है, उसे अजन्मा, अमर, अजर, अनादि, मृत्युरहित, निर्विकार, चिदानन्द, अणु से भी सूक्ष्म और महत् से भी विराट् आत्मतत्त्व की निरन्तर अनुभूति होती रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 80

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...