मंगलवार, 5 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 60)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 मृतक भोज के नाम पर घृणित दावतें खाने की निष्ठुरता, पशुबलि की नृशंसता, ऊँच-नीच के नाम पर मानवीय अधिकारों का अपहरण, नारी को पद-दलित और उत्पीड़न करने की क्रूरता हमारे समाज पर लगे हुए ऐसे कलंक हैं, जिनका समर्थन कोई भी विवेकशील और सहृदय व्यक्ति कर ही नहीं सकता। मूढ़ परम्पराओं ने इन कुरीतियों को धार्मिकता के साथ जोड़ दिया है, इस स्थिति को कब तक सहन किया जाता रहेगा? इस मूढ़ता के विरुद्ध प्रचार मोर्चे से आगे बढ़कर हमें कई और ऐसे सक्रिय कदम उठाने पड़ेंगे, जिन्हें भले ही अशान्ति उत्पन्न करने वाले कहा जाए, परंतु रुकेंगे तभी, जब मानवता के मूलभूत आधारों को स्वीकार करने वाले और झगड़े का खतरा मोल लेकर भी अनीति से हर मोर्चे पर जूझने के लिए कमर कस लें, भले ही इस संदर्भ में हमें कोई भी खतरा क्यों न उठाना पड़े।

🔵 वैयक्तिक दोष-दुर्गुणों से लड़ने और जीवन को स्वच्छ, पवित्र निर्मल बनाने के लिए अगर कुसंस्कारों से लड़ना पड़ता है, तो वह लड़ाई लड़ी ही जानी चाहिए। परिवार में कुछ सदस्यों को दास-दासी की तरह और कुछ को राजा-रानी की तरह रहने को यदि परम्परा का पालन माना जाता है, तो उसे बदल कर ऐसी परम्पराएँ स्थापित करनी पड़ेंगी, जिनमें सबको न्यायानुकूल अधिकार, लाभ, श्रम तथा सहयोग करने की व्यवस्था करे। आर्थिक क्षेत्र में बेईमानी को प्रश्रय न मिले।
 
🔴 व्यक्तिगत व्यवहार में छल करने और धोखेबाजी की गुंजाइश न रहे। ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए प्रबल लोकमत तैयार करना पड़ेगा और अवांछनीय तत्त्वों के उस प्रतिरोध को इतना सक्रिय बनाना पड़ेगा कि अपराध, उद्दंडता और गुंडागर्दी करने की हिम्मत करना किसी के लिए भी संभव न रहे। हराम की कमाई खाने वाले, भ्रष्टाचारी, बेईमान लोगों के विरुद्ध इतनी तीव्र प्रतिक्रिया उठानी होगी, जिसके कारण उन्हें सड़क पर चलना और मुँह दिखाना कठिन हो जाए। जिधर से वे निकलें उधर से ही धिक्कार की आवाजें ही उन्हें सुननी पड़ें। समाज में उनका उठना-बैठना बंद हो जाए और नाई, धोबी, दर्जी कोई उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग करने के लिए तैयार न हों।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.83

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.15

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 8)

🔵 ज्ञान और विज्ञान की सुविस्तृत सम्पदा ही मनुष्य को समर्थ, सम्पन्न कुशल बना सकी है। यह उपलब्धियाँ बादलों से नहीं बरसतीं, वरन् अनवरत अध्यावसाय के द्वारा ही एक-एक मंजिल पार करते हुए इन्हें खोज निकालना सम्भव हुआ है।यदि शोध प्रयासों को मानवी प्रवृत्ति में स्थान न मिला हो तो आग जैसी क्रान्तिकारी उपलब्धियाँ करतल गत न होतीं और आदिम मनुष्य की पीढ़ियाँ अभी भी अपने वानर वर्ग के अन्य साथियों के साथ गुजर कर रही होतीं। कोलम्बस ने अमेरिका खोज निकाला और संसार के विकास, विस्तार में एक नये अध्याय का समावेश हुआ।

🔴 खोजियों ने अन्तरिक्ष खोजा है और उसमें से उतना पाया है जितना कि रत्नाकर कहे जाने वाले समुद्र से भी न मिल सका। कहते हैं कि खोजने वालों ने ही भगवान को ढूँढ़ निकाला अन्यथा वह क्षीर सागर में शेष नाग के ऊपर चादर ताने गहरी नींद में सो रहा था। मनुष्योत्तर प्राणियों के लिए वह अभी भी उसी तरह अविज्ञात स्थिति में पड़ा हुआ है। आत्मा का अस्तित्व मनुष्य ने ही खोजा है। अन्यथा अन्य जीवधारी अपनी सत्ता शरीर तक ही सीमाबद्ध किये रहते। धर्म और अध्यात्म मनुष्य की अपनी खोज है।

🔵 अपने समय में एक बहुत बड़ा काम युग मानवों को खोज निकालना है। बड़े काम के किए बड़ी हस्तियाँ ही चाहिए। उन्हें एक सीमा तक ही शिक्षा और परिस्थितियाँ विकसित कर सकती है। नैपोलियन और सिकन्दर किसी सैनिक संस्था द्वारा विनिर्मित नहीं किये जा सके। वशिष्ठ औरन विश्वामित्र किस आश्रम में किस साधन के सहारे विनिर्मित किये जा सके। इसका पता लग नहीं पा रहा है। अंगद और हनुमान, भीम और अर्जुन, चाणक्य और कुमार जीव, बुद्ध और महावीर, गाँधी और पटैल, शिवाजी और प्रताप किस प्रकार तैयार किये जाय उसका कोई उपाय अभी भी सूझा नहीं पड़ रहा है।
 
🔴 ईसा जटाथुस्त-अरस्तू और सुकरात, लिंकन और वाशिंगटन-विवेकानन्द और गोविन्दसिंह, नानक और कबीर किस प्रकार तैयार किये जाँय, इसका कोई मार्ग मिल नहीं रहा है, शतरुपा, कौशल्या, सीता, सावित्री, मदालसा, शकुन्तला उपलब्ध करने के लिए क्या किया जा सकता है इसके लिए भारी माथा पच्ची के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगता। अरविन्द और रमण, रामकृष्ण परमहंस और विरजानन्द जैसी हस्तियाँ ही युग निर्माण जैसे महा-प्रयोजन को पूरा करने में अग्रिम भूमिका निभा सकती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.50

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Sep 2017

🔵 इस भूमण्डल पर जितने लोग दीर्घजीवी और चिरस्मरणीय हो गये हैं वे सभी ब्राह्ममुहूर्त में उठने के लिये प्रसिद्ध थे। भोर में नहीं उठने से प्रातः-काल के कार्य-कलाप यथोचित ढंग से सम्पन्न नहीं हो सकते। देर करके उठने से प्रातः कृत्यों में ही दिन का बहुत सा समय व्यतीत हो जाता है और अन्योन्य कार्य समूह यथासमय सम्पन्न नहीं हो सकते। सुप्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक महात्मा अरस्तू का कथन है, “ भोर होने के पहिले ही शय्या त्याग करने का अभ्यास करना उचित है। ऐसा करने से धन, स्वास्थ्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है। “अफ्रीका देश के नीग्रो लोगों में एक कहावत प्रचलित है कि जो भोर में उठता है उसके भ्रमण का पथ संक्षेप होता है।”

🔴 यदि आप दीर्घजीवी बनना चाहते हो, अपने हृदय को वसन्त कालीन वायु प्रवाह की तरह आनन्दोल्लास पूर्ण करना चाहते हों, अपनी धमनियों में झरझर शब्द करती हुई प्रवाहित होनेवाली छोटी नदी की धारा की भाँति स्वच्छ रक्त की धारा प्रवाहित करने की अभिलाषा रखते हों, आयु को बढ़ाने वाली पुष्प-फलादि के सौरभ से पूर्ण प्रातः समीरण का सेवन करके अपने जीवन की तेजस्विता बढ़ाने की इच्छा रखते हों, तो खूब तड़के शय्या त्याग करने का अभ्यास करें।

🔵 यदि आप इस जीवन में कोई महत्व का कार्य करके अपने मानव जन्म को सार्थक बनाना चाहते हों, यदि अकाल मृत्यु से बचने की अभिलाषा रखते हों तो प्रतिज्ञा पूर्वक नियमित रूप से भोर में उठा करें तथा प्रातः कालीन वायु का सेवन करें और ईश्वर का नाम लेकर उत्साह पूर्वक अपने कार्य में प्रवृत्त हों।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों। (भाग 1)

🔵 यों तो जरा−जरा सी बात पर दुःखी होना बहुत से लोगों का स्वभाव होता है। यह स्वभाव किसी प्रकार भी वाँछनीय नहीं माना जा सकता। मनुष्य आनन्दस्वरूप है, उसका दुःखी होना क्या? उसे तो हर समय प्रसन्न, आनन्दित तथा उत्साहित ही रहना चाहिए। यही उसके लिए वाँछनीय है और यही जीवन की विशेषता। इस स्वभाव के अतिरिक्त लोग तब तो अवश्य ही दुःखी रहने लगते हैं, जब वे किसी उच्च स्थिति से नीचे उतर जाते हैं। इस दशा में वे अपने दुःखावेग पर नियन्त्रण नहीं कर पाते और फूल जैसे जीवन में ज्वाला का समावेश कर लेते हैं। जब कि उस उतार की स्थिति में भी दुःख−शोक की उपासना करना अनुचित है।

🔴 उतार की स्थिति में दुःखी होना तभी ठीक है। जब वह उतार पतन के रूप में घटित हुआ हो। और यदि उसका घटना नियति में नियम ‘परिवर्तन’, ईश्वर की इच्छा, प्रारब्ध अथवा दुष्टों की दुरभिसंधियों के कारण हुआ हो तो कदापि दुःखी न होना चाहिए। तब तो दुःख के स्थान पर सावधानी को ही आश्रित करना चाहिए। पतन के रूप में उतार का घटित होना अवश्य खेद और दुःख की बात है। उदाहरण के लिए किसी परीक्षा को ले लीजिए, यदि परीक्षार्थी ने अपने अध्ययन, अध्यवसाय और परिश्रम में कोताही रखी है। समय पर नहीं जागा, आवश्यक पाठ आत्मसात नहीं किये, गुरुओं के निर्देश और परामर्शों पर ध्यान नहीं दिया। अपना उत्तरदायित्व अनुभव नहीं किया और असावधानी तथा लापरवाही बरती है तो उसका फेल हो जाना खेद, दुःख व आत्महीनता का विषय है। उसे अपने इस किए का दुःख रूपी दण्ड मिलना ही चाहिए। वह इसी योग्य था। उसके साथ न किसी को सहानुभूति होनी चाहिए और न उसे सान्त्वना और आश्वासन का सहयोग ही मिलना चाहिए।

🔵 किन्तु उस पुरुषार्थी विद्यार्थी को दुःख से अभिभूत होना उचित नहीं, जिसने पूरी मेहनत की है और पास होने की सारी शर्तों का निर्वाह किया है। बात अवश्य कुछ उल्टी लगती है कि जिसने परिश्रम नहीं किया, वह तो अनुत्तीर्ण होने पर दुःखी हो और जिसने खून−पसीना एक करके तैयारी की वह असफल हो जाने पर दुःखी न हो। किन्तु हितकर नीति यही है कि योग्य विद्यार्थी को असफलता पर दुःखी नहीं होना चाहिए। इसलिए कि उसके सामने उसका उज्ज्वल भविष्य होता है। दुःख और शोक से अभिभूत हो जाने पर वह निराशा के परदे में छिप सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 56
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.56

👉 आज का सद्चिंतन 5 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Sep 2017


👉 मेहनत से ही छुआ जाता है बुलंदियों को

 🔴 एक बहुत ही गरीब लड़का था | उसे खाना खाने के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता था। दो वक्त की रोटी भी उसे सही से नसीब नहीं हो रही थी। वो लड़का बहुत ही मेहनती था। बिना किसी की सहायता लिए वह अपने स्कूल की फीस जमा किया करता था। वह भले ही एक समय खाना न खाता पर अपनी किताबें भी वह स्वयं ही खरीदता था।

🔵 उसके सारे साथी उससे बहुत ही ज्यादा जलते थे। एक दिन उसके मित्रों ने उस लड़के पर एक लांछन लगाना चाहा और उसे झूठे आरोप में फँसाने का फैसला किया। एक दिन स्कूल के प्राचार्य अपने कक्ष में बैठे हुए थे तभी वे सब बच्चे उस लड़के की शिकायत लेकर वहाँ पहुँचे और प्राचार्य जी से बोले – यह लड़का रोज कहीं से पैसे चुराता है और चुराए पैसों से अपने स्कूल की फीस जमा करता है। कृपया आप इसे सजा दें।

🔴 प्राचार्य ने उस लड़के से पूछा – क्या जो ये सब बच्चे बोल रहे हैं वो सच है बेटे?

🔵 लड़का बोला – प्राचार्य महोदय, मैं बहुत निर्धन परिवार से हूँ, एक गरीब हूँ लेकिन मैंने आज तक कभी चोरी नहीं की.. मैं चोर नहीं हूँ।

🔴 प्राचार्य ने उस लड़के की बात सुनी और उसे जाने के लिए कहा।

🔵 लेकिन सारे बच्चों ने, प्राचार्य से निवेदन किया कि इस लड़के के पास इतने पैसे कहाँ से आते हैं इसका पता लगाने के लिए कृपया जाँच की जाये।

🔴 प्राचार्य ने जब जाँच की तो उन्हें पता चला कि वह स्कूल के खाली समय में एक माली के यहाँ सिंचाई का काम करता है और उसी से वह कुछ पैसे कमा लेता है जो उसकी फीस भरने के काम आ जाते हैं।

🔵 अगले ही दिन प्राचार्य ने उस लड़के को और अन्य सभी बच्चों को अपने कक्ष में बुलाया और उस लड़के की तरफ देखकर उन्होंने उससे प्यार से पुछा – “बेटा! तुम इतने निर्धन हो, अपने स्कूल की फीस माफ क्यों नहीं करा लेते?”

🔴 उस निर्धन बालक ने स्वाभिमान से उत्तर दिया – “श्रीमान, जब मैं अपनी मेहनत से स्वयं को सहायता पहुँचा सकता हूँ, तो मैं अपनी गिनती असमर्थों में क्यों कराऊँ? कर्म से बढ़कर और कोई पूजा नहीं होती, ये मैंने आपसे ही सीखा है!

🔵 छात्र की बात से प्राचार्य महोदय का सिर गर्व से ऊँचा हो गया, और बाकि बच्चे जो उस लड़के को गलत साबित करने में लगे थे उनको भी बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने उससे मांगी।

🔴 मेहनत करके अपने दम पर कमाने में विश्वास रखने वाला वह निर्धन बालक था – सदानंद चट्टोपाध्याय..

🔵 बड़ा होने पर ठीक बीस वर्षों बाद इन्हें बंगाल के शिक्षा संगठन के डायरेक्टर का पद सौंपा गया था। उन्होंने एक बहुत अच्छी बात हम सबको सिखाई कि “मेहनती और सच्चे ईमानदार व्यक्ति हमेशा ही सफलता के ऊँचे शिखर पर चढ़ जाते हैं, और एक दिन अपने कठिन परिश्रम के बदौलत संसार भर में अपने नाम की छाप छोड़ जाते हैं”।

🔴 मित्रों, वास्तव में कर्म से बढ़कर कोई पूजा नहीं होती। मेहनत और ईमानदारी से कर्म करते हुए हम तमाम मुसीबतो, विपत्तियों और  बाधाओं से निकलकर, संघर्ष करते हुए ही हम सफलता को प्राप्त करेंगे और आकाश की बुलंदियों को छुएंगे।

👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...