शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १२)

जिसे भक्ति मिल जाए, वो और क्या चाहे?

भगवन्नाम कीर्तन का सुरभित संगीत देवात्मा हिमालय के अणु-अणु में व्याप्त होता गया। भक्ति चेतना की सघनता से वहाँ उपस्थित ऋषियों, देवों एवं दिव्य विभूतियों के अंतस् स्पन्दित हो उठे। हिमालय की पावनता, भक्तिगाथा के निरन्तर श्रवण से और भी अधिक पावन हो रही थी। सब ओर विशुद्ध सत्त्व का भावमय उद्रेक हो रहा था। हिमालय के हिमाच्छादित शुभ्र शिखर मौन, नीरव समाधि में डूबे थे। निर्विचार भावमयता का अजस्र-अविरल-अदृश्य प्रवाह और भी कुछ सुनने को प्रेरित कर रहा था। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का महातेजस् भी आज रोमांचित था। उन्होंने भक्तिविह्वल हो सभी जनों को प्रणाम् करते हुए कहा- ‘‘भक्तिगाथा के श्रवण से अधिक और कोई सुख नहीं है। मेरा देवर्षि नारद से अनुरोध है कि हम सभी को अपने अगले सूत्र से अनुग्रहीत करें।’’

सभी ने इस कथन से अपनी समवेत सहमति जताई और कहा- ‘‘ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने हम सभी के हृदयों के उद्गार व्यक्त किये हैं। हम सभी देवर्षि से आग्रह करते हैं-कुछ और कहें।’’ महर्षियों के इस आग्रह से देवर्षि की भावमय तल्लीनता में कुछ नवस्फुरण हुए। वे कहने लगे- ‘‘हे महर्षिजन! हम बड़भागी हैं जो आप सबके पावन सान्निध्य में भक्ति, भक्त एवं भगवान की दिव्य लीला का अवगाहन कर रहे हैं। भक्ति की महिमा ही कुछ ऐसी है कि जो इसे पा लेता है उसे और कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। मेरा आज का सूत्र भी कुछ यही कहता है-
‘यात्प्राप्य न किञ्चद्वाञ्छति न शोचति
न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति’॥ ५॥
    
भक्ति को प्राप्त करने वाला कुछ और नहीं चाहता, कुछ और नहीं सोचता, किसी से द्वेष नहीं करता, कहीं अन्य नहीं रमता, विषय-भोगों के लिए उत्साही नहीं होता।
    
देवर्षि नारद के इस स्वर सूत्र में सभी के मन अनायास गुँथने लगे थे। उनके भावों में एक अनोखी मिठास घुलने लगी थी, तभी एक अनोखी घटना ने सभी का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लिया। सबने देखा कि दूसरे सूर्य के समान परम तेजस्वी ज्योतिपुञ्ज आकाश से अवतरित हो रहा था। हिमालय का यह पावन परिसर इस महासूर्य के प्रकाश से आपूरित हो जा रहा था। कुछ ही क्षणों में यह परम तेजस्वी ज्योतिपुञ्ज मानव आकृति में परिवर्तित हो गया। अद्भुत स्वरूप था इन  महाभाग का। इनके सारे शरीर पर सघन रोमावली थी परन्तु प्रत्येक रोम ज्योति किरण की भाँति प्रकाशित था। कुछ ऐसा जैसे कि भगवान भुवन-भास्कर के शरीर को उनकी सहस्र-सहस्र किरणें घेरे हों।
    
एकबारगी सभी चमत्कृत थे, परन्तु सप्तर्षियों, कल्पजीवी महर्षि मार्कण्डेय एवं देवर्षि नारद को उन्हें पहचानने में अधिक देर न लगी। ये भगवान भोलेनाथ एवं माता जगदम्बा के वरद् पुत्र शिवस्वरूप महर्षि लोमश थे। सभी जानते थे कि सृष्टि में इनसे अधिक दीर्घायु और कोई भी नहीं। सबने उन्हें प्रणाम् किया। महर्षि लोमश ने बड़े हर्षित मन से उन्हें आशीष दिया और बोले-‘‘ऋषियों! मैं चिरकाल से समाधिस्थ था। समाधि में ही मुझे भगवान सदाशिव एवं माता पार्वती के दर्शन हुए। उन्होंने मुझे चेताया-लोमश! हिमालय के आँगन में अद्भुत, अपूर्व भक्तिगंगा बह रही है और तू समाधि में खोया है। बस भगवान महादेव का इंगित मुझे यहाँ ले आया और यहाँ आप सभी के दर्शन हुए।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २९

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १२)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

नशा पी लेने पर मस्तिष्क और इन्द्रियों का संबंध लड़खड़ा जाता है, फलस्वरूप कुछ का कुछ अनुभव होता है शराब के नशे में धुत्त व्यक्ति जैसा कुछ सोचता, समझता, देखता अनुभव करता है वह यथार्थता से बहुत भिन्न होता है। और भी ऊंचे नशे इस उन्मत्तता की स्थिति को और भी अधिक बढ़ा देते हैं। डी. एलस्केस. ए. सरीखे नवीन नशे तो इतने तीव्र हैं कि उनके सेवन के उपरान्त ऐसे विचित्र अनुभव मस्तिष्क को होते हैं जिनकी यथार्थता के साथ कोई संगति नहीं होती।

साधारणतया दैनिक जीवन में भी अधिकांश अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें यथार्थ नहीं कहा जा सकता। सिनेमा के पर्दे पर जो दीखता है सही कहां है? एक के बाद एक आने वाली अलग-अलग तस्वीरें इतनी तेजी से घूमती हैं कि उस परिवर्तन को आंखें ठीक तरह समझ नहीं पातीं और ऐसा भ्रम होता है मानो फिल्म में पात्र चल फिर रहे हैं। लाउडस्पीकर से शब्द अलग अन्यत्र निकलते हैं और पर्दे पर तस्वीर के होठ अलग चलते हैं पर दर्शकों को ऐसा ही आभास होता रहता है मानो अभिनेताओं के मुख से ही वार्तालाप एवं संगीत निकल रहा है। प्रकाश की विरलता और सघनता भर पर्दे पर उतरती है पर उसी से पात्रों एवं दृश्यों का स्वरूप बन जाता है और मस्तिष्क ऐसा अनुभव करता है मानो यथार्थ ही वह घटना क्रम घटित हो रहा है।

सिनेमा के दृश्य क्रम को देखकर आने वाला यह नहीं अनुभव करता कि उसे यांत्रिक जाल जंजाल में ढाई तीन घंटे उलझा रहना पड़ा है। उसे जो दुखद-सुखद रोचक भयानक अनुभूतियां उतने समय होती रही हैं वे सर्वथा भ्रान्त थीं। सिनेमा हाल में कोई घटना क्रम नहीं घटा। कोई प्रभावोत्पादक परिस्थिति नहीं बनी केवल प्रकाश यन्त्र या ध्वनि यन्त्र अपने-अपने ढंग की कुछ हरकतें भी करते रहे। इतने भर से दर्शक अपने सामने अति महत्वपूर्ण घटना क्रम उपस्थित होते का आभास करता रहा, इतना ही नहीं उससे हर्षातिरेक एवं अश्रुपात जैसी भाव भरी मनःस्थिति में भी बना रहा। इस इन्द्रिय भ्रम को माया कहा जाता है। मोटी दृष्टि से यह माया सत्य है। यदि सत्य न होती तो फिल्म उद्योग, सिनेमा हाल, उसमें युक्त हुए यन्त्र, दर्शकों की भीड़ उनकी अनुभूति आदि का क्या महत्व रह जाता? थोड़ी विवेचनात्मक गहराई से देखा जाय तो यह यन्त्रों की कुशलता और वस्तुस्थिति को समझ न सकने को नेत्र असमर्थता के आधार पर इस फिल्म दर्शन को मायाचार भी कह सकते हैं। दोनों ही तथ्य अपने अपने ढंग से सही हैं। संसार चूंकि हमारे सामने खड़ा है, उसके घटना क्रम को प्रत्यक्ष देखते हैं। इसलिए वह सही है किन्तु गहराई में प्रवेश करने पर वे दैनिक अनुभूतियां नितान्त भ्रामक सिद्ध होती हैं। ऐसी दशा में उन्हें भ्रम, स्वप्न या माया कहना भी अत्युक्ति नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १७
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ११)

असंभव को संभव करती है भक्ति

परम भक्त नारद के इस कथन के साथ ऋषियों एवं देवों ने महर्षि मार्कण्डेय की ओर निहारा। महर्षि पुलह ने तो उन्हें सभा मध्य लगे उच्चासन में पधारने का अनुरोध किया। कल्पजीवी महर्षि ऋषियों के इस अनुरोध को अस्वीकार न कर सके। वे बड़ी सहजता से पुलह व क्रतु के पास आकर बैठ गए। इसी के साथ उन्होंने अपनी अन्तर्दृष्टि से स्मृति कोष को निहारा। वहाँ उन्हें भगवान् सदाशिव एवं भवतारिणी माता आशीष देते नजर आए।
    
उनके पावन स्मरण ने मार्कण्डेय ऋषि को पुलकित कर दिया और वे कहने लगे- ‘‘मेरे पिता महर्षि भृकण्डु एवं माता सुयशा ने शिवभक्ति के प्रसाद के रूप में मुझे पाया था। श्रद्धेय माता मुझे बचपन में समझाया करती थीं कि पुत्र! जीवन का सार प्रभु का नाम है। इसकी सार्थकता भक्ति में है। भक्ति का अर्थ उदारता, सहनशीलता, परदुःखकातरता, सहज निष्कपटता है। जो नर में नारायण की झांकी देख सकता है, वही भक्त है।
    
माता के वात्सल्य एवं पिता के संरक्षण की छांव में मुझे भक्ति के तीनों चरणों उपासना, साधना एवं आराधना की सहज सीख मिली। भगवान् सदाशिव का स्मरण उन महाकाल का ध्यान, यही मेरी उपासना थी। कठोर व्रतों का पालन, तितीक्षामय जीवन, शरीर, वाणी व मन पर महासंयम को मैंने अपनी साधना का रूप दिया था और जीव में शिव का अनुभव करते हुए उनकी सेवा में तल्लीनता मेरी आराधना थी। इस क्रम में मेरा बचपन गुजरा और किशोरवय आ पहुँची। जैसे-जैसे मैं किशोरावस्था में पहुँचने लगा, पता नहीं क्यों मेरे पिता उदास होते गए। मेरी मां की आँखें भी भरी-भरी रहने लगीं।
    
एक दिन सायं जब भगवान् सूर्यदेव अस्ताचल को गमन कर रहे थे, उनकी लालिमा से गगन लोहित हो रहा था। मैंने माता से उनकी उदासी का कारण पूछा, पिता भी वहीं समीप खड़े थे। मेरे प्रश्न के स्पर्श से वे दोनों ही फफक उठे। उन्होंने लगभग बिलखते हुए बताया- पुत्र! तुम्हारी आयु केवल सोलह साल की है और अब तुम तेरहवें वर्ष पूरे कर रहे हो। लगभग तीन वर्ष शेष हैं तुम्हारी आयु के। बस यही हम दोनों के दुःख का कारण है। उनकी इन बातों पर मैंने कहा आप दोनों ने मुझे यह सिखाया- भक्ति असम्भव को सम्भव करती है। भगवान् महाकाल काल के भी विनाशक हैं। ऐसे भगवान् भोलेनाथ के रहते क्या चिन्ता? आप तो बस मुझे आशीष दें कि मैं भगवान् सदाशिव की कृपा पा सकूँ।
    
माता-पिता का आशीष लेकर मैं उसी क्षण घर से निकल पड़ा। और पुष्पभद्रा नदी के तीर पर मैं कुटी बनाकर शिव भक्ति में लीन हो गया। नियमित पार्थिव पूजन, यजुर्वेद के महामंत्रों से प्रतिः-सायं रुद्राभिषेक। रुद्राष्टाध्यायी का पाठ, संध्या, गायत्री के साथ महामृत्युञ्जय मंत्र का जप। अहर्निश भगवान् भोलेनाथ का स्मरण मेरी दिनचर्या बन गयी। नित्य प्रति मेरा विश्वास दृढ़ होने लगा कि भक्ति से कुछ भी सम्भव है, कुछ भी यानि कि कुछ भी। दिन-महीने-वर्ष बीतने लगे। और एक दिन वह घड़ी भी आ पहुँची, जिसके लिए मेरे पिता-मेरी मां डर रहे थे।
    
संध्या बेला थी- मैं रुद्राभिषेक पूरा करके मृत्युञ्जय स्तोत्र से शिवस्तवन कर रहा था। तभी कज्जल गिरि के समान भीम-भयानक आकृति लिए कालदेव आ पहुँचे। मैंने उनकी मंशा जान ली और उनसे कहा ठहरो- पहले मैं अपना स्तवन पूरा कर लूँ, तब मैं तुमसे बात करूँगा। परन्तु अधीर कालदेव को भला कहाँ इतना धैर्य, उन्होंने क्रोधपूर्वक मुझे ग्रसना चाहा। परन्तु तभी काल की क्रोध भरी हुंकार के साथ भगवान् महाकाल की महाहुंकार वहाँ गूँज उठी। उनके चरण प्रहार से कालदेव पीड़ित होकर दूर जा गिरे। चेत आने पर मैंने देखा कि भगवान् भोलेनाथ के साथ माता सिंहवाहिनी भी पधारी हैं। प्रभु ने, माँ ने मुझे ढेर सारा प्यार किया। माता ने तो मेरा सिर अपनी गोद में रखते हुए कहा- पुत्र! भक्ति के प्रभाव से तुम शिवतत्त्व को जानने वाले होगे।
    
कृपालु मां ने बिन मांगे वरदान दिया कि मेरा दिव्यचरित श्रीदुर्गासप्तशती तुम्हारे माध्यम से लोक में प्रचारित होगा। भक्तवत्सल भगवान् सदाशिव ने मुझसे वरदान मांगने के लिए कहा तो मैंने केवल इतना कहा- दयामय! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वरदान दें कि भगवान् में मेरी अविचल भक्ति हो। आपमें मेरी स्थिर श्रद्धा रहे। भगवद्भक्तों के प्रति मेरे मन में अनुराग रहे और सचमुच ही वात्सल्यस्वरूपा माँ जगदम्बा एवं जगदीश्वर प्रभु सदाशिव की कृपा से, उनकी भक्ति के प्रसाद से मुझे स्वतः ही सब कुछ प्राप्त है।’’ महर्षि मार्कण्डेय की पवित्र अनुभूति को सुनकर ऋषियों को अपार हर्ष हुआ। वे सभी कुछ और सुनने के लिए उत्सुक हो उठे। परन्तु देवर्षि नए रहस्य को उजागर करने के पहले भगवन्नाम का कीर्तन करने में लीन हो गए। उनके स्वरों में सभी के स्वर सम्मिलित हो उठे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २६

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ११)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

प्रातःकाल का अरुणोदय और लाल रंग का सूर्य निकलना इस रंग भ्रम जंजाल की एक झलक है। सूर्य वस्तुतः सफेद ही होता है, पर सवेरे वह सिर पर नहीं पूर्व में तिरछी स्थिति में होता है। इसलिए उसकी किरणों को बहुत लम्बा वायुमंडल पार करना पड़ता है। इस मार्ग में बहुत अधिक धूलि कण आड़े आते हैं। वे कण लाल रंग नहीं सोख पाते अस्तु वे किरणें हम तक चली आती हैं और सवेरे का उगता हुआ सूर्य लाल दिखाई पड़ता है।

आंखें कितना अधिक धोखा खाती हैं और मस्तिष्क कितनी आसानी से बहक जाता है इसका एक उदाहरण रंगों की दुनिया में पहला पैर रखते ही विदित हो जाता है। अन्य विषयों में भी हमारी भ्रान्ति का ठिकाना नहीं। जीवन का स्वरूप, प्रयोजन और लक्ष्य एक प्रकार से पूरी तरह विस्मृत कर दिया है और जड़ पदार्थों पर अपनी ही मान्यता को बखेर कर उन्हें प्रिय-अप्रिय के रूप में देखने की स्थिति को संसार से मिलने वाले सुख-दुख मान लिया है। आत्म-ज्ञान की सूक्ष्म दृष्टि यदि मिल सके तो पता लगेगा कि हम अज्ञान, माया और भ्रम के जिस जंजाल में फंसे हुए हैं उनसे निकले बिना सत्य के दर्शन नहीं हो सकते और सत्य के बिना सुख नहीं मिल सकता।

वेदान्त दर्शन संसार को माया बताता है और संसार को स्वप्न कहता है इसका अर्थ यह नहीं कि जो कुछ दीखता है उसका अस्तित्व ही नहीं अथवा जो सामने है वह झूठ है। वर्तमान स्वरूप एवं स्थिति में वे सत्य भी हैं। यदि ऐसा न होता तो कर्म फल क्यों मिलते? पुण्य और तप तितीक्षा करने की क्या आवश्यकता होती। कर्तव्य और अकर्तव्य में क्या अन्त होता? धर्मकृत्यों की क्या उपयोगिता रह जाती? और पाप कर्मों से डरने बचने की क्या आवश्यकता रहती?

माया का अर्थ वेदान्त ने इस अर्थ में किया है जिसमें जो भाषित होता हो वह तत्वतः यथार्थ न हो। जगत को इसी स्थिति में—इसी स्तर का माना गया है। वह जैसा कुछ प्रतीत होता है, क्या वह वैसा ही है? इस प्रश्न पर जब गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि संसार में जो कुछ हम इन्द्रियों द्वारा देखते हैं, अनुभव करते हैं वह यथार्थ में वैसा ही नहीं होता। इन्द्रिय छिद्रों के माध्यम से मस्तिष्क को होने वाली अनुभूतियों का नाम ही जानकारी तभी सत्य हो सकती है जब वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को सही रूप में इन्द्रियां समझ सकें। यदि वे धोखा खाने लगें तो मस्तिष्क गलत अनुभव करेगा और वस्तुस्थिति उलटी दिखाई पड़ने लगेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १६
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

👉 महावीर बजरंग बली


महावीर बजरंग बली, श्री राम दूत का अभिनन्दन है।
दुष्टदलन,दुःख-कष्ट हरण,श्री हनुमान का शुभ वंदन है।।

मनुजता जब भी फंसी भँवर में, हनुमान ने उसे उबारा।
भ्रम व भय से मुक्ति दिलाया, नव जीवन दे हमें संवारा।।
सेवा से श्री राम प्रसन्न हो जाते हैं, जग को बतलाया।    
सेवा धर्म ही श्रेष्ठ धर्म है, हनुमत ने जीकर सिखलाया।।
प्रभु सेवक केसरी नंदन का,पवनसुत का अभिवादन है।
महावीर बजरंग बली, श्री राम दूत का अभिनन्दन है।।

दुष्टों के प्रभु सदा काल हैं, महाकाल के अवतारी  हैं।
संतों के रक्षक हैं हरपल, भक्तों  के ह्रदय बिहारी हैं।।
जहाँ कहीं भी अन्धकार है, सूर्य समान पथ द्योतक हैं।
बल बुद्धि विद्या के सागर हैं, आप ही संकटमोचक हैं।।
हर संकट के समाधान हैं, शुभ कार्य को हरि चन्दन हैं।
महावीर बजरंग बली, श्री राम दूत का अभिनन्दन है।।

नयी विपदा आई जग में, आप ही अब उपचार करो।
अतिसूक्ष्म है असुर आज का, प्रभु इसका संहार करो।।
संकट में है प्राण मनुज के, संजीवन दे उपचार करो।
अभयदान फिर दो भक्तों को, हम सब पर उपकार करो।।
आस और विश्वास कपिवर, आपका ही चरण वंदन है।
महावीर बजरंग बली, श्रीराम  दूत का अभिनन्दन है।।

उमेश यादव

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १०)

असंभव को संभव करती है भक्ति

देवर्षि नारद को जब भावसमाधि से चेत हुआ तो उनकी आँखों से भावबिन्दु झर रहे थे। भावों की प्रगाढ़ता के कारण उनका मुख आरक्त था और देह में एक सात्त्विक कम्प हो रहा था। उनकी भाव चेतना से प्रस्फुटित हो रहे इस भक्ति के उद्रेक ने वहाँ उपस्थित सभी ऋषियों व देवों के समुदाय को भक्तिमय कर दिया। इन्हीं क्षणों में महागायक गन्धर्वराज तुम्बरु अपनी गायन मण्डली के साथ आ पहुँचे। उनकी इस मण्डली में गन्धर्वों के साथ पुञ्जिकस्थली, सुवर्णा आदि अप्सराएँ थीं। इन्हें देवराज इन्द्र की सभा में सूचना मिली थी कि देवात्म हिमालय के गुह्य क्षेत्र में देवर्षि नारद के सान्निध्य में सप्तर्षि मण्डल भक्ति संगम कर रहा था। भक्ति के इस आकर्षण ने तुम्बरु के अन्तस् को बलात् खींच लिया।
    
इस आकर्षण का एक कारण देवर्षि का सान्निध्य पाना भी था। हो भी क्यों न? तुम्बरु ने देवर्षि से ही सात सुरों की बारीकियाँ, इसके आरोह-अवरोह सीखे थे और साथ ही यह भी जाना था गीतों के गायन का, संगीत  के सरगम का वास्तविक उद्देश्य भावों की संशुद्धि है। भावों की सच्ची साधना में कला निखरती है। इस सत्य को जानने वाले तुम्बरु ने आते ही अपने अनुचरों-अप्सराओं के साथ ऋषियों को प्रणाम किया, देवर्षि की चरण रज ली और फिर वहाँ के पवित्र उद्रेक से स्पन्दित होकर शिव-शिव, नारायण-नारायण, जय जगजननी माँ का कीर्तन करने लगे। भगवन्नाम के इस पवित्र नाद से हिमालय की चैतन्यता में चित् शक्ति का चिद्विलास होने लगा। प्रभुनाम के साथ हो रहे कलात्मक नृत्य के आहत स्वरों से सभी के अनाहद् कमल बरबस खिल उठे।
    
साथ ही सभी में भक्ति के नए सूत्र की प्रतीक्षा जाग उठी। ऋषियों ने अनुनय भरे नयनों से देवर्षि की ओर देखा। देवर्षि अभी भावों की गहनता से पूरी तरह से उबरे नहीं थे। फिर भी उन्होंने ऋषियों के अनुराध को स्वीकारते हुए बड़े ही मीठे स्वरों में अपना नया सूत्र कहा-
‘यं लब्ध्वापुमान सिद्धा भवति,
अमृतो भवति, तृप्तो भवति’॥ ४॥
    
सूत्र की इस अनुभूति के साथ उनकी आँखें महर्षि मार्कण्डेय के मुख पर जा टिकीं। परमसिद्ध, जरा-मरण से रहित, अमर व नित्यतृप्त- महर्षि मार्कण्डेय, जिन्हें भगवान् सदाशिव की और माता जगदम्बा की पराभक्ति व नित्य कृपा सहज प्राप्त है। जिन्होंने भगवान् विष्णु के बालमुुकुन्द स्वरूप का दिव्य साक्षात् किया। उन महर्षि की ओर देखते हुए देवर्षि बोले- ‘‘भक्ति ऐसी है जिसे पाकर पुरूष (स्त्री) सिद्ध होता है, अमृतमय होता है, नित्य तृप्त होता है। इस सूत्र की साकार उपस्थिति महर्षि मार्कण्डेय हैं। इनके जीवन की अनुभूतियों में ही इस सूत्र की व्याख्या है। इस सूत्र को समझने के लिए हम लोग महर्षि से अनुरोध करें कि वे अपने भक्तिमय जीवन की अनुभूतियों का अमृत हम सबको प्रदान करें।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २५

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १०)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

विद्युत चुम्बकीय तरंगें ही प्रकाश हैं। इन तरंगों की लम्बाई अलग-अलग होती है। अस्तु उनका अनुभव हमारा मस्तिष्क भिन्न-भिन्न अनुभूतियों के साथ करता है। यह अनुभूति भिन्नता ही रंगों के रूप में विदित होती है। सात रंग तथा उनसे मिल-जुलकर बनने वाले अनेकानेक रंगों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रकाश तरंगों की लम्बाई का मस्तिष्कीय अनुभूति के रूप में ही किया जा सकता है। रंगों की अपनी तात्विक सत्ता कुछ भी नहीं है।

आश्चर्य का अन्त इतने से ही नहीं हो जाता। रंगों की दुनिया बहुत बड़ी है उसे मेले में हमारी जान-पहचान बहुत थोड़ी-सी है। बाकी तो सब कुछ अनदेखा ही पड़ा है। लाल रंग की प्रकाश तरंगें एक इंच जगह में तेतीस हजार होती हैं जबकि कासनी रंग की सोलह हजार। इन्फ्रारेड तरंगें एक इंच में मात्र 80 ही होती हैं। इसके विपरीत रेडियो तरंगों की लम्बाई बीस मील से लेकर दो हजार मील तक पाई जाती है। यह अधिक लम्बाई की बात हुई। अब छोटाई की बात देखी जाय परा कासनी किरण एक इंच में बीस लाख तक होती हैं। एक्सरे किरणें एक इंच में पांच करोड़ से एक अरब तक पाई जाती हैं। गामा तरंगें एक इंच में 220 अरब। इतने पर भी इन सब की चाल एक जैसी है अर्थात् सैकिण्ड में वही एक लाख छियासी हजार मील।

अगर हम विदित प्रकाश किरणों को यन्त्रों की अपेक्षा खुली आंखों से देख सकने में समर्थ हो सके होते तो जिस प्रकाश एक सात रंगों का सप्तक हमें दीखता है उससे अतिरिक्त अन्यान्य ऐसे रंगों के जिनकी आज तो कल्पना कर सकना भी अपने लिए कठिन है 67 सप्तक और दीखते। 67×7=469 रंगों के सम्मिश्रण से कितने अधिक रंग बन जाते इसका अनुमान इसी से लगाया जाता है कि विज्ञान सात रंगों से ही हजारों प्रकार के हलके भारी रंग बने हुए दीखते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १५
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ९)

भक्ति से व्यक्तित्व बन जाता है अमृत का निर्झर
    
क्रतु के इस सूत्र को थाम कर भृत्सभद कहने लगे- ‘‘कितने दारूण थे सागर मन्थन के प्रारम्भिक पल। अमृत की आस में देव और असुर दोनों ही महासागर को मथ रहे थे। भगवान् कूर्म की पीठ पर मन्दराचल घूम रहा था। उसके घर-घर के रव से ब्रह्माण्ड आलोड़ित था। सभी आशान्वित थे कि रत्नाकर के गर्भ से अमृत निकलेगा, परन्तु निकला महाविष। अमृत के आकांक्षी तो सभी थे, परन्तु विष की ज्वाला में जलने को कोई भी  तैयार न था। निखिल सृष्टि त्राहि-त्राहि करने लगी। प्राणि मात्र में व्याकुलता फैल गयी। जन्तुओं की कौन कहे, इस विष के आतप से वनस्पतियाँ भी झुलसने लगीं। सभी को केवल एक ही तारणहार दिखे- भगवान् सदाशिव। सब के सब भागे-भागे उन्हीं के पास गए। उस समय उन प्रभु की चेतना पराचेतना की भक्ति में लीन थी। भक्ति की भावसमाधि में डूबे थे भगवान्। माता जगदम्बा चित्शक्ति उनकी सेवा में लीन थीं। उन्होंने देवों-असुरों, ऋषियों के मुख से यह व्यथा सुनी। प्रेममयी सृष्टिजननी अपनी सन्तानों की पीड़ा से व्याकुल हो गयीं।
    
उन्होंने ही भगवान् भोलेनाथ को समाधि से व्युत्थित किया। प्रभु समाधि से जागे। उनके नेत्रों से करुणा झर रही थी। सभी की व्यथा ने उन्हें द्रवित कर दिया। उस समय उन महादेव को जिसने भी देखा उसी ने अनुभव किया कि भक्ति में केवल भावों की सजलता ही नहीं महाशक्ति की प्रचण्डता भी रहती है।’’ अपनी बात कहते-कहते महर्षि भृत्समद एक पल के लिए ठिठके और बोले- ‘‘उस समय आप भी तो थे देवर्षि, आप भी कुछ कहें।’’ ऋषि भृत्समद की वाणी ने परम भागवत नारद की स्मृतियों को कुरेदा। वे कहने लगे- ‘‘तप तो सभी करते हैं, देव, दानव, मानव, परन्तु इनका तप इनकी अहंता-ममता के इर्द-गिर्द ही रहता है, उसमें शिवमयता नहीं होती। जबकि भगवान शिव का तप पल-पल सृष्टि में प्राणों का संचार करता है। उसकी ऊष्मा एवं ऊर्जा से सृष्टि को गति एवं लय मिलती है।    
    
उन पलों में भी जब सृष्टि की लय बिगड़ रही थी, इसकी गति का क्रम टूट रहा था। डमरूधर, शूलपाणि भगवान सृष्टि का शूल हरने के लिए उठ खड़े हुए और क्षणार्द्ध से भी कम समय में वहाँ जा पहुँचे, जहाँ सागरमंथन का उपक्रम हो रहा था। उन्हें देखकर सभी के मन में आशा का सूर्य उगा। भोलेनाथ ने महाज्वाला उगलते उस महाविष को देखा और एक ही क्षण में उसे निगल गये। उस क्षण ऐसा लगा जैसे कि सब कुछ थम गया। जो उनकी महिमा से सुपरिचित थे, वे शान्त रहे, परन्तु जो शंकालु थे, वे सोच में पड़ गये। उन्होंने यह भी सोच लिया कि कहीं स्वयं सदाशिव भी तो इस विष-ज्वाला से नहीं झुलस जायेंगे।    
    
लेकिन जिसे भावभक्ति ने अमर कर दिया हो उसे भला विष स्पर्श भी क्या करेगा। जिसके हृदय में भक्ति की पवित्र ज्योति जलती है उसे संसार का अंधेरा छू भी नहीं सकता। सागरमंथन के समय सभी ने भगवान शिव की भक्ति का चमत्कार देखा। सभी ने उनके महातप की महिमा को पहचाना। सभी ने जाना- जहाँ सारी शक्तियाँ, दिव्य विभूतियाँ निरर्थक, निस्सार सिद्ध होती हैं, वहाँ केवल भक्ति की सार्थकता ही समर्थ सिद्ध होती है। भक्तिगाथा में उभरे इस शिवतत्त्व के मानसिक संस्पर्श ने सभी को दिव्य अनुभूति से भर दिया। सबके सब शिव स्मरण में लीन हो उठे-
यस्याङ्के च विभाति भूधरसूता च गरलं देवावभ्रामस्तके,
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा,
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशंकरः पातुमाम्॥        
    
जिनके अंक पर माँ हिमाचल सुता, मस्तक पर गंगा जी, ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा, कण्ठ में हलाहल विष, वक्षःस्थल पर सर्पराज श्री शेष जी सुशोभित हैं; वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर भक्तों के पापनाशक, सर्वव्यापक, कल्याणरूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्री शंकरजी सदा मेरी रक्षा करें।    
    
भावभरे इस गायन ने हिमालय के कण-कण को आन्दोलित कर दिया। सभी के अंतस् में विद्यमान भक्तितत्त्व सघन होने लगा और फिर पलों में ही स्तुतिगान में वर्णित स्वरूप लेकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हो गये। उनके साथ पराम्बा भी थीं। उन्होंने सभी को आशीष दिया- ‘‘तुम सभी का कल्याण हो, तुम सब सदा-सदा संसार में कलुषित हो रही भावनाओं को निर्मल बनाने में सहायक  बनो। भगवान शिव एवं माता जगदम्बा का यह आशीष पा कर सभी के अंतस् भक्ति से भीगे थे। देवर्षि नारद की चेतना तो एक गहरी भावसमाधि में डूब गयी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २२

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ९)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

यह बात कहने, सुनने और जानने, मानने में बड़ी विचित्र लगेगी कि संसार के किसी पदार्थ में कोई रंग नहीं है। हर वस्तु रंग रहित है। किन्तु यह विशेषता अवश्य है कि प्रकाश की किरणों में जो रंग है उनमें से किसी को स्वीकार करें किसी को लौटा दें। बस इसी कारण हमें विभिन्न वस्तुएं विभिन्न रंगों की दीखती हैं। पदार्थ जिस रंग की किरणों को अपने में सोखता नहीं वे उससे टकराकर वापिस लौटती हैं। वापसी में वे हमारी आंखों से टकराती हैं और हम उस टकराव को पदार्थ का अमुक रंग होने के रूप में अनुभव करते हैं। पौधे वस्तुतः हरे नहीं होते, उनका कोई रंग नहीं, हर पौधा सर्वथा बिना रंग का है, पर उसमें प्रकाश की हरी किरणें सोखने की शक्ति नहीं होती अस्तु वे उसमें प्रवेश नहीं कर पाती। वापिस लौटते हुये हमारी आंखों को इस भ्रम में डाल जाती हैं कि पौधे हरे होते हैं। हम उसी छलावे को शाश्वत सत्य मानते रहते हैं और प्रसंग आने पर पूरा जोर लगाकर यह सिद्ध करते रहते हैं कि पौधे निश्चित रूप से हरे होते हैं। कोई उससे भिन्न बात कहे तो हंसी उसी की बुद्धि पर आवेगी, भ्रांत और दुराग्रही उसी को कहेंगे। यह जानने और मानने का कोई मोटा आधार दिखाई नहीं पड़ता है कि हमारी ही आंखें धोखा खा रही हैं—प्रकृति की जादूगरी, कलाबाजी हमें ही छल रही हैं। पेड़ का तो उदाहरण मात्र दिया गया। हर पदार्थ के बारे में हम रंगों के सम्बन्ध में ऐसे ही भ्रम जंजाल में जकड़े हुए हैं। जिन आंखों को प्रामाणिक मानते हैं, जिस मस्तिष्क की विवेचना पर विश्वास करते हैं यदि वही भ्रमग्रस्त होकर हमें झुठलाने लगें तो फिर हमारा ‘प्रत्यक्षवाद’ को तथ्य मानने का आग्रह बेतरह धूल धूसरित हो जाता है।

हमारी दृष्टि में काला रंग सबसे गहरा रंग है और सफेद रंग कोई रंग नहीं है। पर यथार्थता इस मान्यता से सर्वथा उलटी है। किसी भी रंग का न दीखना काला रंग है और सातों रंगों सम्मिश्रण सफेद रंग। अंधेरा वस्तुतः ‘कुछ भी नहीं’ कहा जा सकता है जबकि वह घेर-घना छाया दीखता है और उसके कारण कुछ भी सूझ न पड़ने की स्थिति आ जाती है। वैशेषिक दर्शन ने अंधेरे को कोई पदार्थ मानने से इनकार किया है, जबकि दूसरे दार्शनिक उसे एक तत्व मानने का जोर-शोर से प्रतिपादन करते हैं। कालापन सभी प्रकाश किरणों को अपने भीतर सोख लेता है। फलतः हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़ता है और अंधेरे में ठोकर खाते हैं—घनी कालिमा छाई देखते हैं।

किसी भी रंग की किरणें सोख सकने में जो पदार्थ सर्वथा असमर्थ हैं वे ही हमें सफेद दीखते हैं। कारण यह है उनसे टकरा कर तिरस्कृत प्रकाश तरंगें वापस लौटती हैं और उनके सातों रंगों का सम्मिश्रण हमारी आंखों को सफेद रंग के रूप में दीखता है। कैसी विचित्र, कैसी असंगत और कैसी भ्रम जंजाल भरी विडम्बना है यह। जिसे न उगलते बनता है न पीते। न स्वीकार करने को मन होता है अस्वीकार करने का साहस। अपने ही अपूर्ण उपकरणों पर क्षोभ व्यक्त न करते हुये मन मसोस कर बैठना पड़ता है। वैज्ञानिक सिद्धियों को अस्वीकार कैसे किया जा सकता है। हलका, भारी, गहरा, उथला कालापन भी एक पहेली है। अन्धकार कहीं या कभी बहुत गहरा होता है और कहीं या कभी उसमें हलकापन रहता है यह भी उतने अंशों में प्रकाश को सोखने न सोखने की क्षमता पर निर्भर रहता है। काले रंग में प्रकाश का सारा अंश सोख लेने की क्षमता का एक प्रमाण यह है कि वह धूप में अन्य पदार्थों की अपेक्षा अधिक मात्रा में और अधिक जल्दी गरम होता है।

अब एक नया प्रश्न उभरता है कि प्रकाश किरणों में रंग कहां से आता है? इस स्थल पर उत्तर और भी विचित्र बन जाता है। प्रकाश लहरों की लम्बाई का अन्तर ही रंगों के रूप में दीखता है। वस्तुतः रंग नाम की कोई चीज समस्त विश्व में कहीं कुछ है ही नहीं। उसका अस्तित्व सर्वथा भ्रामक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १३
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 तौर बदलना होगा


सुनो साथियों, समय कठिन है, संभल-संभल कर चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रिय जन, अब तो तौर बदलना होगा।।

है विनाश की काली छाया, दुनिया में दहशत फैलाया।
यह अदृश्य होकर है लड़ता, छुपा हुआ दुश्मन है आया।।
जीवन पर संकट आया है, हर क्षण हमें संभलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

शत्रु है यह बड़ा सयाना, तनिक नहीं इससे घबराना।
सावधान होकर  है लड़ना, हम सबको है  इसे हराना।।
श्वास-प्राण से युद्ध है इसका, मास्क लगाकर चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

प्राणायाम है बहुत जरुरी, नींद करो अपनी सब पूरी।
सट कर मत चल मेरे भाई, दो गज दुरी बहुत जरुरी।।
इधर उधर न छूना कोई, हाथ समय पर धोना होगा।   
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन,अब तो तौर बदलना होगा।।

गरम गुनगुना पानी पीओ, सर्दी खांसी रहित हो जिओ।
हल्दी का दूध सबसे उत्तम, रोज रात में कप भर पीओ।।    
प्रण लो भाई बिना काम के, घर से नहीं निकलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

हंसी ख़ुशी जीवन है जीना, सदा संतुलित भोजन लेना।
डॉक्टर के सलाह लेकर ही, कोई भी ओषधि  है लेना।।
जीत हमारी सदा सुनिश्चित, सावधान हो चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

उमेश यादव

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

👉 मातु तुम्हारे चरणों में, श्रध्दा भाव समर्पित है


किंचित मात्र न संशय मन में, निश्छल निष्ठा अर्पित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे शैलपुत्री माता आओ, पत्थर में प्रेम रसधार करो,
पर्वत से कठोर पिता के, उर में सहज प्रेम का भाव भरो।
पिता पुत्री का स्नेहिल बंधन तो, सदियों से ही वर्णित है
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे ब्रह्मचारिणी माता आओ, तप से अपने सब विघ्न हरो,
जीवन के संघर्षों में तपाकर, मानव जीवन को कुंदन करो।
तपश्चारिणी और अपर्णा नाम तुम्हारे चर्चित हैं,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे खड्ग विभूषित चंद्रघंटा मां, दुष्टों हेतु टंकार करो,
आलस दूर भागे जग से, वीर रस का भाव भरो।
बाल हृदय सा पवित्र यह मन, माता तुम पर आश्रित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे आदिशक्ति माता आओ, कुष्मांडा का फिर रूप धरो,
है तमस रात्रि की अंतिम बेला, सूर्य का नया विहान करो।
आयुश बल आरोग्य की देवी, ये तन मन तुमको अर्पित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे स्कंदमाता आओ, जीवों में नव चेतना भरो,
हे शुभ्रवर्णा माता सुन लो, साधकों को मोक्ष प्रदान करो,
अज्ञानी को ज्ञान दो हे माता, ज्ञान से ही जीव परिष्कृत है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

मां कात्यायनी आओ माता, रोग शोक संताप हरो,
भक्तों के दुख को हरकर मां, अपनी भक्ति प्रदान करो,
ब्रजमण्डल की अधिष्ठात्री माता, तुम पर जग ये गर्वित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

मां कालरात्रि आओ माता, मन के संशय अब दूर करो,
कल्मष कषाय को हरकर मां, जीवन में नव प्रकाश भरो,
आपके शरण में जो आया, वो काल से भी रक्षित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है

महागौरी माता अब तो, भक्तों का उद्धार करो,
अपनी शीतल छाया से, जीवनी शक्ति संचार करो,
हे गौरवर्णा माता तुम पर, मेरा ये जीवन अर्पित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे सिद्धिदात्री माता तुमसे, शिव भी अर्धनारीश्वर कहलाये,
जिसने भी तेरा ध्यान धरा, अष्ट सिद्धि उसकी हो जाए,
हम पर भी मां कृपा करो, सर्वश्व तुम्हे समर्पित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे नौदुर्गे माता सब पर, अपनी करुणा मां बरसाओ,
आज तुम्हारा आवाह्न है, आओ माता दुर्गे आओ,
नौरूप धरो माता फिर से, यह सृष्टि तुम पर आश्रित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

👉 "आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो"


आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो,
जन्म धरो हे जन्म धरो,
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो।

अयोध्या के आस तुम्ही हो, दशरथ के तो श्वास तुम्ही हो,
कौसल्या की सुनी गोद बुलाए, जन जन के विश्वास तुम्ही हो,
रघुकुल के नायक हे रघुवर, जीवों का दर्द हरो।
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो,
आओ हे गुणधाम आज फिर जन्म धरो।

लखन सरीखा कौन अनुरागी, भरत बने कैसे फिर त्यागी,
शत्रुघ्न की तो बात ना पूछो, वो तो बन बैठा वैरागी,
अनुजों के करतार तुम्ही हो, आकर ज्येष्ठ बनो।
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो,
आओ हे गुणधाम आज फिर जन्म धरो।

मात सुमित्रा तुम पर वारी, कैकेयी भी जाए बलिहारी,
दुनियां में और कौन है ऐसा, तेरी छवि है सबसे न्यारी,
मर्यादा पुरुषोत्तम आओ, नयनों को तृप्त करो,
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो,
आओ हे गुणधाम आज फिर जन्म धरो।

मानवता फिर आज पुकारे, तुम बिन हमको कौन उबारे,
जग के पालनकर्ता तुम हो, पल पल हम तुमको ही निहारे,
प्राणिमात्र की विकल व्यथा है, आकर कष्ट हरो,
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो, आओ हे गुणधा
 
                                                  - डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

👉 माँ नवदुर्गा


हे नवदुर्गा कृपा करो माँ, जगती का उपकार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

शैलपुत्री माँ सती-पार्वती, भव बंधन से मुक्त करा दो।
प्यार और सहकार बढ़े माँ, सुविचार की धार बहा दो।।
बृषभ स्थिता, हेमवती माता, दिव्य ज्ञान संचार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

ब्रह्मचारिणी ब्राह्मी माता, तप करने की शक्ति हमें दो।
शिव स्वरूपा गनेश जननी, शिव की अविचल भक्ति हमें दो।।
ज्योतिर्मय हे मातु उमा अब, मन में  श्रेष्ठ  विचार भरो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

चंद्रघंटा हे मातु भवानी, हर संकट को दूर भगा दे।
सुख,सौभाग्य, शांति दे माते,हर मानव को श्रेष्ठ बना दे।।
दिव्य विभूतियाँ दे दो अम्बे, अहंकार संहार  करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

कूष्मांडा हे आदिशक्ति माँ, तूने ही ब्रह्माण्ड बनाया।
अष्टभुजा हे आदिस्वरुपा, तेरी कांति सर्वत्र समाया।।
रोग शोक का अंत करो माँ, अंतस से कुविचार हरो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।  

स्कंदमातापरम सुखदायी, मुक्ति मोक्ष को सहज करा दो।
शुभ्रवर्ण कमलासिनी माते, मूढ़ मति  हैं, श्रेष्ठ बना  दो।।  
सांसारिक जीवों में माता, नवचेतन का प्रसार  करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।  

कात्यायिनी माता की भक्ति, जो साधक कर पाता है।
धर्म अर्थ और काम मोक्ष की, प्राप्ति सहज हो जाता है।।
चतुर्भुजा हे मातु पराम्बा, भय रोग शोक संताप हरो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

कालरात्रि हे महाकाली माँ, संत साधू अब भटक रहे हैं।
रुद्रानी चामुंडा चंडी माँ, रक्तबीज फिर पनप रहे  है।।
हे शुभंकरी फिर असुर बढ़े हैं, उन सबका संहार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

महागौरी हे मातु अम्बे, पाप हरिणी  पुण्य  प्रदाता।
शक्ति अमोघ हे वृषारूढ़ा, सद्य: फलदायिनी हे माता।।
चैतन्यमयी हे मातु भवानी, दुष्टों का उपचार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।
 

सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, साधक में नव प्राण भरो।
सिंहासिनी कमलासिनी देवि, सर्वसिद्धि का दान करो।।
प्राणी मात्र को सुखी करो माँ, श्रद्धा का संचार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

मातृ रूप में हे माँ दुर्गा, हर प्राणी को वरदान दो।  
जीव मात्र हों सुखी निरोगी, सबका ही कल्याण हो।।
हे नवदुर्गा, हे शक्तिस्वरूपा, मानव में श्रेष्ठ विचार भरो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

उमेश यादव

👉 सिद्धिदात्री जन जन का कल्याण करो।


ज्ञान रूप हे मातु शतावरी, साधक में नव प्राण भरो।
सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, जन जन का कल्याण करो।।

यक्ष गन्धर्व सेवा में निशदिन, देव दनुज भी चरण पखारें।
शंख चक्र गदा पंकज कर, ऋषि मुनि यति तव रूप निहारें।।
हे शतावरी माँ  साधक में, श्रद्धा का आधान करो।
सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, जन जन का कल्याण करो।।

अणिमा गरिमा महिमा लघिमा, सर्वसिद्धि नवनिधि प्रदाता।
सिंहासिनी कमलासिनी देवि, जगदम्बे भक्तों की माता।।  
मन को शुद्ध पवित्र करो माँ, बुद्धि विवेक प्रदान करो।
सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, जन जन का कल्याण करो।।

अर्धनारीश्वर शिव को तुमसे, सिद्धि का वरदान मिला था।
राम भक्त हनुमन को तुमसे, अष्टसिद्धि का दान मिला था।।
प्राणी मात्र को सुखी करो माँ, बल आरोग्य प्रदान करो।
सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, जन जन का कल्याण करो।।
 
उमेश यादव

👉 भक्तिगाथा (भाग ८)

भक्ति से व्यक्तित्व बन जाता है अमृत का निर्झर

हिमालय के आंगन में प्रेममयी जगदम्बा के प्रकाश का उद्भास देर तक बना रहा। धीरे-धीरे यह प्रकाश वहाँ उपस्थित देवों, ऋषियों व सिद्धों के अन्तस् में समा गया। परमप्रेम की इस अनुभूति ने सब को विभोर कर दिया। सभी हर्षित थे, गद्गद् थे, पुलकित थे। भक्ति की विह्वलता उनकी आँखों से छलक रही थी। उनके अन्तर्भावों में भक्ति के रहस्यों को और भी अधिक जानने की उत्कण्ठा हुलसने लगी थी। सभी के मन देवर्षि की ओर उन्मुख थे, केन्द्रित थे। स्वयं अन्तर्यामी परमात्मा का मन कहे जाने वाले देवर्षि ने इन सभी महाविभूतियों के मानसिक स्पन्दनों की अनुभूति पा ली। वह स्वयं भी भक्ति का अगला दुर्लभ सूत्र सुनाना चाहते थे। सत्य जिज्ञासा, सद्गुरु को और भी कुछ अधिक दे डालने को प्रेरित करती है।
    
देवर्षि के हृदय में भी भावों का शतदल खिला और उसकी सुरभि वाणी से बहने लगी। वह कह रहे थे- ‘‘प्रेम विकसित हो तो अहं विगलित हुए बिना नहीं रहता। और जब अहं ही नहीं तब स्वार्थ कैसा? ऐसे में बचती है तो सिर्फ कल्याण भावना, जगती के कल्याण की कामना, अखिल सृष्टि चराचर के कल्याण की प्रार्थना। व्यक्तित्व में परम दुर्लभ अमृतत्त्व विकसित होता है। मेरे भक्ति दर्शन का अगला सूत्र भी यही है-
अमृतस्वरूपा च ॥ ३॥  
भक्ति अमृत रूपा है।
    
जिसमें भक्ति अपनी सम्पूर्णता में खिली, वह व्यक्तित्व स्वयं में अमृत का निर्झर बन जाता है। असंख्य उसके पावन स्पर्श से नवजीवन, दिव्य जीवन पाते हैं। उनकी प्राण चेतना में भक्ति का संचार होता है।’’
    
महर्षि वामदेव, ब्रह्मर्षि भृत्समद की अन्तर्चेतना देवर्षि के इन वचनों को सुनकर दिव्य पुलक से पूरित हो गयी। वे गहन भावसमाधि में डूब गए। अन्य ऋषिजनों ने इस सत्य को अनुभव किया। सभी कह उठे- ‘‘धन्य हैं देवर्षि आप। आपकी अमृतवाणी भावचेतना में समाधि का संचार करती है।’’ ऋषियों के इस कथन पर परम भागवत नारद ने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़े और धीमे स्वरों में कहा- ‘‘धन्यता तो भगवान् शिव में है। वे विषपायी प्रभु नीलकण्ठ भोलेनाथ न केवल स्वयं अमर हैं, बल्कि असंख्य भक्तों को अमरता का वरदान देते रहते हैं। भक्ति का परमोज्ज्वल आदर्श हैं वे। उनकी लीलाओं में भक्ति का स्वाभाविक विहार है।’’

नारद के कथन की सत्यता को सभी ने अनुभव किया। हिमालय के दिव्य परिसर में उपस्थित इन ऋषियों में अनेक चिरजीवी भी थे। उन्होंने भगवान् सदाशिव को, उनकी लीलाओं को स्वयं देखा था। वे उनके साक्षी ही नहीं, सहभागी भी बने थे। इनमें से महर्षि भृत्सभद एवं परमर्षि क्रतु को स्मरण हो आयी- भगवान् महादेव के विषपान की लीला। क्रतु बोल उठे- ‘‘सत्य है देवर्षि! भगवान् शिव न होते तो यह सृष्टि भी नहीं होती। वे ही सृष्टि के आदि- मध्य एवं अन्त हैं। जब-जब सृष्टि पर महासंकट आते हैं, तब वे महाकाल स्वयं युगावतार बन कर इन महाविपत्तियों का संहार करते हैं।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २१

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ८)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

अपेक्षा से ही हम किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति का मूल्यांकन करते हैं तुलना ही एक मोटी कसौटी हमारे पास है जिससे किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। जिनके बारे में वह निर्धारण किया गया है वे वस्तुतः क्या हैं? इसका पता लगाना अपनी ज्ञानेन्द्रियों के लिये जिनमें मस्तिष्क भी सम्मिलित है, अति कठिन है। क्योंकि वे सभी अपूर्ण और सीमित हैं। कई अर्थों में तो उन्हें भ्रान्त भी कहा जा सकता है। सिनेमा के पर्दे पर तस्वीरें चलती-फिरती दिखाई देती हैं वस्तुतः वे स्थिर होती हैं, उनके बदलने का क्रम ही इतना तेज होता है कि आंखें उसे ठीक तरह पकड़ नहीं पातीं और आकृतियों को ही हाथ-पैर हिलाती, बोलती, गाती समझ बैठती हैं।

अक्सर हमारी अनुभूतियां वस्तुस्थिति से सर्वथा उलटी होती हैं। इन्द्रियां अपूर्ण ही नहीं कई बार तो वे भ्रामक सूचनाएं देकर हमें ठगती भी हैं। उनके ऊपर निर्भर रहकर—प्रत्यक्षवाद को आधार मानकर शाश्वत सत्य को प्राप्त करना तो दूर समझ सकना भी सम्भव नहीं होता।

उदाहरण के लिये प्रकाश को ही लें। प्रकाश क्या है? उसे विद्युत चुम्बकीय लहरों का बवंडर ही कहा जा सकता है। वह कितना मन्द या तीव्र है यह तो उसकी मात्रा पर निर्भर है, पर उसकी चाल सदा एक-सी रहती है। एक सैकिण्ड में वह एक लाख छियासी हजार मील की गति से दौड़ते रहने वाला पदार्थ है। प्रकाश किरणों में सात रंग होते हैं! इन्हीं के सम्मिश्रण से हलके भारी अनेकानेक रंगों का सृजन होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १२
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

👉 महागौरी भक्तों का कल्याण करो


हे अम्बे, हे महागौरी माँ, भक्तों का  कल्याण  करो।
पाप ताप संताप हरो, दुःख कष्टों का अवसान करो।।

श्‍वेताम्‍बरधरा, हे वृषारूढ़ा, गौर वर्ण, माँ दुर्गा माता।
अन्नपूर्णा, ऐश्वर्य प्रदायिनी, अष्टवर्षा,हे जग के त्राता।।
पाप हारिणी पुण्य प्रदायिनी, अभय करो माँ प्राण भरो।  
हे अम्बे, हे महागौरी माँ, भक्तों  का  कल्याण  करो।

कठिन तपस्या से माते ने, शिवशंकर सा वर पाया था।
कर डमरू शोभित माता ने, तप करना सिखलाया था।।
चैतन्यमयी हे मातु भवानी, त्रितापों का अवसान करो।
हे अम्बे, हे महागौरी माँ, भक्तों का कल्याण  करो।
 
शक्ति अमोघ है सदा तुम्हारी, सद्य: फलदायिनी हे माते।
अन्तः के कल्मष धो देतीं,पवित्र पुण्य दायिनी हो माते।।
हे शिवा-सुभद्रा कृपा करो अब, दुष्टों के अभिमान हरो।
हे अम्बे, हे महागौरी माँ, भक्तों का  कल्याण  करो।

उमेश यादव

👉 जीवन के रंग



फूल भी हैं, शूल भी हैं, रंग जीवन में सभी हैं।
है कभी मधुमास जीवन और पतझर भी कभी है।

एक जैसा ही समय रहता नहीं है इस जगत में,
कर नहीं सकते नया कुछ जो सदा जीते विगत में,
अब नई फसलें उगाओ, स्वेदकण से सींच कर तुम,
आँसुओं से आस्तीनों को भिगोना हल नहीं है।

क्या हुआ यदि धूप भीषण है कहीं छाया नहीं है,
राह काँटों से भरी और साथ हमसाया नहीं है,
बस यही विश्वास लेकर तुम रहो चलते निरंतर,
जो रुका है हारकर वो लक्ष्य तक पहुंचा नहीं है।

बीत जाती रात भी काली, किरण जब फूटती है,
जो हुआ भयभीत तम से, चांदनी भी रूठती है,
तप से मिला संतोष होता सब सुखों से श्रेष्ठतर है,
रंग मेहँदी में नहीं आता अगर पिसती नहीं है।

सुधीर भारद्वाज

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

👉 हे श्री राम तुम कब आओगे


आज रावण फिर शीश उठाता, सीता का दामन बच न पाता,
हर मन का असुर फिर पाँव बढ़ाता, घड़ा पाप का भरता ही जाता,
पापी का समूल नाश कर, क्या धर्म ध्वजा ना फहराओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

आज धरा फिर अकुलाती है, पाप का बोझ सह ना पाती है,
दंभ, लोभ तो सह भी जाती, पर अधर्म ना सह पाती है,
हे मर्यादा पुरूषोत्तम क्या तुम, धर्म हेतु भी ना आओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

देखो मंथरा की कुटिल चाल से, कैकेयी का प्रेम फिर हारा है,
मां के प्रेम बिना बच्चों को, किसका यहां सहारा है,
बचपन खोने के द्वार खड़ी है, क्या इसे नही बचाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

फिर मित्रता की पड़ी परीक्षा, कौन करेगा पूरी इच्छा,
सच्चा मित्र, हितैषी कैसा हो, कौन देगा फिर इसकी शिक्षा,
क्या केंवट और सुग्रीव की, नैय्या पार ना लगवाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

भाई बन बैठा शत्रु भाई का, खुद का ही वंश मिटाता है,
अपनों से ही छल करता वो, भ्रातृ प्रेम समझ न पाता है,
भरत, लखन की त्याग कथा को, क्या फिर से नही सुनाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

मात-पिता की हालत ना पूछो, वृद्धाश्रम में शोभा पाते हैं,
पुत्रों के सक्षम होते ही, मात-पिता बोझ हो जाते हैं,
हे मात-पिता के प्रिय पुत्र तुम, क्या पुत्र धर्म ना बतलाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

मानव पतन की गर्त में जा रहा, एक दूजे को न कोई भा रहा,
प्रेम, समर्पण और त्याग की, जैसे कोई लंका जला रहा,
क्या मानव उत्थान के लिए, अब भी तुम ना आओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

- डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

👉 भक्तिगाथा (भाग ७)

पराम्बा के प्रति परमप्रेमरूपा है भक्ति

देवर्षि के शब्दों ने न केवल उनकी बल्कि सभी सप्तऋषियों की स्मृतियों को कुरेद दिया। आखिर वे भी तो पार्वती के प्रेममय स्वरूप के साक्षी थे। महर्षि अंगिरा ने उन पुरानी स्मृतियों के सूत्रों को सुलझाते हुए कहा- ‘‘यह सच है देवर्षि! हम सबमें सबसे पहले आप ने ही उन्हें माँ के रूप में पहचाना था और उनको शिवप्रेम के महातप में तपने की सलाह दी थी और फिर चली थी उनकी कठिन कठोर और दारुण तपश्चर्या। गंगाद्वार (हरिद्वार) का विल्व वन, विल्वकेश्वर मंदिर आज भी उन जगदम्बा के उस महातप का साक्षी है।’’
    
महर्षि अंगिरा के कथन से सहमति व्यक्त करते हुए देवर्षि ने कहा- ‘‘महर्षिगणों! यह सच सभी को, आज के प्रत्येक मानव को समझना होगा कि तप की आग के बिना प्रेम शुद्ध नहीं होता है। जहाँ तप नहीं है वहाँ प्रेम पनप नहीं सकता। वहाँ तो प्रेम के नाम पर वासनाएँ ही नर्तन करती हैं। जिसे प्रेम का अनुभव करना है, प्रेम का स्वाद चखना है उसे तप करना चाहिए। प्रेममयी माँ ने यही किया।’’ ‘‘हाँ, देवर्षि!’’ महामुनि वेदशिरा कहने लगे, ‘‘मैं भी साक्षी था माँ के उस तप का।’’
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गँवाए॥
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किये कठिन कछु दिन उपबासा॥
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भवउ अपरना॥
    
देवर्षि नारद आगे बोले- ‘‘तप में माँ ऐसी रमीं कि देह की सुध-बुध भूल गयीं। दैहिक कामनाएँ विसर्जित होती गयीं और अन्तर की भक्ति प्रगाढ़ होती गयी। उस समय साक्षात् सघन सौदामिनी की भाँति प्रचण्ड तेजस्विता थी माँ की।’’ नारद के इन स्वरों में साम्य बिठाते हुए महामुनि वेदशिरा बोले- ‘‘देवर्षि! उन्हीं दिनों देवाधिदेव भगवान महादेव ने काम-दहन किया था। उसे देवराज ने उन परमेश्वर की समाधि में व्याघात डालने के लिए भेजा था। बेचारा काम सर्वथा निष्काम परमेश्वर को सकाम करने चला था। शिव के तृतीय नेत्र की ज्वाला में जलकर राख हो गया। उसके बाद सप्तऋषिगण माँ की परीक्षा लेने के लिए गये थे।’’
    
इस प्रसंग के स्मरण से सप्तर्षियों के मन में भावों के कई उतार-चढ़ाव आये। उनमें से एक ने इस प्राचीन कथा के सूत्र को पकड़ते हुए कहा- ‘‘हम सबने माँ पार्वती को जाकर काम-दहन का संवाद सुनाते हुए कहा था कि जब काम ही नहीं बचा तो विवाह का क्या प्रयोजन और तब उन प्रेममयी ने लगभग फटकारते हुए कहा था-
तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा॥
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म बन बानी॥
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा॥
    
हे ऋषियों! तुम्हारे ज्ञान के अनुसार भगवान शिव ने अब काम को जलाया है। अभी तक तो सकाम ही थे। पर मेरे ज्ञान के अनुसार भगवान शिव सदा से ही योगी हैं। यदि मैंने ऐसे शिव की मन, कर्म, वाणी से भक्ति की  है तो हे मुनिश्वरों! करुणामय भगवान हमारा प्रण अवश्य पूर्ण करेंगे।

महर्षि वेदशिरा सप्त ऋषियों के कथन को आगे बढ़ाते हुए बोले- ‘‘यही हुआ। माँ का प्रण पूरा हुआ। क्योंकि उनकी भक्ति प्रेममयी थी। जिसे उन्होंने तप के साँचे में ढाला था। जिसमें किसी भी कामना की कालिख नहीं थी। जो सभी साँसारिक भावों के भद्देपन से अछूती थी। इस भक्ति के प्रभाव से माँ का अंतस् भगवान शिव से एकाकार हुआ था।’’

ऋषि के इस प्रसंग का सब भावभरा स्मरण कर ही रहे थे कि हिमालय के उस दिव्य परिसर में एक अलौकिक आध्यात्मिक छटा छा गयी। सभी ने सिर उठा कर देखा, यह माँ जगदम्बा का प्राकट्य हुआ। अष्टभुजा भवानी, माँ सिंहवाहिनी की ज्योतिर्मयी छवि हिमालय के आकाश में प्रकाशित हो रही थी। सभी के मुख से स्वतः ही उच्चारित हो उठा-
या देवि सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै! नमस्तस्यै!! नमस्तस्यै नमो नमः!!!

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १८

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ७)


👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

दार्शनिक विवेचनाओं से देश, काल का उल्लेख होता रहता है। उसे कोई मुल्क या घण्टा मिनट वाला समय नहीं समझ लेना चाहिये। यह पारिभाषिक शब्द है। वस्तुओं की लम्बाई चौड़ाई मोटाई को ‘देश’ कहा जाता है और उनके परिवर्तन को ‘काल’। आमतौर से वस्तुएं देश की अर्थात् लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई के आधार पर ही देखी जाती है जब कि उनकी व्याख्या विवेचना करते हुये काल का चौथा ‘आयाम’ भी सम्मिलित किया जाना चाहिये। किन्तु गतियां और दिशाएं अनिश्चित भी हैं और भ्रामक भी। काल तो उन्हीं पर आश्रित है यदि आधार ही गड़बड़ा रहा है तो काल का परिमाण कैसे निश्चित हो। अस्तु वस्तुओं को तीन आयाम की अपेक्षा चार आयाम वाली भी कहा जाय तो भी बात बनेगी नहीं। वस्तुएं क्या हैं? उनका रूप, गुण, कर्म स्वभाव क्या है? यह कहते नहीं बनता क्योंकि उनके परमाणु जिस द्रुतगति से भ्रमण शील रहते हैं उस अस्थिरता को देखते हुये एक क्षण की गई व्याख्या दूसरे ही क्षण परिवर्तित हो जायगी।

कौन बड़ा कौन छोटा इसका निश्चय भी निःसंकोच नहीं किया जा सकता है। पांच फुट की लकड़ी छह फुट वाली की तुलना में छोटी है और चार फुट वाली की तुलना में बड़ी। एक फुट मोटाई वाले तने की तुलना में दो फुट वाला मोटा ‘अधिक’ है और दो फुट वाले की तुलना में एक फुट वाला पतला। वह वस्तुतः मोटा है या पतला ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता। तुलना बदलते ही यह छोटा और बड़ा होता—पतला और मोटा होता सहज ही बदल जायेगा।

कौन धनी है और कौन निर्धन, कौन सुखी है कौन दुःखी, कौन सन्त है, कौन ज्ञानी है कौन अज्ञानी, कौन सदाचारी है कौन दुराचारी, इसका निर्णय अनायास ही कर सकना असम्भव है। इस प्रकार का निर्धारण करने से पूर्व यह देखना होगा कि किस की तुलना में निर्णय किया जाय। नितान्त निर्धन की तुलना में वह धनी है जिसके पास पेट भरने के साधन हैं। किन्तु लक्षाधीश की तुलना में वह निर्धन ही है। जिसे दस कष्ट हैं उसकी तुलना में तीन कष्ट वाला सुखी है, पर एक कष्ट वाले की तुलना में वह भी दुःखी है। वस्तुतः कौन सुखी और कौन दुःखी हैं यह नहीं कहा जा सकता। डाकू की तुलना में चोर सहृदय है किन्तु उठाईगीरे की तुलना में वह भी अधिक दुष्ट है। एक सामान्य नागरिक की तुलना में उठाईगीरा भी दुष्ट है, जबकि वह सामान्य नागरिक भी सन्त की तुलना में पिछड़ा हुआ और गया-गुजरा है। सन्त भी किसी महा सन्त आत्मत्यागी शहीद की तुलना में हलका बैठेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ११
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६)

पराम्बा के प्रति परमप्रेमरूपा है भक्ति
    
‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्’- चौबीस अक्षरों वाले इस गायत्री महामंत्र के समवेत उच्चारण से हिमालय का कण-कण गूँज उठा। सप्त ऋषियों सहित सभी महर्षियों एवं देवशक्तियों ने सन्ध्या वन्दन के पश्चात भगवान भुवन भास्कर को अर्घ्य अर्पित किया। अद्भुत छटा हो रही थी हिमशिखरों में उदित हो रहे सूर्य की। पहले अरुण आभा उदित होकर फैली और फिर भगवान सविता देव हिमाद्रि तुंग शृंगों से प्रकट हुए। सभी ने हाथ जोड़कर उनकी अभ्यर्थना करते हुए सिर नवाया। भगवान अंशुमाली ने भी अपनी सहस्र किरणों से सभी पर अपनी कृपादृष्टि की। सूर्यदेव के इस अपूर्व अनुदान से सभी रोमांचित हो उठे। प्रत्येक के अन्तस् में आह्लाद की हिलोर उठी और भक्ति की पुलकन से सात्विक रोमांच हो आया।
    
सभी की दृष्टि, भक्ति के परमाचार्य देवर्षि की ओर उठी। परम भागवत देवर्षि नारद निर्निमेष भाव से हिमशिखरों को निहारे जा रहे थे। उनके हृदय की प्रगाढ़ भावनाएँ आँखों में अश्रुबूँदों के रूप में चमक रही थीं। इस भावविह्वलता ने उनकी वाणी को जड़ीभूत कर दिया था। ब्रह्मर्षि वामदेव ने उन्हें टोका- ‘‘किस चिंतन ने आज आपको विह्वल कर दिया है-देवर्षि?’’ वामदेव के इस प्रश्न से देवर्षि की अंतर्मुखी चेतना बाह्य जगत् की ओर मुड़ी। शनैः-शनैः वह प्रकृतिस्थ हुए। उनके होठों पर हल्का स्मित झलका एवं मुखमण्डल पर भक्ति की सात्विक आभा छलकने लगी। उन्होंने सभी महर्षियों की ओर मुड़ते हुए कहा- ‘‘आज राजा हिमवान् के आँगन में युगों पुरानी स्मृतियाँ ताजी हो आयीं। बस माँ की याद हो आयी।’’
    
‘‘हाँ, देवर्षि!’’- महर्षि वशिष्ठ एवं अंगिरा लगभग एक साथ बोले- ‘‘आपकी पिछले जन्मों की माता ने ही तो आपको भक्ति की जन्मघुट्टी पिलायी थी, उन्हीं की प्रकाश किरण का अनुदान पाकर आज आप स्व-प्रकाशित हो रहे हैं।’’ ‘‘सो तो है महर्षिगण! भला उनकी कोख के संस्कारों को कैसे भुलाया जा सकता है। पर आज मेरी स्मृति व चिंतन का केन्द्र वे ममतामयी नहीं, बल्कि अहैतुक कृपामयी पराम्बा भगवती हैं, जो जन-जन की, सृष्टि के कण-कण की, हम सबकी, तिर्यक योनि वाले निम्न प्राणियों से लेकर देवों एवं महर्षियों की माँ हैं। जिनके एक अंश को धारण कर जननी माँ बनती है, जिनके परम प्रेम को  अनुभव कर जीव कृतार्थ एवं कृत्कृत्य हो जाता है।’’

‘‘उन्हीं के परम प्रेम की अनुभूति करते हुए मैंने भक्तिदर्शन का दूसरा सूत्र कहा है-
‘सा त्वस्मिन् परम प्रेम रूपा’॥ २॥
उनके प्रति परम प्रेमरूपा है-भक्ति।

हृदय में आदिशक्ति माँ जगदम्बा का स्मरण करते हुए देवर्षि का कण्ठ रूँध आया था। उन्होंने बड़ी श्रद्धा से दोनों हाथ जोड़े और ‘‘माँ! माँ!! परम प्रेममयी माँ!!!’’ कहकर सब ओर माथा नवाते हुए प्रणाम किया और भावविह्वल स्वर में बोले- ‘‘धन्य है देवात्मा हिमालय, जिन्हें जगदम्बा ने अपने पिता होने का गौरव दिया। धन्य है इनके राज्य में रहने वाले लोग जो उनके भाई-बहिन बने।’’ भावों का तीव्र वेग बह रहा था और देवर्षि नारद कह रहे थे- ‘‘माता सती ने जब दक्ष यज्ञ में स्वयं की देह विसर्जित की थी, तब से सभी के मन में जिज्ञासा थी कि वे लीलामयी कब, कहाँ, किस रूप में अवतरित होंगी। और वे प्रेममयी आयीं, पर्वतकन्या पार्वती बनकर।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १७

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

चन्द्रमा हमसे ऊंचा है पर यदि चन्द्रतल पर जा खड़े हों तो प्रतीत होगा कि पृथ्वी ऊपर आकाश में उदय होती है। सौर मण्डल से बाहर निकल कर कहीं आकाश में हम जा खड़े हों तो प्रतीत होगा कि पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण ऊपर नीचे जैसे कोई दिशा नहीं है। दिशाज्ञान सर्वथा अपेक्षाकृत है। दिल्ली, लखनऊ से पश्चिम में बम्बई से पूर्व में, मद्रास से उत्तर में और हरिद्वार से दक्षिण में है। दिल्ली किस दिशा में है यह कहना किसी की तुलना अपेक्षा से ही सम्भव हो सकता है वस्तुतः वह दिशा विहीन है।

समय की इकाई लोक व्यवहार में एक तथ्य है। घण्टा मिनट के सहारे ही दफ्तरों का खुलना बन्द होना रेलगाड़ियों का चलना रुकना—सम्भव होता है। अपनी सारी दिनचर्या समय के आधार पर ही बनती है। पर समय की मान्यता भी असंदिग्ध नहीं है। सूर्योदय या सूर्यास्त का समय वही नहीं होता जो हम देखते या जानते हैं। जब हमें सूर्य उदय होते दीखता है उससे प्रायः 8।। मिनट पहले ही उग चुका होता है। उसकी किरणें पृथ्वी तक आने में इतना समय लग जाता है। अस्त होता जब दीखता है, उससे 8।। मिनट पूर्व ही वह डूब चुका होता है। आकाश में कितने ही तारे ऐसे हैं जो हजारों वर्ष पूर्व अस्त हो चुके पर वे अभी तक हमें चमकते दीखते हैं। यह भ्रम इसलिये रहता है कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में हजारों वर्ष लग जाते हैं। जब वे वस्तुतः अस्त हुये हैं उसकी जानकारी अब कहीं इतनी लम्बी अवधि के पश्चात हमें मिल रही है। सौर मण्डल के अपने ग्रहों के बारे में भी यही बात है, वे पंचांगों में लिखे समय से बहुत पहले या बाद में उदय तथा अस्त होते हैं।

जो तारा हमें सीध में दीखता है आवश्यक नहीं कि वह उसी स्थिति में है। प्रकाश की गति सर्वथा सीधी नहीं है। प्रकाश भी एक पदार्थ है और उसकी भी तोल है। एक मिनट में एक वर्ग मील जमीन पर सूर्य का जितना प्रकाश गिरता है उसका वजन प्रायः एक ओंस होता है। पदार्थ पर आकर्षण शक्ति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। तारों का प्रकाश सौर मण्डल में प्रवेश करता है तो सूर्य तथा अन्य ग्रहों के आकर्षण के प्रभाव से लड़खड़ाता हुआ टेढ़ा तिरछा होकर पृथ्वी तक पहुंचता है। पर हमारी आंखें उसे सीधी धारा में आता हुआ ही अनुभव करती हैं। हो सकता है कि कोई तारा सूर्य या किसी अन्य ग्रह की ओट में छिपा बैठा हो पर उसका प्रकाश हमें आंखों की सीध में दीख रहा हो। इसी प्रकार ठीक सिर के ऊपर चमकने वाला तार वस्तुतः उस स्थान से बहुत नीचा या तिरछा भी हो सकता है। इस प्रकाश दिशा ही नहीं समय सम्बन्धी मान्यताएं भी निर्भ्रान्त नहीं हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ५)

वासनाओं के भावनाओं में रूपांतरण की कथा

महर्षि पुलह एवं क्रतु के इस कथन ने देवर्षि को किन्हीं स्मृतियों से भिगो दिया। उनकी आँखें छलक उठीं। वे विह्वल स्वर में बोले- ‘‘हे महर्षिजन! मुझे आप सबका आदेश शिरोधार्य है। मैं अब भक्ति की व्याख्या करूँगा-
    ‘अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः’॥ १॥

‘‘अब भक्ति की व्याख्या यही मेरे द्वारा रचित भक्ति दर्शन का पहला सूत्र है। मैंने इस क्रम में ८४ सूत्र रचे हैं। इन ८४ सूत्रों में ८४ लाख योनियों की भटकन से उबरने का उपाय है। भक्ति की इस अमृतधारा से अखण्ड ज्योति को प्रकाशित करने से मानव जीवन प्रकाशित होगा। आज परम पवित्र घड़ी है। हिमालय के इस आँगन में भक्ति के नवस्रोत का उद्गम हो, इसी में हमारे तप एवं ज्ञान की सार्थकता है।’’
    
देवर्षि के इस कथन से महर्षियों को अपना यह मिलन सार्थक लगने लगा। उन्हें अनुभव हुआ कि देवर्षि के ये वचन मनुष्य को उसकी भटकन से अवश्य बचायेंगे। सभी महर्षियों की इन मानसिक तरंगों को अनुभव करते हुए परम भागवत नारद ने कहा- ‘‘हे महर्षिजन! आज मैं अपनी अनुभवकथा कहता हूँ कि मैंने अपनी वासनाओं को भावनाओं में कैसे बदला। मेरी यह अनुभवगाथा ही भक्ति के इस प्रथम सूत्र की व्याख्या है।’’ देवर्षि नारद के इस कथन ने सब की उत्सुकता जाग्रत कर दी। कथाश्रवण की लालसा में सभी के मन निस्पन्द हो गये और साथ ही भक्ति की अमृत गंगा बहने लगी।
    
देवर्षि कह रहे थे, ‘‘हे ऋषिगण! पूर्वकल्प में मैं उपबर्हण नाम का गंधर्व था। मेरा शरीर जितना सुन्दर था, अंतस् उतना ही कुरूप। वासनाओं को ही भावना समझता था। प्रेम का अर्थ मेरे लिए कामुकता के सिवा और कुछ भी न था। अनेकों स्त्रियों से मेरे वासनात्मक सम्बन्ध थे। शृंगार एवं वासना भरी चेष्टाओं में मेरा जीवन बीत रहा था। इस क्रम में मेरी उन्मुत्तता यहाँ तक थी कि कथा-कीर्तन के अवसर पर भी मैं वासनाओं में मग्न रहता था। एक अवसर पर तो मैंने ब्रह्मा जी की उपस्थिति में भी भगवान के कीर्तन के समय जब अपनी वासना भरी चेष्टाएँ जारी रखी तो उन्होंने मुझे शाप दिया, जा तू शूद्र हो जा।
    
यह ब्रह्मकोप ही मेरे लिए कृपा बन गया। मैंने दासी माता की कोख से जन्म लिया। मेरी माँ दासी होते हुए भी सदाचारी, संयमी एवं भगवान की सच्ची भक्त थी। संतों एवं भक्तों की सेवा में उसका जीवन व्यतीत होता था। माँ के साथ साधुसंग के अवसर मुझे भी मिले। साधु सेवा एवं सत्संगति ने मुझे साधना सिखाई, और प्रारम्भ  हो गयी मेरे रूपान्तरण की प्रक्रिया। अपनी वासना भरी चाहतों पर मुझ ग्लानि होने लगी। साधु सेवा से जब भी मुझे विश्राम मिलता, मैं पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान करने लगता। पास के सरोवर के जल का पान और पीपल के नीचे ध्यान। यही मेरी दिनचर्या बन गयी।
    
इसी बीच मेरी माँ चल बसीं। शरीर छोड़ते हुए उन्होंने मुझसे कहा- ‘‘पुत्र! भक्ति को ही अपनी माँ समझना। माँ के इन प्रेमपूर्ण वचनों ने मुझे भक्ति से भिगो दिया। जैसे-जैसे निर्मल होता गया-प्रभु की झाँकी मिलने लगी। परन्तु पूर्ण निर्मलता के अभाव में उस समय मुझे भगवान का साक्षात्कार न हो सका। परन्तु अगले कल्प में ब्रह्माजी के मन से फिर मेरा प्राकट्य हुआ। भक्ति के प्रभाव से रूपान्तरित हो गया मेरा जीवन। लीलामय प्रभु ने मुझे अपना पार्षद बना लिया। भक्ति ने मुझे भगवान का सान्निध्य एवं प्रेम का वरदान दिया। इस प्रेममय भक्ति की व्याख्या अगले सूत्र में कहेंगे।’’ ऐसा बोलकर नारद जी मौन हो गये। आकाश में अब अरुणोदय होने लगा था। महर्षियों के समुदाय ने भी इस अमृतवेला में नित्य कर्मों के साथ संध्या वन्दन का निश्चय किया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५)

👉 प्रत्यक्ष लगने पर भी सत्य कहां

स्थान की भांति गति की मात्रा भी भ्रामक है। दो रेलगाड़ियां समान पटरियों पर साथ-साथ दौड़ रही हों तो वे साथ-साथ हिलती-जुलती भर दिखाई पड़ेंगी दो मोटरें आमने सामने से आ रही हों और दोनों चालीस चालीस मील प्रति घण्टे की चाल से चल रही हों तो जब वे बराबर से गुजरेगी तो 80 मील की चाल का आभास होगा। जब कभी आमने सामने से आती हुई रेल गाड़ियां बराबर से गुजरती हैं तो दूना वेग मालूम पड़ता है, यद्यपि ये दोनों ही अपनी अपनी साधारण चाल से चल रही होती हैं। अपनी पृथ्वी जिस दिशा में जिस चाल से चल रही है वही गति और दिशा अन्य ग्रह नक्षत्रों की रही होती तो आकाश पूर्णतया स्थिर दीखता। सूर्य तारे कभी न उगते न चलते न डूबते। जो जहां हैं वहीं सदा बना रहता। तब पूर्ण स्थिरता की अनुभूति होते हुये भी सब की गतिशीलता यथावत् बनी रहती।

गति सापेक्ष है। अन्तर कितनी ही तरह निकाला जा सकता है। सौ में से नब्बे निकालने पर दस बचते हैं। तीस में से बीस निकालने पर भी—पचास में से चालीस निकालने पर भी दस ही बचेंगे। अन्तर एक ही निकले इसके लिये अनेकों अंकों का अनेक प्रकार से उपयोग हो सकता है। इतनी भिन्नता रहने पर भी परिणाम में अन्तर न पड़ेगा। एक हजार का जोड़ निकालना हो तो कितने ही अंकों का कितनी ही प्रकार से वही जोड़ बन सकता है। गति मापने के बारे में भी यही बात है। भूतकाल के खगोल वेत्ता सूर्य को स्थिर मान कर यह गणित करते हैं। चन्द्र-ग्रहण, सूर्य ग्रहण सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रहों का उदय-अस्त दिन मान, रात्रि मान आदि इसी आधार पर निकाला जाता रहा है। फिर भी वह बिलकुल सही बैठता रहा है। यद्यपि सूर्य को स्थिर मानकर चलने की मान्यता सर्वथा मिथ्या है। मिथ्या आधार भी जब सत्य परिणाम प्रस्तुतः करते हैं तो फिर सत्य असत्य का भेद किस प्रकार किया जाय, यह सोचने पर बुद्धि थककर बैठ जाती है।

दिशा का निर्धारण भी लोक व्यवहार में आवश्यक है। इसके बिना भूगोल नक्शा, यातायात की कोई व्यवस्था ही न बनेगी। रेखा गणित में आड़ी, सीधी, तिरछी रेखाओं को ही आधार माना गया है। दिशा ज्ञान के बिना वायुयान और जलयानों के लिये निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुंच सकना ही सम्भव न होगा। पूर्व, पश्चिम आदि आठ और दो ऊपर नीचे की दशों दिशाएं लोक व्यवहार की दृष्टि से महत्वपूर्ण आधार हैं, पर ‘नितान्त सत्य’ का आश्रय लेने पर यह दिशा मान्यता भी लड़खड़ा कर भूमिसात् हो जाती है।

एक लम्बी नाली लगातार खोदते चले जायें तो प्रतीत होगा कि वह सीधी समतल जा रही है, पर वस्तुतः यह गोलाई में ही खुद रही है और वह क्रम चलता रहने पर खुदाई उसी स्थान पर आ पहुंचेगी जहां से वह आरम्भ हुई थी। रबड़ की गेंद पर बिलकुल सीधी रेखा खींचने पर भी वस्तुतः वह गोलाई में ही खिंच रही है, सीधी रेखा खींचने का मतलब उसके दोनों सिरों का अन्तर सदा बना रहना ही होना चाहिये, पर जब वे अन्ततः एक में आ मिलें तो फिर सीधी लकीर कहां हुई? कागज पर जमीन पर, या कहीं भी छोटी बड़ी सीधी लकीर खींची जाय वह कभी भी सीधी नहीं हो सकती। स्वल्प गोलाई अपने नाप साधनों से भले ही पकड़ में न आये, पर वस्तुतः वह गोल ही बन रही होगी। जिस भूमि को हम समतल समझते हैं वस्तुतः वह भी गोल है। समुद्र समतल दीखता है, पर उस पर चलने वाले जहाजों का मस्तूल ही पहले दीखता है इससे प्रतीत होता है कि पानी समतल प्रतीत होते हुये भी पृथ्वी के अनुपात में गोलाई लिये हुये है। जमीन पर खड़े होकर जमीन और आसमान मिलने वाला क्षितिज प्रायः 3 मील पर दिखाई पड़ता है पर यदि दो सौ फुट ऊंचाई पर चढ़ कर देखें तो वह बीस मील दूरी पर मिलता दिखाई देगा। यह बातें पृथ्वी की गोलाई सिद्ध करती हैं। फिर भी मोटी बुद्धि से उसे गोल देख पाने का कोई प्रत्यक्ष साधन अपने पास नहीं हैं। वह समतल या ऊंची नीची दीखती है गोल नहीं। ऐसी दशा में हमारा दिशाज्ञान भी अविश्वस्त ही ठहरता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ८

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रह...