सोमवार, 25 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०३)

ध्यान की अनुभूतियों द्वारा ऊर्जा स्नान

अंतर्यात्रा के पथ पर चलने वाले योग साधक में सतत सूक्ष्म परिवर्तन घटित होते हैं। उसका अस्तित्व सूक्ष्म ऊर्जाओं के आरोह-अवरोह एवं अंतर-प्रत्यन्तर की प्रयोगशाला बन जाता है। योग साधक के लिए यह बड़ी विरल एवं रहस्यमय स्थिति है। ध्यान की प्रगाढ़ता में होने वाले इन सूक्ष्म ऊर्जाओं के परिवर्तन से जीवन की आंतरिक एवं बाह्य स्थिति परिवर्तित होती है। इन ऊर्जाओं में परिवर्तन साधक के अंदर एवं बाहर भारी उलट-पुलट करते हैं। साकार सहज ही निराकार की ओर बढ़ चलता है।
    
इस तत्त्व का प्रबोध करते हुए महर्षि कहते हैं-
सूक्ष्मविषयत्वं चालिंगपर्यवसानम्॥ १/४५॥
शब्दार्थ-च = तथा; सूक्ष्मविषयत्वम् = सूक्ष्म विषयता; अलिंगपर्यवसानम् = प्रकृति पर्यन्त है।
भावार्थ- इन सूक्ष्म विषयों से सम्बन्धित समाधि का प्रान्त सूक्ष्म ऊर्जाओं की निराकार अवस्था तक फैलता है।
    
महर्षि के इस सूत्र में ध्यान की प्रक्रिया की गहनता का संकेत है। कर्मकाण्ड की पूजा-प्रक्रिया में पदार्थ का ऊर्जा में परिवर्तन होता है। पदार्थों का इस विधि से समायोजन, संकलन एवं विघटन किया कि उनसे आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति हो सके। इस पूजा-प्रक्रिया से पाठ एवं मंत्र के प्रयोग कहीं अधिक सूक्ष्म है। इनमें शब्दशक्ति का अनन्त आकाश में स्फोट होता है। इससे भी कहीं सूक्ष्म है ध्यान। इसमें विचार एवं भाव ऊर्जाओं में सघन परिवर्तन घटित होते हैं। ये परिवर्तन आत्यन्तिक आश्चर्य में होते हैं। इस सम्बन्ध में आध्यात्मिक तथ्य यह है कि साधक की एकाग्रता, आंतरिक दृढ़ता जितनी सघन है, उसमें आध्यात्मिक ऊर्जा का घनत्व जितना अधिक है, उसी के अनुपात में वह इन परिवर्तनों को सहन कर सकता है।
    
योग की इस साधनाभूमि में साधक को बहुत ही सक्रिय, सजग एवं समर्थ होना पड़ता है, क्योंकि ध्यान योग के प्रयोग में सूक्ष्म ऊर्जाएँ कुछ इस ढंग से परिवर्तित-प्रत्यावर्तित होती हैं कि इनसे साधक की समूची प्रकृति प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। इन ऊर्जाओं से संस्कार बीज भी प्रेरित-प्रभावित होते हैं। ऐसे में योग साधक के पास इसके परिणामों को सम्हालने के लिए बड़े प्रभावकारी आध्यात्मिक बल की आवश्यकता है। इसके बिना कहीं भी-कुछ भी अघटित घट सकता है।
    
ये सूक्ष्म ऊर्जाएँ जब साधक के अस्तित्व को प्रभावित करती हैं, तो बड़ी जबरदस्त उथल-पुथल होती है। संस्कार बीजों के असमय कुरेदे जाने से जीवन में कई ऐसी घटनाएँ घटने लगती हैं, जो सहज क्रम में अभी असामयिक है। ये घटनाएँ शुभ भी हो सकती हैं और अशुभ भी। कई तरह की दुर्घटनाएँ व जीवन में विचित्र एवं संताप देने वाले अवसर आ सकते हैं। यह योग अवस्था भू-गर्भ में किये जाने वाले पारमाणविक बिस्फोट के समान हैं, जिसके सारे प्रभाव भू-गर्भ तक ही सीमित रखे जाने चाहिए। इसके थोड़े से भी अंश का बाहर आना साधक के अस्तित्व के लिए, उसके शरीर के लिए खतरा हो सकता है। इसके लिए साधक के पास उस बल का होना आवश्यक है, जो इसके प्रभावों का नियमन कर सके। हालाँकि ये घटनाएँ, ये परिवर्तन जिस अवस्था तक होती है, वह समाधि की सबीज अवस्था ही है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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