सोमवार, 24 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 25 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 July 2017


👉 मदद और दया सबसे बड़ा धर्म

🔵 कहा जाता है दूसरों की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है। मदद एक ऐसी चीज़ है जिसकी जरुरत हर इंसान को पड़ती है, चाहे आप बूढ़े हों, बच्चे हों या जवान; सभी के जीवन में एक समय ऐसा जरूर आता है जब हमें दूसरों की मदद की जरुरत पड़ती है।

🔴 आज हर इंसान ये बोलता है कि कोई किसी की मदद नहीं करता, पर आप खुद से पूछिये- क्या आपने कभी किसी की मदद की है? अगर नहीं तो आप दूसरों से मदद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

🔵 किशोर नाम का एक लड़का था जो बहुत गरीब था। दिन भर कड़ी मेहनत के बाद जंगल से लकड़ियाँ काट के लाता और उन्हें जंगल में बेचा करता। एक दिन किशोर सर पे लकड़ियों का गट्ठर लिए जंगल से गुजर रहा था।

🔴 अचानक उसने रास्ते में एक बूढ़े इंसान को देखा जो बहुत दुर्बल था उसको देखकर लगा कि जैसे उसने काफी दिनों खाना नहीं खाया है। किशोर का दिल पिघल गया, लेकिन वो क्या करता उसके पास खुद खाने को नहीं था वो उस बूढ़े व्यक्ति का पेट कैसे भरता? यही सोचकर दुःखी मन से किशोर आगे बढ़ गया।

🔵 आगे कुछ दूर चलने के बाद किशोर को एक औरत दिखाई दी जिसका बच्चा प्यास से रो रहा था क्यूंकि जंगल में कहीं पानी नहीं था। बच्चे की हालत देखकर किशोर से रहा नहीं गया लेकिन क्या करता बेचारा उसके खुद के पास जंगल में पानी नहीं था। दुःखी मन से वो फिर आगे चल दिया। कुछ दूर जाकर किशोर को एक व्यक्ति दिखाई दिया जो तम्बू लगाने के लिए लकड़ियों की तलाश में था।

🔴 किशोर ने उसे लकड़ियाँ बेच दीं और बदले में उसने किशोर को कुछ खाना और पानी दिया। किशोर के मन में कुछ ख्याल आया और वो खाना, पानी लेकर वापस जंगल की ओर दौड़ा। और जाकर बूढ़े व्यक्ति को खाना खिलाया और उस औरत के बच्चे को भी पानी पीने को दिया। ऐसा करके किशोर बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।

🔵 इसके कुछ दिन बाद किशोर एक दिन एक पहाड़ी पर चढ़कर लकड़ियाँ काट रहा था अचानक उसका पैर फिसला और वो नीचे आ गिरा। उसके पैर में बुरी तरह चोट लग गयी और वो दर्द से चिल्लाने लगा। तभी वही बूढ़ा व्यक्ति भागा हुआ आया और उसने किशोर को उठाया। जब उस औरत को पता चला तो वो भी आई और उसने अपनी साड़ी का चीर फाड़ कर उसके पैर पे पट्टी कर दी। किशोर अब बहुत अच्छा महसूस कर रहा था।

🔴 मित्रों दूसरों की मदद करके भी हम असल में खुद की ही मदद कर रहे होते हैं। जब हम दूसरों की मदद करेंगे तभी जरुरत पढ़ने पर कोई दूसरा हमारी भी मदद करेगा। तो आज इस कहानी को पढ़ते हुए एक वादा करिये की रोज किसी की मदद जरूर करेंगे, रोज नहीं तो कम से कम सप्ताह एक बार , नहीं तो महीने में एक बार।

🔵 जरुरी नहीं कि मदद पैसे से ही की जाये, आप किसी वृद्ध व्यक्ति को सड़क पार करा सकते हैं या किसी प्यासे को पानी पिला सकते हैं या किसी हताश इंसान को सलाह दे सकते हैं या किसी को खाना खिला सकते हैं। यकीन मानिये ऐसा करते हुए आपको बहुत ख़ुशी मिलेगी और लोग भी आपकी मदद जरूर करेंगे।

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 35)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।  

🔴 जब हम किसी से मिलें या हमसे कोई मिले, तो प्रसन्नता व्यक्त की जानी चाहिए। मुस्कराते हुए अभिवादन करना चाहिए और बिठाने-बैठने कुशल समाचार पूछने और साधारण शिष्टाचार बरतने के बाद आने का कारण पूछना, बताना चाहिए । यदि सहयोग किया जा सकता हो तो वैसा करना चाहिए अन्यथा अपने परिस्थितियाँ स्पष्ट करते हुए सहयोग न कर सकने का दुःख व्यक्त करना चाहिए। इसी प्रकार यदि दूसरा कोई सहयोग नहीं कर सका है तो भी उसका समय लेने और सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में ही देना चाहिए। रूखा, कर्कश, उपेक्षापूर्ण अथवा झल्लाहट, तिरस्कार भरा उत्तर देना ढीठ और गँवार को भी शोभा देता है। हमें अपने को इस पंक्ति में खड़ा नहीं करना चाहिए।

🔵 बड़े जो व्यवहार करेंगे, बच्चे वैसा ही अनुकरण सीखेंगे। यदि हमें अपने बच्चों को अशिष्ट, उद्दंड बनाना हो तो ही हमें असभ्य व्यवहार की आदत बनाए रहनी चाहिए अन्यथा औचित्य इसी में है कि आवेश, उत्तेजना, उबल पड़ना, क्रोध में तमतमा जाना, अशिष्ट वचन बोलना और असत्य व्यवहार करने का दोष अपने अंदर यदि स्वल्प मात्रा में हो तो भी उसे हटाने के लिए सख्ती के साथ अपने स्वभाव के साथ संघर्ष करें और तभी चैन लें, जब अपने में सज्जनता की प्रवृत्ति का समुचित समावेश हो जाए।
 
🔴 हम अपनी और दूसरों की दृष्टि में सज्जनता और शालीनता से परिपूर्ण एक श्रेष्ठ मनुष्य की तरह अपना आचरण और व्यक्तित्व बना सकें तो समझना चाहिए कि मनुष्यता की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। उसके आगे के कदम नैतिकता, सेवा, उदारता, संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ के हैं। इसमें भी पहली एक अति आवश्यक शर्त यह है कि हम सज्जनता की सामान्य परिभाषा समझें और अपनाएँ, जिसके अंतर्गत मधुर भाषण और विनम्र, शिष्ट एवं मृदु व्यवहार अनिवार्य हो जाता है। अस्वच्छता मनुष्य की आंतरिक और गई-गुजरी स्थिति का परिचय देती है।

🔵 गंदा आदमी यह प्रकट करता है कि उसे अवांछनीयता हटाने और उत्कृष्टता बनाए रखने में कोई रुचि नहीं है। लापरवाह, आलसी और प्रमादी ही गंदे देखे गए हैं जो अवांछनीयता से समझौता करके उसे गले से लगाए रह सकता है, वही गंदा भी रह सकता है। गंदगी देखने में सबको बुरी लगती है और उस व्यक्ति के प्रति सहज ही घृणा भाव उत्पन्न करती है। गंदे को कौन अपने समीप बिठाना चाहेगा? दुर्गंध से किसे अपनी नाक, मलीनता से किसे अपनी आँखें और हेय प्रवृत्ति को देखकर कौन मनोदशा क्षुब्ध करना चाहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 7)

🔵 देवताओं की शिक्षाओं और प्रेरणाओं को मूर्तिमान करने के लिए ही अपने हिन्दू समाज में प्रतीक-पूजा की व्यवस्था की गई है। जितने भी देवताओं के प्रतीक हैं, उन सबके पीछे कोई न कोई संकेत भरा पड़ा है, प्रेरणाएँ और दिशाएँ भरी पड़ी हैं। अभी भगवान शंकर का उदाहरण दे रहा था मैं आपको और यह कह रहा था कि सारे विश्व का कल्याण करने वाले शंकर जी की पूजा और भक्ति के पीछे जिन सिद्धान्तों का समावेश है हमको उन्हें सीखना चाहिए था, जानना चाहिए था और अपने जीवन में उतारना चाहिए था। लेकिन हम उन सब बातों को भूलते चले गए और केवल चिन्ह-पूजा तक सीमाबद्ध रह गए।

🔴 विश्व-कल्याण की भावना को हम भूल गए। जिसे ‘शिव’ शब्द के अर्थों में बताया गया है। ‘शिव’ माने कल्याण। कल्याण की दृष्टि रखकर के हमको कदम उठाने चाहिए और हर क्रिया-कलाप एवं सोचने के तरीके का निर्माण करना चाहिए। यह शिव शब्द का अर्थ होता है। कल्याण हमारा कहाँ है? सुख हमारा कहाँ है? लाभ नहीं, वरन् कल्याण हमारा कहाँ है? कल्याण को देखने की अगर हमारी दृष्टि पैदा हो जाए तो यह कह सकते हैं कि हमने भगवान् शिव के नाम का अर्थ जान लिया। ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप तो किया, लेकिन ‘शिव’ शब्द का मतलब क्यों नहीं समझा। मतलब समझना चाहिए था और तब जप करना चाहिए था, लेकिन हम मतलब को छोड़ते चले जा रहे हैं और ब्रह्म रूप को पकड़ते चले जा रहे हैं। इससे काम बनने वाला नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 July

🔴 मानव जाति अनेक प्रकार के अत्याचार, दम्भ, छल, द्वेष, घृणा, वैर आदि से परिपूर्ण है। इसका कारण मन, वाणी और शरीर की एकता न होना है। चूँकि एकता न होने के कारण मनुष्य मन से कुछ सोचता है वाणी से कुछ कहता है और शरीर से कुछ करता है। यह कैसी विचित्र विडम्बना है। यह मनुष्य के पतन की पराकाष्ठा है। इसका उपाय केवल सत्य है। सत्य का अनुकरण करने से ही इनसे छुटकारा मिल सकता है। सत्य को अपनाने के पश्चात् हम जो कुछ मन में सोचेंगे उसे ही वाणी से कहेंगे तथा शरीर से करेंगे। इस प्रकार तीनों में एकता उत्पन्न हो जायगी। मन वाणी तथा शरीर की एकता के साथ मानव कर्त्तव्य ही सत्य है।

🔵 वर्तमान भूत पर आधारित है और भविष्यत् वर्तमान पर। हमने पहले जो कुछ अच्छा बुरा किया उसका परिणाम वर्तमान में अनुभव कर रहे हैं और वर्तमान में जो कुछ कर रहे हैं उसका परिणाम भविष्य में प्राप्त होगा। अच्छे या बुरे किये गये कर्मों का फल तो अवश्य मिलेगा ही, क्रिया निष्फल तो जाती नहीं। यदि भावी परिणाम नहीं सोचें तो वर्तमान तो एक क्षण मात्र ही है। परवर्ती क्षण ही तो भविष्यत् है जो क्षणान्तर में वर्तमान होने वाला है और वर्तमान का क्षण भूत हो जाने वाला है अतः उन दोनों से उदासीन रहा नहीं जा सकता। जैसा भी हम बनना चाहते हैं उसके योग्य प्रवृत्ति इस समय करनी होगी

🔴 अपने हृदय में यह बात अच्छी तरह स्थिर कीजिए कि आप योग्य हैं, प्रतिभाशाली हैं, शक्ति वान हैं। अपने उद्देश्य की ओर वीरता और धैर्य पूर्वक पाँव उठा रहे हैं। परमेश्वर ने कूट कूट कर आपमें अद्भुत योग्यताएँ भरी हैं। आत्म संकेत दिया करें। शान्त चित्त से मन में पुनः पुनः इस प्रकार के विचारों को प्रचुरता से स्थान दें कि “मैं बलवान हूँ। दृढ़ संकल्प हूँ। सब कुछ करने में समर्थ हूँ। मैं जिन पदार्थों की आशा−अभिलाषा करता हूँ, वह अवश्य प्राप्त करूंगा। मैं दृढ़ता से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहा हूँ। मुझ में मानसिक धैर्य है। मेरा मानसिक संस्थान आत्म−विश्वास से परिपूर्ण है। मैं धैर्य पूर्वक अपने उद्देश्य की ओर पाँव उठा रहा हूँ। मैं विघ्न बाबाओं से विचलित नहीं होता हूँ।”
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: २४

🌹  आत्मविश्वास जागृत करो

🔵 जब निराशा और असफलता को अपने चारों ओर मंडराते देखो तो समझो कि तुम्हारा चित्त स्थिर नहीं, तुम अपने ऊपर विश्वास नहीं करते।

🔴 वर्तमान दशा से छुटकारा नहीं हो सकता जब तक कि अपने पुराने सड़े गले विचारों को बदल नडालेा। जब तक यह विश्वास न हो जाए कि तुम अपने अनुकूल चाहे जैसी अवस्था निर्माण कर सकते हो तब तक तुम्हारे पैर उन्नति की ओर बढ़ नहीं सकते। अगर आगे भी न संभलोगे तो हो सकता है कि दिव्य तेज किसी दिन बिलकुल ही क्षीण हो जाए। यदि तुम अपनी वर्तमान अप्रिय अवस्था से छुटकारा पाना चाहते हो तो अपनी मानसिक निर्बलता को दूर भगाओ। अपने अंदर आत्मविश्वास जागृत करो।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 24

🌹  Awaken Your Self-Confidence

🔵 When you find yourself in adverse situations and you feel that nothing is under your control, take it as a sign that you lack self-confidence.

🔴 Until you change your mindset, you cannot be rid of these adverse situations. You cannot create favorable conditions until you believe that you are fully capable of doing so. If you do not change your thinking now, the divinity in you will diminish. Tell yourself that the divinity within you is working in your favor, and replace your mental weakness with this ' awakened self-confidence.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 July 2017

👉 आज का सद्चिंतन 24 July 2017

👉 बाड़े की कील

 🔵 बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था. वह बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आप खो बैठता और लोगों को भला-बुरा कह देता. उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.”

🔴 पहले दिन उस लड़के को चालीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी. पर धीरे-धीरे कीलों  की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक  काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया कि उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी अपना temper नहीं loose किया.

🔵 जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्होंने ने फिर उसे एक काम दे दिया, उन्होंने कहा कि, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना.”

🔴 लड़के ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब लड़के ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने पिता को ख़ुशी से ये बात बतायी.

🔵 तब पिताजी उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटे तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो. अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था.जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं.

🔵 इसलिए अगली बार अपना temper loose करने से पहले सोचिये कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं!!

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ५)

कुरीतियों की दृष्टि से यों अपना समाज भी अछूता नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक...