गुरुवार, 26 जुलाई 2018

👉 बालू के कण

🔷 सीपी के पेट में बालू का एक कण घुस जाता है। उस कण के ऊपर सीपी के शरीर का रस लिपटता जाता है और वह बढ़ते-बढ़ते एक चमकते हुये कीमती मोती के रूप में प्रस्तुत हो जाता है। यो बालू के एक कण की कुछ कीमत नहीं, पर सीपी जब उसे अपने उदर में धारण कर अपने जीवन रस से सींचने लगती हैं तो वह तुच्छ रज कण एक मूल्यवान पदार्थ बनता है। उच्च नैतिक आदर्श भी ऐसे ही बालू के कण हैं जो यदि मनुष्य के हृदय में गहराई तक प्रवेश कर जाये तो एक तुच्छ व्यक्ति को महापुरुष, ऋषि और देवता के रुपये प्रस्तुत कर सकते है।

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 12)

👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत

🔶 जनसाधारण के बीच प्रतिभाशाली अलग से चमकते हैं, जैसे पत्तों व काँटों के बीच फूल, तारों के बीच चंद्रमा। यह जन्मजात उपलब्धि नहीं है और न किसी का दिया हुआ वरदान। इसे भाग्यवश मिला हुआ आकस्मिक संयोग-सुयोग भी नहीं कहा जा सकता। वह स्व-उपार्जित संपदा है। इस कार्य में दूसरे कुछ सहायक तो हो सकते हैं, पर प्रधानता तो अपने प्रबल प्रयास की ही रहती है।
  
🔷 धन आता है और चला जाता है। रूप यौवन भी सामयिक है। उसका संबंध चढ़ते खून से है। किशोर और तरुण ही सुंदर दिखते हैं। इसके बाद ढलान आरंभ होते ही अवयवों में कठोरता और चेहरे पर रुक्षता की हवाइयाँ उड़ने लगती हैं। विद्या उतनी ही स्मरण रहती है, जितनी कि व्यवहार में काम आती है। मित्र, सहयोगी, संबंधी, सहायकों के मन बदलते रहते हैं। आवश्यक नहीं कि उनकी घनिष्टता सदा एक-सी बनी रहे। अधिकार भी चिरस्थायी नहीं है। समर्थन घटते ही वे दूसरों के हाथों चले जाते हैं। वयोवृद्धों के उत्पादन की, परिश्रम की क्षमता घट जाती है। आयुवृद्धि के साथ-साथ स्मरण शक्ति और स्फूर्ति भी जवाब देने लगती है। ऐसी दशा में तब कोई योजना बनाना और उसे चलाना भी, बस से बाहर हो जाता है। यह सब मरण के ही लक्षण हैं। जीवनी शक्ति का भंडार धीरे-धीरे चुकता है और फिर वह अंतत: जवाब दे जाता है।
  
🔶 विकासोन्मुख शरीर, चढ़ते खून और परिपक्व व्यक्तित्व वाले दिनों में ही रहता है। उसे भले ही कोई आलस्य-प्रमाद में गुजारे, भले ही कोई लिप्सा-लालसा की वेदी पर विसर्जित कर दे। कोई-कोई तो उन दिनों भी अतिवादी उद्दंडता दिखाने से नहीं चूकते। यह सब शक्तियों और संभावनाओं के भंडार मनुष्य जीवन के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। दूरदर्शी वे हैं, जो विभूतियों में सर्वश्रेष्ठ ‘प्रतिभा’ को मानते हैं और उसके संपादन हेतु प्राणपण से प्रयत्न करते हैं, क्योंकि वही हर स्थिति में साथ रहती है, अपनी तथा दूसरों की गुत्थियाँ सुलझाती है और जन्म-जन्मान्तरों तक साथ रहकर, क्रमश: अधिकाधिक ऊँचे स्तर वाली परिस्थितियों का निर्माण करती रहती है। इस उपार्जन के लिए किए गए प्रयत्नों को ही, हर दृष्टि से सराहा और स्वर्ण संपदा की तरह किसी भी बाजार में भुनाया जा सकता है। भौतिक प्रगति में भी उसी के चमत्कार दिखते हैं और आदर्शवादी परमार्थ अपनाने वाली महानता को भी उसी के सहारे विकसित परिष्कृत होते हुए देखा जा सकता है। 
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 16

👉 Enrich Your Heart

🔶 Great personalities do not accumulate wealth, neither do they desire for it; because, they have a generous heart full of a treasure that is bigger than that of Kuber (the God of wealth). It is said that there is no place for the one who is poor (miser) at heart; if there is no compassion in one’s heart, he will have no abode (of peace) – neither in this world, nor in the sublime world beyond… A materialistically poor man may have many chances of getting wealthy but the one whose heart is merciless will remain a beggar who will get scorn from everywhere.

🔷 Who can be a follower of truth and sainthood? Who is worthy of seeing God? The one, whose heart pulsates with generosity and love… Harsh, dry-hearted, cruel ones are infirm, they are impaired despite having healthy body, mind and resourceful life; they won’t be able to enjoy even the nectar kept in their closed vicinity. ‘O’ tyrants, just think before terrorizing others! What will happen the day when you will be in the place of your victims? Why be blinded by selfish passions, ego and follow apathy? You will have to bear the painful retribution life after life…Mother earth is a witness to this law of eternity; sooner or later the sinners have to face the dreadful punishments of the hell right here. Therefore, be gentle, sensitive, kind and helpful to others.

🔶 Those who possess the light of compassion in their hearts will never wander in the dark. So open your eyes to look inside and illumine your heart with the glow of kindness. Be considerate and compassionate to every one around you.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1942

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 July 2018


👉 व्यर्थ का उलाहना

🔶 हे प्रभु ! हे जगत्-पिता, जगन्नियन्ता कैसे आप मौन, मन्दिर में बैठे हैं। क्या आप देख नहीं रहे हैं कि बाहर संसार में अन्याय और अनीति फैली हुई है। अत्याचारियों के आतंक और त्रास से संसार त्राहि-त्राहि कर रहा है। आप उठिये और बाहर आकर अत्याचारियों का विनाश करिये, संसार को त्रास और उत्पीड़न से बचाइये। देखिये, मैं कब से आपको पुकार रहा हूँ, विनय और प्रार्थना कर रहा हूँ। किन्तु आप अनसुनी करते जा रहे हैं। हे प्रभु, हे जगन्नियन्ता न जाने आप जल्दी क्यों नहीं सुनते। पुकारते-पुकारते मेरी वाणी शिथिल हो रही है किन्तु अभी तक आपने मेरी पुकार नहीं, सुनी कहते-कहते, प्रार्थी करुणा से रो पड़ा !

🔷 तभी मूर्ति ने गम्भीरता के साथ कहा- ‘मनुष्य मुझे संसार में आने के लिये न कहे- मैं मनुष्यों से बहुत डरता हूँ। प्रार्थी ने विस्मय पूर्वक पूछा- भगवान् ! आप मनुष्य से डरते हैं- यह क्यों !

🔶 मूर्ति पुनः बोली- इसलिये कि यदि मैं संसार में सशरीर ईश्वर के रूप में आ जाऊँ तो मनुष्य मेरी दुर्गति बना डालें। क्योंकि हर मनुष्य को मुझ से कुछ न कुछ शिकायत है, हर मनुष्य मुझ से कुछ न कुछ सेवा चाहता है। अपनी शिकायतों को ढूँढ़ने और उन्हें दमर करने की अपेक्षा वह दोष मुझे देता है। पुरुष अपनी समस्यायें आप हल करने की अपेक्षा मुझे से सारे काम कराना चाहता है और मूल्य चुकाये बिना वैभव पाने की याचना करता है।

🔷 अब तुम्हीं बताओ ऐसी स्थिति में मैं सशरीर ईश्वर के रूप में कैसे आ सकता हूँ ? मूर्ति मौन हो गई

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखंड ज्योति दिसम्बर 1971 पृष्ठ 1

👉 प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न हों

🔶 हमें चाहिए कि हम अपने आप को परिस्थितियों के अनुरूप ढालें और जिस परिस्थिति में हों, उससे असंतोष या घृणा न प्रकट करें। दिन कभी एक से नहीं रहते। हमें चाहिए कि हम दु:ख के विषम पथ पर धैर्य न खो बैठें। प्रत्येक परिस्थिति की अपनी-अपनी हानि होती है और अपना-अपना लाभ। संसार की कोई भी ऐसी परिस्थिति नहीं, जिसका कुछ-न-कुछ लाभ न हो।

🔷 हमें लाभ की ओर ही ध्यान देना चाहिए। जिन मजदूरों को मिट्ïटी में कार्य करना पड़ता है, स्वास्थ्य भी तो उन्हीं का बढ़ता है। ज्ञान तो केवल यही है कि हमें प्रतिकूल परिस्थिति में हिम्मत नहीं खो बैठना चाहिए और जब हम देखें कि परिस्थिति में तब्दीली आती ही नहीं, तो हमें उस परिस्थिति से संतोष करना चाहिए। नीच वह नहीं, जिसका कार्य आप नीच बतलाते हैं, बल्कि नीच वह है जो अपने कार्य में, चाहे वह कार्य कितना ही छोटा हो, दिलचस्पी नहीं लेता और केवल काम चलाऊ काम करता है। इस जिंदगी में कभी पक्की सडक़ें आती है और कभी कच्ची।

🔶 हमें दोनों प्रकार की सडक़ों को अपनाना है, सहर्ष और एक जैसे उत्साह से। कभी फूलों के बिछौने पर सोना है, तो कभी कंटकों की सेज भी अपनानी है। शांति प्राप्त करने का यही प्रथम साधन है कि हम अपने को प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न होने दें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 वास्तविक सौंदर्य

राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कईं राजकुमार व राजा उसके साथ विवाह करना चाहते थे, लेकिन वह किसी को पसन्द नहीं करती थी। आखिरकार उन र...