रविवार, 26 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 27 Feb 2017


👉 शक्तिपात से पल मात्र में हुआ कायाकल्प

🔵 उन दिनों मैं राजकीय रेलवे पुलिस में डी.आई.जी. के पद पर कार्यरत था। मेरे कई मित्रों ने पूज्य गुरुदेव के बहुआयामी व्यक्तित्व के विषय में इतना कुछ कहा कि हरिद्वार जाकर उनसे मिलने की इच्छा जाग उठी। इसलिए जब यू.पी. पुलिस के साथ सहयोग बैठक के क्रम में हरिद्वार का कार्यक्रम बना, तो मन ललक उठा- कुछ ही देर के लिए सही, समय मिल जाता तो उनसे भी मिल लेता।

🔴 सहयोग बैठक के व्यस्त कार्यक्रमों के कारण शांतिकुंज जाने का समय निकल पाएगा, इसमें कुछ संदेह- सा लग रहा था। फिर भी मैंने उत्तर प्रदेश के संबंधित अधिकारी से अनुरोध किया कि मेरी शान्तिकुञ्ज जाने की प्रबल इच्छा है। अतः वहाँ जाने के लिए मुझे थोड़े समय का अवकाश दिया जाय। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बैठक के बीच में दो घण्टे का अवकाश था। उतना ही समय मिल पाया। अनुमति मिल जाने से मुझे काफी खुशी हुई। मैं इतने से ही खुश हो रहा था कि भागते दौड़ते ही सही, आचार्यश्री के दर्शन तो कर लूँगा। क्या पता, फिर बाद में कभी मौका मिले या नहीं।

🔵 शान्तिकुञ्ज पहुँचा, तो पता चला कि गुरुदेव सूक्ष्मीकरण साधना में हैं। अब वे किसी से मिलते- जुलते नहीं हैं। वन्दनीया माताजी, शैल जीजी, डॉ. साहब -- इन तीनों के अलावा और कोई मिल नहीं सकता। यह जानकर बड़ी निराशा हुई। इतने दिनों से सोच रखा था, लेकिन यहाँ आकर भी दर्शन नहीं हुए। अपने- आप पर बहुत कोफ्त हुई। चाहता, तो कभी खुद ही कार्यक्रम बनाकर आ सकता था। किसी ने कहा- माता जी से मिल लीजिए, अब तो सारी शक्तियाँ उन्हीं के पास हैं। मन में एक उम्मीद बँधी, माताजी के पास जाकर उनसे प्रार्थना करूँगा। शायद दर्शन हो ही जाएँ। माताजी से मिला। विगलित स्वर में उनसे विनती की- एकबार आचार्यश्री से मिलवा दें, बड़ी उम्मीद लेकर आया हूँ।

🔴 माताजी ने आँखें मूँद लीं, कुछ देर मौन रहीं, फिर उठकर अन्दर चली गईं। मैं चुपचाप बैठा भगवान से प्रार्थना करने लगा- हे भगवान बड़ी मुश्किल से अधिकारियों को मनाकर यहाँ तक आया हूँ। अब मुझ पर इतना अनुग्रह तो कर ही दो कि मैं उनसे मिल सकूँ। पल भर के लिए ही सही एक बार उनके दर्शन तो करा दो, प्रभु! मैं उधेड़बुन में पड़ा अकेला बैठा हुआ था। थोड़ी देर बाद माताजी लौट आईं। उन्होंने हँसते हुए मुझसे कहा- जाओ बेटा, मिल लो। गुरुदेव ने तुम्हें बुलाया है।

🔵 मैं उठकर तेजी से चल पड़ा। जिस कमरे में गुरुदेव बैठे थे, उसके अन्दर जाते ही तेज प्रकाश से आँखें चकाचौंध हो गईं। पूरा कमरा एक अलौकिक प्रकाश से भरा था। थोड़ी देर में आँखें उस प्रकाश की अभ्यस्त हुईं तो कमरे में फर्श से लेकर छत तक फैले उस प्रकाश के बीच मुझे पूज्य गुरुदेव दिखे, उनके अंग- अंग में प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा था। मैंने उनकी ओर देखा, लेकिन क्षण भर के लिए भी उनसे आँखें नहीं मिला सका।

🔴 मैंने महसूस किया कि उनकी आँखों से दिव्य प्रकाश की किरणें निकलकर मेरे अन्दर प्रविष्ट हो रही हैं। इस प्रक्रिया के प्रारंभिक क्षण तो असह्य- से थे, किन्तु शनैः शनैः वह प्रकाश मेरे संपूर्ण शरीर के लिए सहनीय होने लगा। अब मैं पूज्य गुरुदेव को आसानी से देख पा रहा था। वे शांत, प्रफुल्लित बैठे थे। वे मेरी ओर गहरी नजरों से देखकर मुस्कराये। फिर उन्होंने कहा- यह दिव्य प्रकाश तुम्हारे लिए अभेद्य रक्षा कवच का काम करेगा। सत्य और न्याय की रक्षा के लिए तुम जो चाहोगे, वही होगा। अब कोई तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।

🔵 .....और सचमुच हुआ भी ऐसा ही। पहले मेरी कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी और सख्ती के कारण प्रशासनिक तथा राजनैतिक जगत की कुछ बड़ी हस्तियाँ मेरे विरुद्ध हो गई थीं, लेकिन, पूज्य गुरुदेव द्वारा किए गए उस शक्तिपात से मेरे सभी विरोधी एक- एक कर धराशाई होते चले गए और गुरुकृपा से मेरी चर्चा ईमानदारी तथा कर्तव्यनिष्ठा के उदाहरण के रूप में होने लगी। 

🌹 शिवमूर्ति राय सेवानिवृत्त डी.जी.पी., (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 6)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा  

🔴 शक्ति की सर्वत्र अभ्यर्थना होती है, पर यदि उसका बहुमूल्य अंश खोजा जाए, तो उसे प्रतिभा के अतिरिक्त और कोई नाम नहीं दिया जा सकता। विज्ञान उसी का अनुयायी है। सम्पदा उसी की चेरी है। श्रेय और सम्मान वही जहाँ-तहाँ से अपने साथ रहने के लिए घसीट लाती है। गौरव-गाथा उन्हीं की गायी जाती है। अनुकरणीय और अभिनन्दनीय इसी विभूति के धनी लोगों में से कुछ होते हैं।          

🔵 दूरदर्शिता, साहसिकता और नीति-निष्ठा का समन्वय प्रतिभा के रूप में परिलक्षित होता है। ओजस, तेजस् और वर्चस, उसी के नाम हैं। दूध गर्म करने पर मलाई ऊपर तैरकर आ जाती है। जीवन के साथ जुड़े हुए महत्त्वपूर्ण प्रसंगों से निपटने का जब कभी अवसर आता है, तो प्रतिभा ही प्रधान सहयोगी की भूमिका निभाती देखी जा सकती है। 

🔴 सफलताओं में, उपलब्धियों में अनेकों विशेषताओं के योगदान की गणना होती है, पर यदि उन्हें एकत्रित करके एक ही शब्द में केन्द्रित किया जाए, तो प्रतिभा कहने भर से काम चल जाएगा और भी खुलासा करना हो, तो उसे अपने को, दूसरों को, संसार को और वातावरण को प्रभावित करने वाली सजीव शक्ति वर्षा भी कह सकते हैं।

🔵 अन्यान्य उपलब्धियों का अपना-अपना महत्त्व है। उन्हें पाने वाले गौरवान्वित भी होते हैं और दूसरों को चमत्कृत भी करते हैं, पर स्मरण रखने की बात यह है कि यदि परिष्कृत प्रतिभा का अभाव हो, तो प्राय: उनका दुरुपयोग ही बन पड़ता है। दुरुपयोग से अमृत भी विष बन जाने की उक्ति अप्रासंगिक नहीं है। शरीर बल से सम्पन्नों को आततायी, आतंकवादी, अनाचारी, आक्रमणकारी, अपराधी के रूप में उस उपलब्धि का दुरुपयोग करते और अपने समेत अन्यान्यों को संकट में धकेलते देखा जाता है। सम्पदा अर्जित करने वाले उसका सही उपयोग न बन पड़ने पर विलास, दुर्व्यसन उद्धत् अपव्यय, विग्रह खड़े करने वाले अहंकार-प्रदर्शन आदि में खर्च करते देखे गये हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अभेद आदर-निर्विकार न्याय

🔵 इस युग में भी जब कि बुद्धि-विकास तेजी से हो रहा है, लोगों में ऊँच-नीच, छूत-अछूत, छोटे-बड़े का भाव देखकर हर विचारशील व्यक्ति को कष्ट होता है। उस परिस्थिति में तो और भी जब कि सामाजिक न्याय के लिए भी पक्षपात होता है। साधारण कर्मचारी से लेकर बडे-बडे पदाधिकारी और न्यायाधीशों में भी इस तरह की प्रवंचना देखने मे आती है तो उन महापुरुषों की यादें उभर आती हैं, जिन्होंने कर्तव्यपरायणता से अपने पद को सम्मानित किया, आज की तरह उस पर कलंक का टीका नहीं लगाया।

🔴 बंबई हाईकोर्ट के जज गोंविद रानाडे को कौन नहीं जानता ? पर इसके लिए नहीं कि वे अंग्रेजी युग के सम्माननीय जज थे वरन इसलिये कि उन्होंने पद की अपेक्षा कर्तव्य पालन को उच्च माना और उसकी पूर्ति में कभी हिचक न होने दी।

🔵 एक बार की बात हैं- रानाडे साहब अपने कमरे में पुस्तक पढ़ रहे थे, तो उस समय कोई अत्यत दीन और वेषभूषा से दरिद्र व्यक्ति उनसे मिलने गया अफसरों के लिये इतना ही काफी होता है अपने पास से किसी को भगा देने के लिए। कोई अपना मित्र संबंधी, प्रियजन हो तो सरकारी काम की भी अवहेलना कर सकते है पर न्याय के लिए हर-आम की बात गौर से सुन लेना, अब शान के खिलाफ माना जाता है।

🔴 रानाडे इस दृष्टि से निर्विकार थे। उन्होंने अपने चपरासी से कहा-उस व्यक्ति को आदरपूर्वक भीतर ले आओ। कोइ छोटी जाति का आदमी था। नमस्कार कर एक ओर खडा हो गया। कहने लगा हुजूर मेरी एक प्रार्थना है।

🔵 "सो तो मैं सुनूँगा।" जज साहब ने सौम्य शब्दों में कहा- "पहले आप कुर्सी पर बैठिए।"

🔴 "हुजूर मैं छोटी जाति का आदमी हूँ आपके सामने कैसे बैठ जाऊ, यो ही खडे-खडे अर्ज कर देता हूं।"

🔵 रानाडे जानते थे, इनके साथ हर जगह उपेक्षापूर्ण बर्ताव होता है, इसीलिए वह यहाँ भी डर रहा है। उनके लिए यह बडा दुःख था कि मनुष्य-मनुष्य में भेद जताकर उसका अनादर करता है। परिस्थितियों में किसी को हीन स्थिति मिली तो इसका यह अर्थ नही होता है कि उन्हें दुतकारा जाए और सामाजिक न्याय से वंचित रखा जाए। भेद किया जाए तो हर व्यक्ति दूसरे से छोटा है। जब चाहे, जो चाहे जिसका अनादर कर सकता है। ऐसा होने लगे तो संसार में प्रेमा-आत्मीयता और आदर का लेशमात्र स्थान न बचे।

🔴 जज साहब ने उसे पहले आग्रहपूर्वक कुर्सी पर बैठाया और फिर अपनी बात कहने के लिए साहस बंधाया था।

🔵 बंबई नगरपालिका के विरुद्ध अभियोग था। साधारण व्यक्ति होने के कारण सुनवाई न हुई थी, वरन् उसे जहाँ गया डॉट- फटकार ही मिली थी। आजकल वैसा नही होता तो बहानेबाजी, रिश्वतखोरी की बाते चलती हैं दोनों एक-सी है। फिर जितना उपर बढो़ सुनवाई की संभावना भी उतनी ही मंद पड़ती जाती है।

🔴 जज साहब ने बात ध्यान से सुनी और कहा- "मैं सब कुछ आज ही ठीक कर दूँगा।" आश्वासन पाकर उस दीन जन की आँखें भर आईं। जज साहब ने उसी दिन उस बेचारे का वर्षों का रुका काम निबटाया। यह भी हिदायत दी कि किसी को निम्न वर्ग वाला, अशिक्षित या अछूत मानकर उपेक्षित और न्याय से वंचित न रखा जाए।

🔵 जज साहब की यह आदर्शवादिता यदि आज के पदाधिकारियों में होती तो भारतीय लोकतंत्र उजागर हो जाता।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 52, 53

👉 विपत्ति में अधीर मत हूजिए। (भाग 2)

🔵 अपने प्रियजन के वियोग से हम अधीर हो जाते हैं। क्योंकि हमें छोड़कर चल दिया। इस विषय में अधीर होने से क्या काम चलेगा? वह हमारे अधीर होने का कोई समुचित कारण भी तो नहीं। क्योंकि जिसने जन्म धारण किया है, उसे मरना तो एक दिन है ही। जो जन्मा वह मरेगा भी। सम्पूर्ण सृष्टि के पितामह ब्रह्मा है चराचर सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न हुई है। अपनी आयु समाप्त होने पर वे भी नहीं रहते। क्योंकि वे भी भगवान विष्णु के नाभिकमल से उत्पन्न हुए हैं। अतः महाप्रलय में वे भी विष्णु के शरीर में अन्तर्हित हो जाते हैं। जब यह अटल सिद्धान्त हैं कि जायमान वस्तु का नाश होगा ही, तो फिर तुम उस अपने प्रियजन का शोक क्यों करते हो? उसे तो मरना ही था, आज नहीं तो कल और कल नहीं तो परसों। सदा कोई जीवित रहा भी है जो वह रहता? जहाँ से आया था, चला गया। एक दिन तुम्हें भी जाना है। जो दिन शेष है, उन्हें धैर्य के साथ गुणागार के गुणों के चिन्तन में बिताओ।

🔴 शरीर में व्याधि होते ही हम विकल हो जाते हैं। विकल होने से आज तक कोई रोग-विमुक्त हुआ है? यह शरीर व्याधियों का घर है। जाति, आयु, भोग को साथ लेकर ही तो यह शरीर उत्पन्न हुआ है। पूर्व जन्म के जो भोग हैं, वे तो भोगने पड़ेंगे।

🔵 दान पुण्य, जप, तप, और औषधि-उपचार करो अवश्य, किन्तु उनसे लाभ न होने पर अधीर मत हो जाओ। क्योंकि भोग की समाप्ति में ही, दान, पुण्य और औषधि कारक बन जाते है। बिना कारण के कार्य नहीं होता तुम्हें क्या पता कि तुम्हारी व्याधि के नाश में क्या कारण बनेगा? इसलिये प्राप्त पुरुषों ने शास्त्र में जो उपाय बताये हैं उन्हें ही करो। साथ ही धैर्य भी धारण किये रहो। धैर्य से तुम व्याधियों के चक्कर से सुखपूर्वक छूट सकोगे।

🔴 जीवन की आवश्यक वस्तुएं जब नहीं प्राप्त होती है तो हम अधीर हो जाते हैं। घर में कल को खाने के लिए मुट्ठी भर अन्न नहीं है। स्त्री की साड़ी बिलकुल चिथड़ा बन गई है। बच्चा भयंकर बीमारी में पड़ा हुआ है, उसकी दवा-दारु का कुछ भी प्रबन्ध नहीं। क्या करूं? कहाँ जाऊँ? इन्हीं विचारों में विकल हुए हम रात रात भर रोया करते हैं और हमारी आँखें सूज जाती है। ऐसा करने से न तो अन्न ही आ जाता है और न स्त्री की साड़ी ही नई हो जाती है। बच्चे की भी दशा नहीं बदलती। सोचना चाहिये हमारे ही ऊपर ऐसी विपत्तियाँ हैं सो नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखंड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 9

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Feb 2017

🔴 भाग्य का रोना रोने का अर्थ तो इतना ही समझ में आता है कि हम अपने कर्म के लिये सचेत नहीं हो पाये हैं। अपनी शक्तियों का दुरुपयोग ‘अब’ नहीं तो ‘तब’ किया था, जिसका कटु आघात भोगना पड़ रहा है। पर प्राकृतिक विधान के अनुसार तो यह भाग्य अपनी ही रचना है। अपने ही किए हुए का प्रतिफल है। मनुष्य भाग्य के वश में नहीं है, उसका निर्माता मनुष्य स्वयं है। परमात्मा के न्याय में अभेद देखें तो यही बात पुष्ट होती है कि भाग्य स्वयं हमारे द्वारा अपने को सम्पन्न करता है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व कुछ भी नहीं है।

🔵 विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने आती है। इससे हृदय में जो पीड़ा, आकुलता और छटपटाहट उत्पन्न होती है, उससे चाहें तो अपना सद्ज्ञान जागृत कर सकते हैं। भगवान को प्राप्त करने के लिए जिस साहस और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, दुःख उसकी कसौटी मात्र है। विपत्तियों की तुला पर जो अपनी सहन-शक्तियों को तौलते रहते हैं, वही अन्त में विजयी होते हैं, उन्हीं को इस संसार में कोई सफलता प्राप्त होती है।

🔴 मनुष्य! तुम्हें शरीर इसलिए नहीं मिला कि तुम उस पर अत्याचार करते हुए उसकी मिट्टी खराब कर दो! तुम्हें संसार के भोग इसलिए नहीं दिये गए कि तुम उन पर वुभुक्षित पशुओं की भाँति टूट पड़ो। तुम्हें मन, बुद्धि और आत्मा इसलिए नहीं मिली कि तुम उनमें द्वन्द्व कराओ। तुम्हें रात और दिन, आलोक और अन्धकार इसलिए नहीं दिये गए कि तुम उनको जैसे चाहो प्रयोग में लाओ। तुम्हारे साथ विवेक और सदाशयता को इसलिए नहीं भेजा गया कि तुम उन्हें धोखा दो। संसार में तुम्हारा अवतरण इसलिये नहीं हुआ कि तुम उसे धधकता नरक कुण्ड बना दो।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 22)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘हैल्थ’ का शाब्दिक अर्थ ‘शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा से पुष्ट होना लिखा है। अर्थात् मस्तिष्क जितना पुष्ट रहता है शरीर उतना ही पुष्ट होगा और मस्तिष्क के पुष्ट होने का एक ही उपाय है ज्ञान वृद्धि। शास्त्रकारों ने भी ज्ञान वृद्धि को ही अमरता का साधन कहा है। भारतीय ऋषि-मुनियों का दीर्घजीवन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सभी ऋषि दीर्घ जीवी हुए हैं उनके जीवन क्रम में ज्ञानार्जन ही सबसे बड़ी विशेषता रही है। इसके लिए तो उन्होंने वैभव विलास का जीवन तक ठुकरा दिया था। वे निरन्तर अध्ययन में लगे रहते थे जिससे उनका नाड़ी संस्थान कभी शिथिल न होने पाता था और वे दो-दो, चार-चार सौ वर्ष तक हंसते-खेलते जीते रहते थे।

🔵 पुराणों के अध्ययन  से पता चलता है कि वशिष्ठ, विश्वामित्र, दुर्वासा, व्यास आदि की आयु कई-कई सौ वर्ष की थी। जामवन्त की कथा लगती कपोल कल्पित है पर अमेरिकी वैज्ञानिकों का कथन सत्य है तो उस कल्पना को भी निराधार नहीं कहा जा सकता है। कहते हैं जामवन्त बड़ा विद्वान था। वेद उपनिषद् उसे कण्ठस्थ थे वह निरन्तर पढ़ा ही करता था और इस स्वाध्यायशीलता के कारण ही उससे लम्बा जीवन प्राप्त किया था। वामन अवतार के समय वह युवक था। रामचन्द्र का अवतार हुआ तब यद्यपि उसका शरीर काफी वृद्ध हो गया था पर उसने रावण के साथ युद्ध में भाग लिया था। उसी जामवन्त के कृष्णावतार में भी उपस्थित होने का वर्णन आता है।

🔴 दूर की क्यों कहें ‘पेंटर मार्फेस’ ने ही अपने भारत के इतिहास में ‘नूमिस्देको गुआ’ नामक एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन किया है जो सन् 1566 ई. में 370 की आयु में मरा था। इस व्यक्ति के बारे में इतिहासकार ने लिखा है कि मृत्यु के समय भी उसे अतीत की घटनाएं इतनी स्पष्ट याद थीं जैसे अभी वह कल की बाते हों। यह व्यक्ति प्रतिदिन 6 घण्टे से कम नहीं पढ़ता था। डा. लेलार्ड कार्डेल लिखते हैं—‘‘मैंने शिकागो निवासिनी श्रीमती ल्यूसी जे. से भेंट की तब उनकी आयु 108 वर्ष की थी। मैं जब उनके पास गया तब वे पढ़ रही थीं। बात-चीत के दौरान पता चला कि उनकी स्मरण शक्ति बहुत तेज है वे प्रतिदिन नियमित रूप से पढ़ती है।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (अंतिम भाग)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए

🔵 समय को अत्यन्त दुरूह समझा जा रहा है और मान्यता बनती जा रही है कि यह बढ़ते हुए कदम मानवी महत्ता ही नहीं, सत्ता का भी समापन करके रहेेंगे। क्या हम सब अगले ही दिनों सामूहिक आत्महत्या का यह विनाश आयोजित करके रहेंगे?      

🔴 स्थिति को कैसे बदला जाये? इसके सम्बन्ध में तरह तरह के उत्पादनों, उपकरणों, निर्धारणों की बात सोची जाती है। वैज्ञानिक, मनीषी, सत्ताधारी, शक्तिशाली, अपने-अपने ढंग से यह भी सोचते हैं कि प्रस्तुत अनर्थ को यदि सुसंरचना में बदला जा सके, तो इसकी तैयारी के लिए बड़े साधन, बड़े-बड़े आधार खड़े किये जाने चाहिए। ऐसी योजनाएँ भी आए दिन सुनने को मिलती हैं और जताई-बताई भी जाती है कि अधिक साधन सम्पन्न संसार विनिर्मित करने के लिए बड़े लोग कुछ बड़े कदम उठाने, बड़े विधान बनाने जा रहे हैं। इतने पर भी निराशा को हटाने में राई रत्ती भी सफलता मिलती दीख नहीं पड़ती, क्योंकि वस्तुत: मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। 

🔵 यदि मानसिकता को आदर्शवादी उत्कृष्टता के साथ न जोड़ा जा सका, तो स्थिति सुधरेगी, सुलझेगी नहीं, वरन् विपत्तियाँ और भी नजदीक आती, और भी रौद्र रूप धारण करती चली जायेंगी। समस्याओं का सामाधान भले ही आज हो या आज से हजार वर्ष बाद, पर उसका समाधान मात्र एक ही उपाय से सम्भव होगा, कि मन:स्थिति में संव्याप्त अवाञ्छनीयता को पूरी तरह बुहार फेंका जाये जो प्रस्तुत उलटे प्रवाह को अपनी प्रचण्ड शक्ति के सहारे उलटकर सीधा कर सके।    

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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प्रस्तुत पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने एवं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का अनुरोध है।

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 4)

🌹 नर-पशु से नर-नारायण

🔴 भारतीय धर्म के अनुसार मनुष्यों को दो बार जन्म लेने वाला होना चाहिए। एक बार जन्म सभी कीट- पतंगों और जीव- जन्तुओं का हुआ करता है। एक बार जन्म का अर्थ है- शरीर का जन्म। शरीर के जन्म का अर्थ है- शरीर से सम्बन्धित रहने वाली इच्छाओं और वासनाओं, कामनाओं और आवश्यकताओं का विकास और उनकी पूर्ति। दूसरा जन्म है- जीवात्मा का जन्म, उद्देश्य का जन्म और परमात्मा के साथ आत्मा को जोड़ देने वाला जन्म। इसी का नाम मनुष्य है। जो मनुष्य पेट के लिए जिया, सन्तान उत्पन्न करने के लिए जिया, वासना और तृष्णा के लिए जिया, वो उसी श्रेणी में भावनात्मक दृष्टि से रखा जा सकता है, जिस श्रेणी में पशु और पक्षियों को रखा गया है, कीड़े और मकोड़ों को रखा गया है। 

🔵 कीड़े, मकोड़ों का भी उद्देश्य यही है- पेट पाले, बच्चा पैदा करे, दूसरा उनके सामने कोई लक्ष्य नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई आकांक्षा नहीं, कोई उद्देश्य नहीं। जिन लोगों के सामने यही दो बातें हैं, उनको इसी श्रेणी में गिना जायेगा। चाहे वो विद्वान् हों, पढ़े- लिखे हों, लेकिन जिनका अन्तःकरण इन दो ही क्रियाओं के पीछे लगा हुआ हैं, दो ही महत्त्वाकाँक्षाएँ हैं, उन्हें पशु योनि से आगे कुछ नहीं कह सकते, उनको नर- पशु कहा जायेगा।

🔴 भारतीय धर्म की एक बड़ी विशेषता यह है, जिसने नर को पशु की योनि में पैदा होने के लिए इनकार नहीं किया, लेकिन इस बात पर जोर दिया है कि जैसे- जैसे मानवीय चेतना का विकास होना चाहिए, उस हिसाब से उसको मनुष्य के रूप में विकसित होना चाहिए और मनुष्यता की जिम्मेदारियों को अपने सिर पर वहन करना चाहिए। मनुष्य की जिम्मेदारियाँ क्या हैं? मनुष्य की वे जिम्मेदारियाँ जो जीवात्मा की जिम्मेदारी है। भगवान् के उद्देश्यों को लेकर के मनुष्य को पैदा किया गया है, उसको पूरा करने की जिम्मेदारियाँ हैं। भगवान् ने मनुष्य को कुछ विशेष उद्देश्य से बनाया और उसके पीछे उसका विशेष प्रयोजन था। ऐसा न होता, तो जो अन्य कीड़े और मकोड़ों को, जीव और जन्तुओं को सुख- सुविधाएँ दी थीं, उससे ज्यादा मनुष्यों को क्यों दी होतीं?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/12

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 62)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴 पिछली बार जो तीन परीक्षाएँ ली थीं, इस बार इनमें से एक से भी पाला नहीं पड़ा। जो परीक्षा ली जा चुकी है, उसी को बार-बार लेने की आवश्यकता भी नहीं समझी गई। गंगोत्री तक का रास्ता ऐसा था जिसके लिए किसी से पूछताछ नहीं करनी थी। गंगोत्री से गोमुख के 14 मील ही ऐसे हैं जिनका रास्ता बर्फ पिघलने के बाद हर साल बदल जाता है, चट्टानें टूट जाती हैं और इधर-उधर गिर पड़ती हैं। छोटे नाले भी चट्टानों से रास्ता रुक जाने के कारण अपना रास्ता इधर से उधर बदलते रहते हैं। नए वर्ष का रास्ता यों तो उस क्षेत्र से परिचित किसी जानकार को लेकर पूरा करना पड़ता था या फिर अपनी विशेष बुद्धि का सहारा लेकर अनुमान के आधार पर बढ़ते और रुकावट आ जाने पर लौटकर दूसरा रास्ता खोजने का क्रम चलता रहा। इस प्रकार गोमुख जा पहुँचे।

🔵 आगे के लिए गुरुदेव का संदेशवाहक साथ जाना था वह भी सूक्ष्म शरीरधारी था। छाया पुरुष यों वीरभद्र स्तर का था। समय-समय पर वे उसी से अनेकों काम लिया करते थे। जितनी बार हमें हिमालय जाना पड़ा, तब नन्दन वन एवं और ऊँचाई तक तथा वापस गोमुख पहुँचाने का काम उसी के जिम्मे था। सो उस सहायक की सहायता से हम अपेक्षाकृत कम समय में और अधिक सरलता पूर्वक पहुँच गए। रास्ते भर दोनों ही मौन रहे।

🔴  नन्दन वन पहुँचते ही गुरुदेव का सूक्ष्म शरीर प्रत्यक्ष रूप में सामने विद्यमान था। उनके प्रकट होते ही हमारी भावनाएँ उमड़ पड़ीं। होंठ काँपते रहे। नाक गीली होती रही। ऐसा लगता रहा मानों अपने ही शरीर का कोई खोया अंग फिर मिल गया हो और उसके अभाव में जो अपूर्णता रहती हो सो पूर्ण हो गई हो। उनका सिर पर हाथ रख देना हमारे प्रति अगाध प्रेम के प्रकटीकरण का प्रतीक था। अभिवादन आशीर्वाद का शिष्टाचार इतने से ही पूर्ण हो गया। गुरुदेव ने हमें संकेत किया, ऋषि सत्ता से पुनः मार्गदर्शन लिए जाने के विषय में हृदय में रोमांच हो उठा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/prav

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 63)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔵 साधनात्मक जीवन की तीन सीढ़ियाँ हैं। तीनों पर चढ़ते हुए एक लंम्बी मंजिल पार कर ली गई। (१) मातृवत् परदारेषु (२) परद्रव्येषु लोष्ठवत् की मंजिल सरल थी, वह अपने- आप से सम्बन्धित थी। लड़ना अपने से था, संभालना अपने को था, तो पूर्व जन्मों के संस्कार और समर्थ गुरू की सहायता से इतना सब आसानी से बन गया। मन उतना ही दुराग्रही दुष्ट न था, जो कुमार्ग पर घसीटने की हिम्मत करता। यदा- कदा उसने इधर- उधर भटकने की कल्पना भर की। जब प्रतिरोध का डंडा जोर से सिर पर पड़ा ,, तो सहम गया और चुपचाप सही राह चलता रहा। मन से लड़ते, झगड़ते, पाप और पतन से भी बचा लिया गया।  

🔴 अब जबकि सभी खतरे टल गये तब संतोष की साँस ले सकते हैं। दास कबीर ने झीनी- झीनी बीनी चदरिया, जतन से ओढ़ी थी और बिना दाग- धब्बे ज्यों की त्यों वापिस कर दी। परमात्मा को अनेक धन्यवाद कि उसने  सही राह पर हमें चला दिया और उन्हीं पदचिन्हों को ढ़ूढ़ते तलाशते, उन्हीं आधारों को मजबूती के साथ पकड़े हुए उस स्थान तक पहुँच गये, जहाँ लुढ़कने और गिरने का खतरा नहीं रहता। 

🔵 अध्यात्म की कर्मकाण्डात्मक प्रक्रिया बहुत कठिन नहीं होती। संकल्प बल मजबूत हो, श्रद्धा और निष्ठा भी कम न पड़े तो मानसिक उव्दिग्नतानहीं होती और शांतिपूर्वक मन लगने लगता है। और उपासना के विधि- विधान गड़बड़ाए बिना अपने ढ़र्रे पर चलते रहते हैं। मामूली दुकानदार सारी जिन्दगी एक ही दुकान पर, एक ही ढर्रे से पूरी दिलचस्पी के साथ काट लेता है। न मन डूबता है न अरुचि होती है। पान- सिगरेट के  दुकानदार १२- १४ घण्टे अपने धन्धे को उत्साह और शान्ति के साथ आजीवन करते रहते हैं, तो हमें ६- ७ घण्टे प्रतिदिन की गायत्री साधना २४ वर्ष तक चलाने का संकल्प तोड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ती। मन उनका उचटता है जो उपासना को पान- बीड़ी की खेती- बाड़ी का, मिठाई- हलवाई के धन्धे से भी कम लाभदायक समझते हैं। बेकार के अरुचिकर कामों में मन नहीं लगता

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य