मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

👉 संघर्ष

🔷 पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!!

🔶 एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?'

🔷 पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'

🔶 लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।'

🔷 पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।'

🔶 महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी..!!

🔷 उसे लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!!

🔶 वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।'

🔷 पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।'

🔶 वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।'

🔷 पिकासो ने हँसते हुए कहा, 'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है ... इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है। मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ..!! तुम भी दो, सीख जाओगी..!!

🔶 वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 Feb 2018


👉 मौन : मन और वाणी का संयम

🔷 मनुष्य जो कुछ सोचता और विचार करता है, उसे वाणी के माध्यम से व्यक्त करता है।  मनुष्य ने अपने विचारों और भावों को सर्वप्रथम वाणी के माध्यम से व्यक्त करना सीखा। वाणी और मस्तिष्क का सीधा सम्बन्ध है, विशेषत: अभिव्यक्ति के लिए तो सबके लिए वही सर्वाधिक सुलभ है। इसलिए मानसिक शक्तियों का बहिर्गमन मुख्यत: वाणी के द्वारा होता है। अहंता, मोह-तृष्णा, वासना आदि के द्वारा तो मानसिक शक्तियाँ अन्दर-अन्दर ही जलती रहती हैं। वाणी के माध्यम से उनकी ज्वालाएँ बाहर भी धधकने लगती हैं। इसलिए वाणी के संयम को मानसिक संयम के साथ भी जोड़े रखा गया है।
  
🔶 विचारों पर संयम कर लिया जाय और वाणी को असंयमित ही रहने दिया जाय तो विचार संयम का आधार भी लडख़ड़ा उठता है। हमेशा कुछ न कुछ कहते रहने की आदत व्यक्ति को कोई विषय ढूँढऩे के लिए भी बाध्य करती है। इसलिए विचार संयम के साथ-साथ वाणी का संयम भी अनिवार्य है। वरन्ï वाणी का संयम-मानसिक संयम का ही अंग है। मानसिक संयम के साथ वाणी के संयम की महत्ता को भी समझना चाहिए और उसे हल्के रूप में नहीं इतना अधिक महत्व नहीं देते। उसकी मान्यता होती है बोलने में क्या लगता है? बोलने में बड़ी शक्ति खर्च होती है। एक घण्टे लगातार बोलने पर व्यक्ति इतना अधिक थक जाता है कि आठ घण्टे तक शारीरिक श्रम किया जाता तो थकान नहीं आती। कारण वाणी का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से है और काम तो हाथ पैर से भी किए जा सकते हैं, उन्हें करते समय ध्यान कहीं और भी रह सकता है, पर बोलते समय सारा ध्यान बोलने पर ही रखना पड़ता है।
    
🔷 बेहोश होने अथवा मरने से पूर्व अन्य अंग बाद में निष्क्रिय होते हैं, सबसे पहले वाणी ही अवरुद्ध होती है, क्योंकि मस्तिष्क जैसे-जैसे शिथिल या अचेत होता जाता है। वाक्ï इन्द्रिय वैसे-वैसे असमर्थ होती जाती है। उस समय न शरीर में इतनी शक्ति रह जाती है और न मन मस्तिष्क में ही इतनी चेतना रहती है कि कुछ शब्द भी कहे जा सकें। शरीर में जो शक्ति और मस्तिष्क में जो चेतना बची रहती है वह इतनी अपर्याप्त रहती है कि उससे कुछ शब्द भी नहीं बोले जा सकते। यद्यपि वह शक्ति अन्य अंगों को हिलाने डुलाने के लिए पर्याप्त रहती है। मरते हुए कोई बात सुनकर उसका उत्तर सिर हिलाकर ही दे पाते हैं-कुछ कह पाना अधिकांश लोगों के लिए कठिन ही होता है। शारीरिक क्रिया-कलापों में जिन कार्यों में सर्वाधिक मानसिक शक्ति खर्च होती है वह वाणी ही है। इसीलिए मौन की गणना मानसिक तप से की गई है।
  
🔶 सामान्य जीवन में भी कार्य करते समय बोलने और मौन रहने का अन्तर समझा जा सकता है। किसी को करते समय यदि बात भी करते रहा जाय तो मनोयोग उस कार्य में पूरी तरह जुट नहीं पाता। कारण कि बात करते रहने से वह एकाग्रता और दक्षता नहीं आ पाती जिसके द्वारा अधिक व्याकुलता तथा दक्षता से कार्य किया जा सके। बातूनी व्यक्ति का काम भली-भाँति सम्पन्न नहीं हो पाता। अधिक बातें करने वाले व्यक्ति तुरन्त उत्तेजित हो उठते हैं, क्योंकि वाचालता के कारण मनुष्य की प्राण-शक्ति नष्ट होती रहती है और तज्जनित मानसिक दुर्बलता व्यक्ति को असहिष्णु बना देती है। व्यक्ति को जिस प्रकार जल्दी क्रोध आ जाता है उस प्रकार वाचालता के कारण मानसिक दृष्टि से दुर्बल भी शीघ्र उत्तेजित हो उठता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मौन साधना के सिद्ध साधक- महर्षि रमण

🔶 मदुरै जिले के तिरुचुपि नामक एक देहान्त में उत्पन्न वैंकट रमण अपनी ही साधना से इस युग के महर्षि बन गये। आत्मज्ञान उन्होंने अपनी ही साधना से उपलब्ध किया। अठारह वर्ष की आयु में उनने अपना विद्यार्थी जीवन पूर्ण कर लिया। दक्षिण भारत में बोली जाने वाली चारों भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। साथ ही अंग्रेजी और संस्कृत का भी। यह भाषा ज्ञान उन्होंने किशोरावस्था में ही प्राप्त कर लिया था। अब आत्म-ज्ञान की बारी थी, जिसके लिए उनकी आत्मा निरन्तर बेचैन थी।

🔷 एक दिन जीवन और मृत्यु का मध्यवर्ती अन्तर समझने के लिए उन्होंने अपने मकान की छत पर ही एकाकी अभ्यास किया। शरीर को सर्वथा ढीला करके अनुभव करले लगे कि उनके प्राण निकल गये, काया सर्वथा निर्जीव पड़ी है। प्राण अलग है। प्राण के द्वारा शरीर की उलट-पलट कर देखने की अनुभूति वे देर तक करते रहे। शरीर और प्राण की भिन्नता का उन्हें गहरा अनुभव होता रहा इसके बाद वस्त्र की तरह उन्होंने शरीर को पहन लिया। यह अनुभव उन्हें आजन्म बना रहा।

🔶 आत्मानुभूति का आनन्द जीवन भर लेते रहने के लिए वे अरुणाचलम् चल दिये यह पर्वत दक्षिण भारत में पार्वती जी की तपस्थली माना जाता है। तप के लिए यह स्थान निकटवर्ती और परम पवित्र लगा। घर से बिना सूचना दिये यहाँ चले आये थे सो उन्होंने घर वालों के कष्ट का ध्यान रखते हुए एक पत्र भेज दिया। साथ ही सदा यहीं रहकर सदा तपश्चर्या करने का अभिप्राय भी। मौन उन्होंने अपना तप स्वरूप बनाया। घर के सब लोग उनका दर्शन कर गये। वापस लौटने का अभिप्राय भी कहते रहे पर उनने अस्वीकृति सिर हिलाकर ही प्रकट कर दी।

🔷 महर्षि मौन रहते थे पर उनके समीप आने वालों और प्रश्न पूछने वालों को मौन भाषा में ही उत्तर मिल जाते थे। उनकी दृष्टि नीची रहती थी। पर कभी किसी को आँख से आँख मिलाकर देखा तो इसका अर्थ होता था, उसकी दीक्षा हो गई। उन्हें ब्रह्मज्ञान का लाभ मिल गया। ऐसे ब्रह्मज्ञानी बड़भागी थोड़े से ही थे।

🔶 आरम्भिक दिनों में वे अरुणाचल के कतिपय अनुकूल स्थानों में निवास करते रहे। पीछे उन्होंने एक स्थान स्थायी रूप से चुन लिया। आरम्भ में उनकी साधना का कोई नियत स्थान और समय नहीं था। पीछे वे नियमबद्ध हो गये, ताकि दर्शनार्थी आगंतुकों को यहाँ वहाँ तलाश में न भटकना पड़े।

🔷 महर्षि रमण सिद्ध पुरुष थे। मौन ही उसकी भाषा थी। उनके सत्संग में सब को एक जैसे ही सन्देश मिलते थे मानों वे वाणी से दिया हुआ प्रचलन सुन कर उठे थे। सत्संग के स्थान में उस प्रदेश के निवासी कितने ही प्राणी नियत स्थान और नियत समय पर उनका सन्देश सुनने आया करते थे। बन्दर, तोते, साँप, कौए सभी को ऐसा अभ्यास हो गया कि आगन्तुकों की भीड़ से बिना डरे झिझके अपने नियत स्थान पर आ बैठते थे और मौन सत्संग समाप्त होते ही उड़कर अपने-अपने घोंसलों को चले जाया करते थे।

🔶 संस्कृत के कितने ही विद्वान उनकी सेवा में आये अपने-अपने समाधान लेकर वापस गये। उन्हीं लोगों ने रमण गीता आदि कतिपय संस्कृत पुस्तकें लिखीं जिनमें महर्षि की अनुभूतियों तथा शिक्षाओं का उल्लेख मिलता है।

🔷 वे सिद्ध पुरुष थे पर उनने जान-बूझकर कभी सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं किया। भारत में योगियों की खोज करने वाले पाल ब्रंटन ने बड़े सम्मानपूर्वक उनकी कितनी ही अलौकिकताओं का उल्लेख किया है।

🔶 भारत को स्वतन्त्रता दिलाने में जिन तपस्वियों का उल्लेख किया जाता है उनमें योगीराज अरविन्द, राम-कृष्ण परमहंस और महर्षि रमण के नाम प्रमुख हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1984 अगस्त पृष्ठ 61
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/August/v1.61

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (अन्तिम भाग)

🔶 कामुक चिन्तन में मानसिक शक्ति का इतना अधिक क्षरण होता है जितना कदाचित ही अन्य किसी प्रयोजन में होता हो। शरीर का ओजस् वीर्यपात से नष्ट होता है, किन्तु उससे भी कहीं अधिक महत्त्व की मानसिक क्षमता को आनन्दमय उत्तेजना से अस्त-व्यस्त कर डालने में कामुक चिन्तन का आक्रमण और भी अधिक विनाशकारी है। इस स्तर की कुकल्पनाओं में से कदाचित ही कोई एक प्रतिशत साकार कर पाता है, किन्तु इस कारण पूरी-पूरी हानि उठा लेता है। नीति मर्यादा को तोड़-फोड़ कर रख देने वाली इस विडम्बना से मनुष्य परोक्षतः मानवी गरिमा का अनुशीलन भी गँवा बैठता है। बाहर से भले ही वह निर्दोष दीखता रहे पर यह हानि ऐसी है, जिसके कारण उत्कृष्टता के अन्यान्य क्षेत्र भी मनुष्य के हाथ से चले जाते हैं और वह क्रमशः अन्यान्य अनुबन्ध उल्लंघन की मनोभूमि भी अपनाने लगता है। शारीरिक ब्रह्मचर्य तो प्रतीक मात्र है। जिस ब्रह्मचर्य की अध्यात्म क्षेत्र में अतिशय प्रशंसा की गई और माहात्म्य-गाथा गाई गई है, उसे मानसिक स्तर की कामुक प्रसंग में बरती जाने वाली पवित्रता ही समझनी चाहिए।

🔷 मानसिक आवेशों में लोभ लिप्सा का अतिवाद भी ऐसा है जिससे प्रेरित होकर व्यक्ति बेईमानी, विश्वासघात से लेकर आक्रामक कुकृत्यों तक में लीन होता और अपराधी जीवन व्यतीत करता है। ऐसे आवेशग्रस्त अनीति उपार्जन को दुर्व्यसनों और उद्धत प्रदर्शनों में ही खर्च करते और बदले में अनेकों संकट ओढ़ते देखे गये हैं।

🔶 काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के षट्-रिपुओं को उत्तेजक मनोविकार ही समझा जाना चाहिए। उन्हें ऐसे मनोरोग भी कह सकते हैं जो सन्तुलन और सौजन्य का सर्वनाश करके रख दें। इनसे बचना और बचाना ही उचित है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Exclusive Phase of Time (Part 2)

🔶 The first step that you will have to take is that you have to stop living like ordinary men and say we would live like special and exclusive men.  Serving stomach is one thing. It is not the only job so why to do it absurdly? Why not to fill it through righteous measures? Why shouldn’t we do works that we can do other than serving the stomach? This question will appear before us leading us to feel the need of reshuffling our mind-set in a new way, changing our mind-set so that we would prioritize the assignments given by BHAGWAN over worldly appeals for the former is more regular and profitable. It is more profitable to partner with BHAGWAN, to allow BHAGWAN to pervade in our life. The world history tells us that persons partnering with BHAGWAN have never been and will never be in loss. It will be great to realize that. It must be understood that a great solution to our life-touching issues has been gained.
                                    
🔷 If we could feel that now it is the right time to change our mentality in order to go with BHAGWAN instead of clubbing with world. It will be our second step to excel. The third step to excel is to shift our ambitions, longings and wishes to centre of greatness from that of a bigwig. This should not be our ambitions that we will continue to concentrate on saturating our desires, spending our brain in managing ego, pomp-show and features of a bigwig and dancing in tune with worldly appeals. If our conscience and mind concede to this fact that these things are trivial and childish issues serving no purpose and if we could relinquish timidity, shrewdness and juvenile attitude only then we could endeavor to attain greatness after all How a glass of water can be filled with milk if the water is not taken out of that glass?
                                      
🔶 The same should be our characters, activities & thinking styles as was that of great men and noble men. After conceding to this fact, conceiving these theories in our mind, changing centers of desires & longings we must initiate some actions in our practical life also. Very this is the way prescribed for SADHAKs.

Finished, today’s session.
                                  
===OM SHANTI===

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 10)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 मित्रो! क्षमताएँ जिनके अंदर हैं, प्रतिभाएँ जिनके अंदर हैं, वह कहीं-से-कहीं जा पहुँचता है। आम्रपाली जब तक वेश्या रही, तो पहले नंबर की रही। राजकुमार, राजाओं से लेकर सेठ-साहूकार तक उसकी एक निगाह के लिए, उसकी एक चितवन और एक इशारे के लिए ढेरों रुपया खरच कर डालते थे और उसके गुलाम हो जाया करते थे, लेकिन जब आम्रपाली अपनी करोड़ों की संपत्ति को लेकर भगवान् बुद्ध की ओर चली गई, तो न जाने क्या-से-क्या हो गई और सम्राट् अशोक जो था, ऐसा खूनी था कि उसने खानदान-के-खानदान समाप्त कर दिए थे। सभी शाही खानदानों को एक ओर से उसने मरवा डाला था। मुसलमानों ने एक-आध को मारा था, लेकिन उसने तो किसी को जिंदा ही नहीं छोड़ा। ऐसी खूनी था अशोक। उसने चंगेज खाँ, नादिरशाह और औरंगजेब, सबको एक किनारे रख दिया था। जहाँ कहीं भी हमले किए, वहाँ खून की नदियाँ ही बहाता चला गया।

🔷 लेकिन मित्रो! जब उसने पलटा खाया और जब अपने आप में परिवर्तन कर डाला, तो फिर वह कौन हो गया? सम्राट् अशोक हो गया, जिसने बौद्ध संघ और बौद्ध धर्म का सारे-का-सारा संचालन किया। आज जो हमारे झंडे के ऊपर और हमारे सिक्कों-नोटों के ऊपर तीन शेर वाला निशान बना हुआ है, वह सम्राट् अशोक की निशानी है। और जो हमारे राष्ट्रीय ध्वज पर चौबीस धुरी वाला और चौबीस पँखुड़ी वाला चक्र लगा हुआ है, यह क्या है? यह सम्राट् अशोक के द्वारा पारित किया और प्रतिपादित किया हुआ धर्मचक्र प्रवर्तन है, जिसको हमने राष्ट्रीय झंडे के ऊपर स्थान दिया हुआ है। ये किसकी हिम्मत, किसकी दिलेरी थी किसकी बहादुरी थी? उसकी थी, जो डाकू था और खूँखार था।

🔶 मित्रो! भगवान् जहाँ कहीं भी अपना अंश देता है, विभूति देता है, उसके अंदर चमक होती है, लगन होती है, उसके अंदर तड़प होती है और मुरदे? मुरदे हमारे और आपके जैसे होते हैं। साँस लिया करते हैं। भगवान् की जब पूजा करते हैं, तो भी ऐसे-ऐसे सिर हिलाते रहते हैं और साँस लेते रहते हैं। सेवा करने जाते हैं, तो वहाँ भी निठल्ले की तरह पड़े रहते हैं। सत्संग करने, शिविर करने आते हैं, तो यहाँ भी मौसी जी-मौसा जी की याद सताती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 47)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔶 गुरुगीता का प्रत्येक महामंत्र गुरुभक्ति का गीत है। यह जब शिष्य की समर्पण साधना की सरगम से सुरबद्ध होता है, तो इसकी सम्मोहकता भुवन मोहिनी होती है। गुरुभक्ति के ये गीत-समर्पण के संगीत से सजकर शिष्य की चेतना में ईश्वरीय प्रकाश की सृष्टि करते हैं। इस महासत्य की अनुभूति अब तक अनेकों शिष्यों को हुई है। इन क्षणों में भी बहुतेरे इस सत्य को अपने जीवन की परिभाषा मानकर जुटे हैं। उनकी लगन उन्हें अन्तर्जगत के अनेकों रहस्यों से परिचित करा रही है। इन रहस्यों में सबसे परम रहस्य एक ही है कि गुरुकृपा से सब कुछ सम्भव है। यहाँ तक कि गुरु कृपा से परम असम्भव भी सहज सम्भव है। इस सच्चाई को जब भी कोई चाहे अपने जीवन में अनुभव कर सकता है।

🔷 गुरु समर्पण की भक्ति कथा में रमे हुए शिष्यों ने गुरु गीता के पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् सदाशिव के इन बोध वचनों को पढ़ा कि गुरुदेव के चरण कमल संसार के सभी दावानलों का विनाश करने वाले हैं। गुरुभक्त साधकों को उन सद्गुरु का ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिए। यह ध्यान चन्द्रमण्डल के अन्दर श्वेत कमल में अकथ आदि तीन रेखाओं से बने हंस वर्ण युक्त त्रिकोण में करना चाहिए। ध्यान की यह गुप्त गोपनीय विधि अपने परिणाम में साधक को अध्यात्म साधना का चरम फल देने वाली है। जिन्होंने भी इसे किया है, वे सद्गुरु के कृपा के श्रेष्ठतम प्रसाद को पाने में सफल हुए हैं।

🔶 गुरु कृपा की इस साधना महिमा को और भी अधिक स्पष्टता देते हुए भगवान् भोलेनाथ जगन्माता पार्वती से कहते हैं-

सकलभुवनसृष्टिः कल्पिताशेषपुष्टिर निखिलनिगमदृष्टिः संपदां व्यर्थदृष्टिः।
अवगुणपरिमार्ष्टिस्तत्पदार्थैकदृष्टिर भवगुणपरमेष्टिर्मोक्षमार्गैकदृष्टिः॥ ५९॥
सकलभुवनरंगस्थापनास्तंभयष्टिः सकरुणरसवृष्टिस्तत्त्वमालासमष्टिः।
सकलसमयसृष्टिः सच्चिदानंददृष्टिर निवसतु मयि नित्यं श्रीगुरोर्दिव्यदृष्टिः॥ ६०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 76

👉 आत्मरक्षा मनोरोगों से भी करनी चाहिए (भाग 6)

🔷 कामुक चिन्तन इस सुव्यवस्थित निर्धारण पर सीधा आक्रमण करता है और पशुओं जैसी स्थिति में लौटना चाहता है जिसमें यौनाचार को शरीर कृत्य विनोद भर माना जाता है। ऐसी छूट पाने से पूर्व परिवार संस्था और समाज गठन को समाप्त करके आदिम युग में लौटना पड़ेगा। इस पर भी समाधान नहीं। बलिष्ठ कुत्ते कमजोरों को खदेड़ कर यौनाचार का लाभ लेते हैं। आदिम युग में भी स्वेच्छाचार नहीं चलता था। सभ्य युग में मर्यादा पालन का अनुबन्ध है तो आदिम युग में इस प्रयोजन के लिए ठनने वाले मल्ल में स्वयंवर का विजेता होने का। दोनों ही दृष्टि से मनचाही स्वच्छन्दता को छूट नहीं है। मनुष्य न भौंरे हो सकते और न नारियाँ तितली। एक फूल से उड़कर दूसरे पर जा बैठने की छूट उन्हें तब तक नहीं मिल सकती, जब तक कि मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनकर रहना अंगीकार है।

🔶 कामुक चिन्तन असंख्यों पर हावी रहता है। विपरीत लिंग वालों के रूप में यौवन का स्मरण आता रहता है और रमण के लिए मन चलता है। कल्पनाएँ उठती हैं और एक परीलोक बनकर खड़ी हो जाती है। मन मोदक खाने में मनोयोग ऐसे जंजाल में जकड़ जाता है जिसके कारण किन्हीं महत्त्वपूर्ण प्रसंगों पर ध्यान ही नहीं जमता। इस कुचक्र में कितने ही प्रतिभावान छात्र अनुत्तीर्ण होते और भविष्य गँवाते देखे गये हैं। कितने ही कुटेवों के शिकार होते और ओजस्-तेजस् गँवाकर छूँछ बनते हैं। कई उस स्वप्नलोक के साथ इतने अधिक लिपट जाते हैं कि अश्लीलता का उद्धत प्रदर्शन करके अनजानों तक से छेड़खानी करने जैसी कुचेष्टा करते देखे गये हैं। परिणाम स्पष्ट है।

🔷 बहुत बार तो हाथ मलते और खीजते रहने से भी काम चल जाता है, पर बहुत बार बदले में ऐसा मजा चखने को भी मिलता है, जिसका स्मरण जन्म भर बना रहे और छठी का दूध याद आये। व्यभिचार की सीमा तक जा पहुँचने पर भी इस कामुक चिन्तन की परिणति और भी अधिक भयावह होती है। उससे दोनों ही क्षेत्रों के गृहस्थ जीवन बेतुके, अप्रामाणिक, नीरस स्तर के बनते देखे गये हैं। सन्तान पर तो इसका प्रभाव निश्चित रूप से अत्यधिक पड़ता है। वे व्यभिचारी अभिभावकों को क्षमा नहीं करते। इसके कई आर्थिक, सामाजिक एवं भावनात्मक कारण भी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Exclusive Phase of Time (Part 1)

🔷 Each fellow of us must conceive deeply in our minds that the present time in which we & you are living is the most exclusive one. This is such a transition period in which the Age is changing. Each one of us must conceive that our personality is very special. We have been sent by BHAGWAN for some specific task. Insects and wicked creatures are usually born for reproduction and servicing the stomach. Many of humans too serve only this purpose and live like human-fool and human-insect, also no account of their lives is maintained. Such men also cannot do anything other than serving stomach and reproduction, but BHAGWAN pose his faith on some persons and believes such persons to do some work exclusively for BHAGWAN also and not be busy in own labyrinth only.
                                         
🔶 Every person of YUG NIRMAN PARIVAR must frame an idea about himself that BHAGWAN has sent us for some every exclusive jobs; that this is such some exclusive time-span and each one of us has to feel it that we have been entrusted with duties to fulfill the needs of the Age. If you could believe that path to progress can be opened and you can proceed on the way of great men, thus you can successfully achieve the object of our family of Age-building. You will get exclusive personality which will not be like that of ordinary men.
                                          
🔷 Now is very exclusive phase of time, not like that of usual normal time rather it is emergency-like situation and we all know that emergent actions are to be taken in any emergency-like situation. The responsibility upon our shoulders is not ordinary one only of serving stomach. There are additional responsibilities we have to discharge as Monkeys, Bears; cow-boys came to accompany KRISHAN and RAM to contribute exclusively for some specific objectives. If you too could  feel like that and realize that you people too are associated with MAHAKAAL the same way then new questions,  problems and also new grounds and reasons behind  exciting scenario will be clear to you.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 8)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! क्या वजह है इसकी? हम में और तुलसीदास जी में क्या अंतर है? एक अंतर है। नाक, आँख, कान, दाँत और हाथ-पाँव सब बराबर हैं, पर एक चीज जो उनके अंदर थी, वह हमारे अंदर नहीं है। वह चीज है, जिसे मैं जिंदगी कहता हूँ, जिसको मैं प्रतिभा कहता हूँ, जिसको मैं विभूति कहता हूँ, जिसको मैं लगन कहता हूँ, तन्मयता कहता हूँ, जीवट कहता हूँ। वह जीवट मित्रो! जहाँ कहीं भी होगा, तो वह बड़ा शानदार काम कर रहा होगा और गलत दिशा पकड़ने पर गलत काम भी कर रहा होगा।

🔶 अंगुलिमाल पहले नंबर का डाकू था। उसने ये कसम खाई थी कि फोकट में किसी का पैसा नहीं लूँगा। उँगलियाँ काट-काटकर उसकी माला बनाकर वह देवी को रोज चढ़ाया करता था। अगर कोई कहता कि अरे भाई! पैसे ले ले, पर उँगली क्यों काटता है हमारी? वह कहता, वाह! फोकट में, दान में नहीं लेता हूँ। पहले तेरी उँगली काटूँगा, तो मेरी मेहनत हो जाएगी। फिर उस मेहनत का पैसा ले लूँगा। ऐसे मुफ्त में कैसे ले लूँगा किसी का पैसा?

🔷 इस तरह वह रोज एक साथ उँगलियाँ कट-काटकर उसकी माला देवी को पहनाया करता था? कौन? खूँख्वार अंगुलिमाल डाकू, लेकिन जब उसने पलटा खाया, तो कैसा जबरदस्त पलटा खाया, आपको मालूम है न? अंगुलिमाल जब तक डाकू था, तो पहले नंबर का और जब संत हो गया, तो उसने हिंदुस्तान से आगे जाकर के सारे-के-सारे विदेशों में, मिडिल ईस्ट में वो काम किए कि बस, तहलका मचा दिया। वह जहाँ कहीं भी गया, अपने प्रभाव से दुनिया को बदलता हुआ चला गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 46)

👉 साधन-सिद्धि गुरुवर पद नेहू

🔶 सद्गुरु के ध्यान की यह सर्वोच्च विधि है। यह ध्यान जीवन को शिवस्वरूप प्रदान करने वाला है। अत्यन्त प्रभावशाली एवं परम गोपनीय, अतिदुर्लभ एवं समस्त आध्यात्मिक विभूतियों को प्रकट करने वाला है। ध्यान की इस रहस्यमयी विधि का प्रयोग श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के शिष्य दुर्गाचरण नाग किया करते थे। श्रीरामकृष्ण ने उनकी पात्रता पर विश्वास करके यह विधि प्रदान की थी। जिनकी सन्त साहित्य में रुचि है, उनके लिए दुर्गाचरण नाग का नाम अपरिचित नहीं है। श्रीरामकृष्ण के शिष्यों में उन्हें नाग महाशय के नाम से जाना जाता था। गृहस्थ होने के बावजूद उनका जीवन संन्यासियों से भी ज्यादा कठोर एवं तपपरायण था। उनके कठोर तपश्चरण के अनेकों कथानक सन्त साहित्य में पढ़े और जाने जाते हैं।
  
🔷 नाग महाशय का सारा दिन गरीबों एवं दुःखी जनों की चिकित्सा सेवा में बीतता था। चिकित्सक होते हुए भी उनके लिए चिकित्सा कभी भी व्यवसाय नहीं बनी,बल्कि उन्होंने सदा ही उसे सेवा कार्य समझा। अपने इस सेवा कार्य में, जिसे वे नारायण सेवा कहा करते थे, कभी-कभी तो घर का सामान और रुपये भी दे आते थे। दिन भर की इस सेवा के बावजूद नाग महाशय की प्रायः सम्पूर्ण रुचि जप-ध्यान में बीतती थी। उनकी साधना इतनी उग्र एवं कठोर थी कि सामान्य निद्रा की उन्हें कोई विशेष जरूरत नहीं रह गयी थी। अमावस के दिन उपवास रखकर गंगा के किनारे जप करते-करते वह भाव समाधि में लीन हो जाते थे। कभी-कभी तो यह समाधि दशा इतनी प्रगाढ़ होती कि नदी का ज्वार उन्हें बहा ले जाता। बाद में इन्हें तैरकर वापस आना पड़ता।
  
🔶 ऐसे महान् साधक नाग महाशय के लिए उनके गुरु श्रीरामकृष्ण ही सर्वस्व थे। साधना के उच्च शिखरों पर आरूढ़ नाग महाशय की पात्रता-पवित्रता एवं साधना की कई बार परीक्षाएँ लेकर उन्हें सहस्रदल कमल में ध्यान करने की यह विधि सुझाई थी। ध्यान का यह दुर्लभ प्रयोग बताते समय श्रीरामकृष्ण ने अपनी ओर इशारा करते हुए पूछा था-तुम इसे क्या समझते हो? नाग महाशय ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया-यह मुझसे मत कहलाइये ठाकुर। आपकी कृपा से मैं समझ गया हूँ कि आप वही हैं। इस पर परमहंस देव ने कहा-तब ठीक है। तुम सच्चे अधिकारी हो। तुम इसे कर सकते हो। ऐसा कहते हुए श्री ठाकुर को समाधि लग गयी। समाधि की इसी भावदशा में नाग महाशय के वक्षस्थल पर उनके पैर पड़ गये। इस स्पर्श मात्र से नाग महाशय को एक दिव्य अनुभूति हुई, जिसमें उनके अन्तःकरण में सहस्रदल कमल में सद्गुरु के ध्यान का स्वरूप प्रकट हो गया। साथ ही उन्हें सर्वत्र दिव्य ज्योति के दर्शन भी हुए।
  
🔷 इस अनुभूति के बाद उन्होंने श्री ठाकुर द्वारा निर्दिष्ट की गयी ध्यान की विधि का प्रयोग करना शुुरू किया। यहाँ पर हम इन पंक्तियों के पाठकों को यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि सहस्रदल कमल में ध्यान की यह विधि सर्वसाधारण के लिए उचित नहीं है। जिसके आज्ञाचक्र एवं अनाहत चक्र का ठीक-ठीक विकास हो चुका होता है, उन्हीं के लिए यह दुर्लभ साधना उचित बतायी गयी है। सहस्रदल कमल पर गुरुगीता के इन महामंत्रों के अनुरूप ध्यान की परमहंस अवस्था को सिद्धों का ध्यान कहा गया है। यही कारण है कि यहाँ उसका सम्पूर्ण रहस्य नहीं बताया जा रहा। नाग महाशय की उच्च अवस्था देखकर ही श्री श्रीरामकृष्ण ने उन्हें यह दुर्लभ प्रयोग बताया था।
  
🔶 इस ध्यान प्रयोग से नाग महाशय में असीमित योग ऐश्वर्य प्रकट हुआ। उन्होंने अपने गुरुदेव के साकार और निराकार स्वरूप के दर्शन किये। माँ गंगा स्वयं ही उनके आँगन में प्रकट हुई। अनेक देवदुर्लभ चमत्कार नाग महाशय के जीवन में प्रकट हुए। संक्षेप में इस ध्यान विधि से परम असम्भव भी सम्भव बन पड़ता है। हाँ, इसे निर्दिष्ट करने का अधिकार केवल सद्गुरु को है। जिन्हें भी यह विधि गुरुदेव ने बतायी है, वे आज आध्यात्मिक जीवन के परम आनन्द में विभोर हैं। गुरुदेव की कृपादृष्टि ऐसी ही सर्वफलदायिनी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 74

👉 गायत्री साधना का सत्परिणाम अवश्यंभावी

🔶 गायत्री साधना का प्रत्यक्ष परिणाम है-सात्विक आत्मबल की अभिवृद्धि।  सात्विक आत्मबल के दस लक्षण हैं- उत्साह, सतत परिश्रम, कत्र्तव्यपरायणता, संयम, मधुर स्वभाव, धैर्य, अनुद्वेग, उदारता, अपरिग्रह और तत्त्वज्ञान। यदि कोई व्यक्ति सच्ची गायत्री साधना कर रहा है, तो उसमें अवश्य ही ये गुण बढ़ेंगे और जैसे-जैसे यह बढ़ोतरी आगे चलेगी, वैसे ही वैसे जीवन की कठिनाइयों का समाधान होता चलेगा। जब साधक की आत्मा गायत्री शक्ति से परिपूर्ण हो जाती है, तो उसे किसी भी प्रकार का कोई कष्टï, अभाव या दु:ख नहीं रह जाता। वह निरंतर पूर्ण परमानन्द का, ब्रह्मïानंद का अलौकिक रसास्वादन करता रहता है।
  
🔷 भ्रांत, पथ-भ्रष्ट, लालची, गायत्री को मुफ्त में ठगने का षड्यंत्र करने वाले लोग सच्ची साधना नहीं कर सकते। करना तो दूर, उसे ठीक तरह समझ भी नहीं सकते। वे जिव्ह्वा के अग्र भाग से 24 अक्षरों की तोता रटंत करते हैं; अंत:करण में श्रद्धा-विश्वास का नाम भी नहीं होता, मातृ-भक्ति का प्रेमांकुर कहीं दीख नहीं पड़ता। जितने मिनट चौबीस अक्षर रटते हैं, उतने समय अपनी अवांछनीय, अनैतिक, अवास्तविक मृग तृष्णाओं में ही मन को लपलपाते रहते हैं। दस-पाँच दिन जप करने पर यदि उनकी सब तृष्णाएँ पूरी नहीं हो गयीं, तो उनका साहस टूट जाता है और साधना को छोड़ बैठते हैं। साधना विधि से छोटे-छोटे नियम बंधनों तक को गवारा नहीं करना चाहते। दान- पुण्य के नाम पर एक कौड़ी खर्च करना ब्रज उठाने के समान भारी मालूम पड़ता है। ऐसे लोगों की साधना प्राय: निष्फल रहती है। कई बार तो वह पहले की अपेक्षा भी घाटे में रहते हैं। वे सोचने लगते हैं कि हमारे सब काम गायत्री करके रख जायेगी, इसलिए हमें अब कुछ करना नहीं है। वे अपने रहे बचे प्रयत्न को भी छोड़ बैठते हैं। आलस्य, अकर्मण्यता और परावलम्बन की मनोवृत्ति में केवल कार्य नाश ही हो सकता है। ऐसी दशा में उनका लँगड़ा-लूला विश्वास भी नष्टï हो जाता है और भविष्य में आत्म-विद्या के दुरुपयोग से कोई लाभ उठाने का उनमें उत्साह भी नहीं रहता।
  
🔶 उपरोक्त प्रकार की छछोरी बुद्धि के साथ, बाल-क्रीड़ा के साथ साधना करना निष्प्रयोजन है। कभी-कभी तत्काल आश्चर्यजनक परिणाम भी होते अवश्य है; पर सदा ही वैसी आशा नहीं की जा सकती। वेदमाता की आराधना एक प्रकार का आध्यात्मिक कायाकल्प करना है। जिन्हें कायाकल्प कराने की विद्या मालूम है, वे जानते हैं कि इस महा अभियान को करते समय कितने धैर्य और संयम का पालन करना होता है, तब कहीं शरीर की जीर्णता दूर होकर नवीनता प्राप्त होती है। गायत्री आराधना का आध्यात्मिक कायाकल्प और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके लाभ केवल शरीर तक ही सीमित नहीं हैं, वरन्ï शरीर, मस्तिष्क, चित्त, स्वभाव, दृष्टिïकोण सभी का नवनिर्माण होता है और स्वास्थ्य, मनोबल एवं सांसारिक सुख-सौभाग्यों में वृद्धि होती है। ऐसे असाधारण महत्त्व के अभियान में समुचित श्रद्धा, सावधानी, रुचि व तत्परता रखनी पड़े, तो इसे कोई बड़ी बात न समझना चाहिए। केवल शरीर को पहलवानी के योग्य बनाने में काफी समय तक धैर्यपूर्वक व्यायाम करते रहना पड़ता है। दण्ड, बैठक, कुश्ती आदि के कष्टï साध्य कर्मकाण्ड करने होते हैं।
  
🔷 यह सत्य है कि कई बार जादू की तरह गायत्री उपासना का लाभ होता है। आई हुई विपत्ति अति शीघ्र दूर हो जाती है और अभीष्ट मनोरथ आश्चर्यजनक रीति से पूरे हो जाते हैं। पर कई बार ऐसा भी होता है कि अकाट्य प्रारब्ध भोग न टल सके और अभीष्टï मनोरथ पूरा न हो। गीता में भगवान्ï श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग का ही उपदेश दिया है। साधना कभी निष्फल नहीं जाती। उसका तो परिणाम मिलेगा ही; पर हम अल्पज्ञ होने के कारण अपना प्रारब्ध और वास्तविक हित नहीं समझते।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य