शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

👉 शान्त विचारों की ठोस शक्ति (भाग २)

गम्भीर परिस्थितियों में मन का शान्त रहना इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति को किसी भारी व्यक्ति का सहारा मिल गया है। शान्त मन रहने से प्रतिकूल परिस्थितियाँ थोड़े ही काल में अनुकूल परिस्थितियों में परिणत हो जाती हैं। शान्त लोगों की शक्ति का दूसरे लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वास्तव में हमारी ही शक्ति दूसरे की शक्ति के रूप में प्रकाशित होती है। यदि किसी व्यक्ति का निश्चय इतना दृढ़ हो कि चाहे जो परिस्थितियाँ आवें उसका निश्चय नहीं बदलेगा तो वह अवश्य ही दूसरे व्यक्तियों के विचारों को प्रभावित करने में समर्थ होगा। जितनी ही किसी व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता होती है उसके विचार उतने ही शान्त होते हैं। और उसकी दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति उतनी ही प्रबल होती है। शान्त विचारों का दूसरों पर और वातावरण पर प्रभाव धीरे-धीरे होता है। उद्वेगपूर्ण विचारों का प्रभाव तुरन्त होता है। हम तुरन्त होने वाले प्रभाव से विस्मित होकर यह सोच बैठते हैं कि शान्त विचार कुछ नहीं करते और उद्वेगपूर्ण विचार ही सब कुछ करते हैं। पर जिस प्रकार किसी बीज को वृक्ष रूप में परिणत होने के लिए शान्त शक्तियों को काम करने की आवश्यकता होती है, इसी प्रकार किसी विचार को फलित होने के लिए शान्त होने की आवश्यकता होती है और उसका कार्य अवश्य जगत में होता है।

शान्त विचारों से शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाते हैं। लेखक का एक मित्र 20 वर्ष का युवक हो चुका था। इस समय भी वह ऊँचाई और मोटाई में एक चौदह वर्षीय बालक के समान लगता था। उसने किसी शुभ चिन्तक के सुझाने पर नियमित रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ किया। थोड़े ही दिनों में वह चार इंच बढ़ गया और उसका शरीर भी पुष्ट हो गया। उसकी समझ थी कि व्यायाम ने उसे बढ़ा दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि व्यायाम से उसे लाभ हुआ, पर उससे भी अधिक लाभ उसके निश्चय से हुआ। इस निश्चय के कारण प्रतिदिन के शान्त विचार उसकी भावना को प्रयत्न करते गये और इस प्रकार उसके शरीर में मौलिक परिवर्तन होते गये।

हम जो कुछ सोचते हैं उसका स्थायी प्रभाव हमारे ऊपर तथा दूसरों के ऊपर पड़ता है। शान्त विचार धीरे-धीरे हमारे मन को ही बदल देते हैं। जैसे हमारे मन की बनावट होती है वैसे ही हमारे कार्य होते हैं। और हमारी सफलता भी उसी प्रकार की होती है। हम अनायास ही उन कार्यों में लग जाते हैं जो हमारी प्रकृति के अनुकूल हैं, और उन कार्यों से डरते रहते हैं जो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। अपने स्वभाव को बदलना हमारे हाथ में है। यह अपने शान्त विचारों के कारण बदला जा सकता है। स्वभाव के बदल जाने पर मनुष्य को किसी विशेष प्रकार का कार्य करना सरल हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 11

👉 आत्म विश्वास ईश्वर का अजस्र वरदान

पुलिस का सशस्त्र गारद साथ रहने पर सुरक्षा की निश्चिंतता हो जाती है और निर्भय आश्वस्त रहा जा सकता है। जिसे ईश्वर पर उसकी सर्व शक्ति सत्ता पर विश्वास है उसे किसी से भी डरना न पड़ेगा। जिसे ईश्वर पर भरोसा है और जो उसे अपने भीतर हर घड़ी विद्यमान अनुभव करता है उसे आत्म विश्वास की कमी क्यों रहेगी? ऊपर से— अपनी महानता और सम्भावना से आस्था खो बैठा उसे नास्तिक के अतिरिक्त और क्या कहा जायगा?

जो अपने ऊपर भरोसा करता है, उसी पर दूसरे भी भरोसा करते हैं। जो अपनी सहायता आप करता है, उसी की सहायता ईश्वर भी करता है। हो सकता है कि कोई निष्ठावान असफल रहा है। सम्भव है किसी कुशल किसान की फसल मारी जाय पर जिनने भी कृषि में कमाई की है उनमें से प्रत्येक को जोतने और बोने का श्रम करना पड़ा।

आत्म विश्वास ही शक्ति का स्रोत है। प्रगति के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकना उसी के सहारे सम्भव हो सकता है। जो ईश्वर भाग्य का निर्माण करता है उसका दूसरा नाम आत्म विश्वास है। उसी की प्रेरणा से ऐसे प्रचण्ड पुरुषार्थ का उद्भव होता है। जिसके लिए दुर्गम पर्वतों को भी रास्ता देना पड़े। वस्तुतः ईश्वर का एकमात्र दिव्य उपहार जो मनुष्य को मिलता है— आत्म विश्वास ही है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जून 1974 पृष्ठ 1

👉 Rise! Have Courage

Please Note! Adversities and obstructions are there for your own good. They occur to activate your strength and trigger its constructive use. Hidden beneath them is the spring of joy. Those who have never faced any hindrances or struggled against hardships would not know the real taste of happiness and success in life. Only those who have accepted these challenges with courage and stability and conquered over against struggles in their lives are worthy of being called achievers, distinguished heroes. It is only the lives of such great people that deserve to be dignified.

So don’t loose heart. Awaken! Rise! And look at the Almighty – the Divine Light of your Life-Force. God has not sent you in human form without any purpose. He has endowed you with immense potentials; it’s your duty to make use of them. Sufferings and sorrows surface in our world only until we don’t sacrifices our narrow self-interests for greater aims in life. A sapling sprouts and a tree grows from only that seed which dissolves self-existence in the soil; flowers and fruits illustrate its accomplishments and expand its glory.

So, Be Happy and face all testing moments with smile and courage. Have unflinching faith in the eternal truth that your soul is omnipotent. This is what corresponds to having faith in God. The force of this intrinsic faith would wane out all your fears and weaknesses. Its impetus will awaken your inner strength by which you can eliminate all hindrances and win all battles of life.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1940

👉 अद्वैत का ज्ञान - भक्ति की अनन्यता

अद्वैत का ज्ञान दरअसल अपनी आत्मा और आत्मीयता के अनन्त असीमित विस्तार का अनुभव है। ऐसा अनुभव जिसमें जड़-चेतन सभी स्वयं की आत्मचेतना में समाए नजर आते हैं। पर्वत-नदी-झरने, वृक्ष-वनस्पति, देव-दानव-मानव, पशु-पक्षी यहाँ तक कि कीट-पतंगों में अपनी ही आत्मा प्रकाशित नजर आती है। छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, कुल-जाति यहाँ तक कि जड़-चेतन का कोई भेद यहाँ मिथ्या और मायिक अनुभव होता है। आत्मा का यह अनन्त विस्तीर्ण अनुभव ही ब्रह्म है। जिन्हें कठिन तप से यह अनुभूति मिली उन्होंने इसे अभिव्यक्त करते हुए कहा- ‘अहं ब्रह्मास्मि’।
  
परन्तु जिन्होंने तप और साधना को दरकिनार कर केवल पोथियों के पन्ने उलटे उन्होंने इस महान् अनुभव को अपने तर्कों से विकृत और भोंड़ा बना दिया। वे सब ब्रह्मास्मि को भूल अहं में अटक गए। अपनी इस भटकन को उन्होंने सही साबित करने के लिए शास्त्र रचे, तर्क जाल फैलाया। इसका प्रभाव जहाँ और जिन पर भी पड़ा उन सभी के हृदय संवेदना रस से शून्य होते गए। इससे कुछ ऐसा हो गया जैसे कि उतप्त गर्मी के दिन आते हैं और सूरज की तपन से धरती सूख जाती है और दरारें पड़ जाती है।
  
इस शुष्कता से, कण्ठ सुखाने वाली तृषा से उबरने के लिए भक्ति की वर्षा चाहिए। अद्वैत ज्ञान के अनुभव को विकृत बनाने वाले सभी प्रयासों को समाप्त करने के लिए अनन्य भक्ति चाहिए। अनन्य का अर्थ है, अन्य अन्य न रहा, अब अनन्य हो गया। कहीं कोई अब दूसरा न रहा, सभी एक हो गए। इस पथ पर चलने वाला भक्त पहले भक्ति में भीगकर स्वयं को प्रभु के साथ अनन्य अनुभव करता है। फिर वह अपने प्रियतम परमात्मा में अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्डों की एकात्मता को अनुभव करता है। वह यह अनुभव कर लेता है कि अहंता के विसर्जित होते ही परमात्म चेतना का अद्वैत स्वतः प्रकट हो जाता है। अद्वैत की इस मिठास में उसे केवल ब्रह्मास्मि का अनुभव होता है, अहं तो यहाँ ढूँढने पर भी नहीं मिलता।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९८