सोमवार, 2 दिसंबर 2019

👉 जीवन का आनन्द

जीवन का आनन्द किसी वस्तु या परिस्थिति में नहीं, बल्कि जीने वाले के दृष्टिकोण में है। स्वयं अपने आप में है। क्या हमको मिला है- उसमें नहीं, बल्कि कैसे हम उसे अनुभव करते हैं? किस तरह से उसे लेते हैं- उसमें है। यही वजह है कि एक ही वस्तु या परिस्थिति दो भिन्न दृष्टिकोण के व्यक्तियों के लिए अलग-अलग अर्थ रखती है। एक को उसमें आनन्द की अनुभूति होती है- दूसरे को विषाद की।
  
दक्षिणेश्वर के मन्दिर निर्माण के समय तीन श्रमिक धूप में बैठे पत्थर तोड़ रहे थे। उधर से गुजर रहे श्री रामकृष्ण देव ने उनसे पूछा- क्या कर रहे हैं? एक बोला; अरे भई, पत्थर तोड़ रहा हूँ। उसके कहने में दुःख था और बोझ था। भला पत्थर तोड़ना आनन्द की बात कैसे हो सकती है। वह उत्तर देकर फिर बुझे हुए मन से पत्थर तोड़ने लगा।
  
तभी श्री परमहंस देव की ओर देखते हुए दूसरे श्रमिक ने कहा, बाबा, यह तो रोजी-रोटी है। मैं तो बस अपनी आजीविका कमा रहा हूँ। उसने जो कहा, वह भी ठीक बात थी। वह पहले मजदूर जितना दुःखी तो नहीं था, लेकिन आनन्द की कोई झलक उसकी आँखों में नहीं थी। बात भी सही है, आजीविका कमाना भी एक काम है, उसमें आनन्द की अनुभूति कैसे हो सकती है।
  
तीसरा श्रमिक यूँ तो हाथों से पत्थर तोड़ रहा था, पर उसके होंठो पर गीत के स्वर फूट रहे थे- ‘मन भजलो आमार काली पद नील कमले’। उसने गीत को रोककर परमहंस देव को उत्तर दिया- बाबा, मैं तो माँ का घर बना रहा हूँ। उसकी आँखों में चमक थी, हृदय में जगदम्बा के प्रति भक्ति हिलोर ले रही थी। निश्चय ही माँ का मन्दिर बनाना कितना सौभाग्यपूर्ण है। इससे बढ़कर आनन्द भला और क्या हो सकता है। इन तीनों श्रमिकों की बात सुनकर परमहंस देव भाव समाधि में डूब गए। सचमुच जीवन तो वही है, पर दृष्टिकोण भिन्न होने से सब कुछ बदल जाता है। दृष्टिकोण के भेद से फूल काँटे हो जाते हैं, और काँटे फूल हो जाते हैं। आनन्द अनुभव करने का दृष्टिकोण जिसने पा लिया उसके जीवन में आनन्द के सिवा और कुछ नहीं रहता।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Dec 2019

■ राष्ट्रपिता का मन्तव्य हर स्त्री- पुरुष जिन्दा रहने के लिए शरीर श्रम करें। मनुष्य को अपनी बुद्धि की शक्ति का उपयोग आजीविका या उससे भी ज्यादा प्राप्त करने के लिए ही नहीं, बल्कि सेवा के लिए, परोपकार के लिए करना चाहिए। इस नियम का पालन सारी दुनिया करने लगे, तो सहज ही सब लोग बराबर हो जायें, कोई भूखों न मरे  और जगत् बहुत से पापों से बच जाय, इस नियम का पालन करने वाले पर इसका चमत्कारी असर होता है, क्योंकि उसे परम शान्ति मिलती है, उसकी सेवा शक्ति बढ़ती है  और उसकी तन्दुरुस्ती बढ़ती है। गीता का अध्ययन करने पर मैं इसी नियम को गीता के तीसरे अध्याय में यज्ञ के रूप में देखता हूँ। यज्ञ से बचा हुआ वही है, जो मेहनत करने के बाद मिलता है। अजीविका के लिए पर्याप्त श्रम को गीता ने यज्ञ कहा है।

□ मानवी चिन्तन, चरित्र और लोक परम्पराओं में घुसी हुई भ्रान्तियों एवं अवांछनीयताओं को विज्ञान और अध्यात्म का, सम्पदा और उत्कृष्टता का शक्ति और शालीनता का, बुद्धि और नीति निष्ठा का, समन्वय अपने युग का सबसे बड़ा चमत्कार समझा जायेगा। विज्ञान क्षेत्र पर छाई हुई मनीषा को यह युगधर्म निभाना ही चाहिए।

◆ अच्छे- बुरे वातावरण से अच्छी -बुरी परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं और वातावरण का निर्माण पूरी तरह मनुष्य के हाथ में है, वह चाहे उसे स्वच्छ, स्वस्थ और सुन्दर बनाकर स्वर्गीय परिस्थितियों का आनन्द ले अथवा उसे विषाक्त बनाकर स्वयं अपना दम तोड़े।

◇ सादगी एक ऐसा नियम है जिसके सहारे हम अपने वैयक्तिक तथा सामाजिक जीवन की बहुत- सी समस्याओं सहज ही हल कर सकते हैं। सादगी जहाँ व्यक्तिगत जीवन में लाभकारी होती है, वहाँ सामाजिक जीवन में भी संघर्ष, रहन- सहन की असमानता कृत्रिम अभाव, महँगाई आदि को दूर करके वास्तविक समाजवाद की रचना करती है। इसलिए जीवन को सादा बनाइए, इससे आपका और समाज का बहुत बड़ा हित साधन होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य