सोमवार, 9 जुलाई 2018

👉 दोषों में भी गुण ढूँढ़ निकालिये (भाग 5)

🔷 दूसरों की अच्छाइयों को ढूंढ़ने, उन्हें देख-देखकर प्रसन्न होने एवं उनकी प्रशंसा करते रहने का स्वभाव यदि हम अपना बना लें तो यह सारी दुनिया हमें एक सुरम्य सुगंधित बगीचे की तरह मनोरम दिखाई देगी। हर व्यक्ति और हर वस्तु में कुछ न कुछ अच्छाई मौजूद है। हमारे लिये इतना ही पर्याप्त है। शहद की मक्खी के लिए, इतना ही पर्याप्त है कि फूल में मिठास के तनिक से कण मौजूद हों, जब एक नन्हीं-सी विद्या और बुद्धि से हीन मक्खी इतना कर सकती है कि फूल में से अपने काम की जरा सी चीज को निकालने मात्र का ध्यान रखे और अपना छत्ता मीठे शहद से भर ले तो क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि लोगों के अंदर उपस्थित अच्छाइयों को ही तलाश करें भले ही वे थोड़ी-सी ही मात्रा में क्यों न हों। यदि हमारी दृष्टि ऐसी रहे तो हमें अपने चारों और सज्जन एवं स्नेही ही दिखाई देंगे। हमारा मन घड़ी प्रसन्नता और संतोष से ही भरा रहेगा।

🔶 ताली एक हाथ से नहीं बजती। अन्य व्यक्ति दुर्जन भी हो तो हमारी सज्जनता उनके हथियारों को व्यर्थ बना देगी। सड़क टूट हुई हो, जगह-जगह गड्ढे हों तो मोटर में बैठने वाले को दचके लगने स्वाभाविक हैं, पर बहुत बढ़िया किस्म की मोटर जिसमें लचकदार कामनी या स्प्रिंगदार सीटें हों-उस टूटी सड़क पर भी किसी यात्री को सुविधा पूर्वक यात्रा करा सकती है। दुनिया में बुरे लोग हैं- ठीक है- पर यदि हम अपनी मनोभूमि को सहनशील, धैर्यवान, उदार और गुदगुदी बना लें तो बढ़िया मोटर में बैठने वाले यात्री की तरह इस टूटी सड़क वाली दुनिया में भी आनंद पूर्वक यात्रा कर सकते हैं।

🔷 जो उपलब्ध है उसे कम या घटिया मानकर अनेक लोग दुःखी रहते हैं और अपने भाग्य को कोसते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि अधिक ऊंची किस्म के सुख-साधन, सामग्री प्राप्त करने के लिए उतावले होकर लोग अनुचित रीति से भी उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं और अन्याय और अत्याचार करने में भी नहीं चूकते। यह मार्ग समाज में अशान्ति और अपने लिये दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाला ही है। ऐसे अनुचित कदम उठने में वह असन्तोष ही मुख्य कारण है जिससे, और अधिक मात्रा में, और अधिक बढ़िया किस्म की वस्तुएं प्राप्त करने की लालसा लगी रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1960 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.5

👉 मनुष्य जाति के गौरव

🔷 संसार में ऐसे मनुष्यों की बड़ी आवश्यकता है जो ईमानदारी हो। जो भय या लोभ के कारण अपनी अन्तरात्मा को बेचते न हों। जो मचाई पर कायम रहने के लिए अपने प्राणों तक को भी उत्सर्ग कर सकें। जिन्होंने बनावट से घृणा करना और सचाई से प्यार करना सीखा है वस्तुतः वे ही ज्ञानी है।

🔶 कुतुबनुमा (दिशा सूचक यंत्र) की सुई जिस तरह सदा उत्तर दिशा में ही रहती है उसी तरह जिनकी अन्तरात्मा सदा सत्य की ओर उन्मुख रहती है वे ही मनुष्य जाति के गौरव है। ऐसे ही लोगों से मानवता धन्य होती है और उन्हीं से संसार की सुख शान्ति बढ़ती है। महान् व्यक्तियों की विशेषता यही होती है कि वे अपने चरित्र से विचलित नहीं होते। प्रलोभनों और आपत्तियों के बीच भी वे चट्टान की तरह अविचल बन रहते है।

📖 अखण्ड ज्योति से

👉 अध्यात्म की प्रधान कसौटी

🔷 महामानवों में एक अतिरिक्त गुण होता है और वह है परमार्थ। दूसरों को दुखी या अधःपतित देखकर जिसकी करुणा विचलित हो उठती है, जिसे औरों की पीड़ा अपनी पीड़ा की तरह कष्टकर लगती है, जिसे दूसरों के सुख में अपने सुख की आनन्दमयी अनुभूति होती है, वस्तुतः वही महामानव, देवता, ऋषि, सन्त, ब्राह्मण, अथवा ईश्वर-भक्त है। निष्ठुर व्यक्ति, जिसे अपनी खुदगर्जी के अतिरिक्त दूसरी बात सूझती ही नहीं, जो अपनी सुख सुविधा से आगे की बात सोच ही नहीं सकता ऐसा अभागा व्यक्ति निष्कृष्ट कोटि के जीव जन्तुओं की मनोभूमि का होने के कारण तात्विक दृष्टि से ‘नर-पशु’ ही गिना जायगा।

🔶 ऐसे नर-पशु कितना भजन करते हैं, कितना ब्रह्मचर्य रहते है, इसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। भावनाओं का दरिद्र व्यक्ति ईश्वर के दरबार में एक कोढ़ी कंगले का रूप बनाकर ही पहुँचेगा। उसे वहाँ क्या कोई मान मिलेगा ? भक्ति का भूखा, भावना का लोभी भगवान् केवल भक्त की उदात्त भावनाओं को परखता है और उन्हीं से रीझता है। माला और चन्दन, दर्शन और स्नान उसकी भक्ति के चिह्न नहीं, हृदय की विशालता और अन्तःकरण की करुणा ही किसी व्यक्ति के भावनाशील होने का प्रमाण है और ऐसे ही व्यक्ति को, केवल ऐसे ही व्यक्ति को ईश्वर के राज्य में प्रवेश पाने का अधिकार मिलता है।

🔷 हमें अपने परिवार में से अब ऐसे ही व्यक्ति ढूंढ़ने हैं जिन्होंने अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप समझ लिया हो और जीवन की सार्थकता के लिए चुकाए जाने वाले मूल्य के बारे में जिन्होंने अपने भीतर आवश्यक साहस एकत्रित करना आरम्भ कर दिया हो। हम अपना उत्तराधिकार उन्हें ही सौंपेंगे। बेशक, धन-दौलत की दृष्टि को कुछ भी मिलने वाला नहीं है, हमारे अन्तःकरण में जलने वाली आग की एक चिंगारी ही उनके हिस्से में आवेगी पर वह इतनी अधिक मूल्यवान है कि उसे पाकर कोई भी व्यक्ति धन्य हो सकता है।

खरे खोटे की कसौटी

🔶 जिनकी दृष्टि से विराट् ब्रह्म की उपासना का वास्तविक स्वरूप विश्व-मानव की सेवा के रूप में आ गया हों वे हमारी कसौटी पर खरे उतरेंगे। जिनके मन में अपनी शक्ति सामर्थ्य का एक अंश पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिये लगाने की भावना उठने लगी हो उन्हीं के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है कि मानवीय श्रेष्ठता की एक किरण उनके भीतर जगमगाई है। ऐसे ही प्रकाश पुँज व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते हैं। उन्हीं के व्यक्तित्व का प्रकाश मानव-जाति के लिये मार्ग-दर्शक बनता हैं। उन्हीं का नाम इतिहास के पृष्ठों पर अजर अमर बना हुआ हैं। प्रतिनिधियों के चुनाव में हम अपने परिवार में से इन्हीं विशेषताओं से युक्त आत्माओं की खोज कर रहे हैं। हमारे गुरुदेव ने हमें इसी कसौटी पर कसा और जब यह विश्वास कर लिया कि प्राप्त हुई आध्यात्मिक उपलब्धियों का उपयोग यह व्यक्ति लोक कल्याण में ही करेगा तब उन्होंने अपनी अजस्र ममता हमारे ऊपर उड़ेली और अपनी गाढ़ी कमाई का एक अंश प्रदान किया। वैसा ही पात्रत्व का अंश उन लोगों में होना चाहिए जो हमारे उत्तराधिकारी का भार ग्रहण करें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.51

👉 First Give, Then Gain

🔷 Great personalities always appeal and motivate people in their contact to give something for noble causes. They themselves sacrifice everything they had. This is what makes them great. Thorough pondering over this fact has taught me that there is no religious duty greater than giving or sacrificing (for others’ welfare), which we can do any time (provided we have the will and attitude). There is no better mode than renunciation (of selfish possessions and attachments) for elimination of evil tendencies and untoward accumulation in the mind.

🔶 If you want to acquire precious knowledge, attain people’s respect, achieve something great, then first learn to give what best you can for the society, for altruistic service. Donate your talents, intellect, time, labor, wealth, whatever potentials or resources you have for the betterment of the world…; you will get manifold of that in return… Gautam Buddha had renounced the royal throne;
Gandhi had left the brilliant career, wealth, comforts… As the world has witnessed, what they were rewarded in return was indeed immeasurable,immortal…

🔷 It is worth recalling the beautiful verse of renowned poet Rabindranath Tagore here, which says – He spread his hands open and asked for something… I took out a tiny piece of grain from my bag and kept on His palm. At the end of the day, I found a golden piece of same size in my bag. I cried – why didn’t I empty my bag for Him, which would have transformed me, the poor man into a King of Wealth?

📖 Akhand Jyoti, March. 1940

👉 आवेशग्रस्त न रहें, सौम्य जीवन जियें (भाग 3)

🔷 भय के वास्तविक कारण कम और काल्पनिक अधिक होते हैं। भूत, चोर, साँप, बिच्छू आदि की उपस्थिति एवं आक्रामकता के कल्पित चित्र इतना परेशान करते हैं मानो वे सचमुच ही सामने उपस्थित हों और बस हमला ही करने जा रहे हैं।

🔶 कोई व्यक्ति आक्रमण करने वाला हो, षडयन्त्र रच रहा हो, जादू टोना करके हानि पहुँचाने जा रहा हो ऐसा डर अकारण ही उठता रहता है। आमतौर से ऐसा होता नहीं है। ऐसी दुर्घटनाएँ कभी-कभी ही घटित होती हैं। उनमें से 90 प्रतिशत आशंकाएँ काल्पनिक पाई जाती हैं। रात के अन्धेरे में अविज्ञात का डर लगता है। प्रकाश होने पर वस्तुस्थिति का पता चल जाता है और साथ ही डर भी नहीं रहता। एकाकी रास्ता चलते मनुष्य अपनी अशक्तता की अनुभूति से डरता है। कोई साथ चलने लगे तो वह अपडर भी नहीं रहता।

🔷 श्मशान में भूत-पलीतों की उपस्थिति मान्यता क्षेत्र पर छाई रहती तो उधर से गुजरते हुए दिल धड़कता है। किन्तु देखा यही गया है कि उसी क्षेत्र में काम करने वाले या बसने वाले लोग बिना किसी प्रकार का जोखिम उठाये निश्चिन्तता पूर्वक समय बिताते रहते हैं। भय का बाहरी कारण कम और भीतरी अधिक होता है। अन्धेरे में झाड़ी भी भूत की तरह डरावनी लगती है।

🔶 दुर्बल के लिए दैव भी घातक होता है। जो हवा आग को जलने में सहायता करती है वही कमजोर दीपक को बुझा भी देती है। बढ़ती हुई ज्वाला के लिए पवन सहायता करता है और देखते-देखते दावानल बना देता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1984 पृष्ठ 40
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/May/v1.40

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 9 July 2018


👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...