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शनिवार, 4 जुलाई 2020

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (भाग ३)

राजनैतिक स्वाधीनता के लिए आत्माहुति देने वाले पिछली पीढ़ी के शहीद अपनी जलाई हुई मशाल हमारे हाथों में थमा कर गये हैं। जिनने अपने प्राण, परिवार, शरीर, धन आदि का मोह छोड़कर भारत माता को पराधीनता पाश से मुक्त करने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया, उनकी आत्माएं भारतीय राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आशा लेकर इस संसार से विदा हुई हैं। उन्हें विश्वास था कि अगली पीढ़ी हमारे छोड़े हुए काम को पूरा करेगी। नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति की अभी तीन मंजिलें पार करनी हैं। राजनैतिक क्रान्ति की अभी एक ही मंजिल तो पार हुई है। तीन चौथाई काम करना बाकी पड़ा है। यदि वैयक्तिक स्वार्थपरता तक सीमित रह कर हम उन सार्वजनिक उत्तरदायित्वों को उठाने से इनकार करेंगे, बहाने बनायेंगे तो निश्चय ही यह उन स्वर्गीय शहीदों के प्रति विश्वासघात होगा। इतिहास हमारे इस ओछेपन को सहन न करेंगे। भावी पीढ़ियाँ इस अकर्मण्यता को घृणा भरी दृष्टि से देखती रहेंगी।

मानव जीवन का गौरव समझने वाला कोई भावनाशील व्यक्ति अपने को इस घृणित परिस्थिति में रखना पसंद न करेगा—अखण्ड-ज्योति परिवार का कोई सदस्य तो निश्चित रूप में नहीं । हम लोग जिस भी परिस्थिति में है देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान अभियान में भाग लेते हुए बहुत कुछ करते रहे हैं, आगे बढ़ती हुई जिम्मेदारियों के अनुरूप और भी अधिक करेंगे। त्रिविध क्रान्तियों को सम्पन्न करने की तीन अग्नि परीक्षाओं में होकर जब गुजरना ही ठहरा तो झंझट किस बात का, जो करना हो उसे करेंगे ही।

आगामी गुरुपूर्णिमा हमसे कुछ अधिक खरी और अधिक स्पष्ट बात करने आ रही है। अब तक लड़खड़ाते हुए चलने की बात निभती रही, पर अब तो सीना तान कर ही चलना पड़ेगा। अब ‘यदा कदा’ के स्थान पर निश्चितता और नियमित की नीति बदलनी पड़ेगी। जिस प्रकार शरीर को नित्य ही नहाते, खिलाते, सुलाते हैं, जिस प्रकार परिवार की दैनिक जिम्मेदारियों को नियमित रूप से वहन करते हैं उसी प्रकार हमें नव निर्माण के उत्तरदायित्व भी एक प्रकार से दैनिक नित्य कर्मों में सम्मिलित करने पड़ेंगे और जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बनाना पड़ेगा। अपने दृष्टिकोण में जब तक यह परिवर्तन न हो तब तक युग-परिवर्तन अभिमान के एक उत्तरदायी सदस्य के ऊपर आने वाली जिम्मेदारियों को हम समुचित रूप से पूरा कर ही न सकेंगे।

गुरुपूर्णिमा पर्व अखण्ड-ज्योति का हर सदस्य सदा से मनाता आया है। सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, गुरु पूजन, सत्संकल्प पाठ, दीप दान आदि औपचारिक कर्म काण्ड प्रायः सभी शाखाओं में आयोजित किये जाते हैं। जहाँ शाखाएं नहीं हैं वहाँ वह कार्यक्रम वैयक्तिक रूप से किया जाता है। इस पर्व पर श्रद्धाञ्जलि के रूप में गुरुदक्षिणा देने की भी प्रथा है। मातृऋण, पितृ ऋण की तरह गुरु ऋण भी रहता है और उसे अपने धर्म एवं अपनी संस्कृति के प्रति आस्था रखने वाले किसी न किसी रूप में चुकाकर अपने को आँशिक रूप से उऋण बनाने का प्रयत्न किया करते हैं। स्वर्गीय पितरों के वार्षिक श्राद्ध की तरह गुरुदक्षिणा भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देनी ही पड़ती है। नहीं तो एक धार्मिक ऋण हमारे ऊपर चढ़ा ही रह जाता है।

गत वर्षों में अपनी-अपनी श्रद्धा और स्थिति के अनुरूप अखण्ड-ज्योति के सदस्य जिस प्रकार भी इस पुनीत पर्व पर जो भी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते रहे हों, वह बात अलग है। पर इस वर्ष तो हम सभी को एक ही प्रकार अपनाना है। वह है नव-निर्माण के लिए ‘यदा कदा’ कुछ कर देने की ढील-पोल छोड़कर निश्चित और नियमित रूप से कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लेना। शरीर में कई अंग होते हैं उन सबको रक्त देना पड़ता है, परिवार में कई सदस्य होते हैं उन सब का भरण पोषण करना होता है, दैनिक क्रम में अनेकों समस्याएं रहती हैं, उन सब को सुलझाना पड़ता है। इन्हीं दैनिक आवश्यकताओं में एक नव निर्माण के राष्ट्रीय कर्तव्यों की आवश्यकता को भी जोड़ लेना चाहिये। उसे दैनिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता का स्थान देना चाहिये। यदि इतना किया जा सका तो यह ठोस गुरु पूर्णिमा होगी। यह व्रत लिया जा सका तो गुरु ऋण, राष्ट्रीय ऋण, समाज ऋण, धर्म ऋण सभी से उऋण होने का अवसर मिलेगा।

हमारी माँग यह है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य “एक घंटा समय तथा एक आना नित्य” (आज के समय में १ रुपया) नव निर्माण योजना के धर्म कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दान किया करें। दान, भारतीय धर्म का अंग है। दान से विमुख कृपण की सद्गति नहीं होती। कुपात्रों को विडम्बनाओं को दान तो हम बहुत दिन से देते आ रहे हैं पर अब आदर्श एवं कर्त्तव्य के लिये अपनी परमार्थ बुद्धि को प्रयुक्त करना पड़ेगा। देखा-देखी के निरर्थक आडम्बरों में हम न जाने कितना धन और समय लगाते रहते हैं, पर तात्विक सत् प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकना विवेकवानों के लिये ही संभव होता है। नामवरी और स्वर्ग-सिद्धि के लिये तो लोभी दुनिया न जाने क्या-क्या लुटाती रहती है पर जिससे मानवता का मुख उज्ज्वल हो सके ऐसे तात्विक परमार्थ को अपना सकना केवल विवेकशील, जागृत आस्थाओं का ही काम है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को इस श्रेणी में गिना जा सकता है इसलिये इन से इस प्रकार की याचना एवं आशा करना भी हमारे लिये उचित ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 48, 49

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (अन्तिम भाग)

चरित्रवान् बनने के लिये अपनी आत्मिक शक्ति जगाने की आवश्यकता होती है। तप, संयम और धैर्य से आत्मा बलवान बनती है। कामुकता, लोलुपता व इन्द्रिय सुखों की बात सोचते रहने से ही आत्म-शक्ति का ह्रास होता है। अपने जीवन में कठिनाइयों और मुसीबतों को स्थान न मिले तो आत्म-शक्ति जागृत नहीं होती। जब तक कष्ट और कठिनाइयों से जूझने का भाव हृदय में नहीं आता तब तक चरित्रवान् बनने की कल्पना साकार रूप धारण नहीं कर सकती।

चरित्र-निर्माण के लिये साहित्य का बड़ा महत्व है। महापुरुषों की जीवन कथायें पढ़ने से स्वयं भी वैसा बनने की इच्छा होती है। विचारों को शक्ति व दृढ़ता प्रदान करने वाला साहित्य आत्म-निर्माण में बड़ा योग देता है। इससे आन्तरिक विशेषताएं जागृत होती हैं। अच्छी पुस्तकों से प्राप्त प्रेरणा सच्चे मित्र का कार्य करती हैं। इससे जीवन की सही दिशा का ज्ञान होता है। इसके विपरीत अश्लील साहित्य अधःपतन का कारण बनता है। जो साहित्य इन्द्रियों को उत्तेजित करे, उससे सदा सौ कोस दूर रहें। इनसे चरित्र दूषित होता है। साहित्य का चुनाव करते समय यह देख लेना अनिवार्य है कि उसमें मानवता के अनुरूप विषयों का सम्पादन हुआ है अथवा नहीं? यदि कोई पुस्तक ऐसी मिल जाय तो उसे ही सच्ची रामायण, गीता, उपनिषद् मानकर वर्णित आदर्शों से अपने जीवन को उच्च बनाने का प्रयास करें तो चारित्रिक संगठन की बार स्वतः पूरी होने लगती है।

हमारी वेषभूषा व खानपान भी हमारे विचारों तथा रहन-सहन को प्रभावित करते हैं। भड़कीले, चुस्त व अजीब फैशन के वस्त्र मस्तिष्क पर अपना दूषित प्रभाव डालने से चूकते नहीं। इनसे हर घड़ी सावधान रहें। वस्त्रों में सादगी और सरलता मनुष्य की महानता का परिचय है। इससे किसी भी अवसर पर कठिनाई नहीं पड़ती। मन और बुद्धि की निर्मलता, पवित्रता पर इनका बड़ा सौम्य प्रभाव पड़ता है। यही बात खान-पान के सम्बन्ध में भी है। आहार की सादगी और सरलता से विचार भी वैसे ही बनते हैं। मादक द्रव्य मिर्च, मसाले, मांस जैसे उत्तेजक पदार्थों से चरित्र-बल क्षीण होता है और पशुवृत्ति जागृत होती है। खान-पान की आवश्यकता स्वास्थ्य रहने के लिए होती है न कि विचार-बल को दूषित बनाने को। आहार में स्वाद-प्रियता से मनोविकार उत्पन्न होते हैं। अतः भोजन जो ग्रहण करें, वह जीवन रक्षा के उद्देश्य से हो तो भावनायें भी ऊर्ध्वगामी बनती है।

चरित्र-रक्षा प्रत्येक मूल्य पर की जानी चाहिये। इसके छोटे-छोटे कार्यों की भी उपेक्षा करना ठीक नहीं। उठना, बैठना, वार्तालाप, मनोरंजन के समय भी मर्यादाओं का पालन करने से उक्त आवश्यकता पूरी होती है। सभ्यता का चिह्न सच्चरित्र, सादा जीवन और उच्च विचारों को माना गया है। इससे जीवन में मधुरता और स्वच्छता का समावेश होता है। जीवन की सम्पूर्ण मलिनतायें नष्ट होकर नये प्रकाश का उदय होता है जिससे लोग अपना जीवन लक्ष्य तो पूरा करते ही हैं औरों को भी सुवासित तथा लाभान्वित करते हैं। जीवन सार्थकता की साधना चरित्र है। सच्चे सुख का आधार भी यही है। इसलिए प्रयत्न यही रहे कि हमारा चरित्र सदैव उज्ज्वल रहे, उद्दात्त रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 11

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग ३)

काम-विषयक सदाचार चरित्र की सर्वश्रेष्ठ विशेषता और कसौटी मानी गई है। कुछ अर्थों में ‘‘चरित्र’’ शब्द से मर्यादित कामोपभोग का ही अर्थ लगाया जाता है। जिन देशों में स्त्री-पुरुषों के बीच की शील मर्यादाएं निश्चित नहीं, वहां भारी विश्रृंखल पैदा हुआ देखा जाता है। पाश्चात्य देश इस कुटिल प्रवंचना में ग्रसित होने के कारण अपना श्रेय खो चुके हैं। पाश्चात्य सिद्धान्तों पर आधारित इस घृणित दुष्प्रवृत्ति के कारण भारतीय संस्कृति और समाज कम अस्त-व्यस्त नहीं हुआ। इस विषैली कामुकता की दुर्भाग्यपूर्ण स्वच्छन्दता ने आज सारे सामाजिक ढांचे को ही खोखला कर दिया है। इसके दुष्परिणाम भी बुरी तरह से लोगों को आहत बनाने में लगे हैं। स्वास्थ्य की दुर्दशा, अशक्तता, अपहरण, हत्या और आत्म-हत्याओं के आज जितने दृश्य दिखाई दे रहे हैं उन सबका अधिकांश कारण मनुष्य का चारित्रिक पतन ही है। सदाचार की सीमायें जब तक निर्धारित न होंगी और दुराचार पर जब-तक प्रतिबन्ध न लगेगा तब-तक समाज में सुख शान्ति और व्यवस्था का स्थापित होना प्रायः असम्भव ही है।

भीतर-बाहर से पवित्र रहने, शुद्ध आचरण करने, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय, सत्संग, शक्ति पुरुषार्थ, आत्मिक-प्रसन्नता के आधार पर ही मनुष्य की उन्नति सम्भव है। आत्म-नियन्त्रण, संयम और सम्भाषण से न केवल अपने को वरन् अपने पास-पड़ोस और सम्पर्क में आने वालों को भी सुख मिलता है। मानवता का विकास भी इसी से सम्भव है कि दूसरों को भी अपने ही समान समझें और सबके साथ सद्व्यवहार करें। यह सब चरित्रवान् व्यक्ति के लक्षण हैं। जिनके द्वारा दूसरों को भी आत्म-कल्याण की प्रेरणा मिले वही चरित्र के सच्चे धनी कहे जा सकते हैं।

पर-निन्दा, छिद्रान्वेषण, झूठ, छल, कपट, व्यभिचार, लोलुपता ये सब आसुरी प्रवृत्तियां हैं। इनसे विनाशकारी परिणाम ही उपस्थित होते हैं। पर आत्म-संयम और स्वत्वाभिमान के द्वारा वैयक्तिक व सामाजिक सभी प्रकार की श्रेष्ठताओं का उदय होता है। चरित्र-साधना का मूलाधार मानसिक पवित्रता है। जीवन के प्रत्येक छोटे-मोटे व्यवसाय व क्रिया-कलापों में मानसिक स्थिति का प्रभाव पड़ता ही है। आत्मिक पवित्रता का परिणाम सदाचरण है जिससे सुख मिलता है। कुविचारों से कुकर्म उठ खड़े होते हैं, जिससे कष्ट, क्लेश और मुसीबतें आ उपस्थित होती हैं। इसलिए छोटे-से-छोटे कार्य में भी पवित्रता का भाव बनाये रखने से चारित्रिक-विकास होता है। प्रातःकाल सोकर उठने से दिन भर कार्यरत रहने और सायंकाल निद्रा-माता की गोद में जाने तक जितने कर्म हमें करने पड़ें उनमें पवित्रता का भाव बना रहे तो ही किसी को चरित्रवान् कहलाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह एक साधना है जिसकी सिद्धियां अनन्त हैं।

चरित्र का आधार धर्म है। मन, वचन और कर्म के धार्मिक कृत्यों के निर्वाह को सदाचार कहा जाता है। इससे चरित्र बनता है। मानवता से ओत-प्रोत भावनाओं से चरित्र की रक्षा सम्भव है। अतएव अपने जीवन में उदारतापूर्वक धार्मिक भावनाओं को धारण किए रहने से चारित्रिक-बल प्रगाढ़ बना रहता है। बुद्धि, धन या शरीर बल तब तक सुख नहीं दे सकते जब तक चरित्र में मानवता, बुद्धि में धर्मभाव और शरीर से सत्कर्म नहीं बन पड़ते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 10

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.10

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग २)

समाज की सुव्यवस्था का आधार उज्ज्वल चरित्र के व्यक्तियों का बाहुल्य माना गया है। सुख-शान्ति और सन्तोष की परिस्थितियां नेक व्यक्तियों के सदाचार से बनती हैं। प्रेम, स्नेह, मैत्री, दया, आत्मीयता और सहानुभूति का वातावरण जहां भी रहेगा वहीं स्वर्ग जैसे सुखों की रसानुभूति होने लगती है। जो मनुष्य स्वभावतः दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार करते हैं, स्नेह वर्तते और परोपकार की भावना रखते हैं वे अपने चरित्र की उज्ज्वल छाप दूसरों पर भी छोड़ते हैं। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है तो ऐसे स्थान विशेष में स्वर्गिक परिस्थितियों का उभार स्वयमेव होने लगता है। व्यक्ति के चरित्रवान् बनने से ही किसी समाज का सच्चा सुधार हो सकता है। व्यक्ति के चरित्रवान् बनने से ही किसी समाज का सच्चा सुधार हो सकता है। इसलिए चरित्र की महान महत्ता को सभी महापुरुषों ने स्वीकार किया है।

यह देखा जाता है कि लोग अपने बच्चों के नाम राम-कृष्ण, शिव-शंकर, राणाप्रताप, रणजीत आदि रखना अधिक पसन्द करते हैं। रावण, कंस या खरदूषण नाम रखना किसी को भी प्रिय नहीं। इससे प्रतीत होता है कि लोगों में चरित्रवान् की प्रतिष्ठा व सम्मान का भाव अधिक पाया जाता है। यह बात अपने यहां ही नहीं हर देश, जाति और संस्कृति में पाई जाती है। इससे चरित्र की महान् महत्ता प्रतिपादित होती है। मनुष्य की कीर्ति, यश और सम्मान का आधार बाह्यजगत की सफलताएं नहीं हैं। उसकी आन्तरिक श्रेष्ठता के आधार पर युगों तक यश शरीर अमर रहता है। सोलहवीं सदी में सबसे बड़ा पहलवान कौन हुआ, ईसा के जन्म से दो शताब्दी पूर्व कौन व्यक्ति सर्वाधिक धनी हुआ है यह कोई भी न जानता होगा, इतिहास में भी इनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता किन्तु भगवान राम, कृष्ण, हरिश्चंद्र, शिव, दधीच, अर्जुन आदि चरित्रवान् महापुरुषों की जीवनियां आज भी लोगों को मुंह जबानी याद हैं।

दुराचारी व्यक्ति अपनी बाह्य-शक्तियों को भी देर तक बनाए नहीं रख सकते। कुकर्मों पर चलने से उनकी दुर्दशा स्वाभाविक है। फलतः उनका जीवन दिन-दिन पतित होता जाता है और उन्हें निरन्तर नारकीय यन्त्रणायें भोगनी पड़ती हैं किन्तु चरित्रवान व्यक्तियों को बुरा-समय भी वरदान सिद्ध हुआ है। अपनी चारित्रिक विशेषता के कारण सत्यव्रती हरिश्चन्द्र ने अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया, उर्वशी का श्राप कालान्तर में अर्जुन के लिए वरदान सिद्ध हुआ। रावण के दुष्कर्मों का फल विनाश के रूप में मिला और विभीषण की नेकी का परिणाम यह हुआ कि उसे लंका की राजगद्दी मिली। चरित्र मनुष्य को सदैव ही ऊंचे उठाता है। परिस्थितियां तो चरित्रवान पुरुषों की चेरी कहीं गई हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग १)

मनुष्य जीवन की सार्थकता उज्ज्वल और उद्दात्त चरित्र से होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के भागीदार वे होते हैं जिनमें चारित्रिक बल की न्यूनता नहीं पाई जाती। जिस पर सभी लोग विश्वास करते हों, ऐसे ही लोगों की साख औरों पर पड़ती है। पर-उपदेश तो वाक्पटुता के आधार पर धूर्त व्यक्ति तक कर लेते हैं। किन्तु दूसरों को प्रभावित कर पाने की क्षमता, लोगों को सन्मार्ग का प्रकाश दिखाने की शक्ति चरित्रवान् व्यक्तियों में हुआ करती है। सद्-विचारों और सत्कर्मों की एकरूपता को ही चरित्र कहते हैं। जिसके विचार देखने में भले प्रतीत हों किन्तु आचार सर्वदा भिन्न हों, स्वार्थपूर्ण हों, अथवा जिनके विचार छल व कपट से भरे हों और दूसरे को धोखा देने, प्रपंच रचने के उद्देश्य से चिन्ह पूजा के रूप में सत्कर्म करने की आदत होती है उन्हें चरित्रवान् नहीं कहा जा सकता। सत्कर्मों का आधार इच्छाशक्ति की प्रखरता है। जो अपनी इच्छाओं को नियन्त्रित रखते हैं और उन्हें सत्कर्मों का रूप देते हैं उन्हीं को चरित्रवान् कहा जा सकता है। संयत इच्छा-शक्ति से प्रेरित सदाचार का ही नाम चरित्र है।

विपुल धन सम्पत्ति, आलीशान मकान, घोड़े-गाड़ी, यश, कीर्ति आदि कमाने एवं विविध भाग भोगने की इच्छा आम लोगों में पाई जाती है। बालकों का हित भी इसी में मानते हैं कि उनके लिए उत्तराधिकार में बहुत धन दौलत जमा करके रखी जाय। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि जिस धन से भावी सन्तान आत्म-निर्माण न कर सके वह धन क्या? बिना श्रम उत्तराधिकार में मिला धन घातक होता है। सच्ची बपौती व्यक्ति का आदर्श चरित्र होता है, जिससे बालक अपनी प्रतिभा का स्वतः विकास करते हैं। उज्ज्वल चरित्र का आदर्श भावी सन्तति के जीवन-निर्माण में प्रकाश स्तम्भ का कार्य करता है।

समाज का सौन्दर्य, सुख और शान्ति चरित्रवान् व्यक्तियों के द्वारा स्थिर रहती है। दुष्चरित्र और दुराचारी लोगों से सभी भयभीत रहते हैं। उनके पास आने में लोग लज्जा व संकोच अनुभव करते हैं। जो भी उनके सम्पर्क में आता है उसे ही वे अपने दुष्कर्मों की आग में लपेट लेते हैं। ऐसा समाज दुःख, कलह ओर कटुता से झुलसकर रह जाता है। अनेकों प्रकार की भौतिक सम्पत्तियां व सांसारिक सुख सुविधाएं होते हुए भी लोगों को शान्ति उपलब्ध नहीं होती। अधिकतर लोग कुढ़-कुढ़कर जीवन बिताते रहते हैं। यह सब चारित्रिक न्यूनता के कारण ही होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (अन्तिम भाग)

🔷 भय और मलीनता से मुक्त रहने वालों की आत्मा तेजोपूत और उज्ज्वल रहा करती है। उसकी शक्ति बढ़ती और प्रभावपूर्ण बनती जाती है। उज्ज्वल और सत्यपूत आत्मा वाला व्यक्ति हजार दुष्टों तथा धूर्तों में भी ठीक उसी प्रकार प्रचण्ड और निर्भय बना रहता है जिस प्रकार एक अकेला केसरी शृंगालों और शूकरों के झुण्ड में। निर्भयता में अनन्त व अनिवर्चनीय आनन्द है। इसकी प्राप्ति सत्याचरण, सत्य वचन और सत्य व्यवहार द्वारा ही होती है। सत्य जीवन की सर्वोत्तम नीति है। इसका पालन करने वाला निश्चय ही किसी भी क्षेत्र में अपना श्रेष्ठतम निर्माण कर सकने में सफल हो जाता है।

🔶 मनुष्य की आत्मा ही सर्वोत्तम तत्व और उसका सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व है। आत्मा की रक्षा करना मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म बताया गया है। जिसने परमात्मा के प्रधान अंश आत्मा की रक्षा कर ली, उसे अपने आचरण, व्यवहार और क्रियाओं की सत्यता द्वारा पुष्ट और बलिष्ठ बना लिया और उसे मल विक्षेप अथवा कुटिलता के कलुष से मुक्त कर उसके मूल तत्व परमात्मा की ओर उत्सुक कर दिया। उसने मानों अपना ठीक-ठीक निर्माण कर लिया। वह अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व में पूरी तरह उत्तीर्ण माना जाता है, जिसके पुरस्कार स्वरूप उसे भवसागर से पार उतार कर सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा की गोद में पहुंचा दिया जाता है।

🔷 मनुष्य अपना शिल्पी आप है। वह स्वयं ही अपना निर्माण करता है। उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है। आत्म-तत्व की रक्षा ही सर्वोत्कृष्ट निर्माण माना गया है। इस निर्माण के लिये मनुष्य को सत्य तथा वास्तविक नीति का अवलम्बन करना चाहिये। सत्य मानव-जीवन की सफलता के लिये सर्वोत्तम नीति है। इसको अपनाकर चलने वाले किसी भी दिशा और किसी भी क्षेत्र में अपना स्थान बनाकर अन्त में परम पद के अधिकारी बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 18

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.18

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

सोमवार, 22 जनवरी 2018

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 4)

🔷 उपर्युक्त कतिपय बातें तो अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व निर्वाह के सम्बन्ध में हैं। अब सबसे विस्तृत क्षेत्र आता है व्यवहार जगत। इस क्षेत्र में तो मनुष्य को अधिकाधिक सावधान तथा संयमित रहना चाहिए। यही वह क्षेत्र है जिसमें मनुष्य के असभ्य व्यवहारी होने की सबसे अधिक सम्भावना रहती है। आजकल विश्वासघात, दगाबाजी और वचनाघात अर्थात् कुछ कहना, कुछ करना, जो कुछ कहना उसे पूरा न करना एक सामान्य-सा चलन बन गया है। विश्वासघात अथवा वचनघात को पाप के स्थान पर चतुरता मानी जाने लगी है। लोग दूसरे के साथ विश्वासघात कर अपने को होशियार समझने लगे हैं। सोचते हैं कि काम बनाने को लोगों को इसी प्रकार बेवकूफ बनाया जाता है, जबकि अपने दिये वचन का पालन न करना, विश्वास देकर पूरा न करना बहुत ही भयानक पाप है।

🔶 सभी धर्मों और सभी शास्त्रों में इसकी घोर निन्दा की गई है। आचार्यों ने धर्म का मूल सत्य को ही माना है। विश्वास की रक्षा और वचन का पालन न करने वाले चाहे सौ जन्मों तक धर्म करते रहें तब भी वे उन्नति अथवा विकास की ओर एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकते। सत्य निष्ठा ही वह प्रथम सोपान है जिस पर चढ़कर ही कोई व्यक्ति धर्म की ओर, उच्चता और श्रेष्ठता की ओर, अध्यात्म तथा ईश्वर की ओर बढ़ सकता है। सत्य, लोक से लेकर परलोक तक के सारे धर्मों का मूल है। हर विषय, हर बात और हर व्यवहार में वास्तविक रूप में सच्चे रहने वाले व्यक्ति ही किसी दिशा में अपना यथार्थ आत्म-निर्माण कर सकते हैं।

🔷 सत्य और ईमानदारी जीवन की सर्वोपरि उत्तम नीति है। इसकी सर्वोपरिता का कारण यह है कि इसमें निष्ठा रखने वाले लोगों के लिये न तो भय होता है और न शंका। सत्यनिष्ठ पुरुषों के चरित्र में दीनता, दयनीयता और हीनता जैसे दुर्गुण नहीं आते। जो सच बोलता है, सत्य व्यवहार करता है, यथार्थ सोचता है और सबके प्रति ईमानदार रहता है, उसके लिये किसी भी प्रकार का डर हो भी कैसे सकता है? सत्यनिष्ठ पुरुष संसार में निर्भयतापूर्वक विचरण करता और सबसे असंदिग्ध व्यवहार करता हुआ आनन्द मनाया करता है। उसे न किसी से डरने की आवश्यकता होती है और न दबने की।

🔶 जो न किसी को धोखा देता है न किसी प्रकार की चोरी करता है, जितना जो कुछ कहता है उसे पूरा करता है। विश्वासघात और दगाबाजी जैसे जघन्य पापों से जिनकी आत्मा मुक्त है, जो न तो किसी के लिये दुर्भाव रखता है और न किसी को वंचित करने का प्रयत्न करता है। ऐसे सत्पुरुष को संसार में किसी भी देव, दानव अथवा मनुष्य से डरने का कारण भी क्या हो सकता है। डर का निवास तो असत्य और मिथ्यात्व में होता है। सत्यनिष्ठ सिंह पुरुष सदैव निर्भय और निर्भीक ही रहा करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.17

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 3)

🔷 जीवन-निर्माता धर्म का आधार है सत्य और ईमानदारी। मनुष्य जो कुछ कहे, करे और सोचे उसका आधार सत्य ही होना चाहिये। जिसने आत्म-निर्माण के लिये धनाढ्यता को आदर्श बनाया है उसे चाहिये कि वह धन के लिये जिस व्यवसाय को अपनाता है उसमें पूरी तरह ईमानदार रहे। यदि दुकानदारी करता है तो पूरा तोले, उचित मूल्य ले। खरा माल दे, ठीक पैसे बतलाये। वस्तु, मूल्य तथा उसके गुण बतलाते समय सच बोले। जिस कीमत में किसी एक ग्राहक को वस्तु दे उसी कीमत में दूसरे को। मुनाफा कमाने के लिये वस्तुएं छिपाकर न रखे। होते हुए किसी से इनकार न करे। आबाल वृद्ध सभी के साथ उसकी इसी प्रकार की एक जैसी ही नीति रहनी चाहिए। किसी अनजान, अबोध अथवा निर्बल से चीज होते हुए भी इनकार कर देना अथवा ज्यादा दाम लेकर देना और किसी जानकार, बुद्धिमान अथवा बलवान व्यक्ति को अलभ्य वस्तुएं भी ठीक दामों पर दे देना, व्यापार जैसे पवित्र काम में एक बड़ा कलंक है।

🔶 व्यापारियों और कारखानेदारों को चाहिए कि वे खरा माल बेचे-बनायें, नकली अथवा निकृष्ट माल बाजार में न भेजें, अधिक मुनाफाखोरी से बचें। लागत के अनुसार कीमत लें। मजदूरों तथा कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक दें। शोषण, मुनाफाखोरी और कालाबाज़ारी की नीति से बचें। इन सब आदर्शों के साथ धनाढ्यता का लक्ष्य पाने वाले ही उस दिशा में अपने निर्माता माने जाएंगे।

🔷 जिसका लक्ष्य एक अच्छा श्रमिक बनना हो वह किसी भी काम को पूरे तन-मन के साथ पूरे समय भर करे। पारिश्रमिक की मात्रा के अनुसार अपने श्रम की मात्रा घटाने-बढ़ाने के बजाय हर स्थिति में पूरी ईमानदारी बरतें अर्थात् पारिश्रमिक भले ही कम हो लेकिन अपने श्रमदान की मात्रा पूरी रखें। कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व का निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करें। उनके काम पर आने का जो नियत समय हो, अकारण ही उससे देर न करें। पूरे समय पर एकनिष्ठ भाव से काम करें। समय पूरा होने से पहले काम न छोड़ें। कामचोरी, रहस्योद्घाटन, चुगली, पिशुनता आदि से बचे रहें। इस प्रकार अपने साधारण कामों में भी पूरी ईमानदारी और सत्य का निर्वाह करके आत्म-निर्माण किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.17

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 2)

🔶 निर्माण निर्माण है। वह कैसा भी हो—आखिर वह निर्माण ही है—इस उक्ति को मान्यता नहीं दी जा सकती। यदि निकृष्ट निर्माण को भी मान्यता दी जाने लगेगी, तो संसार में उत्कृष्टता एवं श्रेष्ठता का कोई मूल्य, महत्व ही न रह जायेगा। निर्माण संज्ञा का वास्तविक अधिकारी उत्कृष्ट निर्माण ही हो सकता है, निकृष्ट निर्माण नहीं। अपने को धनवान् अथवा विद्वान् निर्माण करने में जिसने अयोग्य तथा अनुचित उपायों का प्रयोग किया है उसे यदि धनवान और विद्वान् मान लिया जायेगा तो फिर चोर, धूर्त अथवा ठग किसे कहा जाएगा और इस तथाकथित धनवान तथा विद्वान् में क्या अन्तर रह जायेगा। जिसने परिश्रम, पुरुषार्थ, अध्यवसाय एवं तपस्या के आधार पर अपना निर्माण किया है।

🔷 शिव और अशिव के दो विरोधी उपायों से अर्जित उपलब्धियों को समान श्रेय नहीं दिया जा सकता। यदि कोई ऐसा करता अथवा मानता है तो वह या तो अज्ञानी है अथवा अधम प्रकृति का व्यक्ति। उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है और निकृष्ट निर्माण मिथ्या क्रियाकलाप। अस्तु, उचित यही है कि वह जिस क्षेत्र में अपना निर्माण करे तो उत्कृष्ट रीति से ही करे, नहीं तो कंचन के रूप में पापों की गठरी बांधने से कहीं अच्छा है कि वह निर्धन और गरीब बना रहे।

🔶 उत्कृष्ट निर्माण का आधार धर्म है। धर्म का अर्थ अधिकतर लोग पूजा-पाठ, जप, उपासना, कीर्तन, भक्ति आदि ही मानते हैं। इसीलिये जीवन के अन्य कार्यक्रमों के साथ एक छोटा-सा धार्मिक कार्यक्रम और जोड़कर समझते हैं कि दुनियादारी के साथ-साथ धर्म का भी निर्वाह करते हैं। पूजा-पाठ आदिक कार्यक्रम को धर्म मानने वाले यह नहीं समझ पाते कि संसार का हर काम का एक धर्म होता है। उसके कुछ आदर्श और नियम होते हैं। पूजा-पाठ के कार्यक्रम के साथ जीवन क्रम के हर काम के आदर्श और नियम निर्वाह करने वाले को ही सच्चा धार्मिक कहा जा सकता है।

🔷 केवल मात्र पूजा-पाठ, जप-तप तक ही सीमित रहकर यदि कोई चाहे कि वह अपना उत्कृष्ट निर्माण कर लेगा, तो उसे निराश ही रहना होगा। उत्कृष्ट निर्माण तभी सम्भव होगा जब जीवन की प्रत्येक गतिविधि का धर्म-निर्वाह किया जायेगा। कोई पूजा-पाठ तो करता रहे, साथ ही कार-रोजगार, आचार-व्यवहार में असत्य, मिथ्या और बेईमान बना रहे तो उसका निर्माण निकृष्ट कोटि का ही हो सकेगा। जीवन क्रम में पग-पग पर ईमानदार, सत्यपरायण और आदर्शवान बने रहने पर यदि कोई पूजा-पाठ वाले धर्म के लिये समय नहीं दे पाता तो भी उसका निर्माण उत्कृष्ट ही होगा। उस छोटी-सी कमी के कारण उसकी जीवन तपस्या असफल नहीं हो सकती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.16

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👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 1)

🔶 मनुष्य अपना शिल्पी आप है। प्रारम्भ में वह एक चेतन-पिण्ड के रूप में ही उत्पन्न होता है। अपने जन्म के साथ न तो वह गुणी होता है, न बुद्धिमान, न विद्वान और न किसी विशेषता का अधिकारी। परमात्मा उसे मानव-मूर्ति के रूप में जन्म देता है और बीज रूप में उपयोगी शक्तियों को उसके साथ कर देता है। इसके बाद का सारा काम स्वयं मनुष्य को करना होता है। अपने इस उत्तरदायित्व के अनुसार वह स्वतन्त्र है कि अपनी रचना योग्यतापूर्वक करे अथवा अयोग्यतापूर्वक। जो अपनी रचना योग्यतापूर्वक करते हैं पुरस्कार रूप में वे परम पद पाकर चिदानन्द के अधिकारी होते हैं और जो अपनी रचना में असफल होते हैं वे जन्म-मरण के चक्र में चौरासी लाख योनियों की यातना सहते हैं।

🔷 मानव-पिण्ड के रूप में आया प्रारम्भिक मनुष्य अपने वंश के अनुसार विकसित होता हुआ अपना निर्माण प्रारम्भ कर देता है। अपनी सूझ-बूझ और निर्णय के अनुसार कोई धनवान बनता है, कोई विद्वान् बनता है, कोई व्यापारी बनता है तो कोई श्रमिक। कोई पापी बनता है तो कोई पुण्यात्मा। मनुष्य अपना निर्माण अनेक प्रकार का कर सकता है। मानव-निर्माण का कोई एक स्वरूप नहीं, असंख्य स्वरूप एवं प्रकार हैं। किन्तु उन सबको बांटकर दो प्रकारों में किया जा सकता है। एक उत्कृष्ट निर्माण दूसरा निकृष्ट निर्माण।

🔶 मनुष्य कुछ भी बने, किसी क्षेत्र अथवा किसी दिशा में बढ़े, विकास करे, यदि उसमें उसने श्रेष्ठता का समावेश किया हुआ है तो उसका निर्माण उत्कृष्ट निर्माण ही कहा जायेगा और यदि वह उसमें अधमता का समावेश करता है तो उसका निर्माण निकृष्ट ही माना जायेगा। उदाहरणार्थ यदि वह धन के क्षेत्र में बढ़कर अपना निर्माण धनाढ्य के रूप में करता है किन्तु इसकी सिद्धि में दुष्ट साधनों तथा उपायों का प्रयोग करता है, तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण निकृष्ट कोटि का कर रहा है। यदि वह इसकी सिद्धि में सत्य, शिव और सुन्दर से सुशोभित साधनों तथा उपायों का अवलम्बन करता है तो कहना होगा कि वह अपना निर्माण उत्कृष्ट कोटि का कर रहा है। इस प्रकार मनुष्य का कोई भी आत्म निर्माण या तो उत्कृष्ट कोटि का होता है अथवा निकृष्ट कोटि का।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 16

बुधवार, 17 जनवरी 2018

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (अन्तिम भाग)

🔶 मन के दमन के सम्बन्ध में पाश्चात्य मनोवेत्ताओं की शंका है कि—मन का दमन करने से भले ही उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो पर उसकी भावना मनुष्य के अवचेतन में दबे-दबे जीवित रहती है और अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करती रहती है। ज्यों ही उसे कोई अनुकूल परिस्थिति मिलती है वह सक्रिय होकर विविध प्रकार के उपद्रव उत्पन्न कर देती है। मनुष्य के मानसिक उपद्रवों के पीछे अधिकांश में दमन किये गये मन की वह अतृप्ति ही रहती है जो मनुष्य के अन्तर्मन में दबी पड़ी रहती है। सम्भव है पाश्चात्यों की इस शंका में सत्य का कोई अंश हो। किन्तु इस प्रकार का उपद्रव तभी सम्भव है जब मन का दमन अवैज्ञानिक ढंग से किया जाता है।

🔷 विषयों में अनुरक्ति रखते हुए मन की इच्छाओं का हनन अवैज्ञानिक है। इसका उचित मार्ग यही है कि विषय सेवन की हानियों पर विवेक द्वारा विचार किया जाये। ऐसा करने से विषयों से घृणा उत्पन्न होने लगेगी जिसका परिपाक वैराग्य में होगा। विषयों के प्रति वैराग्य होते ही मन उनसे स्वभावतः विमुख हो जायेगा। इस वैज्ञानिक विधि से वश में किए हुए मन की कोई ऐसी वासना न रहेगी जो अवचेतन में दबी पड़ी रहे और अवसर पाकर उपद्रव उपस्थित करे।

🔶 संसार में विषयों और उनके प्रति वांछाओं की कमी नहीं। उनसे हटाया हुआ मन, सम्भव है चतुर्दिक् वातावरण से प्रभावित होकर कभी फिर विपथी हो उठे—इस शंका से बचने के लिये विषयों से विरक्त मन को भी भगवान् अथवा उनके क्रियात्मक रूप परोपकार एवं परमार्थ में नियुक्त करना चाहिये क्योंकि मन निराधार नहीं रह सकता, उसको टिकने के लिये आधार चाहिये ही। परमात्मात्मक आधार से शुभ एवं निरापद, मन की एकाग्र स्थिति के लिये अन्य आधार नहीं हो सकता। वह परम है, उसी से सब कुछ का उदय है और उसमें सब कुछ का समाधान है और फिर परमात्मक रूप में एकाग्र किए हुए मन में जिस सुख-शांति एवं सन्तुष्टि का प्रस्फुरणा होगा, वह सुख होगा जो शाश्वत, अक्षय एवं स्थायी होता है उससे बढ़कर कोई भी सुख नहीं है। इस शाश्वत सुख को पाकर फिर कुछ पाना शेष न रह जायेगा। आज का विषयी एवं चंचल मन सदा सर्वदा के लिए सन्तुष्ट होकर स्थिर, एकाग्र तथा परिपूर्ण हो जायेगा। मन की यही दशा तो वह सुख शांति है जिसे पाने के लिये मनुष्य रूप जीवन जन्म-जन्मान्तर से भटकता चला आ रहा है किन्तु पा नहीं रहा है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.10

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सोमवार, 15 जनवरी 2018

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 4)

🔶 भारतीय दार्शनिकों ने मानसिक सुख-शांति का जो उपाय निर्देश किया है वह सत्य, शाश्वत, सार्वभौम, सार्वजनिक, सुलभ, सरल तथा सात्विकतापूर्ण है। उसका अवलम्बन लेकर क्या धनी, क्या निर्धन, क्या साधन सम्पन्न, क्या असावधान, क्या निर्बल सभी समान रूप से सुखी एवं शान्त रह सकते हैं। भारतीय दार्शनिकों का कहना है कि सच्ची सुख शांति मन की मनमानी करने में नहीं। मन की इच्छाओं एवं लालसाओं की पूर्ति करते रहने से सुख-शान्ति की उपलब्धि कदापि नहीं हो सकती। सच्ची सुख-शान्ति की प्राप्ति मन का रंजन करने से नहीं उसका दमन करने, कामनाओं एवम् लालसाओं को कम करने से ही प्राप्त हो सकती है।

🔷 लालसाओं की ज्यों-ज्यों पूर्ति की जाती है तृष्णा बढ़ती जाती है, जिसका परिणाम असन्तोष एवं अशान्ति के सिवाय और कुछ नहीं होता। मन की लालसा अभिलाषा एक दो हों और वह उन पर स्थिर भी रहे तो सम्भव है कि उनकी पूर्ति की जा सके और मन शान्त एवं सन्तुष्ट रहे। किन्तु यह चंचल मन अनन्त एवं असीम अभिलाषाओं का अभियुक्त होता है, ऐसी दशा में उसे किसी प्रकार भी सुखी तथा सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता। मानव मन की विवशता, विपरीतता तथा वितृष्णा स्पष्ट बतलाती है कि अपने सुख के लिये उसकी न तो कोई विशेष अभिलाषा होती है और न उसकी कोई एक ऐसी आकांक्षा होती है जिसकी पूर्ति से वह वास्तव में सुखी एवम् सन्तुष्ट हो सकता है।

🔶 यही नहीं उसका किसी विषय विशेष में भी अभिन्न योग नहीं होता, जिसके प्रसंग से वह सदा सर्वदा को सन्तुष्ट एवं सुखी हो सकता हो। मन प्रयत्नशील होता है वह अबोध बालकों अथवा शेखचिल्लियों की तरह क्षण भर में ‘वह-यह’ किया करता है। उसे डांट-डपट कर इस ‘यह-वह’ से मुक्त कर देना ही उसे सुखी एवम् संतुष्ट कर देना है। इस प्रकार कहना न होगा कि भारतीय दार्शनिक द्वारा बताया हुआ उपाय मन का दमन ही उसे सुखी एवम् संतुष्ट कर सकता है। निःसन्देह जिनका मन स्थिर एकाकांक्षी अथवा एक लक्ष्यीय होता है वे अवश्य ही अपेक्षाकृत अधिक सुखी तथा सन्तुष्ट रहा करते हैं। मन की विविधता, बहुलता एवम् चंचलता ही उसके दुःखी एवम् अशान्त होने का मूलभूत कारण है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 9


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रविवार, 14 जनवरी 2018

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 3)

🔶 इस सत्य का यदि पाश्चात्य मनोवेत्ताओं के पास कोई उत्तर हो सकता है तो केवल यह है कि मन को प्रसन्न करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं कि उसकी लालसाओं की पूर्ति करने का यथासाध्य प्रयत्न किया जाये। जो जिस सीमा तक इस प्रयत्न में सफल होता रहेगा वह उस सीमा तक सुखी एवं सन्तुष्ट रहेगा और जो जितनी सीमा तक असफल होगा वह उस सीमा तक दुःखी एवं अशांत रहेगा। उसे सुखी एवं सन्तुष्ट कर सकने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

🔷 क्या पाश्चात्य मानस-वेत्ताओं का यह उत्तर उपयुक्त माना जा सकता है? इसका तो ठीक-ठीक आशय यह है कि जो अधिक शक्तिशाली, साधन सम्पन्न तथा चतुर है वह वांछाओं को किसी प्रकार भी पूरी कर सुखी एवं सन्तुष्ट रह सकता है और जो सामान्य जन जिनके पास शक्ति, साधन तथा चातुर्य की कमी है वे दुःख की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में ही पड़े-पड़े रोते-कलपते रहेंगे। सुखी होने का यह उपाय शाश्वत, सार्वजनिक तथा सभ्यतापूर्ण नहीं है। निःसन्देह इसी प्रकार के दृष्टिकोण ने संसार में स्वार्थ, संघर्ष, शोषण तथा साम्राज्यवाद को जन्म दिया और बढ़ाया है। संसार में फैले अन्याय, अत्याचार तथा अनैतिकता का उत्तरदायी भी यही दूषित दृष्टिकोण ही है।

🔶 इसके अतिरिक्त इस पाश्चात्य कथन में सत्य का अंश भी नहीं है। यदि धन, धाम, वैभव-विभूति, साधन-सुविधा, वस्तुयें एवं उपादान संचय कर लेने से कोई सुख का अधिकारी बन सकता होता तो संसार का कोई भी साधन सम्पन्न व्यक्ति दुःखी अथवा असन्तुष्ट नहीं दिखाई देता। उसका जीवन शांतिपूर्वक शरद-सरिता की तरह निर्विकार रूप से आनन्द कलरव के साथ कल्लोल करता हुआ बहता चला जाता। इसके विपरीत असाधनवानों का कभी मानसिक समाधान ही न होता। वे सर्वदा क्षण-प्रतिक्षण अशान्ति एवं असुख के अनुपात में जलते मरते रहते। जबकि ऐसा देखने में नहीं आता। एक से एक बढ़कर सम्पन्न व्यक्ति दुःखी और एक से एक असम्पन्न व्यक्ति सुखी एवं असन्तुष्ट देखे जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 9
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शनिवार, 13 जनवरी 2018

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 2)

🔶 इस विषय में पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों से भारतीय दार्शनिकों का कहना है कि जीव अर्थात् मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति सुखमय है। उसका सत्य रूप आनन्दस्वरूप है। संसार की बाधायें माया जन्य हैं जो दुःख रूप में मानव मन पर आरोपित होती हैं। यदि जीव अपने सत्यस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करले तो दुःख की सारी अनुभूतियों का अत्यन्ता भाव हो जाये, फिर वह न तो कभी दुःखी हो और न पीड़ित।

🔷 इस प्रश्न के उत्तर में कि जब संसार में शोक संघर्षों का अस्तित्व स्थायी है और मनुष्य सांसारिक प्राणी है तो उसे सुख प्राप्ति ही किस प्रकार हो सकती है। उसके भाग्य में मानो सदा सर्वदा के लिए दुःख शोक ही अंकित हो गये हैं।—उत्तर में आधुनिक मानस वेत्ताओं का उत्तर है कि मानव-मन की कुछ अभिलाषायें होती हैं, इच्छायें तथा कामनायें होती हैं। जिनकी पूर्ति के लिये वह लालायित रहता है। अपनी कामनाओं की आपूर्ति में ही मन को दुःख तथा अशांति होती है। यदि उसकी लालसाओं, अभावों तथा आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे तो मन के दुःखी अथवा अशान्त होने का कोई कारण ही उपस्थित न हो। इसलिये मनुष्य को सुखी होने अथवा मन को सुखी करने के लिये उसी दिशा में बढ़ना होगा जिस दिशा में उसकी लालसाओं का पूर्ति-लाभ हो। मन जो कुछ चाहता है वह उसे मिल जाये तो निश्चय ही वह सुखी एवं सन्तुष्ट रहे।

🔶 सुनने में तो पाश्चात्यों का यह उत्तर बड़ा सीधा, सरल तथा समीचीन मालूम होता है पर भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार वह वैसा है नहीं। उनका कहना है कि मनुष्य का मन-मानस हर समय तरंगित होता रहता है। उसकी हर तरंग की तृप्ति नहीं की जा सकती। मनुष्य के चंचल मन की वासनाओं, कामनाओं, इच्छाओं, अभिलाषाओं तथा लालसाओं का वारापार नहीं। एक की पूर्ति होते ही दूसरी उठ खड़ी होती है। साथ ही चंचल मन में असन्तोष का एक दोष रहता है। किसी विषय की कामना करने पर यदि वह उसे मिल भी जाये तो वह उससे तृप्त नहीं होता, उसे ‘और-और’ का दौरा जैसा पड़ने लगता है। इस प्रकार वह विषय की पूर्ति में भी असन्तुष्ट एवं अशान्त रहने लगता है, और यदि एक बार उसकी और, और की तृष्णा भी बहुतायत से पूरी की जा सके तो उसे शीघ्र ही उस विषय से अरुचि होने लगती है और वह नवीन विषय के लिये उत्सुक हो उठता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 8
http://awgpskj.blogspot.in/2018/01/1_12.html

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.8

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 1)

🔶 मनोविश्लेषण आधुनिक समय का एक विशेष तथा नवीन विज्ञान माना जा रहा है। यह मनोविज्ञान पाश्चात्य देशों के लिये कोई नवीन अथवा विज्ञान हो सकता है। किन्तु भारत के लिये यह एक प्राचीन विषय है। दुःख सुख की अनुभूतियां, काम क्रोध, लोभ-मोह आदि की वृत्तियों, उनका कारण एवं निवारण का उपाय इस देश का चिर परिचित तथा प्राचीन विषय है। अन्तर केवल यह है कि भारत के प्राचीन वेत्ताओं ने इस विषय को दर्शन का नाम दिया था और आज के पाश्चात्य विद्वानों ने इसे मनोज्ञान अथवा मानस-विज्ञान की संज्ञा दी है। ध्येय दोनों का मनःस्थिति द्वारा आन्तरिक सुख शान्ति ही रहा है।

🔷 सुख-दुःख की अनुभूति मन में होती है। अस्तु, मन की स्थिति पर सुख दुःख का आना जाना स्वाभाविक है। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य सांसारिक प्राणी है। उसका संसार के विषयों की ओर झुकाव होना अनिवार्य है। संसार में जहां इच्छा, अभिलाषाओं तथा कामनाओं का बाहुल्य है वहां शोक संघर्षों की भी कमी नहीं है। संसार में निवास करने वाला मनुष्य इन अवस्थाओं से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। कामनायें होंगी, अभाव खटकेगा, फलस्वरूप मन को अशान्ति होगी। मन अशांत रहने पर तरह-तरह की बाधाओं तथा व्यामोहों का जन्म होगा और चिन्ताओं की वृद्धि होगी, जिसका परिणाम दुःख के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।

🔶 पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का यह कथन किसी प्रकार भी गलत नहीं कहा जा सकता। निःसन्देह बाधाओं का यही क्रम है जिससे मनुष्य को दुःख का अनुभव करने के लिये विवश होना पड़ता है। किन्तु उनके इस कथन से जो यह ध्वनि निकलती है कि मनुष्य को दुःख होना ही स्थायी अनुभूति है अथवा सांसारिक स्थिति के अनुसार पीड़ा उसका प्रारब्ध भाग है—ठीक नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 8

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.8

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

शनिवार, 6 जनवरी 2018

👉 मन का भार हल्का रखिये (अन्तिम भाग)

🔷 काम करते समय आपको जब भी निराशा, बोझ या घबराहट लगा करे, उस समय अपने आत्म-विश्वास को जगाने का प्रयत्न किया कीजिये। आध्यात्मिक चिन्तन किया कीजिये। आप यह सोचा करिये कि आप भी दूसरों की तरह एक बलवान् आत्मा हैं, आपके पास शक्तियों का अभाव नहीं है। अभी तक उनका प्रयोग नहीं किया है इसीलिये भय, संकोच या लज्जा आती है। पर अब आपने जान लिया है कि आपकी भी सामर्थ्य कम नहीं है। आप निर्धन परिवार के सदस्य नहीं, वरन् परमात्मा के वंश में उसकी उत्कृष्ट शक्तियाँ लेकर अवतरित हुए हैं फिर आपको घबराहट किस लिये होनी चाहिये?

🔶 जब भी कभी आपको कोई मानसिक भय, उलझन या निराशा उत्पन्न हो, आप कुछ देर के लिये एकान्त में चले जाया कीजिये। कल्पना में शुभ और पौरुष पूर्ण चित्र बनाया कीजिये। असफलता की बात मन से जितनी दूर भगा देंगे, उतनी ही आपके अन्दर रचनात्मक प्रवृत्तियाँ जागृत होंगी और आपका जीवन सुख-सुविधाओं से पूर्ण होता चलेगा।

🔷 प्रत्येक कार्य शान्ति और स्थिरतापूर्वक किया कीजिये आप महान् आत्मा हैं, आपका जन्म किन्हीं महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ है। बड़ी सफलता के लिये बड़ा साहस चाहिये। वह साहस आप में सोया है, उसे जागृत करना आपका काम है। आप इस लक्ष्य को समक्ष रखकर शुभ कल्पनाएं किया कीजिये और मन को भय घबराहट तथा निराशा आदि के बोझ से मुक्त रखा कीजिये आपका मन हल्का रहे तो उसमें से रचनात्मक स्रोत फूट पड़ें और आपको सब तरह की सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कर दें ऋषि की इस प्रार्थना में बड़ा बल हैः—

🔶 अपेहि मनसस्पतेऽप क्राम परश्चर। परो निऋत्या आ चक्ष्व बहुधाजीवनोमनः॥

🔷 अर्थात्- “मन को अपवित्र करने वाले बुरे विचारों वाले बोझ मुझसे दूर रहें। मेरा चित्त कभी मलिन न हो। मेरी अन्तरात्मा निर्भय और मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 3)

🔷 जीवन में उदासी, खिन्नता एवं अप्रसन्नता के वास्तविक कारण बहुत कम ही होते हैं, अधिकाँश का कारण घबराहट से उत्पन्न भय ही होता है। मनुष्य नहीं जानता कि वह इससे अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का कितना बड़ा भाग व्यर्थ गँवाता रहता है? जिन्होंने जीवन में बड़ी सफलताएं पाई हैं, उन सबके जीवन बड़े सुचारु, क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित रहे हैं। जिनके जीवन में विश्रृंखलता होती है, उनके पास सदैव “समय कम होने” की शिकायत बनी रहती है फिर भी अन्त तक कुल मिलाकर एक-दो काम ही कर पाते हैं, पर जिन लोगों ने विधि-व्यवस्था से, धैर्य से चिन्ता-विमुक्त कार्य सँवारे उन्होंने असंख्य कार्य किये। इतनी सफलतायें अर्जित कीं, जो सामान्य व्यक्ति के लिये चमत्कार जैसी लग सकती हैं।

🔶 यह भी संभव है कि आपकी दुर्बलता पैतृक हो। आप यह अनुभव करते हों कि जिस परिवार में पैदा हुए हैं, वहाँ की परिस्थितियाँ उतनी अच्छी नहीं थीं। उस घर के लोग असफल, निराश, निर्धन, अपढ़ या किसी अन्य बुराई से ग्रसित रहे हैं और उनका प्रभाव आपके संस्कारों पर भी पड़ा है। पारिवारिक जीवन का व्यक्ति के जीवन पर निःसंदेह बहुत प्रभाव होता है किन्तु अपने मनोबल को ऊँचा उठाकर गई-गुजरी स्थिति में भी आशातीत सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं।

🔷 कदाचित आप में ऐसी कमजोरियाँ हों, जिनके कारण आपको घबड़ाहट आती हो। उन कमियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार कीजिये। उन्हें अपने माता-पिता, सहपाठियों मित्रों से प्रकट कीजिये और उनसे सहायता लीजिये। जिन लोगों ने छोटी अवस्थाओं से बढ़कर बड़े कार्य किये हों, उनके जीवन चरित्र पढ़िये। अपनी मानसिक कमजोरियों को दूर करने के लिये अपने सहृदय अभिभावकों और मित्रों के प्रति आपका जीवन एक खुली पुस्तक की तरह होना चाहिए, जिसका हर अच्छा-बुरा अध्याय पाठक आसानी से समझ सकता हो। आप अपनी कमजोरियों का हल औरों से पूछिये और उन्हें दूर करने का प्रयत्न किया कीजिये। अब तक आप आत्म-प्रशंसा के लिये अधीर रहते रहे, अब आप आत्मलोचन से प्रसन्न हुआ करिये, तो आपका जीवन प्रतिदिन निखरता हुआ चला जायगा। उसमें शक्ति , साहस और सफलता की कमी न रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 2)

🔷 अपना क्रम अपनी व्यवस्थायें ठीक रखिये तो आप पायेंगे कि घबराहट के सारे कारण निराधार हैं। आप अपना काम ठीक रखिये, आपको कोई नौकरी से नहीं निकालेगा। दुकान पर रोज बैठते हैं, तो खाने की क्या चिन्ता? दूसरों की बच्चियों की शादियाँ होती हैं,फिर आप की बच्ची कुमारी थोड़ी ही बैठी रहेगी। लड़का स्वस्थ और सदाचारी मिल जाय तो निर्धनता की घबराहट क्यों हो? आप अपनी व्यवस्था के साथ अपना दृष्टिकोण ठीक रखिये, आपकी सारी कठिनाइयाँ अपने आप हल होती रहेंगी।

🔶 घबड़ाना तो उन्हें चाहिए, जो हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। कर्मशील व्यक्ति के लिये असफलता की आशंका नहीं होनी चाहिए।

🔷 कार्य करते हुए मानसिक असंतुलन रखना एक बड़ी कमजोरी है। इसी से सारी परेशानियाँ पैदा होती हैं। मन का झुकाव कभी इस ओर , कभी उस ओर होगा तो आप कभी एक काम हाथ में लेंगे और वह पूरा नहीं हो पायेगा, दूसरे काम की ओर दौड़ेंगे। इस गड़बड़ी में आपका न पहला काम पूरा होगा, न दूसरा। सब अधूरा पड़ा रहेगा। आपका मानसिक असंतुलन सब गड़बड़ करता रहेगा और आपकी परेशानियाँ भी बढ़ती जायेंगी।

🔶 विचार लड़खड़ा जाते हैं, तो दिनचर्या और कार्यक्रम भी गड़बड़ हो जाते हैं और उल्टे परिणाम निकलते हैं। सवारी पाने की जल्दी में पीछे सामान छूट जाता है। स्वागत की तैयारी में ध्यान ही नहीं रहता और खाना जल जाता है। स्त्रियाँ इसी झोंक में इतनी बेसुध हो जाती हैं कि चूल्हे या स्टोव की आग से उनके कपड़े जल जाते हैं या मकान में आग लग जाती है। प्रत्येक कार्य को एक व्यवस्था के साथ करने का नियम है। एक काम जब चल रहा है, तो दूसरी तरह के विचार को मस्तिष्क में स्थान मत दीजिये। एक बार में एक ही विचार और एक ही कार्य। हड़बड़ाये नहीं, अन्यथा आपका सारा खेल चौपट हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 3 जनवरी 2018

👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 1)

🔷 कल न जाने क्या होगा? नौकरी मिलेगी या नहीं, कक्षा में उत्तीर्ण होंगे या अनुत्तीर्ण, लड़की के लिये योग्य वर कहाँ मिलेगा, मकान कब तक बन कर पूरा होगा, कहीं वर्षा न हो जाय, जो पकी फसल खराब हो जाय आदि बातों की निराशाजनक कल्पना द्वारा आप मन में घबराहट न पैदा किया करें। जो होना है, वह एक निश्चित क्रम से ही होगा, तो फिर घबराने, व्यर्थ विलाप करने अथवा भविष्य की चिन्ता में पड़े रहने से क्या लाभ? अवाँछित कल्पनाएं करेंगे तो आपका जीवन अस्त-व्यस्त होगा और व्यर्थ की कठिनाई से आप अपने को पीड़ित अनुभव करते रहेंगे।

🔶 समय पर कार्य प्रायः सभी के पूरे हो जाते हैं, इसलिये प्रयास तो जारी रखें, पर घबराहट पैदा कर काम को बोझीला न बनायें। आपका मन भार-मुक्त रहेगा, तो काम अधिक रुचि और जागरुकता के साथ कर सकेंगे। यह स्थिति आपको प्रसन्नता भी देगी और सफलता भी ।

🔷 घबराने वाले व्यक्ति फूहड़ माने जाते हैं, उनका कोई काम सही नहीं होता। पुस्तकें लिये बैठे हैं, पर फेल हो जाने की घबराहट सता रही है। फलतः पेज तो खुला है, पर मन कहीं और जगह घूम रहा है। एक गलती आप से हो गई है, उसे छिपाने के चक्कर में आपका दिमाग सही नहीं है, कहीं गड्ढे में गिर जाते हैं, कहीं बर्तनों से टकरा कर पाँव फोड़ लेते हैं। सही काम के लिये मन में घबराहट का बोझ न डाला करिये। फल-कुफल की परवाह किये बिना स्वस्थ और पूरे मन से काम किया कीजिए।

🔶 स्टेशन की ओर तो जा ही रहे हैं, रेलगाड़ी मिलेगी या नहीं? मस्तिष्क को इस फिसाद में फंसाने का क्या फायदा? यही तो होगा कि गाड़ी स्टेशन पहुँचने के पूर्व छूट जाय और आपको जहाँ जाना है, वहाँ कुछ विलंब से पहुँचना हो। आप जहाँ जा रहे हैं या जो कुछ पूरा कर रहे हैं। उसका भी तो यही लक्ष्य होगा कि वह कार्य पूरा हो प्रसन्नता मिले, पर अगली प्रसन्नता के लिये अब की प्रसन्नता क्यों नष्ट करते हैं? पहले से ही मन को अलमस्त क्यों नहीं रखते, यही तो होगा कि कार्य कुछ थोड़ा विलंब से होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 विक्षुब्ध जीवन, शान्तिमय कैसे बने? (अन्तिम भाग)

🔷 अनास्था, नास्तिकता एवं अविश्वास भी विषैले सर्पों से कम नहीं हैं जो अपने पालने वाले को डसे बिना नहीं रहते। जो नास्तिक है वह निरालंब है, जो आस्थाहीन है, वह नीरस एवं कड़ुआ है और अविश्वासी है वह बहिष्कृत है। संसार में सहज सम्भाव्य निराशाओं और असफलताओं के आने पर जब मनुष्य का विषाद अपनी सीमा पार कर जाता है तब मात्र आस्तिक भाव ही मनुष्य को सहारा देता है। जन-जन के साथ छोड़ देने, सम्बन्धियों के विमुख हो जाने, शत्रुओं से घिर जाने, आपत्ति के आने पर यदि किसी असहाय को कोई सहायता देता है तो वह उसका आस्तिक भाव ही है। रोग, निराशा अथवा विषाद की चरम सीमा जब मनुष्य के चारों ओर मृत्यु का जाल रचने लगती है तब एक आस्तिक भाव ही है जो उसे मृत्यु के भयानक अन्धकार में दीपक दिखाता है।

🔶 मृत्यु के महत्वपूर्ण अवसर पर जहां नास्तिक असहाय अवस्था में छटपटाता, रोता और भयभीत होता है, निरुपाय बांधवों की ओर कातर-दृष्टि से देखता हुआ सहारे की याचना करता वहां आस्तिक व्यक्ति एक अनन्त सहारे से सन्तुष्ट शान्तिपूर्वक प्रयाण करता है। आस्तिकता हर क्षण एक सबल एवं सच्चे मित्र के समान कदम-कदम पर साथ देती है। आस्तिक सदा निर्भय और निश्चिन्त रहता है। आस्तिकता के अभाव में कोई भी मनुष्य कितना ही बलवान अथवा बुद्धिमान क्यों न हो सदैव ही निःसहाय एवं निरुपाय है। ठोकर लगने, चोट खाने पर वह चीत्कार करता उठता है, उसे सहारा देने वाली कोई शक्ति उसके अन्दर नहीं होती।

🔷 इसी प्रकार जो आस्थाहीन और अविश्वासी है उसे न तो किसी से स्नेह होता, न श्रद्धा। स्वयं अविश्वासी होने से किसी का विश्वासपात्र नहीं बन पाता और एक रिक्त एवं बहिष्कृत जीवन बिताता है।

🔶 अस्तु, सुखी और सन्तुष्ट रहने का एक ही मूल-मन्त्र है—स्वल्प इच्छाएं, कम आवश्यकताएं, निःस्वार्थ जीवन और आस्थापूर्ण आस्तिक दृष्टिकोण का विकास मनुष्य को सर्व-सुखी रखने में सदा सफल हो सकते हैं।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...