रविवार, 14 जनवरी 2018

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 3)

🔶 इस सत्य का यदि पाश्चात्य मनोवेत्ताओं के पास कोई उत्तर हो सकता है तो केवल यह है कि मन को प्रसन्न करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं कि उसकी लालसाओं की पूर्ति करने का यथासाध्य प्रयत्न किया जाये। जो जिस सीमा तक इस प्रयत्न में सफल होता रहेगा वह उस सीमा तक सुखी एवं सन्तुष्ट रहेगा और जो जितनी सीमा तक असफल होगा वह उस सीमा तक दुःखी एवं अशांत रहेगा। उसे सुखी एवं सन्तुष्ट कर सकने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

🔷 क्या पाश्चात्य मानस-वेत्ताओं का यह उत्तर उपयुक्त माना जा सकता है? इसका तो ठीक-ठीक आशय यह है कि जो अधिक शक्तिशाली, साधन सम्पन्न तथा चतुर है वह वांछाओं को किसी प्रकार भी पूरी कर सुखी एवं सन्तुष्ट रह सकता है और जो सामान्य जन जिनके पास शक्ति, साधन तथा चातुर्य की कमी है वे दुःख की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में ही पड़े-पड़े रोते-कलपते रहेंगे। सुखी होने का यह उपाय शाश्वत, सार्वजनिक तथा सभ्यतापूर्ण नहीं है। निःसन्देह इसी प्रकार के दृष्टिकोण ने संसार में स्वार्थ, संघर्ष, शोषण तथा साम्राज्यवाद को जन्म दिया और बढ़ाया है। संसार में फैले अन्याय, अत्याचार तथा अनैतिकता का उत्तरदायी भी यही दूषित दृष्टिकोण ही है।

🔶 इसके अतिरिक्त इस पाश्चात्य कथन में सत्य का अंश भी नहीं है। यदि धन, धाम, वैभव-विभूति, साधन-सुविधा, वस्तुयें एवं उपादान संचय कर लेने से कोई सुख का अधिकारी बन सकता होता तो संसार का कोई भी साधन सम्पन्न व्यक्ति दुःखी अथवा असन्तुष्ट नहीं दिखाई देता। उसका जीवन शांतिपूर्वक शरद-सरिता की तरह निर्विकार रूप से आनन्द कलरव के साथ कल्लोल करता हुआ बहता चला जाता। इसके विपरीत असाधनवानों का कभी मानसिक समाधान ही न होता। वे सर्वदा क्षण-प्रतिक्षण अशान्ति एवं असुख के अनुपात में जलते मरते रहते। जबकि ऐसा देखने में नहीं आता। एक से एक बढ़कर सम्पन्न व्यक्ति दुःखी और एक से एक असम्पन्न व्यक्ति सुखी एवं असन्तुष्ट देखे जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

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