मंगलवार, 7 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 08 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 08 March 2017


👉 संजीवनी साधना से मिला जीवनदान

🔴 घटना अगस्त १९९७ की है। पटना जिले के ग्रामीण क्षेत्र के लगभग ६५ भाई बहनों के साथ शांतिकुञ्ज हरिद्वार ९ दिवसीय साधना सत्र में भाग लेने के लिए आया था। सत्र बहुत ही अच्छे तरीके से सम्पन्न हुआ। जब हम पटना वापस जा रहे थे तो मेरे पेट में हल्का दर्द महसूस हुआ। प्रातः घर पहुँचा। उसी दिन शाम को असहनीय दर्द होने लगा, जिसके कारण मैं बेहोश हो गया था। घर के लोग परेशान हो गए। पिताजी ने तुरन्त डॉक्टर को बुलवाया, लेकिन तब तक मुझे होश आ गया था। परीक्षण के उपरान्त पता चला कि हमें अपेन्डिसाइटिस है। डॉक्टर ने दवा दी। उस दवा से दर्द कुछ कम हुआ।

🔵 दूसरे दिन पटना के प्रख्यात सर्जन डॉ० बसन्त कुमार सिंह को उनके लक्ष्मी नर्सिंग होम, राजापुर में जाकर दिखाया। उन्होंने भी कहा कि अपेन्डिसाइटिस है। फिर मेरा अल्ट्रासाउण्ड कराया गया। रिपोर्ट देखकर ऑपरेशन की सलाह दी गई। इस दौरान पेट का दर्द समाप्त हो चुका था। केवल पेट में भारीपन अनुभव हो रहा था। लक्ष्मी नर्सिंग होम में मेरा ऑपरेशन हुआ था। जिस कमरे में मैं रह रहा था उसमें मैंने रैक पर प० पूज्य गुरुदेव, वंदनीया माताजी एवं गायत्री माँ के चित्र को लगा रखे थे।

🔴 मैं ऑपरेशन थियेटर में जाते समय गुरु जी एवं माताजी से अपने स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करके गया था। ऑपरेशन के उपरान्त होश आने पर डॉ० साहब मुझसे मिलने आए। कमरे में प्रवेश करते ही उन्होंने कहा कि आप बड़े भाग्यशाली हैं; आपका अपेण्डिक्स दो दिन पहले फट गया था, लेकिन एक झिल्ली उसके जहरीले मवाद को आपके पेट में फैलने से रोके हुए थी। इस कारण आप बच गए।

🔵 मैंने गुरु देव के चित्र की ओर देखा। मुँह से निकला- सब इन्हीं का कमाल है। लगता है अभी और कुछ काम कराना चाहते हैं मुझसे। डॉक्टर ने जानना चाहा- कौन हैं ये? मैंने गुरु देव और गायत्री परिवार के बारे में संक्षेप में बताया। शान्तिकुञ्ज के संजीवनी साधना सत्र के विषय में भी बताया। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि गुरु देव ने इसीलिए इस समय मुझसे संजीवनी साधना करवाई। यह बात भी मैंने डॉ० साहब को बताई। इसके बाद १० दिन अस्पताल में और रहना हुआ। इस दौरान वहाँ के सभी लोग आत्मीय बंधु हो गए। इस प्रकार मेरी इस बीमारी के जरिए डॉ० बसन्त कुमार सिंह जैसे परिजन गायत्री परिवार से जुड़े।

🌹 दिनकर सिंह चाँदपुर बेला,पटना (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/dal.1

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 15)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं    

🔴 भगवान ने सुदामा को अपनी द्वारिकापुरी, टूटी सुदामापुरी के स्थान पर स्थानान्तरित कर दी थी, पर इससे पहले यह विश्वास कर लिया था कि इस अनुदान को उस स्थान पर कारगर विश्वविद्यालय चलाने के लिए ही प्रयुक्त किया जाएगा। चाणक्य की शक्ति चन्द्रगुप्त को ही मिली थी और वह चक्रवर्ती कहलाया था।              

🔵 भवानी की अक्षय तलवार शिवाजी को मिली थी। अर्जुन को दिव्य गाण्डीव धनुष एवं बाण देने वालों ने अनुदान थमा देने से पहले यह भी जाँच लिया था कि उस समर्थता को किस काम में प्रयुक्त किया जाएगा? यदि बिना जाँच-पड़ताल के किसी को कुछ भी दे दिया जाए, तो भस्मासुर द्वारा शिवजी को जिस प्रकार हैरान किया गया था, वैसी ही हैरानी अन्यों को भी उठानी पड़ सकती है।    

🔴 भगवान ने काय-कलेवर तो आरम्भ से ही बिना मूल्य दे दिया है, पर उसके बाद का दूसरा वरदान है ‘‘परिष्कृत प्रतिभा’’। इसी के सहारे कोई महामानव स्तर का बड़प्पन उपलब्ध करता है। इतनी बहुमूल्य सम्पदा प्राप्त करने के लिए वैसा ही साहस एकत्रित करना पड़ेगा, जैसा कि लोकमंगल के लिए विवेकानन्द जैसों को अपनाना पड़ा था। इन दिनों परीक्षा भरी वेला है, जिसमें सिद्ध करना होगा कि जो कुछ दैवी-अनुग्रह विशेष रूप से उपलब्ध होगा, उसे उच्चस्तरीय प्रयोजन में ही प्रयुक्त किया जायेगा। कहना न होगा कि इन दिनों नवयुग के अवतरण का पथ-प्रशस्त करना ही वह बड़ा काम है, जिसके लिए कटिबद्ध होने पर ‘परिष्कृत प्रतिभा’ का बड़ी मात्रा में, अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। उसे धारण करने पर ‘हीरे का हार’ पहनने वाले की तरह शोभायमान बना जा सकता है। 

🔵 ईश्वरीय व्यवस्था में यही निर्धारण है कि बोया जाए और उसके बाद काटा जाए। पहले काट लें, उसके बाद बोएँ, यही नहीं हो सकता। लोकसेवी उज्ज्वल छवि वाले लोग ही प्राय: वरिष्ठ, विश्वस्त गिने और उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 फूल एक सजीव सौंदर्य

🔴 दार्शनिक अरस्तु को फूलों से बड़ा प्रेम था। उन्हें जितना अवकाश का समय मिलता था, उस समय का संपूर्ण उपयोग फूलों को रोपने, उनकी क्यारियों में जल भरने, निकाई करने गोडाइ करने मे करते थे। उनकी छोटी-सी बगीची उसमें नाना प्रकार के हरे, नीले, पीले, लाल, गुलाबी फूल झूमते रहते थे। गर्मियों में भी पास से गुजरने वाले लोगों को हरियाली और सुगंध का लाभ मिलता था। दोनों वस्तुएँ ऐसी है, जिन्हें देखते ही आत्मा खिल उठती है, मन प्रफुल्लित हो उठता है।

🔵 एक दिन एक मित्र ने पूछा- "आपको फूलों से इतना प्रेम क्यों है" तो उन्होंने मुस्कराकर कहा- यों कि फूल परमात्मा का सौंदर्यबोध कराता है। फूलों को देखकर मानव सात्विक, सरल व सुरुचि भाव जाग्रत करता है। अंतःकरण की जो कोमल वृत्तियाँ हैं, फूलों के सान्निध्य और दर्शन से उनका विकास होता है। इसीलिए तो लोग देवालयों में जाकर फूल चढाते हैं कि उनकी कोमल भावनाएँ परमात्मा स्वीकार करे और स्नेह आशीर्वाद प्रदान करे।

🔴 बडे़ आदमियों, गुरुजनों से भेंट के समय विदाई और मिलन समारोहों में पुष्पहार पहनाना, गुलदस्ते भेंट करने के पीछे भी यही मनोविज्ञान है, उससे हम अपनों मे बडो़ के स्नेह का अधिकार प्राप्त करते है।

🔵 विदेशो में फुलबाड़ी लगाने में लोग बहुत रुचि प्रदर्शित करते हैं, बहुत धन खर्चते हैं और अच्छे-अच्छे फूलों की नस्लें, किस्में प्राप्त करने के लिये परिश्रम भी करते हैं। खेद है कि धार्मिक वृत्ति का देश होते हुए भी अब अपने देश में फूल लगाने की रुचि उतनी नहीं रही। प्रतिदिन उपासना, देव-प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और पुष्पार्पण के लिए फूलों की आवश्यकता होती है, शुचिता, स्वच्छता आदि की तरह फूलों को उपासना का अविछिन्न अंग ही माना गया है, इस संबंध में पद्मपुराण के क्रियायोग के प्राय: ८९ और २८० वें अध्यायों में संपूर्ण रूप से फूलों की उपयोगिता का भी विवेचन हुआ है। लिखा है-

चैत्रे तु चम्पकेनैव जातिपुष्पेण वापुन:।
पूजनीय: प्रयत्नेन केशव: क्लेशनाशन:।।
वैसाखे तु सदा देवि ह्यर्चनीयो महाप्रभुः।
केतकी पत्रमादाय वृषस्थे च दिवाकरे।।

🔴 चैत्र में कमलपुष्प, जाति पुष्प, चंपा दौना, कटसरैया, वरुण पुष्प; बैसाख में केतकी, ज्येष्ठ मे यही पुष्प: आषाढ में कनेर (करवीर), कदंब तथा कमल पुष्पों से पूजा करनी चाहिए।

🔵 यह संदर्भ तत्कालीन लोगों में फूलों की अभिरुचि व्यक्त करते है। यद्यपि तब विविध पुष्पों की उपज माली करते थे। अब मालियों के पास न तो वैसे साधन- सुविधाएँ हैं और न रुचि इसलिए फूलों की आवश्यकता की पूर्ति हर गृहस्थ को स्वयं करनी चाहिए।

🔴 घरों के आस-पास काफी जमीन बेकार पडी रहती है उनकी क्यारियाँ बनाकर स्थायी और कुछ समय फूल देने वाले पौधे रोपे जा सकते हैं। जहाँ भूमि का अभाव है, वहाँ सजाकर रखे जा सकते हैं। थोडा भी समय देकर उनकी सिंचाई आदि की व्यवस्था की जा सके तो हर घर में आवश्यकता अनुरूप फूल उपजाए जा सकते है। कुछ लोग बडे पैमाने खेती भी कर सकते हैं।

🔵 उपासना की आवश्यकता की पूर्ति के साथ ही इस अभिरुचि से आस-पास के वातावरण में सौंदर्य का विकास होता है। फूलों से दृश्य मनोरम हो जाता है। जहाँ फूल होते हैं समझा जाता है कि यहाँ सुसंस्कृत और विचारवान् लोग निवास करते है। किसी भी दृष्टि से फूलों की अभिरुचि मनुष्य को प्रसन्नतादायक ही होती है। हमें एक नये सिरे से पुष्प उत्पादन का अभियान प्रारंभ करना चाहिए। स्वयं फूल उगाऐ उपासना के समय प्रयोग करें दूसरों को स्नेह के आदान-प्रदान के रूप दिया करें। बीज और पौधों का वितरण करके भी फूल अभियान को सफल बनाया जा सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 69, 70

👉 यह संसार क्या है?

🔴 एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है?

🔵 इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई।

🔴 'एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।

🔵 कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए।

🔴 उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना।  वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'

🔵 कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा..

🔴 'संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं।

🔵 जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता.....।'

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए। (भाग 1)

🔴 हमारा मन अभ्यास का दास है। जिस प्रकार का अभ्यास मन को कराया जाता है उसी प्रकार उसका अभ्यास सदा के लिए बन जाता है। जिस मनुष्य को पढ़ने-लिखने का अभ्यास रहता है, उसका मन रुचि के साथ ऐसे काम को करने लगता है। ऐसे व्यक्ति से बिना पढ़े-लिखे रहा ही नहीं जाता। जिस मनुष्य को दूसरों की निन्दा करने का अभ्यास है, जो दूसरों के अहित का सदा चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता ऐसे कार्य उसकी एक प्रकार की नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं, वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।

🔵  जिस व्यक्ति का इस प्रकार का अभ्यास हो जाता है वह जब अपने आपके विष में अशुभ विचार लाता है तो उन विचारों का भी विरोध नहीं कर सकता। जिनको दूसरों की बुराई का चिन्तन भला लगता है, वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है फिर इस प्रकार के विचार उसके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को हम छोड़ दें तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वहीं मनुष्य अपने विचारों पर नियन्त्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिये पाले हैं, वहीं साँप किसी असावधानी की अवस्था में अपने आपको काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश है। अतएव सबका सदा कल्याण सोचना, किसी का भी अहित न सोचना, बुरे विचारों के निराकरण का पहला उपाय है।

🔴  जिस व्यक्ति के प्रति हम बुरे विचार लाते हैं उससे हम घृणा करने लगते हैं। घृणा की वृत्ति उलट कर भय की वृत्ति बन जाती है। जो दूसरों की मानहानि का इच्छुक है उसके मन में अपने आप ही अपनी मान हानि का भय उत्पन्न हो जाता है। जो दूसरों की शारीरिक क्षति चाहता है, उसे अपने शरीर के विषय में अनेक रोगों की कल्पना अपने आप उठने लगती है। जो दूसरों की असफलता चाहता है वह अपनी सफलता के विषय में सन्देहात्मक हो जाता है।

🔵  हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, संभव है वह व्यक्ति हमारा कुछ बुरा न कर सके वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाये। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते। यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 13

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 March

🔴 ईश्वर उपासना का अर्थ है- अपने आपको विकसित करना। चील की तरह ऊपर उठकर अपनी निरीक्षण वृत्ति को चौड़ा करना। जो जितनी ऊँचाई पर उठकर देखता है उसे उतना ही दूरदर्शी, विवेकवान समझा जाता है। जब सारी वस्तुओं की स्थिति का सही पता चल जाता है तो फिर यह कठिनाई नहीं रहती कि किसे चुनें, किसे न चुनें। इस प्रकार का ज्ञान पैदा हुये बिना मनुष्य अपनी जिन्दगी सुख पूर्वक बिता नहीं सकता।

🔵 दुःख का एक कारण है अज्ञान। अज्ञान-अर्थात् किसी वस्तु के वास्तविक स्वरूप को न जानना। वास्तविक का ज्ञान न होने से ही मनुष्य गलती करता है और दंड पाता है। यही दुःख का स्वरूप है अन्यथा परमात्मा न किसी को दुःख देता है न सुख। वह निर्विकार है, उसकी किसी से शत्रुता नहीं जो किसी को कष्ट दे, दंड दे।

🔴 जो बेचैन है, अशान्त है, पीड़ित है, वह सम्पन्नता उपार्जित करने के साधन जुटा ही नहीं सकता। उसे यातनाओं से संघर्ष करने से अवकाश ही नहीं मिलेगा। फिर भला वह सम्पन्नता का स्वप्न किस प्रकार पूर्ण कर सकता है। जो शान्त है, स्थिर है, निर्द्वन्द्व है वही कुछ कर सकने में समर्थ हो सकता है। यदि परिस्थितिवश अथवा संयोगवश किसी को सम्पन्नता प्राप्त भी हो जाये तो अशान्त एवं व्यग्र व्यक्ति के लिये उसका कोई उपयोग नहीं। जिस वस्तु का जीवन में कोई उपयोग नहीं, जो वस्तु किसी के काम नहीं आती, उसका होना भी उसके लिये न होने के समान ही है! अस्तु, सम्पन्नता प्राप्त करने के लिये शान्तिपूर्ण परिस्थितियों की आवश्यकता है और सुख-शान्ति के लिये सम्पन्नता की अपेक्षा है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 31)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं
🔴 धन और स्वास्थ्य भी मानव-जीवन की सम्पत्तियां हैं— इसमें सन्देह नहीं। किन्तु चरित्र की तुलना में यह नगण्य हैं। चरित्र के  आधार पर धन और स्वास्थ्य तो पाये जा सकते हैं किन्तु धन और स्वास्थ्य के आधार पर चरित्र नहीं पाया जा सकता। यदि चरित्र सुरक्षित है, समाज में विश्वास बना है तो मनुष्य अपने परिश्रम और पुरुषार्थ के बल पर पुनः धन की प्राप्ति कर सकता है। चरित्र में यदि दृढ़ता है, सन्मार्ग का त्याग नहीं किया गया है तो उसके आधार पर संयम, नियम और आचार-विचार के द्वारा खोया हुआ स्वास्थ्य फिर वापस बुलाया जा सकता है। किन्तु यदि चारित्रिक विशेषता का ह्रास हो गया है तो इनमें से एक की भी क्षति पूर्ति नहीं की जा सकती। इसलिए चरित्र का महत्व धन और स्वास्थ्य दोनों से ऊपर है। इसीलिये विद्वान् विचारकों ने यह घोषणा की है, कि—‘‘धन चला गया तो कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, तो कुछ गया। किन्तु यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया।’’

🔵 मनुष्य के चरित्र का निर्माण संस्कारों के आधार पर होता है। मनुष्य जिस प्रकार के संस्कार संचय करता रहता है, उसी प्रकार उसका चरित्र ढलता रहता है। अस्तु अपने चरित्र का निर्माण करने के लिए मनुष्य को अपने संस्कारों का निर्माण करना चाहिए। संस्कार, मनुष्य के उन विचारों के ही प्रौढ़ रूप होते हैं, जो दीर्घकाल तक रहने से मस्तिष्क में अपना स्थायी स्थान बना लेते हैं। यदि सद्विचारों को अपनाकर उनका ही चिन्तन और मनन किया जाता रहे तो मनुष्य के संस्कार शुभ और सुन्दर बनेंगे। इसके विपरीत यदि असद्विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जायेगा तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-कर्कट ही इकट्ठा होता जायेगा।

🔴 विचारों का निवास चेतन मस्तिष्क और संस्कारों का निवास अवचेतन मस्तिष्क में रहता है। चेतन मस्तिष्क प्रत्यक्ष और अवचेतन मस्तिष्क अप्रत्यक्ष अथवा गुप्त होता है। यही कारण है कि कभी-कभी विचारों के विपरीत क्रिया हो जाया करती हैं। मनुष्य देखता है कि उसके विचार अच्छे और सदाशयी हैं, तब भी उसकी क्रियायें उसके विपरीत हो जाया करती हैं। इस रहस्य को न समझ सकने के कारण कभी-कभी वह बड़ा व्यग्र होने लगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 9)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि

🔵 इस संदर्भ में एक और भी बढ़ी मूर्खता जनसाधारण के मन में गहरी जड़ें जमाकर बैठ गई है कि ईश्वर में सिद्धांत-रहित किसी ऐसे भूत-प्रेत की कल्पना समाविष्ट कर ली गई जो निशिदिन उपहार बटोरते और नाक रगड़ते हुए भक्तजनों के पीछे रहता है; साथ ही पूजा-पाठ की छुट-पुट टण्ट-घण्ट कर देने भर से फूलकर कुप्पा हो जाता है और मनचाहे उपहार-वरदान बाँटकर हर किसी की मनोकामनाएँ पूरी करता है; भले ही वे कितनी ही अनावश्यक या अनुचित क्यों न हों। 

🔴 इसके अतिरिक्त इस परमेश्वर में एक और भी बुरी आदत है कि पूजा-पत्री में कोई छोटी-मोटी गलती हो जाए तो भी वह आगबबूला हो जाता है और कल तक जिसे भक्त मानता था, आज उसकी जान लेने तक को तैयार हो जाता है। राजी होने के लिये बढ़े-चढ़े उपहार माँगता है। अपना भक्त किसी दूसरे देवता की पूजा करने लगे तो उसकी भी अच्छी-खासी खबर लेता है।

🔵 यही है आज का सशक्त परमेश्वर जिसे जातियों, वर्गों, कबीलों और मत-मतांतरों वाले लोग अपने-अपने तरीके से खोजते और अपनी-अपनी मान्यता के अनुरूप नाम व रूप देेते हैं। इस कालभैरव से किसी का क्या भला होता है, इसे तो पूजने वाले ही जानें, पर एक बात निश्चित है कि इन स्वयंभू देवी-देवताओं के स्वयंभू एजेन्टों की पाँचों उँगलियाँ हर घड़ी घी में रहती हैं। वे मनोकामना पूरी कराने अथवा गरीबी दूर करने-कराने के बहाने हर स्थिति में अपनी एजेण्टी का धंधा बढ़ाते चलते रहे हैं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 13)

🌹 द्विज का अर्थ - मर्म समझें

🔴 अपने हिन्दू समाज में जिन मनुष्यों के दो बार जन्म होते हैं। उन्हें द्विज कहते हैं। द्विज माने दुबारा जन्म लेने वाला। दुबारा जन्म क्या है? नर- पशु के जीवन से नर- नारायण के जीवन की भूमिका में प्रवेश करना। यही तो दूसरा जन्म है और ये दूसरा जन्म जिस दिन लिया जाता है, जिस दिन ये प्रतिज्ञाएँ ली जाती हैं, उस दिन एक समारोह मनाया जाता है, उत्सव मनाया जाता है, कर्मकाण्ड किया जाता है। उसी का नाम दीक्षा संस्कार है। जो आदमी इस तरह की प्रतिज्ञा के लिए तैयार नहीं होते हैं और वे कहते हैं कि ऊँचे जीवन और आदर्श जीवन से कोई मतलब नहीं रखते हैं, वे कहते हैं कि हम तो केवल पशुओं की तरह से जीवन जियेंगे।

🔵 हम पेट भरने के लिए जीयेंगे और संतान पैदा करने के लिए जीयेंगे, उनको अपने यहाँ शूद्र कहा गया और शूद्रों को बहिष्कृत माना गया है। इस तरीके से शूद्र वे नहीं हैं, जो किसी जन्म में, किसी कौम में पैदा होते हैं। शूद्र वे हैं, जिनके जीवन में जीवन का कोई लक्ष्य नहीं होता है और जिनका पशुओं की तरह पेट पालना और रोटी कमाना ही लक्ष्य है। वे सब के सब आदमी शूद्र हैं, दूसरे शब्दों में पशु कहें, तो भी कोई हर्ज नहीं है। उसको बहिष्कृत माने जाने की परम्परा उस जमाने में उसी तरह की थी। 

🔴 आज तो जन्म से शूद्र और जन्म से ही ब्राह्मण मानते हैं। जन्म से शूद्र वर्ण का कोई मतलब नहीं है। केवल मतलब ये है कि जो आदमी भौतिक जीवन जीते हैं और आत्मिक जीवन के प्रति जिनका कोई लगाव नहीं है, उन आदमियों का नाम नर- पशु अथवा शूद्र। शूद्र अपने यहाँ एक निंदा की बात थी, किसी जमाने में, कर्म के आधार पर जब शूद्र और ब्राह्मण बनते थे तब। आज जब जन्म के आधार पर शूद्र और ब्राह्मण मान लिया जाने लगा, तब कोई निंदा की बात नहीं रही और न ही कोई अपमान की बात रही।

🔵 अब तो सब गुड़- गोबर ही हो गया, लेकिन पुराने जमाने की बात अलग थी। मनुष्य शूद्रता की सीमा से निकल करके जिस दिन ये प्रतिज्ञा लेता है, व्रत लेता है कि मैं आज से मनुष्य होकर के जिऊँगा; उस दिन का समारोह? आत्मा और परमात्मा के साथ मिलने का विवाह जैसा समारोह होता है। उस दिन को मनुष्य जीवन में प्रवेश करने वाला नया जन्म कह लीजिए, उसे आत्मा का परमात्मा के साथ आध्यात्मिक विवाह कह लीजिए।    
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/c

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 70)

🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण

🔴  अब मथुरा जाने की तैयारी थी। एक बार दर्शन की दृष्टि से मथुरा देखा तो था पर वहाँ किसी से परिचय न था। चलकर पहुँचा गया और ‘‘अखण्ड ज्योति’’ प्रकाशन के लायक एक छोटा मकान किराए पर लेने का निश्चय किया।

🔵 मकानों की उन दिनों भी किल्लत थी। बहुत ढूँढ़ने के बाद भी आवश्यकता के अनुरूप नहीं मिल रहा था। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते घीया मण्डी जा निकले। एक मकान खाली पड़ा था। मालकिन एक बुढ़िया थी। किराया पूछा, तो उसने पन्द्रह रुपए बताया और चाभी हाथ में थमा दी। भीतर घुसकर देखा तो उसमें छोटे-बड़े कुल पन्द्रह कमरे थे। था तो जीर्ण-शीर्ण पर एक रुपया कमरे के हिसाब से वह मँहगा किसी दृष्टि से न था। हमारे लिए काम चलाऊ भी था। पसन्द आ गया और एक महीने का किराया पेशगी पन्द्रह रुपया हाथ पर रख दिए। बुढ़िया बहुत प्रसन्न थी।

🔴 घर जाकर सभी सामान ले आए और पत्नी बच्चों समेत उसमें रहने लगे। सारे मुहल्ले में काना-फूसी होते सुनी। मानों हमारा वहाँ आना कोई आश्चर्य का विषय हो। पूछा तो लोगों ने बताया कि-‘‘यह भुतहा मकान है। इसमें जो भी आया, जान गँवाकर गया। कोई टिका नहीं। हमने तो कितनों को ही आते और धन-जन की भारी हानि उठाकर भागते हुए देखा। आप बाहर के नये आदमी हैं इसलिए धोखे में आ गए। अब बात आपके कान में डाल दी। यदि ऐसा न होता तो तीन मंजिला 15 कमरों का मकान वर्षों से क्यों खाली पड़ा रहता? आप समझ बूझकर भी उसमें रह रहे हैं। नुकसान उठायेंगे।’’

🔵 इतना सस्ता और इतना उपयोगी मकान अन्यत्र मिल नहीं रहा था। हमने तो उसी में रहने का निश्चय किया। भुतहा होने की बात सच थी। रात भर छत के ऊपर धमा-चौकड़ी रहती। ठठाने की, रोने की, लड़ने की आवाजें आतीं। उस मकान में बिजली तो थी नहीं लालटेन जलाकर ऊपर गए, तो कुछ स्त्री, पुरुष आकृतियाँ आगे कुछ पीछे भागते दीखे, पर साक्षात भेंट नहीं हुई। न उन्होंने हमें कोई नुकसान पहुँचाया। ऐसा घटनाक्रम कोई दस दिन तक लगातार चलता रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/prav.3

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 71)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 मातृवत् परदारेषु और परद्रव्येषु लोष्टवत् की दो सीढ़ियाँ चढ़ना भी अपने को कठिन पड़ता, यदि जीवन का स्वरूप, प्रयोजन और उपयोग ठीक तरह से समझाने और जो श्रेयस्कर है उसी पर चलने की हिम्मत और बहादुरी नहीं होती। जो शरीर को ही अपना स्वरूप मान बैठा और तृष्णा- वासना के लिए आतुर रहा उसे आत्मिक प्रगति से वंचित रहना पड़ा है। पूजा, उपासना के छिटपुट कर्मकाण्डों के बल पर प्रगति की नाव किनारे नहीं लगी है। हमें २४ वर्ष तक निरंतर गायत्री पुरश्चरणों में निरत रह कर उपासना का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय पूरा करना पड़ा। उस पर कर्मकाण्ड की सफलता का पूरा लाभ तभी संभव हो सका जब अत्यधिक प्रगति की भावनात्मक प्रक्रिया को, जीवन- साधना को उससे जोड़े रखा। 

🔵 यदि दूसरों की तरह हम देवताओं को वश में करने या ठगने के लिए, उनसे मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए तन्त्र- मन्त्र का कर्मकाण्ड रचते रहते- जीवन क्रम निर्वाह की आवश्यकता न समझते तो नि:संदेह हमारे हाथ कुछ नहीं पड़ता। हम अगणित भजनानन्दी और तन्त्र- मन्त्र के कर्मकाण्ड़ियों को जानते हैं, जो अपनी धुन में मुद्दतों से  लगे हैं। पूजा- पाठ हमसे ज्यादा लम्बा और चौड़ा है, पर बारीकी से जब उन्हें परखा तो छूँछ मात्र पाया, झूठी आत्म- प्रवंचना उनमें जरूर पायी, जिसके आधार पर यह सोचते थे कि इस जन्म में न सही- मरने के बाद उन्हें स्वर्ग- सुख जरूर मिलेगा; पर हमारी परख और भविष्यवाणी यह है कि इनमें से एक को भी स्वर्ग आदि मिलने वाला नहीं, न उन्हें कोई सिद्ध चमत्कार हाथ लगने वाला है।

🔴 कर्मकाण्ड और पूजा- पाठ में प्राण तभी आते हैं जब साधक का जीवन क्रम उत्कृष्टता की दिशा में क्रमबद्ध रीति से अग्रसर हो रहा हो। उसका दृष्टिकोण सुधर रहा हो और क्रिया कलाप में उस रीति- नीति का समावेश हो जो आत्मवादी के साथ आवश्यक रूप से जुड़े रहते हैं। धूर्त, स्वार्थी, कंजूस और सदा बेटी, बेटों के लिए जीने वाले लोग यदि अपनी विचारणा और गतिविधियाँ परिष्कृत न करें, तो उन्हें तीर्थ, व्रत, उपवास, कथा, कीर्तन, स्नान, ध्यान आदि का कुछ लाभ मिल सकेगा, इसमें हमारी सहमति नहीं है। यह उपयोगी तो हैं, पर इसकी उपयोगिता इतनी है जितनी कि लेख लिखने के लिए कलम की। कलम के बिना लेख कैसे लिखा जा सकता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.3

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...