गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

👉 पूज्य गुरुदेव ने की प्राणरक्षा

🔵 हमारा जन्म उड़ीसा में हुआ था। जब मैं करीब २४- २५ वर्ष का था, हमारे गाँव में भागवत् कथा करने एक सन्त श्री रामचरणदास जी (मौनी बाबा)आते थे। मैं भी भागवत सुनता था। उसमें मैंने सुना कि शरीर नाशवान् है। यह सुन कर मन में आता रहता था, यदि शरीर नाशवान् है तो इसे रख कर क्या करूँगा।

🔴 एक दिन होली की पूर्णिमा रात्रि में, हाथ में जहर लेकर, शरीर को नष्ट करने का संकल्प लेकर सुनसान समुद्र के किनारे जा बैठा। जैसे ही जहर खाने (पीने) का प्रयास किया तो मेरे हाथ में झटका सा लगा। विषपात्र हाथ से छूट कर गिर गया। मैंने सोचा इस सुनसान में कौन आ गया! देखा लम्बा कुर्ता धोती पहने एक आदमी बोला- क्या पागल हो गये हो? इसको नष्ट करने का अधिकार तुम्हें नहीं है। यह बात सुनकर मैं अचरज में पड़ गया। कोई आदमी यहाँ था नहीं। यह कहाँ से आ गया। मैंने पूछा- आप कौन हैं ?? वह आदमी मुस्कुराया और बोला- आपको इस जीवन में बहुत काम करना है, जीवन को ऐसे नष्ट करने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है। यह बात बोलकर वह आदमी धीरे- धीरे समुद्र के अन्दर जाने लगा। जल में उसके पैर जमीन में चलने की तरह पड़ रहे थे। मैं ने भी पानी में उतरकर पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन कुछ दूर जाकर मैं समुद्र की लहर में डूब गया और बेहोश अवस्था में समुद्र के किनारे आ गया। ईश्वर कृपा से जब मुझे होश आया तब चारों तरफ से मछुआरे घेरे खड़े थे। मुझे अनुभव हो रहा था कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं था।

🔵 मछुआरों को जब मैंने अपना परिचय दिया तो उन्होंने मुझे घर पहुँचा दिया। जब मौनी बाबा फिर से गाँव में भागवत् कथा करने आए तो उन्होंने मुझे बुलवाया। फिर मैंने उनसे दीक्षा भी ले ली। करीब दो वर्ष बाद मैं जगन्नाथपुरी रथ यात्रा देखने गया था। उसी भीड़ में फिर मेरी मुलाकात मौनी बाबा से हो गई। वे मुझे एकांत में ले गए और राष्ट्र निर्माण के बारे में विचार विमर्श करने लगे। उन्होंने कहा- आपको मत्त जी के पास जाना है। वे हरिद्वार में हैं। गायत्री के बारे में, राष्ट्र निर्माण के बारे में समझाते हैं। वर्ष १९९६ में पहली बार गायत्रीतीर्थ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार आया, गुरु जी (मत्त जी) के बारे में बाबाजी से सुन रखा था। मैं दो घंटे शान्तिकुञ्ज का दर्शन करता रहा। अचानक मुझे स्मरण हो आया, जहर पीने का प्रयास करते समय जिस व्यक्ति को मैंने देखा था, वही स्वरूप आचार्य श्रीराम शर्मा जी के चित्र में पाया। मैं बार- बार सोचने लगा कि इन्होंने ही मेरे प्राण की रक्षा की है। इस शरीर से वे क्या कार्य कराएँगे वही जाने।

🔴 मैं गौ रक्षा समिति में १९९८ में काम कर रहा था। उड़ीसा से बिहार प्रांत में आया। मैं चकाई में गौ रक्षा हेतु कार्य करने लगा। उसमें गायत्री परिवार के परिजन भी शामिल हो गए। धीरे- धीरे सम्पर्क बढ़ता गया। २००९ में ट्रस्ट का गठन हुआ। अब चकाई में गौशाला निर्माण, प्राकृतिक चिकित्सा के साथ- साथ आयुर्वेदिक औषधि के निर्माण के कार्य में लगा हुआ हूँ। मैं गुरु कृपा से इस गायत्री परिवार से जुड़ गया हूँ। परम पूज्य गुरुदेव के विचारों पर चलकर समाज सेवा के कार्य में संलग्न हूँ। जिन्होंने मेरी प्राण रक्षा की है, यह जीवन अब उन्हीं का है।                    
  
🌹 उड़िया बाबा जमुई (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/pran

👉 आज का सद्चिंतन 21 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 April 2017


👉 TRUE PRAYER

🔴 True prayer is less about asking and begging for things we are attached to than it is about relinquishing our attachments to things, persons and possessions. We, in essence, being the sparks of the Divine Effulgence, ought to pray for illumination of our inner selves with the sublime glow of divinity –– no storm of hardship or turbulence of ups and downs of life could ever quaver the flame of our faith in our divine origin as souls.

🔵 “…. ‘O’ Lord! Please bless us with courage and wisdom so that we could welcome adversities as opportunities to refine our qualities and strengthen our potentials. Today’s blows of adversities should sound as messages of a brighter tomorrow….” –– This would be an ideal prayer to elevate our zeal and optimism and would protect us from becoming weak or coward.

🔴 We have to become intrepid warriors of the Spirit and not frightened fugitives in the battlefield of life.  Our attitude while praying should not be of begging but of ‘offering’ – “Lord, I am here, use me”.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 शाश्वत सौन्दर्य का बोध

🔵 मैंने पूछा-‘‘मैं किसे प्यार करूँ?’’ -तो ध्यान की गहराइयों से एक आवाज आयी-‘‘उन्हें, जिन्हें लोग दलित, गर्हित और गया-गुजरा समझते हैं। जो निन्दा और भर्त्सना के पात्र हो चुके हैं। उनके मित्र बनकर उन्हें प्यार और प्रकाश दो। तुम्हारा गौरव इस पर नहीं कि तुम्हें संसार में बहुत से लोग प्यार करते हैं, वरन् तुम संसार को प्यार करके गौरवान्वित होगे।’’

🔴 मैंने कहा-‘‘लोग कहते हैं कि जो त्वचा, वर्ण और शरीर से सुन्दर नहीं हैं, उन्हें देखने से सुख और शान्ति नहीं मिलती।’’ मेरी प्यारी आत्मा ने कहा-‘‘तुम असुन्दर के माध्यम से उस शाश्वत सौन्दर्य की खोज करो, जो त्वचा, वर्ण और शरीर के धुँधले बादलों में आकाश की नीलिमा के सदृश, प्रच्छन्न शान्ति लिए बैठा है। जब बाह्य आवरणों का धुँधला बादल छट जाएगा तो सौन्दर्य के अतिरिक्त कुछ रह ही नहीं जाएगा।’’

🔵 मैंने जानना चाहा-ऐसा भी तो है, लोग शरीर, कुल-जाति से सुन्दर होते हुए भी मानसिक मलीनता से ग्रस्त हैं। वासनाओं के अँधेरों से घिरे हैं। तब क्या मैं उनसे घृणा करूँ? हृदयाकाश में प्रदीप्त च्योतिर्मय सूर्यमण्डल से आता हुआ एक स्वर पुनः गूँजा-नहीं, घृणा मत करना, घृणा उनके अँधेरों को और अधिक घना करेगी। इससे उनकी मलीनता और अधिक प्रगाढ़ होगी। उन्हें अधिक और अधिक प्यार की जरूरत है। प्रेम का निर्मल जल उन्हें परिशुद्ध करेगा। प्रेम की उज्ज्वलता उनके अँधेरों को प्रकाशित करेगी और वासनाओं को समाप्त। मलीनताओं के नष्ट होते ही उनका शाश्वत सौन्दर्य स्वतः प्रकट हो जाएगा। वैसा ही सौन्दर्य जिसके ध्यान में तुम इन क्षणों में तल्लीन हो।

🔴 तो मैंने कहा-‘‘माँ! संसार कोलाहलपूर्ण है। सर्वत्र करुण और कठोर क्रन्दन गूँज रहे हैं, तुम बताओं मैं सुनूँगा क्या?’’ अविचल और शान्तभाव से मेरे हृदय में शीतलता जगाती हुई वेदमाता गायत्री की एक और स्वर झंकृति सुनायी दी-‘‘वत्स! उन शब्दों को सुना करो जिनका उच्चारण न जिह्वा करती है, न ओठ और न कण्ठ। नीरव अन्तराल से जो मौन प्रेरणाएँ और परागान प्रस्फुटित होता रहता है, उसे सुनकर तेरा मानव जीवन धन्य हो जाएगा।’’

🔵 तभी से मैं किसी भी वर्ण, त्वचा और शरीर वाले दीन-दुःखी को प्यार करने में लगा हूँ। उन्हें भी मैं अपने निर्मल प्रेम के जल से धोता हूँ, जो वासनाओं की मलीनता से ग्रस्त हैं। मेरे अन्दर अब प्यार के सिवा और कुछ नहीं। तब से मैं हृदय गुहा में असीम सौन्दर्य के ध्यान में निमग्न हूँ, तभी से मौन की शरण होकर उस स्तोत्र को सुनकर आनन्दपूरित हो रहा हूँ, जिसे युगों से नभोमण्डल का कोई अदृश्य गायक गाता और शाश्वत सौन्दर्य का बोध कराता रहता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 35

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 April

🔴 वस्तुओं और व्यक्तियों में कोई आकर्षण नहीं है अपनी आत्मीयता जिस किसी से भी जुड़ जाती है वही प्रिय लगने लगती है यह तथ्य कितना स्पष्ट किन्तु कितना गुप्त है लोग अमुक व्यक्ति या अमुक वस्तु को रुचिर मधुर मानते हैं और उसे पाने लिपटाने के लिए आकुल व्याकुल रहते हैं। प्राप्त होने पर वह आकुलता जैसे ही घटती है वैसे ही वह आकर्षण तिरोहित हो जात ह। किसी कारण यदि ममत्व हट या घटा जाय तो वही वस्तुतः जो कल तक अत्यधिक प्रिय प्रतीत होती थी और जिसके बिना सब कुछ नीरस लगता था। बेकार और निकम्मी लगने लगेंगी वस्तु या व्यक्ति वही किन्तु प्रियता में आश्चर्यजनक परिवर्तन बहुधा होता रहता है। इसका कारण एक मात्र यही है कि उधर से ममता का आकर्षण कम हो गया।

🔵 हमारा अज्ञान ही है जो अकारण हर्षोन्मत्त एवं शोक आवेश के ज्वार भाटे में उछलता भटकाता रहता है। यदि मायाबद्ध अशुद्ध चिंतन से छुटकारा मिल जाय और सृष्टि के अनवरत जन्म बुद्धि विनाश के अनिवार्य क्रम को समझ लिया तो मनुष्य शान्त सन्तुलित स्थिर सन्तुष्ट एवं सुखी रह सकता है। ऐसी देवोपम मनोभूमि पल पल में पग पग में स्वर्गीय जीवन की सुखद संवेदनाएं सम्मुख प्रस्तुत किये रह सकती है। चिन्तन में बैठे अज्ञानी बालक के ज्वार से प्रसन्न और भाटा से अप्रसन्न होने की तरह हमें उद्विग्न बनाये रहता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔴 मुझे रास्ता मालूम है। वह तंग किन्तु सीधा है वह खांड़े की धार जैसा है। उस पर चलने में मुझे आनन्द आता है। जब फिसल जाता हूँ तो जी भरकर रोता हूँ। भगवान् का वचन है-कल्याण पथिक की दुर्गति नहीं होती। इस आश्वासन पर मुझे अटूट श्रद्धा है। इस श्रद्धा को गँवाऊँगा नहीं। जिस दिन काया पूर्णतः वश में आ जायगी उस दिन उस दिव्य ज्योति के दर्शन पाऊँगा, इस पर मेरा अविचल विश्वास है।

🌹 ~महात्मा गाँधी

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 14)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 संसार में जितने भी महान पुरुष हुए हैं उनकी महानता का एक ही आधार स्तम्भ है कि उन्होंने अपने समय का पूरा-पूरा उपयोग किया। एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। जिस समय लोग मनोरंजन, खेल-तमाशों में मशगूल रहते हैं, व्यर्थ आलस्य प्रमाद में पड़े रहते हैं, उस समय महान् व्यक्ति महत्त्वपूर्ण कार्यों का सृजन करते रहते हैं। ऐसा एक भी महापुरुष नहीं जिसने अपने समय को नष्ट किया हो और वह महान् बन गया हो। समय बहुत बड़ा धन है। भौतिक धन से भी अधिक मूल्यवान्। जो इसे भली प्रकार उपयोग में लाता है वह सभी तरह के लाभ प्राप्त कर सकता है। छोटे से जीवन में भी बहुत बड़ी सफलतायें प्राप्त कर लेता है। वह छोटी-सी उम्र में ही दूसरों से बहुत आगे बढ़ जाता है।

🔵 समय जितना कीमती और फिर न मिलने वाला तत्व है उतना उसका महत्व प्रायः हम लोग नहीं समझते। हममें से बहुत-से लोग अपने समय का बहुत ही दुरुपयोग करते हैं, उसको व्यर्थ की बातों में नष्ट करते रहते हैं। आश्चर्य है समय ही ऐसा पदार्थ है जो एक निश्चित मात्रा में मनुष्य को मिलता है लेकिन उसका उतना ही अधिक अपव्यय भी होता है। हममें से कितने लोग ऐसा सोचते हैं कि हमारा कितना समय आवश्यक और उपयोगी कार्यों में लगता है और कितना व्यर्थ के कामों में, सैर-सपाटे, मित्रों में गपशप, खेल-तमाशे, मनोरंजन, आलस्य, प्रमाद आदि में? हम कितना नष्ट करते हैं, व्यर्थ की बकवास, अनावश्यक कार्यों में? हम जितना समय नष्ट करते हैं यदि उसका लेखा-जोखा लें तो प्रतीत होगा कि अपने जीवन धन का एक बहुत बड़ा भाग हम अपने आप ही व्यर्थ नष्ट कर डालते हैं समय के रूप में। काश एक-एक मिनट, घण्टे, दिन का हम उपयोग करें तो कोई कारण नहीं कि हम जीवन में महान् सफलताएं प्राप्त न करें।

🔴 समय की बरबादी का सबसे पहला शत्रु है किसी काम को आगे के लिये टाल देना। ‘आज नहीं कल करेंगे।’ इस कल के बहाने हमारा बहुत-सा वक्त नष्ट हो जाता है। स्वेटमार्डेन ने लिखा है ‘इतिहास के पृष्ठों में कल की धारा पर कितने प्रतिभावानों का गला कट गया, कितनों की योजनायें अधूरी रह गईं, कितनों के निश्चय बस यों ही रह गये, कितने पछताते, हाथ मलते रह गये! कल असमर्थता और आलस्य का द्योतक है।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शक्ति संचय कीजिए

🔴 जीवन एक प्रकार का संग्राम है। इसमें घड़ी-घड़ी मे विपरीत परिस्थितियों से, कठिनाइयों से, लड़ना पड़ता है। मनुष्य को अपरिमित विरोधी-तत्त्वों को पार करते हुए अपनी यात्रा जारी रखनी होती है। दृष्टि उठाकर जिधर भी देखिए, उधर ही शत्रुओं से जीवन घिरा हुआ प्रतीत होगा। ‘दुर्बल, सबलों का आहार है’ यह एक ऐसा कड़वा सत्य है, जिसे लाचार होकर स्वीकार करना ही पड़ता है। छोटी मछली को बड़ी मछली खाती है। बड़े वृक्ष अपना पेट भरने के लिए आस-पास के असंख्य छोटे-छोटे पौधों की खुराक झपट लेते हैं। 

🔵 छोटे कीड़ों को चिड़ियाँ खा जाती हैं और उन चिड़ियों को बाज आदि बड़ी चिड़ियाँ कार कर खाती हैं। गरीब लोग अमीरों द्वारा, दुर्बल बलवानों द्वारा सताए जाते हैं। इन सब बातों पर विचार करते हुए हमें इस निर्णय पर पहुँचना होता है कि यदि सबलों का शिकार बनने से, उनके द्वारा नष्ट किए जाने से, अपने को बचाना है तो अपनी दुर्बलता को हटाकर इतनी शक्ति तो कम से कम अवश्य ही संचय करती चाहिए कि चाहे जो कोई यों ही चट न कर जाए।

🔴 सांसारिक जीवन में प्रवेश करते हुए यह बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिए और समझ कर गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि केवल जागरूक और बलवान व्यक्ति ही इस दुनिया में आनंदमय जीवन के अधिकारी हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति-अग. 1945 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1945/August.3

👉 पुरुषार्थ कीजिए! (भाग 2)

🔴 संसार में छोटे-मोटे लोगों के तुम क्यों गुलाम बनते हो ? क्यों मिमियाते, झींकते या बड़बड़ाते हो, दुःख, चिन्ता और क्लेशों से क्यों विचलित हो उठते हो। नहीं, मनुष्य के लिए इन सबसे घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह तो अचल, दृढ़, शक्तिशाली और महाप्रतापी है।

🔵 इसी क्षण से अपना दृष्टिकोण बदल दीजिये। अपने आप को महाप्रतापी, पुरुषार्थी पुरुष मानना शुरू कर दीजिए। तत्पर हो जाइये। सावधानी से अपनी कमजोरी और कायरता छोड़ दीजिये। बल और शक्ति के विचारों से आपका सुषुप्त अंश जाग्रत हो उठेगा।

🔴 सामर्थ्य और शक्ति आपके अन्दर है। बल का केन्द्र आपका मस्तिष्क है, वह नित्य, स्थायी और निर्विकार है फिर किस वस्तु के अभाव को महसूस करते हो? किस शक्ति को बाहर ढूंढ़ते फिरते हो? किस का सहारा ताकते हो ? अपनी ही शक्ति से आपको उठना और उन्नति करनी है। उसी से प्रभावशाली व्यक्तित्व बनाना है। आपको किसी भी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। आपके पास पुरुषार्थ का गुप्त खजाना है उसे खोलकर काम में लाइये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹~अखण्ड ज्योति सितम्बर 1948
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/September/v2.17

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 86)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 जन्मतः सभी अनगढ़ होते हैं। जन्म-जन्मांतरों के कुसंस्कार सभी पर न्यूनाधिक मात्रा में लदे होते हैं। वे अनायास ही हट या भग नहीं जाते। गुरु कृपा या पूजा-पाठ से भी वह प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। उनके समाधान का एक ही उपाय है-जूझना। जैसे ही कुविचार उठें, उनके प्रतिपक्षी सद्विचारों की सेना को पहले ही प्रशिक्षित, कटिबद्ध रखा जाए और विरोधियों से लड़ने को छोड़ दिया जाए। जड़ जमाने का अवसर न मिले तो कुविचार या कुसंस्कार बहुत समय तक ठहरते नहीं। उनकी सामर्थ्य स्वल्प होती है।

🔵 वे आदतों और प्रचलनों पर निर्भर रहते हैं। जबकि सद्विचारों के पीछे तर्क, तथ्य, प्रमाण, विवेक आदि अनेकों का मजबूत समर्थन रहता है। इसलिए शास्त्रकार की उक्ति ऐसे अवसरों पर सर्वथा खरी उतरती है, जिनमें कहा गया है कि ‘‘सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं।’’ इसी बात को यों भी कहा जाता है कि ‘‘परिपक्व किए गए सुसंस्कार ही जीतते हैं, आधार रहित कुसंस्कार नहीं।’’ जब सरकस के रीछ-वानरों को आश्चर्यजनक कौतुक, कौतूहल दिखाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है, तो कोई कारण नहीं कि अनगढ़ मन और जीवन क्रम को संकल्पवान साधनों के हंटर से सुसंस्कारी न बनाया जा सके।

🔴 गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने से त्रिवेणी संगम बनने और उसमें स्नान करने वाले का काया-कल्प होने की बात कही गई है। बगुले का हंस और कौए का कोयल आकृति से बदल जाना तो सम्भव नहीं है, पर इस आधार पर विनिर्मित हुई अध्यात्म धारा का अवगाहन करने से मनुष्य का अंतरंग और बहिरंग जीवन असाधारण रूप से बदल सकता है, यह निश्चित है। यह त्रिवेणी उपासना, साधना और आराधना के समन्वय से बनती है। यह तीनों कोई क्रियाकाण्ड नहीं हैं जिन्हें इतने समय में, इस विधि से, इस प्रकार बैठकर सम्पन्न करते रहा जा सके।

🔵 यह चिंतन, चरित्र और व्यवहार में होने वाले उच्चस्तरीय परिवर्तन हैं, जिनके लिए अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर निरंतर ध्यान देना पड़ता है। दुरितों के संशोधन में प्रखरता का उपयोग करना पड़ता है और नई विचारधारा में अपने गुण, कर्म, स्वभाव को इस प्रकार अभ्यस्त करना पड़ता है जैसे अनगढ़ पशु-पक्षियों को सरकस के करतब दिखाने के लिए जिस तिस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है। पूजा कुछ थोड़े समय की हो सकती है, पर साधना तो ऐसी है, जिसके लिए गोदी के बच्चे को पालने के लिए निरंतर ध्यान रखना पड़ता है। फलवती भी वही होती है। जो लोग पूजा को बाजीगरी समझते हैं और जिस-तिस प्रकार के क्रिया-कृत्य करने भर के बदले ऋद्धि-सिद्धियों के दिवास्वप्न देखते हैं, वे भूल करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.2

👉 आज का सद्चिंतन 20 April 2017


👉 Heard the Bhagwat four times

🔴 Parikshit Maharaj heard Bhagwat Puran from Shukdeo and attained salvation. A rich man on hearing this, developed great respect for the Bhagwat, and got eager to listen to it from a Brahmin to get liberated.

🔵 He searched and found a profound priest of Bhagwat. He told him his intention of hearing the Bhagwat. The priest told him that this is Kaliyug, all the pious activities in this age is reduced four times, thus he had to listen to it for four times. The reason behind the priest’s proposition was to get enough money out of the deal. He gave the fees to the priest and heard four Bhagwat lectures but it was of no use. The man then met a higher level of saint. He asked him, how Parikshit could get and he didn’t after listening to the Bhagwat.

🔴 The saint told him, that Parikshit Maharaj had known the death to be imminent and was completely detached from the world while hearing and Shukdeo Muni was narrating without the feeling of any kind of greed.

🔵 Whoever has got the knowledge in the form of an advice, free of any kind of self vested interests, that has produced desired results.

🌹 ~Pragya Puran Stories

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 April 2017


👉 जगज्जननी की कृपा से नारी का स्वरूप बोध

🔵 हे माँ! आपका सान्निध्य पाकर हम जान सके कि ‘नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, शक्ति है, पवित्रता है, कला है और वह सब कुछ है जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धि है, ऋद्धि है और वह सब कुछ है जो मानव प्राणी के समस्त अभावों, कष्टों एवं संकटों को निवारण करने में समर्थ है।’ यदि उसे श्रद्धासिक्त सद्भावना अर्पित की जाय, तो वह विश्व के कण-कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओत-प्रोत कर सकती है।

🔴 आपका वात्सल्य पाकर हमें बोध हुआ कि नारी सनातन शक्ति है। वह आदिकाल से उन सामाजिक दायित्वों को अपने कन्धों पर उठाए आ रही है, जिन्हें केवल पुरुष के कन्धों पर डाल दिया गया होता, तो वह न जाने कब लड़खड़ा गया होता, किन्तु विशाल भवनों का असह्य भार वहन करने वाली नींव के समान वह उतनी ही कर्त्तव्यनिष्ठा, उतने ही मनोयोग, सन्तोष और उतनी ही प्रसन्नता के साथ उसे आज भी ढोए चल रही है। वह मानवीय तपस्या की साकार प्रतिमा है।

🔵 भौतिक जीवन की लालसाओं को उसी की पवित्रता ने रोका और सीमाबद्ध करके उन्हें प्यार की दिशा दी। प्रेम नारी का जीवन है। अपनी इस निधि को वह अतीत काल से मानव पर न्योछावर करती आयी है। कभी न रुकने वाले इस अमृत निर्झर ने संसार को शान्ति और शीतलता दी है।

🔴 हे जगज्जननी! आपकी कृपा से हम अपने अन्तःकरण में इस ऋषिवाणी को अनुभव करते हैं-
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ता सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्ति।।

🔵 हे देवि! समस्त संसार की सब विद्याएँ तुम्हीं से निकली हैं और सब स्त्रियाँ तुम्हारा ही स्वरूप हैं, समस्त विश्व एक मात्र तुम्हीं से पूरित है। अतः तुम्हारी स्तुति किस प्रकार की जाय?

🔴 अन्तःकरण में इस भाव की घनीभूत अनुभूति से प्रेरित होकर हम सब आपकी सन्तानें, आपकी द्वितीय पुण्यतिथि के अवसर पर अखण्ड च्योति के इस अंक को ‘नारी-अंक’ के रूप में आपको समर्पित करते हैं। भावों की इस पुप्षाञ्जलि को स्वीकार करो माँ! और हम सब पर सदा की भाँति अपने आँचल की वरद्च्छाया बनाये रखना।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 34

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 April

🔴 आनन्द की उपलब्धि के लिए अमुक साधनों की-अमुक परिस्थितियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसके लिए अपना चिन्तन और अपना स्तर ही पर्याप्त होता है। पुष्प की कोमलता, सुषमा ओर सुगन्ध ही उसे हँसते-खिलते रहने के लिए पर्याप्त हैं। उस पर किसी दूसरे द्वारा रंग पोता जाना या सुगन्ध छिड़का जाना अभीष्ट नहीं आदर्शवादी व्यक्तित्व खिले हुए सुगन्धित पुष्प की तरह है जो स्वयं भी धन्य होता है और संपर्क में आने वालों को भी आनन्द प्रदान करता है। ऐसे व्यक्तियों को देव कहा जा सकता है और उनके निवास क्षेत्र को बिना संकोच स्वर्ग घोषित किया जा सकता है। प्रखर विचारों में वह क्षमता होती ही है जिसके आधार पर संपर्क क्षेत्र को स्वर्गीय वातावरण से ओत-प्रोत किया जा सके।

🔵 अपने व्यक्तित्व को आनन्दमय बनाने के लिए संयम, सदाचार, कर्त्तव्य निष्ठा, आत्मीयता, करुणा, जैसी सद्भावनाओं को अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित करने की आवश्यकता पड़ती है। संपर्क क्षेत्र को प्रभावित करने के लिए नम्रता, प्रामाणिकता और पुरुषार्थ परायणता जहाँ भी होगी वहाँ विविध सफलताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहेंगी और जन सहयोग एवं लोक सम्मान का भी अभाव न रहेगा। ऐसी परिस्थितियों को प्रत्यक्ष स्वर्ग कहा जा सकता है। इसका विनिर्मित करना किसी के लिए भी कठिन नहीं है।

🔴 गलती करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। यदि जाने-अनजाने हमसे किसी प्रकार की गलती हो जाती है जिसका आभास हमें नहीं हो रहा हो तो ऐसी गलती को स्वीकार कर लेना चाहिए। अपने गलती को स्वीकार कर लेने वाला व्यक्ति जीवन में पुनः गलती करने से सावधान रहता है। इसके लिए आवश्यक हैं कि अपने यहाँ पारिवारिक गोष्ठी की व्यवस्था अवश्य बना ली जाय।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 13)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिये असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है लेकिन एक ऐसी भी चीज है जिसे एक बार खोने के बाद कभी नहीं पाया जा सकता और वह है—समय। एक बार हाथ से निकला हुआ समय फिर कभी हाथ नहीं आता। कहावत है ‘‘बीता हुआ समय और कहे हुए शब्द कभी वापस नहीं बुलाये जा सकते।’’ समय परमात्मा से भी महान् है। भक्ति साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता।

🔵 समय ही जीवन की परिभाषा है, क्योंकि समय से ही जीवन बनता है। समय का सदुपयोग करना जीवन का उपयोग करना है। समय का दुरुपयोग करना जीवन का नष्ट करना है। समय किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। वह प्रतिक्षण, मिनट, घन्टे, दिन, महलने, वर्षों के रूप में निरन्तर अज्ञात दिशा को जाकर विलीन होता रहता है। समय की अजस्र धारा निरन्तर प्रवाहित होती रहती है और फिर शून्य में विलीन हो जाती है फ्रैंकलिन ने कहा है—‘‘समय बरबाद मत करो क्योंकि समय से ही जीवन बना है।’’ निस्सन्देह वक्त और सागर की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं हमारा कर्तव्य है कि हम समय का पूरा पूरा सदुपयोग करें।

🔴 सचमुच जो व्यक्ति अपना तनिक सा भी समय व्यर्थ नष्ट करते हैं उन्हें समय अनेकों सफलताओं से वंचित कर देता है। नेपोलियन ने आस्ट्रेलिया को इसलिए हरा दिया कि वहां के सैनिकों ने पांच ही मिनटों का विलम्ब कर दिया उसका सामना करने में। लेकिन वही नेपोलियन कुछ ही मिनटों में बन्दी बना लिया गया क्योंकि उसका एक सेनापति कुछ ही मिनट विलम्ब से आया। वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन की पराजय इसी कारण से हुई। समय की उपेक्षा करने पर देखते देखते विजय का पासा पराजय में पलट जाता है लाभ हानि में बदल जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पुरुषार्थ कीजिए! (भाग 1)

🔴 मनुष्य संसार में सबसे अधिक गुण, समृद्धियाँ, शक्तियाँ लेकर अवतरित हुआ है। शारीरिक दृष्टि से हीन होने पर भी परमेश्वर ने उसके मस्तिष्क में ऐसी-2 गुप्त आश्चर्यजनक शक्तियाँ प्रदान की हैं, जिनके बल से वह हिंस्र पशुओं पर भी राज्य करता है, दुष्कर कृत्यों से भयभीत नहीं होता आपदा और कठिनाई में भी वेग से आगे बढ़ता है।

🔵 मनुष्य का पुरुषार्थ उसके प्रत्येक अंग में कूट कूट कर भरा गया है। मनुष्य की सामर्थ्य ऐसी है कि वह अकेला समय के प्रवाह और गति को मोड़ सकता है। धन, दौलत, मान, ऐश्वर्य, सब पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त हो सकते हैं।

🔴 अपने गुप्त मन से पुरुषार्थ का गुप्त सामर्थ्य निकालिए। वह आपके मस्तिष्क में है। जब तक आप विचारपूर्वक इस अन्तःस्थित वृत्ति को बाहर नहीं निकालते तब तक आप भेड़ बकरी बने रहेंगे। जब आप इस शक्ति को अपने कर्मों से बाहर निकालेंगे, तब प्रभावशाली बन सकेंगे।

🔵 संसार के चमत्कार कहाँ से प्रकट हुए? संसार के बाहर से नहीं आये, और ब्रह्म शक्ति आकर उन्हें प्रस्तुत नहीं कर गई है। उनका जन्म मनुष्य के भीतर से हुआ था। संसार की सभी शक्तियाँ, सभी गुण, सभी तत्व, सभी चमत्कार मनुष्य के मस्तिष्क में से निकले हैं। उद्गम स्थान हमारा अन्तःकरण ही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹~अखण्ड ज्योति सितम्बर 1948
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/September/v2.17