सोमवार, 17 अगस्त 2020

👉 साधना की शक्ति

वर्षों पुरानी बात है। एक राज्य में महान योद्धा रहता था। कभी किसी से नहीं हारा था। बूढ़ा हो चला था, लेकिन तब भी किसी को भी हराने का माद्दा रखता था। चारों दिशाओं में उसकी ख्याति थी। उससे देश-विदेश के कई युवा युद्ध कौशल का प्रशिक्षण लेने आते थे।

एक दिन एक कुख्यात युवा लड़ाका उसके गांव आया। वह उस महान योद्धा को हराने का संकल्प लेकर आया था, ताकि ऐसा करने वाला पहला व्यक्ति बन सके। बेमिसाल ताकतवर होने के साथ ही उसकी खूबी दुश्मन की कमजोरी पहचानने और उसका फायदा उठाने में महारत थी। वह दुश्मन के पहले वार का इंतजार करता। इससे वह उसकी कमजोरी का पता लगाता। फिर पूरी निर्ममता, शेर की ताकत और बिजली की गति से उस पर पलटवार करता। यानी, पहला वार तो उसका दुश्मन करता लेकिन आखिरी वार इस युवा लड़ाके का ही होता था।

अपने शुभचिंतकों और शिष्यों की चिंता और सलाह को नजरअंदाज करते हुए बूढ़े योद्धा ने युवा लड़ाके की चुनौती कबूल की। जब दोनों आमने-सामने आए तो युवा लड़ाके ने महान योद्धा को अपमानित करना शुरू किया। उसने बूढ़े योद्धा के ऊपर रेत-मिट्टी फेंकी। चेहरे पर थूका भी। देर तक बूढ़े योद्धा को गालियां देता रहा। जितने तरीके से संभव था, उतने तरीके से उसे अपमानित किया। लेकिन बूढ़ा योद्धा शांतचित्त, एकाग्र और अडिग रहा और उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को पैनी नज़रों से देखता रहा। युवा लड़ाका थकने लगा। अंतत: अपनी हार सामने देखकर वह शर्मिंदगी के मारे भाग खड़ा हुआ।

बूढ़े योद्धा के कुछ शिष्य इस बात से नाराज और निराश हुए कि उनके गुरु ने गुस्ताख युवा लड़ाके से युद्ध नहीं किया। उसे सबक नहीं सिखाया। इन शिष्यों ने गुरु को घेर लिया और सवाल किया, 'आप इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? आपने उसे भाग जाने का मौका कैसे दे दिया?’

महान योद्धा ने जवाब दिया, ‘यदि कोई व्यक्ति आपके लिए कुछ उपहार लाए, लेकिन आप लेने से इनकार कर दें। तब यह उपहार किसके पास रह गया?’ देने वाले के पास ही न।

इसी प्रकार साधना में भी कई प्रकार की बाधाएं आएँगी उनसे लड़ने में अपनी शक्ति न गवाएं बल्कि कुछ समय मौन रहें साधना में निरन्तरता रखें सहज होने की कोशिश रखें। थोड़े ही समय बाद आप उन परिस्तिथियों से आगे निकल जायेंगे। और हमेशा विजयी ही रहेंगे। साधना से जो बड़ी बात अंदर पैदा होती है वो है असीम शांति जिसके सम्पर्क में आते ही बड़ी से बड़ी आसुरी शक्ति भी अपनी कोशिशें कर के थक जाती हैं और भाग जाती हैं या साधक के शरणागत हो जाती है बस जरूरत है धैर्य की और असीम शांति की। अगर परिस्तिथिवश कभी लड़ना भी पड़े तो अंदर शांत रहते हुए पूरी परिस्तिथियों को देखते हुए लड़ो बिना क्रोध किये कोई भी शक्ति होगी आपके ऊपर प्रभाव न डाल सकेगी।

👉 भीतरी गन्दगी की दुर्गन्धित सड़न

आलसी और अव्यवस्थित, छिद्रान्वेषी और उद्विग्न मनुष्य के लिए यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा हैं और न परलोक में स्थान। ऐसे लोग क्षणिक सुख की मृग तृष्णा में भटकते और ओस चाटते फिरते हैं, फिर भी उन्हें सन्ताप के अतिरिक्त मिलता कुछ नहीं। दो घड़ी डरते काँपते कुछ ऐश कर भी लिया तो उसकी प्रतिक्रिया में चिर−अशान्ति उनके पल्ले बँध जाती है।

मन की मलीनता से बढ़कर इस संसार में मनुष्य का और कोई शत्रु नहीं है। यह पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और जो कुछ मानव−जीवन में श्रेष्ठता है उस सब को चुपके−चुपके खा जाती है। बेचारा मनुष्य अपनी बर्बादी की इस तपेदिक का समझ भी तो नहीं पाता। वह बाहर ही बाहर कारणों को ढूँढ़ता रहता है; कभी इस पर कभी उस पर दोष मड़ता रहता है और भीतर ही भीतर चलने वाली यह सत्यानाशी आरी सब कुछ चीर डालती है। उन्नति, प्रगति, शान्ति, स्नेह, आत्मीयता, प्रसन्नता जैसे लाभ जो उसे मन के स्वच्छ होने पर सहज ही मिल सकते थे उसके लिए एक असंभव जैसी चीज बने रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५)

प्रवेश से पहले जानें अथ का अर्थ
  
‘अथ योगानुशासनम्’ के सूत्र का सार यही है- शिष्यत्व का जन्म और सद्गुरु की प्राप्ति। शिष्यत्व और सद्गुरु जब मिलते हैं- तभी योग साधना का प्रारम्भ होता है। अन्तर्यात्रा का विज्ञान जन्म लेता है। अस्तित्व में अनूठे प्रयोग शुरू होते हैं। महर्षि पतंजलि के इस प्रथम सूत्र को जो नहीं समझ पाते, योग साधना का प्रवेश द्वार उनके लिए कभी भी नहीं खुलता। परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में भी यह द्वार इसी रीति से खुला था। ‘अथ’ शब्द की समझ ने, और योग अनुशासन की स्वीकार्यता ने ही उन्हें महायोगी बनाया। अपने सुदीर्घ साधनामय जीवन का निष्कर्ष बताते हुए उन्होंने लिखा- अध्यात्म एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। इसके प्रयोगों के लिए हमें एक सच्चे वैज्ञानिक की भाँति सत्यान्वेषी बनना होगा। अध्यात्म की भाषा में शिष्यत्व ही इसका पर्याय और कसौटी है।
  
इन पंक्तियों को पढ़कर अपनी योग साधना प्रारम्भ करने वाले साधकों के लिए इस सूत्र की साधना के व्यावहारिक बिन्दु निम्न है- १. इस समझ को आत्मसात करना ही योग सत्य की प्राप्ति है, सिद्धि की प्राप्ति नहीं। २. ‘अथ का पुण्य क्षण’ लाने के लिए गुरुदेव को पुकारना, उनकी कृपा का आह्वान करना। ३. योग के प्राथमिक अनुशासन के रूप में किसी सुखप्रद आसन (सुखासन, पद्मासन आदि) पर देर तक बैठकर गायत्री महामंत्र को जपने का अभ्यास, ४. इस विवेक पथ का अनुशीलन करके भी यदि अभी तक हमें योग की अनुभूति नहीं हो सकी है, तो इसका एक मात्र कारण यह है कि अपनी पात्रता अभी परिपक्व नहीं है, इसे परिपक्व करने के प्रयास में प्राणपण से जुटना।
  
इस सम्बन्ध में और अधिक व्यावहारिक ज्ञान पाने के लिए शान्तिकुञ्ज पत्र लिखकर परामर्श किया जा सकता है। अथवा फिर यहाँ नियमित रूप से संचालित होने वाले साधना सत्रों में भागीदारी करके अपनी जिज्ञासा का समाधान पाया जा सकता है। योग अपने आप में क्या है? इसे अच्छी तरह से जाने बिना इसकी सच्ची साधना असम्भव है। पर आत्मा में शिष्यत्व के जन्म के बिना यह जाना भी नहीं जा सकता।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 "Direction of life

Nowadays there is a general tendency to tell a lie, live a lie and behave like a wolf in sheep's clothing. Someone may be talking a lot about morals, righteousness or religious matters but his/her life could well beriddled with wrongdoings and selfish acts. The only thing that really matters is person’s deep-rooted beliefs. That is what decides the overall direction of life. Someone may have a firm belief that having lots of money is a sign of a successful life and would keep busy, day and night, amassing money.

Someone else may have a notion that having sensual pleasures is the most important thing in the life and may squander away the family fortune in the pursuit of having such pleasures. Someone who strongly believes that realising God is the ultimate achievement of life may give up all the worldly pleasures and live a devout life like that of a saint. Someone who cherishes patriotism would happily sacrifice his/her life for the sake of the nation.

The deep-seated beliefs of a person influence and shape his/her way of thinking and imagination. He/she would even endure any amount of difficulties that may arise along the way to realising them. It is not the pretended talks, gossips or the outward thoughts but the deep-seated inner beliefs of individual that actually decide the direction of his/her life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Aatmagyaan aur Atmakalyaan  (Self-realization and Self-benefit) Page 3

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (भाग १)

भव्य भवन थोड़े से या झोंपड़े बहुत से, इन दोनों में से एक का चयन जन कल्याण की दृष्टि से करना है, तो बहुलता वाली बात को प्रधानता देनी पड़ेगी। राम...