गुरुवार, 4 मार्च 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (भाग २)

कभी हमने पूर्व जन्मों के सत् संस्कार वालों और अपने साथी सहचरों को बड़े प्रयत्नपूर्वक ढूंढा है और 'अखण्ड- ज्योति परिवार की शृद्खला में गूंथकर एक सुन्दर गुलदस्ता तैयार किया था। मंशा थी इन्हें देवता के चरणों में चढ़ा येंगे। पर अब जब जब कि बारीकी से नजर डालते हैं कि कभी के अति सुरम्य पुष्प अब परिस्थितियों ने बुरी तरह विकृत कर दिये है। वे अपनो कोमलता, शोभा और सुगंध तोनों ही खोकर बुरी तरह इतनी मुरझा गये कि हिलाते- दुलाते हैं तो भी सजीवता नहीं आती उलटी पंखड़ियाँ भर जाती हैं। ऐसे पुष्पों को फेंकना तो नहीं है क्योंकि मूल संस्कार जब तक विद्यमान हैं तब तक यह आशा भी है कि कभी समय आने पर इनका भी कुछ सदुपयोग सम्भव होगा, किसी औषधि में यह मुरझाये फूल भी कभी काम आयेंगे। पर आज तो देव देवो पर चढ़ाये जाने योग्य सुरभित पुष्पों की आवश्यकता है सो उन्हीं की छांट करनी पड़ रही है। 

अभी आज तो सजीवता ही अभीष्ट है और वस्तुस्थिति की परख तो कहने- सुनने- देखने- मानने से नहीं वरन् कसौटी पर कसने से ही होता है। सो परिवार को सजोवता- निर्जीवता- आत्मीयता, विडम्बना के अंश परखने के लिए यह वर्तमान प्रक्रिया प्रस्तुत की है। अगले बीस महीनों में यथार्थता आजायगो और जन- सम्पर्क की दिशा में किये हुए अपने  प्रयासों की सफलता- असफलता का एक सही निष्कर्ष साथ लेकर हम विदा हो सकेंगे यह इसलिए भी आवश्यक है कि यहाँ से जाने के बाद हमें किसके लिए क्या और कितना करना है इसके सम्बन्ध में भी अपनी दृष्टि साफ हो जायगी। बेकार की घचापच छट जाने से अपने अन्तरिम परिवार को एक छोटी सीमा अपने लिए भी हलकी पड़ेगी बौर अधिक ध्यान से सींचे- पोसे जाने के कारण वे पौधे भी अधिक लाभान्वित होंगे 

नव- निर्माण के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। विचार- प्रसार तो उसका बीजारोपण है। इसके बिना कोई गति नहीं। अक्षर ज्ञान की शिक्षा पाये बिना ऊंची पढ़ाई की न तो आशा है न सम्भावना है। इसलिए प्रारम्भ में हर किसी को अक्षर ज्ञान कराना अनिवार्य है। पीछे जिसकी जैमी अभिरुचि हो शिक्षा के विषय चुनना रह सकता है पर अनिवार्य में छूट किसी को नहीं मिल सकती। प्रारम्भिक अक्षर सबको समान रूप में  पढ़ने पड़े गे। विचारों की उप- योगिता, महत्ता, शक्ति और प्रमुखता का रहस्य हर किसी के मस्तिष्क में कूट- कूट कर भरा जाना है और बताया जाना है कि व्यक्ति की महानता और समाज की प्रखरता उसमें सक्षिप्त विचार पद्धति पर ही सन्निहित है। परिस्थितियों के बिगड़ने- बनने का एकमात्र आधार विचारणा ही है। विवेक के प्रकाश में यह परखा जाना चाहिये कि हमने अपने ऊपर कितने अवांछनीय और अनुपयुक्त  विचार अंट रखे है और उनने हमारी कितनी लोमहर्षक दुर्गति की है। हमें तत्त्वदर्शी की तरह वस्तुस्थिति का विश्लेषण करना होगा और निर्णय करना होगा कि किन आदर्शों और उत्कृष्टताओं को अपनाने के लिए कठिबद्ध हों ताकि वर्तमान के नरक को हटाकर उज्ज्वल भविष्य की स्वर्गीय सम्भावनाओं को मूर्तिमान् बना सकना सम्भव हो सके। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1986 

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan 4 Mar 2021

आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने वाले भी जब समय का ठीक-ठाक उपयोग नहीं कर पाते, इस सम्बन्ध में जागरूक और विवेकशील नहीं होते तो बड़ा आश्चर्य होता है। इससे अच्छे तो वे लोग ही है, जो बेचारे किसी प्रकार जीवन-निर्वाह के साधन और आजीविका जुटाने में ही लगे रहते हैं। उन्हें यह पछतावा तो नहीं होता है कि जीवन के बहुमूल्य क्षणों का पूर्ण उपयोग नहीं कर सके। आजीविका भी अध्यात्म का एक अंग है, अतएव सम्पूर्ण न सही, कुछ अंशों में तो उन्होंने मानव-जीवन का सदुपयोग किया। हाथ पर हाथ रखकर आलस्य में समय गँवाने वाले सामाजिक जीवन में गड़बड़ी ही फैलाते हैं, भले ही वे कितने ही बुद्धिमान, भजनोपदेशक, कथावाचक, पण्डित या संत-सन्यासी ही क्यों न हों। समय का सदुपयोग करने वाला घसियारा बेकार बैठे रहने वाले पण्डित से बढक़र है, क्योंकि वह समाज को किसी न किसी रूप में समुन्नत बनाने का प्रयास करता ही है।

रस्किन के शब्दों में- ‘‘जवानी का समय तो विश्राम के नाम पर नष्ट करना ही घोर मूर्खता है क्योंकि यही वह समय है जिसमें मनुष्य अपने जीवन का, अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है। जिस तरह लोहा ठण्डा पड़ जाने पर घन पटकने से कोई लाभ नहीं, उसी तरह अवसर निकल जाने पर मनुष्य प्रयत्न भी व्यर्थ चला जाता है। विश्राम करें, अवश्यक करें। अधिक कार्यक्षमता प्राप्त करने के लिए विश्राम आवश्यक है, लेकिन उसका भी समय निश्चित कर लेनाचाहिए और विश्राम के लिए ही लेटना चाहिए।’’

मनुष्य कितना ही परिश्रमी क्यों न हो यदि वह अपने परिश्रम के साथ ठीक समय का सामंजस्य नहीं करेगा तो निश्चय ही उसका श्रम या तो निष्फल चला जाएगा अथवा अपेक्षित फल न ला सकेगा। किसान परिश्रमी है, किंतु यदि वह अपने श्रम को समय पर काम में नहीं लाता तो वह अपने परिश्रम का पूरा लाभ नहीं उठा सकता। वक्त पर न जोतकर असमय  पर जोता खेत अपनी उर्वरता को प्रकट नहीं कर पाता। असमय बोया हुआ बीज बेकार चला जाता है, वक्त पर न काटी गई फसल नष्ट हो जाती है। संसार में प्रत्येक काम के लिए निश्चित वक्त  पर न किया हुआ काम कितना भी परिश्रम करने पर भी सफल नहीं होता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...