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शनिवार, 5 जून 2021

👉 पर्यावरण बचाओ सब मिल


कलरव करते नभ में पक्षी, जीवन गान सुनाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

हरी भरी है धरती प्यारी, मनमोहक उपवन उद्यान।
ताल तलैया सुन्दर झरने, नदियाँ बहती हैं अविराम।।
हरे भरे हैं खेत हमारे,गिरी कानन मन को भाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

बच्चों का झूला है बरगद,डाली उसकी  मत काटो।
मधुर फलों से लदे वृक्ष जो, डाली उनकी मत छांटो।।
लगे हुए आंगन में तरु भी, पुरखों की कथा सुनाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

नदियों में अपशिष्ट बहाकर, क्या विकसित बन पाएंगे।
मछली जल की रानी है, केवल गीतों में गाएंगे।।
तरणताल के दृश्य मनोहर, चित्रों में ही दिख पाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

अल्हड मस्त हवाओं के, झोंकों से मस्ती आती है।
पशु पक्षी नर्तक बन जाते, जब घटा सुहानी छाती है।।
हवा शुद्ध करते हैं  वनतरु, मानव की उम्र बढ़ाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

बासंती बयार बहनें दें, हरी भरी सुन्दर वसुधा हो।
मलयज की मंद समीर बहे, प्राणवायु संपन्न धरा हो।।
आभूषण हैं वृक्ष धरा के, धरती को यही सुहाते हैं।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं।।

प्रदुषण रोकें,वृक्ष लगाएं, वन उपवन ना कटने देंगे।
हम धरती माँ की छाती से, न वन का आँचल हटने देंगे।।
नैसर्गिक जीवन अपनाकर, स्वास्थ्य सुलभ हम पाते है।
पर्यावरण बचाओ सब मिल, यह संकल्प जगाते हैं ।।

                                                              उमेश यादव

गुरुवार, 3 जून 2021

👉 श्रधेयद्वय को स्वर्णिम विवाहदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं



पुण्य  परमार्थ  मय  पूर्ण, जीवन  है  जिनका।
युग स्वयं ही लिखेगा,स्वर्णगाथा सृजन का।।

परिणय  से  नए  युग  की  शुरुआत  थी  तब।
अध्यात्म  में  नव  आयाम  की  बात  थी  तब।।
अभिनंदन  हुआ विज्ञान - धर्म के  मिलन का।
युग स्वयं ही लिखेगा,स्वर्ण गाथा सृजन का।।

माँ  भगवती   महाकाल   के  शैल  संतान  हैं।
माँ  सरस्वती   सत्य   के  प्रणव  पहचान  हैं।।
मिलन   है  प्रेम   का,  सत्य  न्याय  धर्म  का।
युग स्वयं ही लिखेगा,स्वर्णगाथा सृजन का।।

भक्ति  के  शिखर  शैल  श्रद्धा   के  अर्णव  हैं।
श्रद्देय  द्वय   हमारे   स्वयं   जीजी   प्रणव   हैं।।
स्वर्णिम  है   पल,  आप  दोनों  के  मिलन का।
युग स्वयं ही लिखेगा,स्वर्ण गाथा सृजन का।।

                                                -उमेश यादव

शुक्रवार, 7 मई 2021

👉 बीतेगा ये बुरा वक्त


अवसादों  के  अब  तमस हटेंगे, आशाओं के दीप जलेंगे।
बीतेगा  ये  बुरा  वक्त  फिर, खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

अंधियारी मिट जाएगी फिर, विश्वासों  का  सूर्य उगेगा।
उमंगों की बगिया में फिर से, हर्ष-हर्ष का फूल खिलेगा।।
नया  सूर्य गगन  में  होगा, अमन  चैन  के  दिन  फिरेंगे।
बीतेगा  ये बुरा   वक्त फिर,  खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

जीतेंगे ये  जारी  जंग  को, दुःख:  निराशा पास न  होगा।
फिर से सबकुछ अच्छा होगा, अब कोई निराश न होगा।।
कोई  नहीं  अब कष्ट  सहेगा, सभी सुखी  निरोग  रहेंगे।
बीतेगा  ये  बुरा वक्त  फिर,  खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

मिट जाएगी महामारी अब, परजीवी  का कोप न  होगा।
बहुत सहे  हैं  परेशानी अब, शांति का  साम्राज्य बढेगा।।
कामयाब मिलकर हम होंगे, सबके सुख सौभाग्य बढ़ेंगे।
बीतेगा  ये   बुरा  वक्त  फिर, खुशियों  के संगीत बजेंगे।।

                                                                   उमेश यादव

शनिवार, 1 मई 2021

👉 गुरु तेग बहादुर


देश धर्म संस्कृति के खातिर, अपना शीश कटाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

जालिम औरंगजेब ने भारत में, अत्याचार फैलाया था।
कश्मीरी पंडितों को जबरन ही, मुसलमान बनावाया था।।
हिन्दू सिखों पर जुल्मों का जब, क्रूर कहर बरपाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

धर्म संस्कृति की रक्षा को, घर घर अलख जगाये थे।
धैर्य त्याग वैराग्य मूर्ति थे, ’हिन्द दी चादर’कहलाये थे।।
इस्लाम नहीं स्वीकारा गुरु ने, हंसकर शीश कटाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

धर्म नहीं वह होता है जो, बल पर ही अभिमान करे।
मानवीय मूल्यों को न समझे,मानव का अपमान करे।।
क्रांतिकारी गुरु ने तब सबको,धर्म का मर्म सिखाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।  
 
‘सीस दिया पर सी न किया’था, धर्म हेतु बलिदान था।
शाश्वत मूल्यों की रक्षा को, साहस का अभियान था।।
धर्म विरोधी क्रूर शासक को, निर्भय हो धूल चटाया था।।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।  

उमेश यादव

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

👉 महावीर बजरंग बली


महावीर बजरंग बली, श्री राम दूत का अभिनन्दन है।
दुष्टदलन,दुःख-कष्ट हरण,श्री हनुमान का शुभ वंदन है।।

मनुजता जब भी फंसी भँवर में, हनुमान ने उसे उबारा।
भ्रम व भय से मुक्ति दिलाया, नव जीवन दे हमें संवारा।।
सेवा से श्री राम प्रसन्न हो जाते हैं, जग को बतलाया।    
सेवा धर्म ही श्रेष्ठ धर्म है, हनुमत ने जीकर सिखलाया।।
प्रभु सेवक केसरी नंदन का,पवनसुत का अभिवादन है।
महावीर बजरंग बली, श्री राम दूत का अभिनन्दन है।।

दुष्टों के प्रभु सदा काल हैं, महाकाल के अवतारी  हैं।
संतों के रक्षक हैं हरपल, भक्तों  के ह्रदय बिहारी हैं।।
जहाँ कहीं भी अन्धकार है, सूर्य समान पथ द्योतक हैं।
बल बुद्धि विद्या के सागर हैं, आप ही संकटमोचक हैं।।
हर संकट के समाधान हैं, शुभ कार्य को हरि चन्दन हैं।
महावीर बजरंग बली, श्री राम दूत का अभिनन्दन है।।

नयी विपदा आई जग में, आप ही अब उपचार करो।
अतिसूक्ष्म है असुर आज का, प्रभु इसका संहार करो।।
संकट में है प्राण मनुज के, संजीवन दे उपचार करो।
अभयदान फिर दो भक्तों को, हम सब पर उपकार करो।।
आस और विश्वास कपिवर, आपका ही चरण वंदन है।
महावीर बजरंग बली, श्रीराम  दूत का अभिनन्दन है।।

उमेश यादव

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

👉 तौर बदलना होगा


सुनो साथियों, समय कठिन है, संभल-संभल कर चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रिय जन, अब तो तौर बदलना होगा।।

है विनाश की काली छाया, दुनिया में दहशत फैलाया।
यह अदृश्य होकर है लड़ता, छुपा हुआ दुश्मन है आया।।
जीवन पर संकट आया है, हर क्षण हमें संभलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

शत्रु है यह बड़ा सयाना, तनिक नहीं इससे घबराना।
सावधान होकर  है लड़ना, हम सबको है  इसे हराना।।
श्वास-प्राण से युद्ध है इसका, मास्क लगाकर चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

प्राणायाम है बहुत जरुरी, नींद करो अपनी सब पूरी।
सट कर मत चल मेरे भाई, दो गज दुरी बहुत जरुरी।।
इधर उधर न छूना कोई, हाथ समय पर धोना होगा।   
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन,अब तो तौर बदलना होगा।।

गरम गुनगुना पानी पीओ, सर्दी खांसी रहित हो जिओ।
हल्दी का दूध सबसे उत्तम, रोज रात में कप भर पीओ।।    
प्रण लो भाई बिना काम के, घर से नहीं निकलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

हंसी ख़ुशी जीवन है जीना, सदा संतुलित भोजन लेना।
डॉक्टर के सलाह लेकर ही, कोई भी ओषधि  है लेना।।
जीत हमारी सदा सुनिश्चित, सावधान हो चलना होगा।
घर में रहें सुरक्षित प्रियजन, अब तो तौर बदलना होगा।।

उमेश यादव

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

👉 मातु तुम्हारे चरणों में, श्रध्दा भाव समर्पित है


किंचित मात्र न संशय मन में, निश्छल निष्ठा अर्पित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे शैलपुत्री माता आओ, पत्थर में प्रेम रसधार करो,
पर्वत से कठोर पिता के, उर में सहज प्रेम का भाव भरो।
पिता पुत्री का स्नेहिल बंधन तो, सदियों से ही वर्णित है
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे ब्रह्मचारिणी माता आओ, तप से अपने सब विघ्न हरो,
जीवन के संघर्षों में तपाकर, मानव जीवन को कुंदन करो।
तपश्चारिणी और अपर्णा नाम तुम्हारे चर्चित हैं,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे खड्ग विभूषित चंद्रघंटा मां, दुष्टों हेतु टंकार करो,
आलस दूर भागे जग से, वीर रस का भाव भरो।
बाल हृदय सा पवित्र यह मन, माता तुम पर आश्रित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे आदिशक्ति माता आओ, कुष्मांडा का फिर रूप धरो,
है तमस रात्रि की अंतिम बेला, सूर्य का नया विहान करो।
आयुश बल आरोग्य की देवी, ये तन मन तुमको अर्पित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे स्कंदमाता आओ, जीवों में नव चेतना भरो,
हे शुभ्रवर्णा माता सुन लो, साधकों को मोक्ष प्रदान करो,
अज्ञानी को ज्ञान दो हे माता, ज्ञान से ही जीव परिष्कृत है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

मां कात्यायनी आओ माता, रोग शोक संताप हरो,
भक्तों के दुख को हरकर मां, अपनी भक्ति प्रदान करो,
ब्रजमण्डल की अधिष्ठात्री माता, तुम पर जग ये गर्वित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

मां कालरात्रि आओ माता, मन के संशय अब दूर करो,
कल्मष कषाय को हरकर मां, जीवन में नव प्रकाश भरो,
आपके शरण में जो आया, वो काल से भी रक्षित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है

महागौरी माता अब तो, भक्तों का उद्धार करो,
अपनी शीतल छाया से, जीवनी शक्ति संचार करो,
हे गौरवर्णा माता तुम पर, मेरा ये जीवन अर्पित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे सिद्धिदात्री माता तुमसे, शिव भी अर्धनारीश्वर कहलाये,
जिसने भी तेरा ध्यान धरा, अष्ट सिद्धि उसकी हो जाए,
हम पर भी मां कृपा करो, सर्वश्व तुम्हे समर्पित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

हे नौदुर्गे माता सब पर, अपनी करुणा मां बरसाओ,
आज तुम्हारा आवाह्न है, आओ माता दुर्गे आओ,
नौरूप धरो माता फिर से, यह सृष्टि तुम पर आश्रित है,
मातु तुम्हारे चरणों में, ये श्रध्दा भाव समर्पित है।

डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

👉 "आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो"


आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो,
जन्म धरो हे जन्म धरो,
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो।

अयोध्या के आस तुम्ही हो, दशरथ के तो श्वास तुम्ही हो,
कौसल्या की सुनी गोद बुलाए, जन जन के विश्वास तुम्ही हो,
रघुकुल के नायक हे रघुवर, जीवों का दर्द हरो।
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो,
आओ हे गुणधाम आज फिर जन्म धरो।

लखन सरीखा कौन अनुरागी, भरत बने कैसे फिर त्यागी,
शत्रुघ्न की तो बात ना पूछो, वो तो बन बैठा वैरागी,
अनुजों के करतार तुम्ही हो, आकर ज्येष्ठ बनो।
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो,
आओ हे गुणधाम आज फिर जन्म धरो।

मात सुमित्रा तुम पर वारी, कैकेयी भी जाए बलिहारी,
दुनियां में और कौन है ऐसा, तेरी छवि है सबसे न्यारी,
मर्यादा पुरुषोत्तम आओ, नयनों को तृप्त करो,
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो,
आओ हे गुणधाम आज फिर जन्म धरो।

मानवता फिर आज पुकारे, तुम बिन हमको कौन उबारे,
जग के पालनकर्ता तुम हो, पल पल हम तुमको ही निहारे,
प्राणिमात्र की विकल व्यथा है, आकर कष्ट हरो,
आओ हे श्रीराम आज फिर जन्म धरो, आओ हे गुणधा
 
                                                  - डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

👉 माँ नवदुर्गा


हे नवदुर्गा कृपा करो माँ, जगती का उपकार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

शैलपुत्री माँ सती-पार्वती, भव बंधन से मुक्त करा दो।
प्यार और सहकार बढ़े माँ, सुविचार की धार बहा दो।।
बृषभ स्थिता, हेमवती माता, दिव्य ज्ञान संचार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

ब्रह्मचारिणी ब्राह्मी माता, तप करने की शक्ति हमें दो।
शिव स्वरूपा गनेश जननी, शिव की अविचल भक्ति हमें दो।।
ज्योतिर्मय हे मातु उमा अब, मन में  श्रेष्ठ  विचार भरो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

चंद्रघंटा हे मातु भवानी, हर संकट को दूर भगा दे।
सुख,सौभाग्य, शांति दे माते,हर मानव को श्रेष्ठ बना दे।।
दिव्य विभूतियाँ दे दो अम्बे, अहंकार संहार  करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

कूष्मांडा हे आदिशक्ति माँ, तूने ही ब्रह्माण्ड बनाया।
अष्टभुजा हे आदिस्वरुपा, तेरी कांति सर्वत्र समाया।।
रोग शोक का अंत करो माँ, अंतस से कुविचार हरो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।  

स्कंदमातापरम सुखदायी, मुक्ति मोक्ष को सहज करा दो।
शुभ्रवर्ण कमलासिनी माते, मूढ़ मति  हैं, श्रेष्ठ बना  दो।।  
सांसारिक जीवों में माता, नवचेतन का प्रसार  करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।  

कात्यायिनी माता की भक्ति, जो साधक कर पाता है।
धर्म अर्थ और काम मोक्ष की, प्राप्ति सहज हो जाता है।।
चतुर्भुजा हे मातु पराम्बा, भय रोग शोक संताप हरो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

कालरात्रि हे महाकाली माँ, संत साधू अब भटक रहे हैं।
रुद्रानी चामुंडा चंडी माँ, रक्तबीज फिर पनप रहे  है।।
हे शुभंकरी फिर असुर बढ़े हैं, उन सबका संहार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

महागौरी हे मातु अम्बे, पाप हरिणी  पुण्य  प्रदाता।
शक्ति अमोघ हे वृषारूढ़ा, सद्य: फलदायिनी हे माता।।
चैतन्यमयी हे मातु भवानी, दुष्टों का उपचार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।
 

सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, साधक में नव प्राण भरो।
सिंहासिनी कमलासिनी देवि, सर्वसिद्धि का दान करो।।
प्राणी मात्र को सुखी करो माँ, श्रद्धा का संचार करो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

मातृ रूप में हे माँ दुर्गा, हर प्राणी को वरदान दो।  
जीव मात्र हों सुखी निरोगी, सबका ही कल्याण हो।।
हे नवदुर्गा, हे शक्तिस्वरूपा, मानव में श्रेष्ठ विचार भरो।
मानव में देवत्व जगाकर, भू पर स्वर्ग साकार करो।।

उमेश यादव

👉 सिद्धिदात्री जन जन का कल्याण करो।


ज्ञान रूप हे मातु शतावरी, साधक में नव प्राण भरो।
सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, जन जन का कल्याण करो।।

यक्ष गन्धर्व सेवा में निशदिन, देव दनुज भी चरण पखारें।
शंख चक्र गदा पंकज कर, ऋषि मुनि यति तव रूप निहारें।।
हे शतावरी माँ  साधक में, श्रद्धा का आधान करो।
सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, जन जन का कल्याण करो।।

अणिमा गरिमा महिमा लघिमा, सर्वसिद्धि नवनिधि प्रदाता।
सिंहासिनी कमलासिनी देवि, जगदम्बे भक्तों की माता।।  
मन को शुद्ध पवित्र करो माँ, बुद्धि विवेक प्रदान करो।
सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, जन जन का कल्याण करो।।

अर्धनारीश्वर शिव को तुमसे, सिद्धि का वरदान मिला था।
राम भक्त हनुमन को तुमसे, अष्टसिद्धि का दान मिला था।।
प्राणी मात्र को सुखी करो माँ, बल आरोग्य प्रदान करो।
सिद्धिदात्री जय माँ दुर्गे, जन जन का कल्याण करो।।
 
उमेश यादव

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

👉 महागौरी भक्तों का कल्याण करो


हे अम्बे, हे महागौरी माँ, भक्तों का  कल्याण  करो।
पाप ताप संताप हरो, दुःख कष्टों का अवसान करो।।

श्‍वेताम्‍बरधरा, हे वृषारूढ़ा, गौर वर्ण, माँ दुर्गा माता।
अन्नपूर्णा, ऐश्वर्य प्रदायिनी, अष्टवर्षा,हे जग के त्राता।।
पाप हारिणी पुण्य प्रदायिनी, अभय करो माँ प्राण भरो।  
हे अम्बे, हे महागौरी माँ, भक्तों  का  कल्याण  करो।

कठिन तपस्या से माते ने, शिवशंकर सा वर पाया था।
कर डमरू शोभित माता ने, तप करना सिखलाया था।।
चैतन्यमयी हे मातु भवानी, त्रितापों का अवसान करो।
हे अम्बे, हे महागौरी माँ, भक्तों का कल्याण  करो।
 
शक्ति अमोघ है सदा तुम्हारी, सद्य: फलदायिनी हे माते।
अन्तः के कल्मष धो देतीं,पवित्र पुण्य दायिनी हो माते।।
हे शिवा-सुभद्रा कृपा करो अब, दुष्टों के अभिमान हरो।
हे अम्बे, हे महागौरी माँ, भक्तों का  कल्याण  करो।

उमेश यादव

👉 जीवन के रंग



फूल भी हैं, शूल भी हैं, रंग जीवन में सभी हैं।
है कभी मधुमास जीवन और पतझर भी कभी है।

एक जैसा ही समय रहता नहीं है इस जगत में,
कर नहीं सकते नया कुछ जो सदा जीते विगत में,
अब नई फसलें उगाओ, स्वेदकण से सींच कर तुम,
आँसुओं से आस्तीनों को भिगोना हल नहीं है।

क्या हुआ यदि धूप भीषण है कहीं छाया नहीं है,
राह काँटों से भरी और साथ हमसाया नहीं है,
बस यही विश्वास लेकर तुम रहो चलते निरंतर,
जो रुका है हारकर वो लक्ष्य तक पहुंचा नहीं है।

बीत जाती रात भी काली, किरण जब फूटती है,
जो हुआ भयभीत तम से, चांदनी भी रूठती है,
तप से मिला संतोष होता सब सुखों से श्रेष्ठतर है,
रंग मेहँदी में नहीं आता अगर पिसती नहीं है।

सुधीर भारद्वाज

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

👉 हे श्री राम तुम कब आओगे


आज रावण फिर शीश उठाता, सीता का दामन बच न पाता,
हर मन का असुर फिर पाँव बढ़ाता, घड़ा पाप का भरता ही जाता,
पापी का समूल नाश कर, क्या धर्म ध्वजा ना फहराओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

आज धरा फिर अकुलाती है, पाप का बोझ सह ना पाती है,
दंभ, लोभ तो सह भी जाती, पर अधर्म ना सह पाती है,
हे मर्यादा पुरूषोत्तम क्या तुम, धर्म हेतु भी ना आओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

देखो मंथरा की कुटिल चाल से, कैकेयी का प्रेम फिर हारा है,
मां के प्रेम बिना बच्चों को, किसका यहां सहारा है,
बचपन खोने के द्वार खड़ी है, क्या इसे नही बचाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

फिर मित्रता की पड़ी परीक्षा, कौन करेगा पूरी इच्छा,
सच्चा मित्र, हितैषी कैसा हो, कौन देगा फिर इसकी शिक्षा,
क्या केंवट और सुग्रीव की, नैय्या पार ना लगवाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

भाई बन बैठा शत्रु भाई का, खुद का ही वंश मिटाता है,
अपनों से ही छल करता वो, भ्रातृ प्रेम समझ न पाता है,
भरत, लखन की त्याग कथा को, क्या फिर से नही सुनाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

मात-पिता की हालत ना पूछो, वृद्धाश्रम में शोभा पाते हैं,
पुत्रों के सक्षम होते ही, मात-पिता बोझ हो जाते हैं,
हे मात-पिता के प्रिय पुत्र तुम, क्या पुत्र धर्म ना बतलाओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

मानव पतन की गर्त में जा रहा, एक दूजे को न कोई भा रहा,
प्रेम, समर्पण और त्याग की, जैसे कोई लंका जला रहा,
क्या मानव उत्थान के लिए, अब भी तुम ना आओगे?
हे श्रीराम तुम कब आओगे, हे श्रीराम तुम कब आओगे।

- डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

👉 डॉ.भीम राव आंबेडकर


संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।
दीन, दुःखी, दलितों, पतितों को, समता का अधिकार दिया।
जय भीम राव की जय हो, जय बाबासाब की जय हो।
जय आंबेडकर की जय हो, जय बाबासाब की जय हो।।
 
बचपन  से  ही थे तेजस्वी, कार्य  तुम्हारे परम ओजस्वी।
प्रतिभा के तो धनी रहे तुम,प्रखर विचारक,महामनस्वी।।
सभ्य समाज  के  सभ्य  मनुज हों, समदर्शी संसार दिया।
संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।
 
छुआ - छूत और उंच - नीच से, जीवन भर एतराज जताया।
भूख और भय से मुक्त राष्ट्र कर,अछूतों को भी ताज दिलाया।।
सुदृढ़  संविधान  बनाया  जो,  हर वासी  ने  स्वीकार किया।
संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।
 
सामाजिक  दुर्भाव  हटाने, बृहद  अभियान  चलाया  था ।
दलितों  के  उत्थान  के  लिए,  पूरा  जन्म  लगाया  था।।
ज्ञान,शील,स्वाभिमान जगाकर, पतितों का उद्धार किया।
संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।
 
भारत  के  तुम  अमूल्य  रत्न  हो, कानून के निर्माता हो।
सत्य,अहिंसा,न्याय,प्रेम से,  सबके  भाग्य  विधाता  हो।।
न्याय सभी के लिए बराबर, यह सबको  अधिकार दिया।
संविधान निर्माता,विधि के ज्ञाता,हम सब पर उपकार किया।।

-उमेश यादव

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

👉 गुरु सांचे में ढलना होगा


गुरुवर यदि श्रेष्ठ चाहिए, मिट्टी बनकर गलना होगा,
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।
मिट्टी को छैनी लगती तो, मन का अहम गल जाता है,
पानी के सानिध्य से ही, एकत्व का भाव फिर आता है,
पात्र बन जाने पर भी, अभी आग में जलना होगा,
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।

मिट्टी तो मिट्टी होती है, कभी रौंदी, कुचली जाती है,
बार बार पैरों से मिसकर, डंडे से पिटती जाती है,
गुरुवर जब शिष्य परखते, पल पल चोट कराते हैं,
मैं का भाव मिटाने को, कर्तव्य मार्ग में तपाते हैं।
हर कष्ट को सहकर भी, ओस की भांति निखरना होगा
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।

मिट्टी जब चाक में आती, जीवन युद्ध शुरू होता है,
हाथ सुगढ़ का लग जाए तो, कायाकल्प फिर होता है
गुरुवर बाहर से हमें परखते, अंदर से सम्बल देते हैं
बार बार विपरीतताओं से, हमारी निष्ठा को बल देते हैं
सच्चा शिष्य बनना है तो, चरणों में समर्पण करना होगा,
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।

इतना तप करने पर भी, कभी अंत में बिखराव आ जाता है
बनते बनते वह सुपात्र, फिर कुपात्र बन जाता है।
जैसे चिलम बन मिट्टी स्वयं जलती, दूजों को जलाती है
इतनी व्यथा सहकर भी सुराही सा यश नहीं पाती है।
निंदा मिले तो सहकर भी, उचित मार्ग पर चलना होगा,
बनना है यदि सुपात्र तो, गुरु सांचे में ढलना होगा।

डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

सोमवार, 29 मार्च 2021

👉 इस बार की होली ऐसी हो


हर मन मे एक प्रश्न है उठता, इस बार की होली कैसी हो
जीवन में शिष्यत्व जगे, इस बार की होली ऐसी हो।

गुरुवर की प्रीति अंग लगे, करुणा मन से छलकाये,
साधक में रंग यूं चढ़े, साधना में जीवन ढल जाए,
रंगों से नही इस बार की होली, गुरुदेव की होली जैसी हो,
जीवन में शिष्यत्व जगे, इस बार की होली ऐसी हो।

घर आंगन को आओ बुहारे, मन के सब कल्मष धो डालें
आपस के सब भेद मिटा लें, प्रेम का सबको रंग लगा लें
आपस की दूरी में भी लगे, मन में दूरी ना जैसी हो,
जीवन में शिष्यत्व जगे, इस बार की होली ऐसी हो।

मीठे मीठे पकवानों सी, बोली भी मीठी हो जाये,
तेरा मेरा का भेद मिटे, सबमें अपनत्व का रंग आये
अहम भांग सा एक नशा है, अपनी हालत ना ऐसी हो
जीवन में शिष्यत्व जगे, इस बार की होली ऐसी हो।

डॉ आरती कैवर्त'रितु'

👉 आज गुरु संग की होली


"गुरु के रंग में जो भी रंगा वो, तर गया जीवन सारा,
द्वार मिला है गुरु का जब से, हो गया वारा न्यारा।।"

अब की होली गुरु संग की होली, रंग गई मैं गुरु रंग की होली
आई रे, आई रे इस बार, आज गुरु संग की होली।
                   
इस रंग में जीवन रंग डाला, तन क्या हमने मन रंग डाला,
और कोई न रंग चढ़े जो, हमनें अंग अंग रंग डाला
आशीषों की बौछार, आज गुरु संग की होली।
आई रे, आई रे इस बार, आज गुरु संग की होली।1।
                
और कोई न रंग ही भाए, जब से गुरु के दर पे आए,
लाल गुलाबी नीले पीले, कोई भी ना रंग सुहाए,
श्रेष्ठ गुरु का प्यार, आज गुरु संग की होली।
आई रे, आई रे इस बार, आज गुरु संग की होली।2।
               
जन्म जन्म के कर्म सधे हैं, हम गुरु से आज मिले हैं
जन्म मरण के कितने बंधन, बरसों बाद आज कटे हैं
गुरु का है उपहार, आज गुरु संग की होली।
आई रे, आई रे इस बार, आज गुरु संग की होली।3।

डॉ आरती कैवर्त 'रितु'

रविवार, 28 मार्च 2021

👉 सबको रंग लगायेंगे


रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।
उत्साह उमंग जहाँ सोया है, उनको पुन: जगायेंगे।।

खुशियों का त्यौहार है प्यारा, झूम रहा देखो जग सारा।
अब तो आलस दूर भगाओ, इक दूजे को रंग लगाओ।।
राग द्वेष जो भी मन में है, उसको आज हटायेंगे।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।  

आओ मस्ती में झूम जायें, प्यार और सहकार बढ़ाएं।
कटुता का रंग फैला है जो, उसे हटा सद्भाव बढ़ाएं।।
प्रेम रंग में रंगकर सबमें, प्रेम भाव विकासायेंगे।।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।

आओ रंग की नदी बहायें, अम्बर में गुलाल उड़ायें।
कलह कलुष को धोएं इसमें, रंग लगा संगी बन जाए।।
सभी चेहरे एक रूप कर, महफिल आज सजायेंगे।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।

मन में नहीं कपट छल होगा, सत्य न्याय का संबल होगा।
कडवाहट की कैद हटेगी, सबका उच्च मनोबल होगा।।  
मिलकर सारे एक बनेंगे, अंतर सारे मिट जायेंगे।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।

थिरक रहें है पाँव हमारे, ढोल मजीरे के संग सारे।
स्नेह प्यार के रंग में भींगे, शुद्ध भाव हो रहे हमारे।।
होली कि रंगोली से ही, प्रेम मिलन कर पायेंगे ।
रंग गुलाल लेकर निकले है, सबको रंग लगायेंगे।।

उमेश यादव

👉 तेरे रंग में रंग जाए


हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।
जितना धोऊ उतना चमके, जीवन सतरंगी बन जाए।।

जहाँ जहाँ रंग मलिन हुआ है, फिर से धवल बना दो।
सूख रही भावों की नदियाँ, स्नेह प्यार से सजल बना दो।।
नहीं रहे बदरंग कहीं अब, सब पर ऐसा रंग चढ़ जाए।
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।  

श्याम रंग क्यों डाला हमने, छवि अपनी मैली कर डाली।
प्रेम रंग अति गाढ़ा था पर, घृणा द्वेष भर उसे मिटा ली।।  
रंग बदलकर भी क्या जीना, खरा रंग अंग अंग लग जाए।
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।  
 
धरती,अम्बर,अवनि सबको, दिव्य रंग में रंग डाला है।
सूरज,चाँद,सितारों से, दुनियां ही अनुपम कर डाला है।।
कुछ ऐसा तू हमें भी रंग दे, तू जैसा चाहे बन जायें।
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।

फाग रंग अब नीरस हुआ है, हर्ष जोश का भंग चढ़ा दे।
राग द्वेष बढ़े जो मन में, उसे मिटा अब प्यार बढ़ा दे।।
अंतःकरण के दोष हटाकर, इन्द्रधनुष सा मन रंग जाए।   
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।

तू है बड़ा रंगीला तूने, कहाँ कहाँ पर रंग नहीं डाला।
जीव जगत सब रंग में तेरे, सबको ही तूने रंग डाला।।
प्रेम रंग में रंग दे सबको, प्रेममयी जीवन बन जाए।
हे रंगरेज रंगो कुछ ऐसा, मन तेरे रंग में रंग जाए।।

उमेश यादव

सोमवार, 15 मार्च 2021

👉 रामकृष्ण परमहंस


भक्ति में है शक्ति अपरिमित, भगवन भी मिल जाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।
 
माँ काली के परम भक्त थे, ईश् अंश अवतारी थे।
प्रेम, दया, करुणा, ममता, मानवता के पुजारी थे।।
हरिदर्शन को आतुर हर क्षण, ईश्वर को पा पाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।
 
भक्ति भाव से रामकृष्ण ने, काली को साकार किया।
शुष्क हृदयों में भी गुरु ने, करुणा का संचार किया।।
ह्रदय पवित्र, मन निर्मल जन, ईश्वर दर्शन कर पाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।

दरिद्र-नारायण की सेवा को, भक्ति मार्ग से जोड़ा था।
जाति-पाति और उच्च-नीच का, बंधन उनने तोड़ा था।।
सेवा पथ अपनाकर ही हम, ईश्वर से मिल पाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।
 
विद्या और अविद्या माया, का विस्तार बताया था।
गृहस्थ तपोवन है भगवन ने, जी कर स्वयं सिखाया था।।  
‘कामिनी कंचन’ की बाधा से, ईश्वर मिल ना पाते हैं।।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।

इन्द्रिय निग्रह करके साधक, महायोगी बन पाते हैं।
धर्म सभी सच्चे होते बस, मार्ग अलग हो जाते हैं।।
ज्ञान, भक्ति, वैराग्य साधकर, बंधन मुक्त हो पाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।  

                                                            उमेश यादव

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...