गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

👉 अपनी इच्छा शक्ति को बढ़ाइए

‘जहाँ चाह है वहाँ राह है’ यह एक पुरानी कहावत है, परन्तु इसमें बड़ा बल है। मनुष्य की जैसी अच्छी बुरी इच्छा होती है वह उसी के अनुसार अपनी समस्त शक्तियों को लगा देता है और उसमें सफल होता है। मनुष्य की जैसी इच्छा होती है, वह वैसा ही बनता चला जाता है। कवि, लेखक, वक्ता, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनने की इच्छा रखने वाला अपनी क्रियाओं को उसी दिशा में मोड़ देता है और अपनी सारी शक्तियों को एकाग्र करके उस में लगा देता है, परिणामस्वरूप वह वही बन जाता है।

हमारा भविष्य हमारे अपने हाथों में है। उसको बनाने वाले हम स्वयं ही हैं। एक विद्वान् युवकों से कहा करते थे कि “यही समय है जब तुम्हें अपने मार्ग का निश्चय कर लेना चाहिए नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा कि मैंने स्वयं अपने भविष्य को अन्धकारमय बनाया है। इच्छा एक ऐसी वस्तु है जो आसानी से हमारे स्वभाव में आ जाती है। इसलिए दृढ़ इच्छा करना सीखो और उस पर दृढ़ बने रहो। इस तरह से अपने अनिश्चित जीवन को निश्चित बना कर उन्नति का मार्ग प्रशस्त करो।”

जिस मनुष्य में कोई इच्छा नहीं होती, वह क्रियाहीन और निरुत्साही बना रहता है। ऐसे ही मनुष्य संसार में दीन-दीन दशा में देखे जाते हैं। मनुष्य को पिछड़ा हुआ और गिरी हुई परिस्थितियों में रखने वाली कोई वस्तु है तो वह इच्छा शक्ति का अभाव है जिसे हमें दूर करना है। जिस तरह नदी का चलता पानी स्वच्छ व स्वास्थ्यप्रद होता है और एक स्थान पर खड़ा पानी गंदला और स्वास्थ्य विनाशक होता है उसी तरह से इच्छा शक्ति जीवन में आगे बढ़ने और कुछ करने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है और इसके अभाव में हमें वर्तमान परिस्थितियों में ही सन्तुष्ट होना पड़ता है। यदि हम आलसी बन कर अपना जीवन बिता देते हैं, तो भगवान के द्वारा दिये गये उत्तरदायित्व को निबाहने से जी चुराते है, अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने से भागते हैं। हम यहाँ जागरुक रहने और दूसरों को जगाये रखने के लिए आये हैं। जब हमारी शक्तियाँ ही गुप्त पड़ी रहेंगी तो हम दूसरों के लिए कुछ करने में कैसे समर्थ होंगे? पहले तो अपनी शक्तियों को जाग्रत करने के लिए इच्छा शक्ति को बढ़ाना चाहिए और अपने जीवन का एक निश्चित मार्ग चुन लेना चाहिए तभी हमें सन्तोष होगा कि यहाँ हम मुर्दों की तरह नहीं बल्कि जिन्दों की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

एक संन्यासी कहा करते थे कि “जैसा तुम चाहो वैसे ही बन सकते हो क्योंकि इच्छा शक्ति का दैव के साथ ऐसा घनिष्ठ संबन्ध है कि हम सच्चे दिल से जो कुछ होने की इच्छा करें, वही हो सकते हैं। ऐसा कोई नहीं है जिसकी उत्कट इच्छा आज्ञाकारी, सन्तोषी, नम्र अथवा उदार होने की हो और वह वैसा ही न हो जाये।” महापुरुषों के जीवन चरित्र इस सत्य की गवाही देते हैं। उन्होंने संसार में जितने बड़े-बड़े कार्य किये हैं, उन में इसी महाशक्ति का सहारा मुख्य था। यह तो सभी कार्यों की जड़ है। इसके बिना तो किसी कार्य का आरम्भ होना भी सम्भव नहीं है। अब यह व्यक्ति विशेष की बुद्धि और विवेक पर निर्भर है कि वह अपनी इच्छा शक्ति को किस ओर लगाये। चोर, डाकू भी इसके आधार पर सफल होते हैं और सन्त, महात्मा और महापुरुष भी इसी के सहारे समाज में क्रान्तियाँ करते हैं। धन्य हैं वह जो प्रभुदत्त इस शक्ति को उत्तम मार्ग में लगाते हैं।

*📖 अखण्ड ज्योति जून 1959*

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👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 2)

आत्मा अनन्त शक्तियों का भण्डार होती है। संसार की ऐसी कोई भी शक्ति और सामर्थ्य नहीं, जो इस भंडार में न होती हो। हो भी क्यों न? आत्मा परमात्मा का अंश जो होती है। सारी शक्तियाँ, सारी सामर्थ्य और सारे गुण उस एक परमात्मा में ही आते हैं। अस्तु अंश आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में विश्वास करना, परमात्मा में विश्वास करना है। जिसने आत्मा के माध्यम से परमात्मा में विश्वास कर लिया, उसका सहारा ले लिया, उसे फिर किस बात की कमी रह सकती है। ऐसे आस्तिक के सम्मुख शक्तियाँ अनुचरों के समान उपस्थित रहकर अपने उपयोग की प्रतिक्षा किया करती हैं।

किन्तु आत्मा का शक्ति-कोश अपने आप स्वयं नहीं खुलता। उसे खोलना पड़ता है। इस उद्घाटन की कुँजी है शुभ संकेत। अर्थात् ऐसे विचार जिनका स्वर हो कि- “मैं अमुक कार्य कर सकता हूँ।” मुझमें उसे पूरा कर सकने का साहस है, उत्साह है और शक्ति भी है। मेरा पुरुषार्थ से अनुराग है, उत्साह है और उद्योग करना मेरा प्रियतम वासना है। विघ्न-बाधाओं से मुझे कोई भय नहीं, क्योंकि संघर्ष को मैं जीवन की एक अनिवार्य प्रतिक्रिया मानता हूँ। मैं मनुष्य हूं। मेरे जीवन का एक निश्चित उद्देश्य है। उसे पूरा करने में अपना तन, मन और जीवन लगा दूँगा। सफलता की प्राप्ति आसक्ति और असफलता के प्रति भय मेरी वृत्ति के अवयव नहीं हैं। मैं भगवान कृष्ण के अनासक्त कर्मयोग का अनुयायी हूँ। सफलता मुझे मदमत्त और असफलता मुझे निरस्त नहीं कर सकती। मुझे ज्ञान है कि लक्ष्य की प्राप्ति और उद्देश्य की पूर्ति सफलता, असफलता के सोपानों पर चलकर ही हो सकती है। मैं अखण्ड आत्म-विश्वासी हूँ। मैं यह कार्य अवश्य कर सकता हूँ और निश्चय ही करके रहूँगा।”

आत्मविश्वास का क्या अर्थ है? | Aatmvishwas Ka Kya Arth Hai? | https://youtu.be/Jt2fHj3r1Ug?si=2-cX4kMksMPdv_so

इस प्रकार के शुभ और सृजनात्मक संकेत देते रहने से आत्मा का कमल-कोश खुल जाता है और उसमें सन्निहित शक्तियाँ एकत्र होकर व्यक्ति की क्रिया में समाहित हो जाती हैं। वह अपने अक्षय, उत्साह साहस और आशा का अनुभव करने लगती हैं। और कदम-कदम पर लक्ष्य स्पष्ट से स्पष्टतर और दूर से सन्निकट होता दिखलाई देने लगता है। शुभ संकेतों से उद्बुद्ध आत्म-विश्वास केवल आत्मा तक ही सीमित नहीं रहता, वह क्रियाओं, प्रक्रियाओं और सिद्धि तक फैल जाता है।

इसके विपरीत आत्मनिषेधी व्यक्ति अपनी सारी शक्तियों को नकारात्मक बनाकर नष्ट कर लेता है। आत्मनिषेधी आसुरी वृत्ति है और आत्म विश्वास, देव वृत्ति आत्मा की शिव शक्ति आसुरी वृत्ति वाले का सहयोग कर भी किस प्रकार सकती है। जो नास्तिक बनकर परमात्मा को छोड़ देता है, परमात्मा उसे उससे पहले ही छोड़ देता है। जिसे परमात्मा ने छोड़ दिया, प्रभु जिससे विमुख हो गया, उसके लिए लोक-परलोक, आकाश-पाताल कहीं भी कल्याण की सम्भावना किस प्रकार हो सकती है। ऐसे नास्तिकवादी और आत्मनिषेधी की नाव भवसागर के बीच डूब जाना निश्चित है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970


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👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 1)

संसार में प्रायः तीन प्रकार के व्यक्ति पाये जाते हैं। एक आत्म विश्वासी, दूसरे आत्मनिषेधी और तीसरे मशयी। अपने इन्हीं प्रकारों के कारण एक वर्ग अपने उद्योग और पुरुषार्थ के बल पर समाज पर छाये रहते हैं, अपना स्पष्ट स्थान बनाकर जीवन को सार्थक बनाते और समय के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

दूसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण निराशा, निरुत्साह और निःसाहस के कारण रोते-झींकते, भाग्य और विधाता को कोसते हुए जीते और अन्त में एक निस्सार और निरर्थक मौत मरकर चले जाते हैं।

तीसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण तर्कों, वितर्कों, में हाँ-ना, क्रिया-निष्क्रियता में अपना बहुमूल्य समय और शक्ति नष्ट करते हुए कर रहा हूँ-के भ्रम में कुछ भी न करके एक असन्तोष लेकर संसार से चले जाते हैं। उनकी अपूर्णता उन्हें निष्क्रियता का दोष दिलाने के सिवाय कोई उपहार नहीं दिला पाती।

संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्म-विश्वासी वर्ग के होते हैं। वे अपनी आत्मा में, अपनी शक्तियों में आस्थावान रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं और जब भी जो काम अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूरी लगन से उसे पूरा करके छोड़ते हैं। वे मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते हैं। आशा, साहस और उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में वे इनको अपने पास से जाने नहीं देते।

अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास : भाग 1 | Pt Shriram Sharma Acharya, 

आत्म-विश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है। वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य और ऊँचा आदर्श ही चुनता है। हेयता, हीनता अथवा निकृष्टता उसके पास फटकने नहीं पाती। फटक भी कैसे सकती है? जब आत्मविश्वास के बल पर वह ऊँचे से ऊँचा कार्य कर सकने का साहस रखता है और कर भी सकता है तो फिर अपने लिए निकृष्ट आदर्श और पतित मार्ग क्यों चुनेगा? आत्मविश्वासी जहाँ अपने लिए उच्च आदर्श चुनता है, वहाँ उच्च कोटि का पुरुषार्थ भी करता है। वह अपनी शक्तियों और क्षमताओं का विकास करता, शुभ संकेतों द्वारा उनमें प्रखरता भरता और यथायोग्य उनका पूरा उपयोग करता है। नित्य नये उत्साह से अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता, प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और अन्त में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है। पराजय, पलायन और प्रशमन से आत्म-विश्वासी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, संघर्ष उसका नारा और कर्त्तव्य उसका शस्त्र होता है। निसर्ग ऐसे अविबन्ध शूरमाओं को ही विजय-मुकुट पहनाया करती है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970

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👉 हम सद्गुणों का उपार्जन क्यों न करें? (भाग 1)

संयम एक प्रकार का अनुशासन है जो साधक में वैराग्य लाता है और उसे योग-पथ पर अग्रसर होने में सहायता प्रदान करता है। यम अथवा आत्मनिग्रह का अभ्यास ही संयम है। यही सारे सद्गुणों का अधिष्ठान है।

संयम ही रोगों के विरुद्ध दृढ़तम चहार दीवारी है यही सारी व्याधियों से सुरक्षित रखता है। इससे सुन्दर स्वास्थ्य शक्ति बल तथा वीर्य की प्राप्ति होती है।

एक सप्ताह के लिए चाय, काफी अथवा धूम्रपान करना बन्द कर दो। इससे तुम्हारी इच्छाशक्ति बलवती होगी जिससे संयम कार्य में मदद मिलेगी। अन्य संयम तुम्हारे लिए सरलतर हो जायेंगे।

संयम का लक्ष्य मन को निम्न पाशवीय अभिरुचियों से ऊपर उठाना ही है। इससे निश्चय ही आत्मपरिष्कार में सहायता मिलती है।

नियताहार, संयम, उपवास, आत्मनियन्त्रण, आत्म-निग्रह, आत्मसंयम, परिमितता ये सब पर्यायवाची हैं।

मदोन्मत्तता, आत्यंतिकता, उद्भ्रान्तता, उन्माद, आत्म-तृप्ति, इन्द्रिय परायणता, लम्पटता, ये सब संयम के विपरीतार्थक शब्द हैं।

आत्मविश्वास कैसे बढ़ाएं | Aatmvishwas Kaise Badhaye | https://youtu.be/Av3k4y9QHKE?si=fQDFCkLMpz8EPnzi

भोजन बन्द कर देना भोजन से संयम कहलाता है। अल्पाहार करना ही नियताहार है। अनाहार कभी एक बार कर लिया जाता है परन्तु अल्पाहार अभ्यास की वस्तु है। इच्छित वस्तु का परित्याग ही आत्म-निग्रह है। अनिच्छित वस्तु का परित्याग भी संयम ही है। नियमित समय तक, साधारणतः धार्मिक व्रतों में, भोजन न करना उपवास कहलाता है। युक्ति पूर्वक कुछ विशेष वस्तुओं का सीमित सेवन तथा कुछ का पूर्ण परित्याग ही परिमितता है। हम लोग दुर्गुणों में संयम तथा भोजन में मिताहार का प्रयोग करते हैं।

यह एक सुन्दर सद्गुण है कि एक मनुष्य दूसरों के साथ चाहे उनकी प्रकृति कैसी भी क्यों न हो, अपने को व्यवस्थित तथा उपयुक्त बनाता है। जीवन में सफलता पाने के लिए यह सर्वोत्तम तथा अनिवार्य सद्गुण है। शनैःशनैः इसका उपार्जन करना आवश्यक है। बहुसंख्यक-जन इसे नहीं जानते कि किस प्रकार दूसरों के साथ अपने को उपयुक्त बनावें। दूसरों के हृदय पर शासन करने के लिए तथा अन्ततः जीवन संग्राम में विजयी होने के लिए यथा काल व्यवस्था एक विचित्र सद्गुण है।

पत्नी नहीं जानती कि पति के साथ किस प्रकार अनुकूल बर्ताव करना चाहिये। वह सदा अपने पति को अप्रसन्न रखती है, घर में झगड़े का कारण बनती है और अन्ततः पति द्वारा परित्यक्त होती है। किरानी नहीं जानते कि अपने मालिक के साथ किस प्रकार व्यवहार करें। वह उससे झगड़ पड़ता है और शीघ्र ही अपनी करनी का फल भोगता है। शिष्य नहीं जानता कि गुरु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। व्यापारी नहीं जानता कि किस प्रकार वह ग्राहकों के साथ व्यवहार करे। फलतः वह अपने व्यापार तथा ग्राहकों से वंचित रह जाता है। दीवान यदि नहीं जानता कि महाराजा के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए तो उसको नौकरी से अलग होना पड़ता है। यथा काल व्यवस्था के ऊपर संसार आधारित है। जो इस कला अथवा विज्ञान को जानता है वह संसार में सकुशल निवास करता है और जीवन की सभी परिस्थितियों में सुखी रहता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जून 1959

"Shantikunj Rishi Chintan शांतिकुंज हरिद्वार का आधिकारिक YouTube चैनल

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 April 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 April 2026


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👉 उपासना में इन्द्रिय-निग्रह की आवश्यकता (अंतिम भाग)

शूरवीर पंडित वही, सदा प्रशंसागार। चारित्र धन जाको नहीं, हरत अक्ष-वटमार॥ दूसरी गाथा में कहा गया है कि इन्द्रिय चपल तुरंग के समान है। दुर्गति ...