शुक्रवार, 22 मई 2026

👉 बड़े कार्य करें (भाग 1)

यह करूंगा−−वह करूंगा ऐसी घोषणाएं करते फिरना निरर्थक है। यह निश्चित नहीं कि जो करने के लिए आज कहा जा रहा है उसे अगले दिन किया भी जा सकता है या नहीं। कल संयोग वश ऐसी परिस्थितियाँ आ सकती हैं कि जो कल करने की घोषणा की गई है वह सम्भव ही न रहें।

अप्रत्याशित घटना क्रम का घटित हो जाना असम्भव नहीं कोन जाने अपना शरीर आज जिस स्थिति में हैं कल उसमें रहेगा भी या नहीं। बीमारी और मौत का आक्रमण कब किस पर हो जाय इसे कोन जानता है। ईश्वर न करे अपना शरीर ही कल दस याग्य न रहे कि घष्ए को कार्यान्वित किया जा सके। इसी प्रकार अन्य ऐसी घटनाएँ भी घटित हो सकती हैं जो अपने भविष्य कथन को निरस्त कर दें। चोरी, अग्निकांड, दुष्काल, घाटा आदि ऐसे हो दरिद्र बना कर रख दें। तब उन घोषणाओं की पूर्ति कैसे हो सकेगी जो आज की सुसंपन्न स्थिति को ध्यान में रखकर की गई थी।

भविष्य अनिश्चित है। नियति के गर्भ में कितनी मृदुल और कितनी दुखद सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं इसे कौन जानता है कल हम क्या करेंगे क्या नहीं—यह निर्णय आज नहीं कल ही किया जा सकता है। समय से पूर्व तो उसकी घोषणा करना तो बचकानापन है। आज तो हमें वही सोचना−−वही कहना और वही करना चाहिए को आश्वासन देना सम्भव है। भविष्य के लिए किसी को आश्वासन देना व्यर्थ है। देना ही हो तो इस शर्त के साथ देना चाहिए कि आज जैसी परिस्थिति कल भी बनी रही तो वह किया जा सकेगा जो आज कहा जा रहा है।

बूढ़े मनुष्य भूतकाल के घटनाक्रम में बहुत दिलचस्पी रखते हैं ओर बीती हुई बातों की चर्चा बड़े उत्साह के साथ करते या सुनते हैं। उनका श्रेष्ठ समय भूतकाल ही था जो अब गुजर गया। वर्तमान नीरस है ओर भविष्य डरावना, इसलिए सुखानुभूति के लिए उन्हें मधुर भूतकाल का स्मरण करते हुए चैन मिलता है। कुछ विचित्र व्यक्ति ऐसे भी होते है जिन्हें दुखों की स्मृति भी ओर विपत्तियों की चर्चा करके अपने घाव हरे करते हैं और अभ्यस्त दुखी मनः स्थिति का जागृत करके विलक्षण प्रकार का आनन्द लेते है। सुखद हो अथवा दुखद जिन्हें भूतकाल जिन्हें भूतकाल की स्मृतियाँ ही सुहाती हैं—कथा पुराणों से लेकर व्यक्ति गत स्मृति की तथा स्वजन संबंधियों की पिछली चर्चाएँ जिन्हें सन्तोष देती हैं समझना चाहिए कि वे बूढ़े हो गये। उनका मन बुढ़ापे से ओत−प्रोत हो गया। भले ही ऐसे लोग आयु की दृष्टि से अधेड़ या युवक दिखाई पड़ते हों।

बालकों का स्वभाव भविष्य की कल्पनाएँ करते रहना होता है। चूँकि उनका भूतकाल कुछ महत्वपूर्ण नहीं था और न उसका स्मरण ही उन्हें होता वर्तमान भी अस्थिरता और अनिश्चितता से भरा रहता है, इसलिए अनेक लिए चिन्तन का एकमात्र आधार भविष्य ही रह जाता है। उसी पर वे तरह−तरह के सुखद आरोपण करते हैं। भविष्य में यह पावेंगे—वहाँ जावेंगे—यह खायेंगे—यह करेंगे जैसी चर्चाएँ ही उनके मुँह सुनी जाती हैं। वे कल्पनाओं को ही वास्तविकता समझने लगते हैं और सम्भावनाओं की सुनिश्चितता का ऐसा बाना पहनाते हैं मानों जो कुछ वे सोच या कह रहे हैं अवश्य ही वैसा होकर रहेगा। उनके इस भोलेपन पर अभिभावक रस लेते हैं, पर साथ ही उस बचपन पर हँसते भी हैं जिसकी कल्पना और यथार्थता के बीच में कितनी बड़ी खाई होती है बाल–कल्पनाओं और घोषणाओं का यदि कोई लेखा−जोखा रखा जा सके तो प्रतीत होगा कि वे जितनी भोली भाली और मृदुल थीं उससे अधिक वे अवास्तविक भी थीं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

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👉 प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (भाग 2)

रस लोनी भ्रमर और पराग प्रेमी मधुमक्खियाँ, एक फूल को चूस कर दूसरे पर जा बैठती है। तितलियों को एक फूल पर बैठे रहने से सन्तोष नहीं होता, उन्हें क्षण−क्षण नवीनता चाहिए। प्रेम जहाँ होगा वहाँ यह अस्थिर उन्माद कभी भी दृष्टिगोचर न होगा। जहाँ आस्थाएँ काम कर रही होंगी वहीं तो विश्वास दे सकने और पा सकने की स्थिति बनेगी। आजीवन मैत्री निर्वाह का आधार वहीं तो बनेगा। प्रेम धर्म निबाहना केवल शूरवीरों का काम है—उसके लिए बहुत चौड़ा दिल चाहिए। मोहग्रस्त लोभीजन उसका निर्वाह कर सकें यह सम्भव नहीं हो सकता।

मोहग्रस्त मनःस्थिति में भौतिक अनुदान, उपहार देने या पाने की प्रवृत्ति रहती है। यदि इस स्तर की प्रेम विडम्बना नर−नारी के बीच चल रही होगी तो उसमें यौन लिप्सा की आतुर माँग होगी। भले ही प्रिय पात्र का गृहस्थ, भविष्य एवं स्तर पतन के गर्त में गिरता हो तो गिरे। उन्माद की पूर्ति किसी भी कीमत पर होनी चाहिए। आवेश में यह मोह ही प्रेम जैसा लगता है और उस आतुर मनःस्थिति में पड़े हुए उन्मादी अपने आपको ‘प्रेमी’ कहने लगते हैं, जबकि यह आचरण प्रेम के तत्व दर्शन की सीमा को छू भी नहीं रहा होता।

विशुद्ध प्रेम व्यक्तियों के बीच आदर्शवादी विशेषताओं के कारण ही आरम्भ होता और पनपता है। वास्तविक सौंदर्य शरीर का नहीं आत्मा का होता है। वह आकृति को देखकर ठिठकता नहीं, वरन् गहराई में प्रवेश करके प्रकृति के मर्मस्थल तक चला जाता है। ऐसे व्यक्ति शारीरिक आकर्षण को तनिक भी महत्व नहीं देते। उनके लिए काली कुरूप आकृति में ऐसी कोई न्यूनता दिखाई नहीं पड़ती, जिसकी तुलना में किसी रूप यौवन सम्पन्न को महत्व दिया जा सके। ऊपर चमड़ी के भीतर सर्वत्र रक्त, माँस, अस्थि जैसे घिनौने और दुर्गन्ध युक्त पदार्थ ही तो भरे पड़े हैं। उनमें केवल मूढ़ मति ही उलझती हैं। शरीर आकर्षण को लेकर आरम्भ हुआ ‘प्रेम’ संध्याकाल के रंगीले बादलों की तरह देखते−देखते धूमिल होता चला जाता है और फिर कुछ समय बाद उसका कहीं पता भी नहीं चलता।

प्रेम गुण ग्राही होता है और वह केवल वहीं जमता है जहाँ व्यक्ति में आदर्शवादी विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं। आत्मा की भूख है कि आत्मिक विभूतियों से भरे व्यक्ति के सजातीय आकर्षण से प्रभावित होकर उसकी भावनात्मक समीपता चाहे। जड़वादी मोह ग्रस्तता के पीछे यौन लिप्सा का ताण्डव रहता है जबकि आत्मवादी प्रेम में केवल सद्भाव सम्पन्न आत्मीयता के आदान−प्रदान की माँग मात्र रहती है। ऐसे प्रेमीजन यदि नर−नारी हैं तो वे आजीवन अति पवित्र सम्बन्ध खुश−खुशी बनाये रह सकते हैं और एक−दूसरे के चरित्र को उज्ज्वल सिद्ध करने के लिए अपनी दुर्बलता पर सदा−सदा तक काबू रख सकते हैं।

नर और नर के बीच—नारी और नारी के बीच उन्मादी प्रेम सघन नहीं हो सकता किन्तु निष्ठावान प्रेम के लिए लिंग भेद जैसी कोई अड़चन नहीं है। दाम्पत्य−जीवन में एक दूसरे पर जैसी निर्भरता होती है एक दूसरे के सान्निध्य में जितना आनन्द प्राप्त करते है वैसा ही विश्वस्तता और भाव भरी स्थिति नारी और नारी के बीच अथवा नर और नर के बीच भी रह सकती है। मैत्री और कामुकता दो भिन्न वस्तुएँ हैं। आवश्यक नहीं कि दोनों साथ रहें। कामुकता विहीन मैत्री भी उसी प्रकार निभायी जा सकती है जिस प्रकार दुनियादार लोगों की मैत्री विहीन कामुकता का क्रीड़ा−विनोद प्रायः चलता रहता है।

लोभ और स्वार्थ की पूर्ति के लिए उत्पन्न हुआ प्रेम पानी के बबूले की तरह उठता है और झाग की तरह बैठ जाता है। मतलब निकालने के लिए चापलूसी की विद्या अब एक सर्व विदित कथा कारिता रह गई है। प्रेम शब्द का उपयोग इस कला−कौशल के साथ भी आये दिन होता है—वैसी ही कृति अनुकृति—वैसी ही भाषा शब्दावली प्रयुक्त होती है पर वस्तुतः बगुला द्वारा मछली पकड़ने अथवा बिल्ली द्वारा चूहा दबोचने से पूर्व साध कर उठाये गये कदमों जैसी ही होता है। प्रयोजन पूर्ण होने के बाद तथाकथित प्रेम पात्र चूसे हुए नींबू के छिलके की तरह कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है। यही तो आज का व्यवहार है। कैसा दुखद और कैसी दयनीय है यह विडम्बना।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 22 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 May 2026


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