सोमवार, 25 मई 2026

👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 1)

कस्तूरी की खोज में हिरन भटकता रहता है। वनों, कन्दराओं में वह ढूंढ़ता है, पर कहीं नहीं मिलती। जो भीतर है उसे बाहर खोजने में उसका जीवन खप जाता है। व्यर्थ की इस भाग दौड़ से उसे निराशा ही हाथ लगती है। अतृप्ति यथावत् बनी रहती है। यह बोध हो सके कि जिसे प्राप्त करने की आकुलता में वह वन एवं कन्दरा में विचरता रहता है वह उसके अपने ही भीतर विद्यमान है तो उसे तृष्णा की आग में इस तरह न जलना पड़े। उसकी निकटता प्राप्त कर मृग स्वयं परितृप्त हो जाय।

मृग ही क्यों? मनुष्य भी तो आनन्द की खोज में मृग मरीचिका की तरह जीवन पर्यन्त भटकता रहता है। आनन्द की प्राप्ति उसकी मूलभूत माँग है। बचपन से लेकर जरावस्था तक वह इस आकाँक्षा की पूर्ति में लगा रहता है। पर हिरन की भाँति दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण मनुष्य सोचता है कि आनन्द के स्रोत बाहर हैं। दृश्य संसार और उससे सम्बद्ध परिवर्तनशील पदार्थों के आकर्षण में वह स्थायी और शाश्वत आनन्द की खोज करता है। इन्द्रियों की तुष्टि के लिए विषय रूपी साधन जुटाता है। पर उनका उपभोग अतृप्ति की आग को और भी अधिक भड़काता और बढ़ाता है।

बचपन से लेकर वृद्धावस्था की मध्यावधि में शारीरिक एवं मानसिक स्थिति में अनेकों तरह के परिवर्तन होते हैं। उन परिवर्तनों के साथ-साथ आनन्द प्राप्ति के बाह्य साधन भी बदलते रहते हैं। शैशव अवस्था की माँग अलग प्रकार की होती है और किशोरावस्था की अलग। युवा वय की मनःस्थिति और वृद्धों की मनःस्थिति सर्वथा एक दूसरे से भिन्न प्रकार की होती है। इस कारण आनन्द प्राप्ति के बाह्य स्रोत की क्रमिक रूप से बदलते रहते हैं। नवजात शिशु माँ की छाती से चिपकता रहता है। पय पान में ही उसे सामयिक तृप्ति मिलती है। पर थोड़ा बड़ा होते ही दुग्ध पान के प्रति उसकी अभिरुचि समाप्त हो जाती है। जो कभी माँ के हृदय से चिपका रहता था, वह अब चित्र-विचित्र खिलौनों में रमण करता है। सुखानुभूति के केन्द्र बिन्दु खिलौने बनते हैं। पर यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं चलने पाती। खिलौने जो बचपन में अत्यंत ही आकर्षक मनोरंजक लगते थे किशोरावस्था में नहीं भाते। घर की सीमा से बाहर वह प्रवेश करता है। मित्रों की टोली में उसका अधिकाँश समय व्यतीत होता है। पढ़ने-खिलाने की- आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (भाग 2)

यह शक्ति कहाँ से आती है? एक ही उत्तर है, इस शक्ति का स्रोत और निवास स्थान मस्तिष्क है। निश्चित रूप से उसे जादू का पिटारा कहा जा सकता है। यद्यपि इन दिनों विलक्षण कम्प्यूटरों का निर्माण हो रहा है। इनके निर्माण से कठिन बौद्धिक कार्यों को बड़ी सरलता से सम्पादित किया जा सकता है। इस कारण इनकी बड़ी चर्चा प्रशंसा की जाती है। किन्तु मस्तिष्कीय क्रियाकलापों को देखा जाए तो उनकी तुलना में अब तक के बने सभी कम्प्यूटर आविष्कारों को न्यौछावर किया जा सकता है। यह एक ऐसा यन्त्र है जिसका तुलना का या बराबरी का दूसरा उपकरण खड़ा कर सकना कल्पना के बाहर की बात है।

प्रकृति के इस अद्भुत विलक्षण आविष्कार के क्रियाकलापों को केवल जीवनयापन सम्बन्धी गतिविधियों तक ही सीमित समझना या यह सोचना कि यह केवल सोच विचार में ही लगा रहता है और उसकी शक्ति इतने तक ही सीमित रहती है, गलत होगा। मस्तिष्कीय क्रियाकलापों का क्षेत्र इससे बहुत आगे तक व्यापक है। सूर्य जिस प्रकार निरन्तर अपना प्रकाश और ताप चारों ओर बखेरता रहता है, ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा निःसृत होती रहती है। इसे विचार, संकल्प, भावना, इच्छा आदि किसी भी नाम से अथवा उसके संयुक्त सम्मिश्रण के रूप में सम्बोधित किया या पहचाना जा सकता है। इस विकिरण के द्वारा एक व्यक्ति अपने समीपवर्ती लोगों को अनजाने ही असाधारण रूप से प्रभावित करता रहता है। इसे अनन्त आकाश में भरे ईथर तत्व के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।

तालाब में ढेला फेंकने पर जिस प्रकार चारों ओर पानी की लहरें इकट्ठी होती रहती हैं, उसी तरह विश्वव्यापी ईथर महासागर में हमारे विचार अपने स्तर के प्रहार करते हैं और उनके प्रकाश ध्वनि से भी अधिक ऊँची एवं सूक्ष्म स्तर की किन्तु लगभग उसी प्रकार की तरंगें उठती हैं। वे कुछ दूर आकर ही समाप्त नहीं हो जातीं वरन् अनन्त आकाश में भ्रमण करती हुईं निकल जाती हैं। स्पष्ट है कि किसी गोलक पर सीधी यात्रा आरम्भ करने से उसका अन्त प्रारम्भ किये जाने वाले स्थान पर ही होता है। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से निकलने वाली विचार तरंगें अपनी सुदूर यात्रा करती हुईं वापस अपने उद्गम स्रोत पर लौट आती हैं। इस प्रक्रिया का दुहरा प्रभाव होता है। एक तो उसी स्तर की विचार बुद्धि वाले उन कम्पनों से बल तथा प्रोत्साहन पाते हैं और जब वे वापस लौटते हैं तो अपने इस उत्पादन को नये आहार के रूप में पाकर सृजेता मस्तिष्क को भी लाभ पहुँचाते हैं।

किसान अपनी फसल का लाभ स्वयं नहीं उठाता है। उसे लाभ मिलता है परन्तु उसके कृषि कर्म से जो उत्पादन होता है, जो लाभ अर्जित किया जाता है उसमें अन्य अनेकों का भी हिस्सा होता है। किसान द्वारा उत्पादित किये गये अन्न से सैकड़ों व्यक्तियों को भोजन मिलता है। विचारों का उत्पादन भी इसी प्रकार कृषि कार्य है। पशु अपनी शरीर यात्रा सम्बन्धी सोच विचारों में ही लगे रहते हैं इसलिए उनका चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। इसलिए उनसे उत्पन्न होने वाली विचार तरंगें भी अति शक्तिशाली होती हैं। जिनका चिन्तन शरीर यात्रा की परिधि में एक ही ढर्रे पर घूमता है उनकी चिन्तन तरंगें दुर्बल होती हैं। उनमें प्रखरता तभी आती है जब किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार उनमें सम्मिलित रह रहा है।

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 25 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 May 2026


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👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 1)

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