जिस प्रकार सोना आग में तप कर और कसौटी पर कस कर ही अपना खरापन सिद्ध कर पाता है। इसी प्रकार व्यक्ति का खरापन तब ही सिद्ध हो पाता है, जब वह समाज में सत्याचरण का प्रमाण दे पाता है। एक बार खरा सिद्ध हुआ सोना संसार में कही भी अपना पूरा मूल्य पा जाता है। उसी प्रकार सत्याचरण का प्रामाणिक व्यक्ति सब जगह समाज का विश्वास प्राप्त कर लेता है।
सत्य मानव-जीवन की अनमोल विभूति है। जो अपने प्रति, अपनी आत्मा के प्रति, अपने कर्तव्यों के प्रति, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति मन-वचन-क्रम से सच्चा रहता है वह इसी जीवन, इसी देह और इसी संसार में स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करता है। उसके लिए सुख-शाँति और साधन संतोष की कमी नहीं रहती।
सत्य मानव जीवन की सबसे शुभ और कल्याणकारी नीति है। इसका अवलम्बन लेकर चलने वाले जीवन में कभी असफल नहीं होते। यह बात मानी जा सकती है कि सत्य का आश्रय लेकर चलने पर प्रारम्भ में कुछ कठिनाई हो सकती है। किन्तु आगे चलकर उसका आशातीत लाभ होता है। सत्य, पुण्य की खेती है। जिस प्रकार अन्न की कृषि करने में प्रारम्भ में कुछ कठिनाई उठानी पड़ती हैं और उसकी फसल के लिए थोड़ी प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है। किन्तु बाद में जब वह कृषि फलीभूत होती है तो घर, धन-धान्य से भर देती है। उसी प्रकार सत्य की कृषि भी प्रारम्भ में थोड़ा त्याग, बलिदान और धैर्य लेती है। किन्तु जब वह फलती है तो लोक से लेकर परलोक तक मानव-जीवन को पुष्पों से भर कर कृतार्थ कर देती है।
सत्य मानव-जीवन को महानता और उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँचाने वाला प्रशस्त और निरापद राज-मार्ग है। इस पर निष्ठापूर्वक चलने वाले पथिक को किसी भी देशकाल में भय अथवा संकट नहीं रहता। सत्य-निष्ठा व्यक्ति को पाप कर्मों से निरत रखती है। सत्यवादी व्यक्ति इस डर से कोई अकरणीय कार्य करेगा ही नहीं कि दण्ड अथवा निन्दा के भय से कहीं उसे असत्य का सहारा न लेना पड़े। जो अपकर्मों और अपाशयों से बचा रहता है, वह अपवाद, अपमान अथवा आघातों से भी सुरक्षित बना रहता है। सत्याश्रमी व्यक्ति का जीवन सुख और शाँति से भरा पुरा रहता है। उसकी प्रसन्नता में विघ्न डालने वाले तत्व उसके पास कदाचित ही आ पाते हैं।
सत्य मनुष्य के सम्मान, प्रतिष्ठा और आत्म-गौरव के लिए अमोघ कवच के समान होता है। जिसने इस कवच को धारण कर लिया है, उसके लिए अपमान, निन्दा और अपवाद का कोई कारण ही नहीं रहता। सत्यनिष्ठ व्यक्ति संसार में निर्भय होकर विचरण करता है और स्पष्ट होकर व्यवहार करता है। उसने तो कही भय होता है और न आशंका। वह अजातशत्रु होकर समाज को अपने व्यवहार से जीत लेता है।
.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968
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