सोमवार, 8 जून 2026

👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (भाग 1)

जिस प्रकार सोना आग में तप कर और कसौटी पर कस कर ही अपना खरापन सिद्ध कर पाता है। इसी प्रकार व्यक्ति का खरापन तब ही सिद्ध हो पाता है, जब वह समाज में सत्याचरण का प्रमाण दे पाता है। एक बार खरा सिद्ध हुआ सोना संसार में कही भी अपना पूरा मूल्य पा जाता है। उसी प्रकार सत्याचरण का प्रामाणिक व्यक्ति सब जगह समाज का विश्वास प्राप्त कर लेता है।

सत्य मानव-जीवन की अनमोल विभूति है। जो अपने प्रति, अपनी आत्मा के प्रति, अपने कर्तव्यों के प्रति, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति मन-वचन-क्रम से सच्चा रहता है वह इसी जीवन, इसी देह और इसी संसार में स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करता है। उसके लिए सुख-शाँति और साधन संतोष की कमी नहीं रहती।

सत्य मानव जीवन की सबसे शुभ और कल्याणकारी नीति है। इसका अवलम्बन लेकर चलने वाले जीवन में कभी असफल नहीं होते। यह बात मानी जा सकती है कि सत्य का आश्रय लेकर चलने पर प्रारम्भ में कुछ कठिनाई हो सकती है। किन्तु आगे चलकर उसका आशातीत लाभ होता है। सत्य, पुण्य की खेती है। जिस प्रकार अन्न की कृषि करने में प्रारम्भ में कुछ कठिनाई उठानी पड़ती हैं और उसकी फसल के लिए थोड़ी प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है। किन्तु बाद में जब वह कृषि फलीभूत होती है तो घर, धन-धान्य से भर देती है। उसी प्रकार सत्य की कृषि भी प्रारम्भ में थोड़ा त्याग, बलिदान और धैर्य लेती है। किन्तु जब वह फलती है तो लोक से लेकर परलोक तक मानव-जीवन को पुष्पों से भर कर कृतार्थ कर देती है।

सत्य मानव-जीवन को महानता और उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँचाने वाला प्रशस्त और निरापद राज-मार्ग है। इस पर निष्ठापूर्वक चलने वाले पथिक को किसी भी देशकाल में भय अथवा संकट नहीं रहता। सत्य-निष्ठा व्यक्ति को पाप कर्मों से निरत रखती है। सत्यवादी व्यक्ति इस डर से कोई अकरणीय कार्य करेगा ही नहीं कि दण्ड अथवा निन्दा के भय से कहीं उसे असत्य का सहारा न लेना पड़े। जो अपकर्मों और अपाशयों से बचा रहता है, वह अपवाद, अपमान अथवा आघातों से भी सुरक्षित बना रहता है। सत्याश्रमी व्यक्ति का जीवन सुख और शाँति से भरा पुरा रहता है। उसकी प्रसन्नता में विघ्न डालने वाले तत्व उसके पास कदाचित ही आ पाते हैं।

सत्य मनुष्य के सम्मान, प्रतिष्ठा और आत्म-गौरव के लिए अमोघ कवच के समान होता है। जिसने इस कवच को धारण कर लिया है, उसके लिए अपमान, निन्दा और अपवाद का कोई कारण ही नहीं रहता। सत्यनिष्ठ व्यक्ति संसार में निर्भय होकर विचरण करता है और स्पष्ट होकर व्यवहार करता है। उसने तो कही भय होता है और न आशंका। वह अजातशत्रु होकर समाज को अपने व्यवहार से जीत लेता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968

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👉 वैभव खोकर भी सत्यनिष्ठ बनें रहें

सत्य और न्याय के पीछे चलने में हमें सब कुछ छोड़ना पड़ता हो तो उसके लिए अपने को तैयार करना चाहिए। सत्य ही परमेश्वर है। उससे बढ़कर इस संसार का सारतत्त्व और कुछ नहीं है। सत्य अपने हाथ रहा और उसके बदले सब कुछ चला गया तो हर्ज नहीं, किन्तु यदि सत्य को गँवा कर कुबेर की सम्पदा और इन्द्र का सिंहासन भी पाया तो समझना चाहिए कि यह बहुत महंगा और बहुत घाटे को सौदा खरीदा गया है।

जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं अथवा चलने के लिए विवश किये जा रहे हैं यदि वह असत्य और अन्याय से भरा है—उससे आदर्शों का हनन होता है और भ्रष्ट परम्पराएँ जन्मती हैं समझना चाहिए या कुमार्ग गमन बड़ी से बड़ी भौतिक उपलब्धि के बदले भी महंगा है उसे खरीदने का विचार छोड़ ही देना चाहिए।

सत्य को त्याग कर वैभव का वरण अथवा वैभव को छोड़कर सत्य का वरण इन दोनों में से किसे चुनना किसे नहीं चुनना यह धर्म संकट उत्पन्न होने पर सजीव और सजग आत्मा का निर्णय यही हो सकता है कि वैभव को छोड़ देना चाहिए और सत्य का वरण करना चाहिए। सत्य शाश्वत है। उसके परिणाम दूरगामी हैं। उसकी उपलब्धि से जो हित साधन होने वाला है वह चिरस्थायी है, जबकि वैभव बिजली की चमक की तरह क्षणिक चकाचौंध उत्पन्न करने के बाद गहन अन्धकार में विलीन हो जाता है।

इस विश्व की संरचना जिन परमाणुओं से हुई है वे द्रुतगति से भाग रह है। उनसे बनी वस्तुएँ भी अपने क्रम से बनती, बढ़ती, बदलती और मरती दिखाई पड़ती हैं। वस्तु की जो स्थिति अभी है वैसी अगले क्षण रहने वाली नहीं है। अस्तु जिस रूप में उसे इस समय आकर्षक पाया जाता है वैसा कुछ ही समय बाद रहने वाला नहीं है।
 
रूप,यौवन,धन,बुद्धि,पद,स्वाद,इन्द्रियानुभूति से जो आकर्षण अब है वह निश्चित रूप से अगले दिनों बदल जायगा। जो बालक अभी तोतली बोली बोलते और खिलौने जैसे हँसते−हँसाते दीखते हैं वे कुछ समय बाद वयस्क होकर अपना घर, परिवार बसायेंगे और अभिभावकों को भारभूत मानकर उनसे सीधे मुँह बात भी न करेंगे। पत्नी को जिस रूप, यौवन के आधार पर परमप्रिय समझा जा रहा है। आयुष्य वृद्धि के साथ−साथ उसमें भी घटी ही आने वाली है। उसका आज का अत्यधिक आकर्षण कल बच्चों में बँटने वाला है। प्रणय के आरम्भ काल का आकर्षण देर तक कहाँ टिकता है? इस बदलती स्थिति में वस्तुओं अथवा व्यक्तियों के साथ मोह जोड़ना और उन तुच्छ सी उपलब्धियों के लिए सत्य जैसे बहूमूल्य तथ्य की उपेक्षा करना किसी भी दृष्टि से दूरदर्शिता पूर्ण नहीं हो सकता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 08 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 08 June 2026


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