रविवार, 21 जून 2026

👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (भाग 2)

बुराइयों के सम्बन्ध में दूसरी विचारणीय बात है कि इन्हें रोकने के लिए हम स्वयं कितनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं? अपने कारोबार, मनोरंजन, आराम, घर गृहस्थी के अलावा हम समाजिक कर्तव्यों में कितना हाथ बटाते हैं, यह प्रश्न हमारे सबके लिए एक चुनौती है। भारतीय नागरिक की यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि वह अपने ही जीवन से इतना चिपका रहता है कि सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर आँख उठाकर नहीं देखता, उनकी ओर उपेक्षा भाव बनाये रखता है। पड़ौस में डाकू रहता है। अनैतिक कार्य का अड्डा है, समाज विरोधी हरकतें हमारे सामने होती रहती हैं। दूसरों को बदमाशी करते हम देखते हैं, किन्तु हम में से कितने इनकी सूचना सरकारी अधिकारियों को देते हैं, या इनके खिलाफ हममें से कितने लोग आवाज उठाते हैं? 

इनके विरोध में आन्दोलन हमसे से कितने चलाते हैं। बहुधा हम इन्हें चुपचाप देखते रहते हैं। बहुत बार हममें से ही बहुत से लोग अपराधियों को आश्रय देते हैं, सहायता पहुँचाते हैं, उन्हें बढ़ावा तक देते हैं। यह निश्चित सत्य है कि अपनी बुराइयों के बल पर जीवित नहीं रह सकते। अपराधी समाज के सहयोग पर ही उनका अस्तित्व कायम रहता है। जागरुक व्यक्ति जानते हैं कि समाज के तथाकथित स्वार्थी लोग ही अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अवाँछनीय तत्वों को प्रोत्साहित करते हैं, उन्हें सहारा देते हैं, आवश्यकता पड़ने पर उनका बचाव भी करते है। फिर एक दिन एक-एक कर हम सभी को इन दूषित तत्वों से हानि उठानी पड़े तो इसमें दोष किसका? क्योंकि अपराधी किसी का सगा नहीं होता, अपना लाभ न होते देख वह अपने तथाकथित बचाव करने वाले व्यक्ति पर भी आक्रमण कर सकता है।

कई बार किसी नागरिक पर बदमाश लोगों के आक्रमण को देखकर भी हममें से बहुत से लोग चुपचाप आगे पग बढ़ा जाते हैं। हममें से कइयों की जानकारी में रिश्वत का दौर चलता रहता है। कई बार हम जानते हैं कि सार्वजनिक कार्यों में ठेकेदार तथा नौकरशाही अनावश्यक लाभ उठा रहें हैं। हममें से बहुत से लोग धोखा-धड़ी, ठगी, चोरबाजारी, मिलावट करने वालों को भली भाँति जानते हैं, किन्तु यह सब जानकर भी हम इनका भण्डाफोड़ नहीं करते। इनकी शिकायत पुलिस को या अपराध निरोधक संस्थाओं को नहीं करते। इनके खिलाफ संगठित होकर आन्दोलन नहीं होता ।

इस सम्बन्ध में हमारी यह शिकायत हो सकती है कि आजकल कोई सुनता नहीं, जो इस तरह के कदम उठाता है, उसे उल्टी परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं। बहुत कुछ अंशों में यह ठीक भी है। किसी बात की सूचना देने पर गुण्डे के बजाय सूचना देने वाले को ही गिरफ्तार कर लिया जाता है। बुराई का प्रतिरोध करने वाले को दूषित तत्वों का कोप भाजन बनना पड़ता है। यह सब ठीक है, किन्तु बिना कोई खतरा उठाये बुराइयों को दूर तो नहीं किया जा सकता। सुधार के लिए एक ही मार्ग है, वह है सब तरह के खतरे उठाकर बुराइयों का मुकाबला करना। यदि प्रशासन इस सम्बन्ध में ढील दे, तो उसके खिलाफ भी आवाज उठाई जाय। कोई सरकारी कर्मचारी या समाज का सदस्य इन दूषित तत्वों का बचाव करे, इन्हें प्रोत्साहन दे तो उनकी भी आलोचना करने में नहीं चूकना चाहिए।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 स्वर्ग आपके घर में हैं। (भाग 2)

दाम्पत्य-जीवन के सुख का चाव विवाह के थोड़े दिन तक पूर्ण स्थिर रहता है। जब तक दोनों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बना रहता है, तब तक दोनों ही एक विलक्षण सुख का अनुभव किया करते है। थोड़ी देर तक पति दिखाई न दे, तो नव-वधू का हृदय आशंका से छटपटाने लगता है। तरह-तरह की मंगल कामनायें अन्तःकरण से उठने लगती है। पति आ जाता है तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे खोए हुए प्राण वापस हुए हों। पुरुषों की भी ऐसी ही अवस्था होती है। उन्हें भी अपनी पत्नी के लिए तरह-तरह की वस्तुएं एकत्रित करने में बड़ा आनन्द आता है। इसके लिये वे अनेकों प्रयत्न भी करते हैं। जब तक यह भावनाओं का आदान-प्रदान चलता रहता है, तब तक घर का वातावरण अत्यन्त रोचक और सजीव बना रहता है।

किन्तु आकर्षण की कमी के साथ भावनाओं का स्तर भी गिरने लगता है। पारस्परिक प्रिय-दर्शन और आत्मदान के स्थान पर एक दूसरे के दोष, ऐब और कमियाँ ढूँढ़ने लग जाते है। यही से गृहस्थ की दुर्दशा प्रारम्भ होती है जो घर को अन्ततः नरक जैसी दुःखद परिस्थितियों में जा पटकती है।

आकर्षण में गिरावट का प्रमुख कारण अनियन्त्रित काम वासना ही है। इसका प्रधान दोषी पुरुष है। भारतीय परम्पराओं के अनुसार पुरुषों के अधिकार बड़े माने जाते हैं। अधिकाँश व्यक्ति इस स्वामित्व का दुरुपयोग अपनी क्षणिक इन्द्रिय उत्तेजना की पूर्ति में किया करते है। इससे सौंदर्य का आकर्षण कम होने लगता है और लोग आध्यात्मिक सन्निकटता से दूर हटने लगते हैं।

स्त्रियों को अपनी सम्पत्ति मानकर उनसे व्यवहार करने की पुरुष की आदत नितान्त दुर्भाग्यपूर्ण है। जो कर्त्तव्य स्त्रियों के पुरुषों के प्रति होते हैं, वैसा ही निर्वाह यदि पुरुष भी अपनी पत्नियों के प्रति करें तो दाम्पत्य जीवन को चिरकाल तक सुखद शान्तिमय बनाये रखा जा सकता है। पुरुषों के कर्त्तव्यों की विवेचना करते हुए पद्मपुराण में लिखा है।

नास्तिभार्या समंतीर्थं नास्ति भार्या समंसुखम्।
नास्ति भार्या सर्मंपुण्य, तारणाय हिताय च॥
पुरुष के हित व कल्याण के लिए पत्नी से बढ़कर न तो कोई तीर्थ है न पुण्य, स्त्री के समान सुख अन्यत्र मिलना असम्भव है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 June 2026


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👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (भाग 2)

बुराइयों के सम्बन्ध में दूसरी विचारणीय बात है कि इन्हें रोकने के लिए हम स्वयं कितनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं? अपने कारोबार, मनोरंजन, आर...