गुरुवार, 14 मई 2026

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये ( भाग 2)

भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों की विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाए अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है तो इसमें किसी और का दोष नहीं है, दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिन्तन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिन्तन को ही अपनाया।

अशुभ चिन्तन चुनने के पीछे भी कारण है। विगत के कटु अनुभवों, असफलताओं और कठिनाइयों से पीड़ित मन वर्तमान में भी लौट-लौटकर उन्हीं स्मृतियों को दोहराता रहता है और जाने-अनजाने अशुभ कल्पनायें करता रहता है। यह कल्पनाएँ ही व्यक्ति में भय उत्पन्न करती हैं। जबकि स्मरण के लिए अतीत के सुखद अनुभव, सफलताएँ और अनुकूलताएँ भी हैं। यदि उन्हें याद किया जाता रहे तो भविष्य के प्रति आशंकित होने के स्थान पर सुखद सम्भावनाओं से आशान्वित भी हुआ जा सकता है।

भय और मनोबल, अशुभ और शुभ चिन्तन आशंकाएं और आशाएँ सब मन के ही खेल हैं। इनमें पहले वर्ग का चुनाव जहाँ व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में धकेलता है वही दूसरे प्रकार का चुनाव उसे उत्कर्ष तथा प्रगति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। सर्वविदित है कि आत्मघात, व्यक्तित्व का हनन या असफलता का चुनाव व्यक्ति किन्हीं विवशताओं के कारण ही चुनता है। अन्यथा सभी अपना विकास, प्रगति और अपने अभियानों में सफलता चाहते हैं। जब सभी लोग सफलता और प्रगति की ही आकाँक्षा करते हैं तो मन में समाये भय के भूत को जगाकर क्यों असफलताओं को आमन्त्रित करता है? इसके लिए मन की उस दुर्बलता को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जिसे आत्मविश्वास का अभाव कहा जाता है।

प्रथम तो अशुभ चिन्तन और अमंगलकारी आशंकाओं से ही बचा जाना चाहिए। लेकिन यह स्वभाव में सम्मिलित हो गया है और अपने आपके प्रति अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ गया तो उसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। इस दिशा में सचेष्ट होते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम स्वयं ही भय की रचना करते हैं, उसे बुलाते और अपनी हत्या के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह जान लिया गया तो यह समझ पाना भी कठिन नहीं है कि स्वयं ही भय को नष्ट भी किया जा सकता है। अपने लगाये पेड़ को स्वयं काटा भी जा सकता है और सन्दर्भों में यह बात लागू होती हो अथवा नहीं होती हो किन्तु मन के सम्बन्ध में यह बात शत प्रतिशत लागू होती है कि वह तभी भयभीत होता है, जब जाने अनजाने उसे भयभीत होने की आज्ञा दे दी जाती है। यह आज्ञा अशुभ आशंकाओं के रूप में भी हो सकती है और अतीत के कटु अनुभवों तथा दुःखद स्मृतियों के रूप में भी। कहने का आशय यह कि किसी भी व्यक्ति के मन में उसकी इच्छा और अनुमति के विपरीत भय प्रवेश कर ही नहीं सकता। तो भीरुता को अपने स्वभाव से हटाने के लिए पहली बात तो यह आवश्यक है कि भय को अपने मनःक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( अंतिम भाग )

पुण्य परमार्थ के अवसर अथवा भावना को टालने वाले जीवन में भारी भूल करते हैं। परमार्थ अथवा परोपकार की भावना अथवा अवसर का उदय होना किन्हीं पूर्व पुण्यों का उदय ही समझना चाहिए। अन्यथा इस प्रपंच एवं प्रवंचनापूर्ण संसार में, इसके दूषित वातावरण में ऐसे अवसर और ऐसी कल्याणकारी भावनाएं सुलभ ही कहाँ होती हैं। यदि आये हुए उत्साह को कार्यान्वित न करके आगे के लिये टाल दिया गया तो कोई ठीक नहीं कि वह भावना फिर उठे या न उठे, वह अवसर फिर आये न आये। इस नश्वर संसार में जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं। आज है कल नहीं भी रह सकता। तब तो पुण्य परमार्थ का एक अवसर भाग्यवश आया था उसके भी लाभ से वंचित रहना पड़ेगा! परमार्थ अथवा पुण्य-कार्य में तत्परता करने का महत्व समझने के लिए महाभारत का यह उपाख्यान बड़ा उपयोगी तथा शिक्षाप्रद है।

एक बार एक भिक्षुक ने महाराज युधिष्ठिर के सम्मुख उपस्थित होकर कुछ याचना की। महाराज युधिष्ठिर उस समय किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे। निदान उन्होंने उससे दूसरे दिन आने को कह दिया। भिक्षुक चला गया!

उस अवसर पर भीम वहीं उपस्थित थे! भिखारी के चले जाने पर वे उठे और हर्ष सूचक दुन्दुभी बजाने लगे उसका संकेत स्वर सुनकर नगर में खुशी के बाजे बजने लगे। युधिष्ठिर ने सुना और भीम से पूछा। भीम यह हर्ष सूचक वाद्य सहसा क्यों बज उठे। भीम ने उत्तर दिया-वह इसलिए कि हमारे महाराज युधिष्ठिर ने काल को जीत लिया है!

भीम की बात सुनकर महाराज युधिष्ठिर बड़े चकित हुए। बोले- “भीम यह तुम क्या कह रहे हो-मैंने काल को जीत लिया है। क्या कोई मनुष्य काल पर भी अधिकार कर सकता है।” भीम ने कहा क्यों नहीं महाराज-यदि आपने काल को न जीत लिया होता तो क्या उस भिक्षुक को कल के लिये कह कर वापस कर देते। ज्यादा तो नहीं कल के लिए तो आपने काल को अपने वश में कर ही लिया है।” महाराज युधिष्ठिर भीम का आशय समझ गये। उन्होंने अपनी भूल पर लज्जित होते हुए तुरन्त ही भिखारी को बुलाया और दान देकर कहा-भीम तुम ठीक कहते हो। पुण्य परमार्थ का कोई अवसर टालना नहीं चाहिए। क्योंकि अगले क्षण यह रहे न रहे! क्या ठिकाना।

अस्तु, पुण्य परमार्थ के बिना मनुष्य का कल्याण नहीं और जब तक उसे जीवन का अनिवार्य अंग नहीं बना लिया जावेगा उसका बन पड़ना सम्भव नहीं होगा! साथ ही उसके करने में न तो विलम्ब करना चाहिए और न प्रमाद! मानव जीवन की सार्थकता और आत्मा का कल्याण इसी में है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 14 May 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 May 2026



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👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये ( भाग 2)

भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों की विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाए अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई ...