रविवार, 17 मई 2026

👉 श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता (भाग 1)

विचार दिशा देते हैं, पर सामर्थ्य आदतों से रहती है। वे ही मनुष्य को किसी निर्धारित दिशा में चलने के लिए न केवल प्रेरणा देती हैं वरन् कई बार तो उसे वे अपने अनुरूप करा लेने के लिए विवश तक कर देती हैं भले ही परिस्थितियाँ अनुकूल न हो। नशेबाजी जैसी आदतें इसका उदाहरण हैं। स्वास्थ्य, पैसा, यश आदि की हानियों को समझते हुए भी नशे के आदी मनुष्य नशा करते और उसके दुष्परिणाम भुगतते हैं। छोड़ने की बात सोचते हुए भी वे वैसा कर नहीं पाते। कारण कि विचारों की तुलना में आदतों की सामर्थ्य अत्यधिक होती है। अनुपयोगी होते हुए भी वे कई बार इतनी प्रबल होती हैं कि पूरा करने के अतिरिक्त और कोई चारा दिखाई नहीं पड़ता। भले या बुरे जीवन क्रम में जितना योगदान आदतों का होता है उतना और किसी का नहीं।

आदतें, आसमान से नहीं उतरतीं। विचारों को कार्यान्वित करते रहने का लम्बा क्रम चलते रहने पर वह अभ्यास आदत बन जाती है और उसे अपनाये रहने में जितना समय बीतता जाता है, उतना ही वह ढर्रा सुदृढ़ होता चला जाता है। वह परिपक्वता कालान्तर में इतनी गहराई से जड़ें जमा लेती है कि उखाड़ने के असामान्य उपाय ही भले सफल हों। सामान्यतया तो वह अभ्यस्त ढर्रा ही जीवन क्रम पर सवार रहता है और उसी पटरी पर गाड़ी लुढ़कती रहती है।

आदतें बनाई जाती हैं, भले ही उनका अभ्यास योजना बनाकर किया गया हो अथवा रुझान, संपर्क, वातावरण परिस्थिति आदि कारणों से अनायास ही बनता चला गया हो। यह आदतें ही मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व या चरित्र होता है। मनुष्य क्या सोचता है क्या चाहता है, इसका अधिक मूल्य नहीं। परिणाम तो उन गतिविधियों के ही निकलते हैं जो आदतों के अनुरूप क्रियान्वित होती रहती हैं। प्रतिफल तो कर्म ही उत्पन्न करते हैं और वे कर्म अन्य कारणों के अतिरिक्त प्रधानतया आदतों से प्रेरित होते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1981 फरवरी

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👉 आत्म कल्याण का सरल मार्ग (भाग 1)

आत्म कल्याण के लिये परिश्रम तो मनुष्य को स्वयं ही करना पड़ता है, पर सत्संग और सदुपदेश उसके प्रधान अवलम्ब हैं। हमारे कानों को सदुपदेश रूपी सुधा निरन्तर प्राप्त होती ही रहनी चाहिये। मनुष्य का स्वभाव चंचल है। इन्द्रियों की अस्थिरता प्रसिद्ध है। यदि आत्म सुधार में सभी इन्द्रियों को वश में रक्खा जाय तो उचित है। क्योंकि अवसर पाते ही इनकी प्रवृत्ति पतन की ओर होने लगती है। सदुपदेश वह अंकुश है, जो मनुष्य को कर्त्तव्य पथ पर निरन्तर चलते रहने को प्रेरित करता रहता है सत्य से विचलित होते ही कोई शुभ विचार या स्वर्ण-सूत्र पुनः ठीक मार्ग पर ले आता है।

प्रत्येक सदुपदेश एक ठोस प्रेरक विचार है। जैसे कोयले के छोटे से कण में विध्वंशकारी विपुल शक्ति भरी हुई है, उसी प्रकार प्रत्येक सदुपदेश शक्ति का जीता-जागता ज्योति पिंड है। उससे हमको नया प्रकाश और नवीन प्रेरणा प्राप्त होती है। महापुरुषों की अमृतमयी वाणी, कबीर, रहीम, मीरा बाई सूरदास आदि महापुरुषों के प्रवचन, दोहों ओर गीतों में ये महान जीवन सिद्धान्त कूट-कूट कर भरे हुये हैं। जिनका आधार गहरे अनुभव के ऊपर रक्खा गया है। आज ये अमर तत्व-वेत्ता हमारे मध्य नहीं हैं, उनका आर्थिक-शरीर विलुप्त हो गया है पर अपने सदुपदेश के रूप में, वे वह जीवन सार छोड़ गये हैं जो हमारे पथ प्रदर्शन में बड़ा सहायक हो सकता है।

आदमी मर जाता है, उसके साथ उसके साज सामान, महल, दीवारें टूट-फूटकर नष्ट हो जाते हैं, परन्तु उसके जीवन का सार उपदेश और शिक्षायें-वह अमर वस्तु है नव युगों तक जीवित रहती है। इस पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने व्यक्ति आये और मृत्यु के प्राप्त हुये, उनका नाम निशान तक शेष नहीं बचा, किन्तु जिन विचारकों, तत्ववेत्ताओं और महापुरुषों ने अपने जीवन के अनुभव रक्खे हैं वे आज भी मशाल की तरह प्रकाश दे रहे हैं।

मनुष्य का अनुभव धीमी गति से धीरे-2 बढ़ता है अब यदि हम केवल अपने ही अनुभवों पर टिके रहें तो, बहुत दिनों में जीवन का सार पा सकेंगे। इस से अच्छा यही है कि हम विद्वानों के अनुभवों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और इन्हें अपने अनुभवों से परखें, तोलें और जीवन में ढालें। सदुपदेशों को ग्रहण करना अपने आप को लाभान्वित करने का एक सरल उपाय है। सदुपदेश हमारे लिये जीते जागते प्रकाश स्तम्भ हैं। जैसे समुद्र में जहाजों को उचित मार्ग बताने के लिये “प्रकाश स्तम्भ” बनाये जाते हैं विद्वानों के ये उपदेश ऐसे ही प्रकाश स्तम्भ हैं।

हमको कोई दूसरा अच्छी सलाह दे, उसको सुनना हमारा कर्त्तव्य है, परन्तु आपके पास अंतरात्मा का निर्देश है। आप अपनी आत्मा की सलाह से काम करते रहिये। कभी धोखा नहीं खावेंगे।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 17 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 May 2026


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👉 श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता (भाग 1)

विचार दिशा देते हैं, पर सामर्थ्य आदतों से रहती है। वे ही मनुष्य को किसी निर्धारित दिशा में चलने के लिए न केवल प्रेरणा देती हैं वरन् कई बार त...