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सोमवार, 10 दिसंबर 2018

पहले अपनी सेवा और सहायता करो

इस संसार में अनेक प्रकार के पुण्य और परमार्थ हैं। शास्त्रों में नाना प्रकार के धर्म अनुष्ठानों का सविस्तार विधि विधान है और उनके सुविस्तृत महात्म्यों का वर्णन है। दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य कार्य है, इससे कीर्ति आत्म संतोष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है।

पर इन सबसे बढ़ कर भी एक पुण्य परमार्थ है और वह है-आत्म निर्माण। अपने दुर्गुणों को, कुविचारों को, कुसंस्कारों को, ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, डाह, क्षोभ, चिन्ता, भय एवं वासनाओं को विवेक की सहायता से आत्मज्ञान की अग्नि में जला देना इतना बड़ा यज्ञ है जिसकी तुलना सशस्त्र अश्वमेधों से नहीं हो सकती।

अपने अज्ञान को दूर करके मन मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाना भगवान की सच्ची पूजा है। अपनी मानसिक तुच्छता, दीनता, हीनता, दासता, को हटाकर निर्भयता, सत्यता, पवित्रता एवं प्रसन्नता की आत्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाना करोड़ मन सोना दान करने की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।

हर मनुष्य अपना-अपना आत्म निर्माण करे तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। फिर मनुष्यों को स्वर्ग जाने की इच्छा करने की नहीं, वरन् देवताओं के पृथ्वी पर आने की आवश्यकता अनुभव होगी। दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य है, पर अपनी सेवा सहायता करना इससे भी बड़ा पुण्य है। अपनी शारीरिक मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना, अपने को एक आदर्श नागरिक बनाना इतना बड़ा धर्म कार्य है जिसकी तुलना अन्य किसी भी पुण्य परमार्थ से नहीं हो सकती।

शनिवार, 27 मई 2017

👉 पूज्यवर का अनुरोध एवं आश्वासन

🔵 हमें अनेक जन्मों का स्मरण है। लोगों को नहीं जिनके साथ पूर्व जन्मों से सघन संबंध रहे हैं, उन्हें संयोगवश या प्रयत्न पूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और जिस- तिस कारण हमारे इर्द- गिर्द जमा हो गए हैं।
   
🔴 बच्चों को प्रज्ञा परिजनों के संबंध में चलते- चलाते हमारा इतना ही आश्वासन है कि वे यदि अपने भाव- संवेदना क्षेत्र को थोड़ा और परिष्कृत कर लें तो निकटता अब की अपेक्षा और भी अधिक गहरी अनुभव करने लगेंगे।
  
🔵 कठिनाइयों में सहयता करने और बालकों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की हमारी प्रकृति में राई- रत्ती भी अन्तर नहीं होने जा रहा है। वह लाभ पहले की अपेक्षा और भी अधिक मिलता रह सकता है।
  
🔴 जो अपनी भाव- संवेदना बढ़ा सकेंगे वे भविष्य में हमारी निकटता अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह अनुभव करते रहेंगे।

शुक्रवार, 26 मई 2017

👉 सर्वसमर्थ गायत्री माता

🔵 यह मई १९७० की बात है। मैं अपने छोटे भाई महावीर सिंह के साथ चार दिन के शिविर में मथुरा गया हुआ था। उस दौरान गुरुदेव ने मुझसे कहा कि तेरी कोई पीड़ा हो तो मुझे बतला। मैंने कहा- गुरुदेव मेरा एक छोटा भाई है। उसके हाथ पैर में जान नहीं है। हिलते डुलते भी नहीं है। पूज्यवर ने कहा- बेटा वह उसके पिछले जन्म का प्रारब्ध है। जिसका परिणाम भुगत रहा है। मैंने कहा- गुरुदेव अगर वह अच्छा नहीं हो सकता है तो ऐसी कृपा करें कि वह मर जाय। हम लोगों से उसका कष्ट देखा नहीं जाता। गुरुदेव बोले- मैं तो ब्राह्मण हूँ, किसी को मार कैसे सकता हूँ! फिर कुछ सोचते हुए धीरे से बोले- जब मनुष्य किसी को जिन्दा नहीं कर सकता तो मारने का अधिकार उसे कैसे मिल सकता है? मैंने कहा- कम से कम चलने फिरने लग जाय.....। गुरुदेव कुछ देर मौन हो गए। उसके पश्चात् बोले बेटा गायत्री माता से कहूँगा, वह ठीक हो जाएगा। भस्मी ले जा, भस्मी से उसकी मालिश करना और मेरा काम करना।
      
🔴 मैंने भस्मी ले जाकर अपनी माँ को दी और बताया कि गुरुदेव की कृपा से भैय्या ठीक हो जाएगा। इस बात पर ज्यादा विश्वास किसी को नहीं हुआ। मेरे पिताजी को तो बिल्कुल विश्वास नहीं था। उन्होंने कहा- अगर यह लड़का ठीक हो जाएगा तो हम गुरुजी की शक्ति को मानेंगे। आसपास के लोगों में यह बात फैल गई थी। सभी लोग उसको देखने आते। डॉक्टर लोग भी बच्चे की स्थिति जानने के लिए आते। मेरी माँ ने भस्म को भाई के अविकसित हाथ पैर में रोजाना लगाना शुरु किया और महामृत्युंजय मंत्र का जप उसने निमित्त शुरू किया। थोड़े ही दिनों में उसके मसल्स बनने लगे।
        
🔵 इस तरह देखते- देखते करीब चार महीने बीत गए। लोगों की उत्सुकता बढ़ रही थी। हाथ पैरों में धीरे- धीरे जान आने लगी। धीरे- धीरे वह चारपाई पकड़कर उठने- बैठने लगा और कुछ ही महीनों में वह एकदम सामान्य बच्चे की तरह हो गया। किसी को विश्वास नहीं होता था कि यह वही बच्चा है। हम लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा। पिताजी गाँव भर घूमते, लोगों को बताते कि गुरुदेव ने मेरे बच्चे को हाथ पैर दे दिए हैं। उन दिनों गायत्री यज्ञ के लिए कोई तैयार नहीं होता था, पर इस घटना ने हमें यज्ञ करने हेतु बाध्य कर दिया। ठाठरिया (चूरू) राजस्थान में ६ से ९ मई १९७२ तक एक विशाल यज्ञ का निर्धारण किया गया। उस यज्ञ में दूर- दूर से लोग आए। जो भी आता वह व्यक्ति पूज्यवर की सिद्धियों से अधिक गायत्री यज्ञ के तत्वदर्शन से प्रभावित होता। हजारों लोग दीक्षा लेकर गए। हजारों का साहित्य बिका। उस क्षेत्र में करीब पचास शाखाएँ खुल गईं।
    
🔴 इस घटना के बाद मेरा पूरा परिवार गुरुदेव से गहराई से जुड़ गया। मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर २२ अगस्त १९९८ को स्थायी रूप से सेवा दे दी। तब से उनके चरणों में रहकर उन्हीं का कार्य कर रहा हूँ।

🌹 रामसिंह राठौर -शान्तिकुञ्ज (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/mata

शुक्रवार, 19 मई 2017

👉 सिद्ध हुआ माँ का आशीर्वाद

🔵 वंदनीया माताजी के आशीर्वाद से ३ दिसम्बर १९९२ को मेरे छोटे भाई बैजनाथ की शादी कलकत्ता आवास पर निश्चित हुई। शादी की तैयारी बड़े जोर- शोर से चल रही थी। घर में हँसी- खुशी का माहौल था। विवाह के १८ दिन पहले १५ नवम्बर ९२ को सबसे छोटे भाई रामनाथ को चिरकुण्डा स्थित फैक्ट्री के अन्दर दिन में २ बजे किसी अज्ञात व्यक्ति ने गोली मार दी। गोली लगने के बावजूद रामनाथ स्वयं पेट में गमछा बाँधकर स्कूटर चलाकर १ किलोमीटर पर स्थित एक प्राइवेट नर्सिंग होम पहुँचे थे लेकिन वहाँ उपचार की समुचित सुविधा न होने पर भाइयों द्वारा उन्हें अस्पताल धनबाद ले जाया गया। माताजी गुरुदेव की कृपा थी, जिसके कारण रविवार अवकाश होने पर भी सभी डॉक्टर अस्पताल में मौजूद थे। डॉक्टरों ने केस की गम्भीरता से हमारे पिताजी श्री राम प्रसाद जायसवाल को अवगत कराया तथा न बचने की बात कही।

🔴 डॉक्टर की बात सुनकर सभी लोग बहुत परेशान हो उठे। लेकिन मेरे पिताजी को वंदनीया माताजी के आशीर्वाद पर पूरा भरोसा था। इसलिए डॉक्टर से ऑपरेशन करने को कह दिया। डॉक्टरों ने ऑपरेशन शुरू किया। इधर हम सभी लोग बैठकर माताजी से प्रार्थना करने लगे। मन में बार- बार भाव उठता, कुछ भी हो जाए माताजी ने घर में मांगलिक कार्यक्रम के लिए आशीर्वाद दिया है तो अमंगल कैसे हो सकता है? हम सभी के मन में यही भाव थे कि माताजी अवश्य ही अपना आशीर्वाद फलीभूत करेंगी।

🔵 हम सभी बैठकर माताजी का ध्यान कर मन ही मन गायत्री मंत्र जप कर रहे थे। करीब ४ घंटे के अथक प्रयास के बाद गोली निकाली जा सकी। सभी डॉक्टर बहुत अचंभित थे। डॉक्टरों ने मेरे पिताजी को बधाई देते हुए कहा कि इस ऑपरेशन में किसी अदृश्य शक्ति का संरक्षण मिल रहा था। इतने दुरूह ऑपरेशन के लिए काफी अधिक दक्षता की जरूरत थी। डॉक्टर साहब ने कहा कि गोली पेट को चीरते हुए किडनी के रास्ते रीढ़ की हड्डी में जा घुसी थी, जिसे निकालना आसानी से संभव नहीं था, लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने उस काम को बहुत आसानी से सम्पन्न करा दिया। इसके पश्चात् शक्तिपीठ से वन्दनीया माताजी द्वारा अभिमंत्रित जल की एक बूँद मुँह में डालने के ठीक दो घंटे बाद रामनाथ को होश आ गया। गुरु कृपा से मात्र १८ दिन में ही सारे उपचार हो गए। विवाह में उसे देखकर लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो लड़का विवाह की सारी व्यवस्था देख रहा है, उसे ही गोली लगी थी।
 
🔴 इस प्रकार माताजी के आशीर्वाद से घर में अमंगल भी मांगलिक कार्य में विघ्न नहीं डाल सका।
 
🌹 विश्वासनाथ प्रसाद जायसवाल चिरकुंडा, धनबाद (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/aad

गुरुवार, 18 मई 2017

👉 ...और मुझे दर्शन हो गये

🔵 जब मैं घुटनों के बल चला करती थी, तभी से घर में होने वाले पूजन, हवन तथा मंत्रोच्चार के प्रति मेरे मन में एक जिज्ञासा का भाव था। कुछ और बड़ी होने पर मेरी माँ ने मुझे गायत्री मंत्र का अभ्यास करा दिया था और मैं भी घर के अन्य सदस्यों के साथ हवन में शामिल होने लग गई थी।

🔴 घर के लोग प्रायः शान्तिकुञ्ज तथा पूज्य गुरुदेव के बारे में बातें किया करते थे। मैं जब भी माँ से पूछती कि पूज्य गुरुदेव कौन हैं, तो उनकी तस्वीर की ओर इशारा करके वह हमेशा यही कहती- उनके बारे में मैं तुम्हें क्या बताऊँ? वे कोई आदमी थोड़े ही हैं। वे तो भगवान हैं, भगवान! 

🔵 माँ की ऐसी बातें सुन- सुन कर मेरा मन पूज्य गुरुदेव से मिलने के लिए बेचैन होने लगा। मैं बार- बार शान्तिकुञ्ज आने की जिद करने लगी।
 
🔴 यह उन दिनों की बात है जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी। बहुत जिद करने पर भी घर से अनुमति नहीं मिली और लाख चाहने पर भी मैं गुरुदेव के दर्शन नहीं कर सकी। आठवीं कक्षा में आते- आते मैंने पहली दूसरी कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था।
 
🔵 सन् १९९०ई. में अचानक एक दिन पता चला कि बोकारो शक्तिपीठ से कुछ परिजन शान्तिकुञ्ज जा रहे हैं। गुरुदेव से मिलने की मेरी उत्कंठा अब तक चरम पर पहुँच चुकी थी। मैंने तत्काल शान्तिकुञ्ज जाने का मन बना लिया और वहाँ जाने वाले एक परिजन से मिलकर उनके साथ चलने का कार्यक्रम तय कर लिया। इस बात की मैंने घर में किसी को भनक तक नहीं लगने दी, डर था कि वे सभी फिर मना कर देंगे।
 
🔴 परिजनों की टोली के साथ मैं शान्तिकुञ्ज पहुँची। अगले दिन सुबह से ही मैं यह सोचकर खुशी से पागल हुई जा रही थी कि आज गुरुदेव के दर्शन होंगे। ऊपर के कक्ष में जाकर पहले मैंने माताजी को प्रणाम किया, तो उन्होंने सिर सहलाते हुए आशीर्वाद दिया। इसके बाद गुरुदेव को प्रणाम करने पर उन्होंने मुझे आधा पुष्प देकर आधा स्वयं रख लिया। आधा फूल देने का अर्थ मेरी समझ में नहीं आया। वापसी में सीढ़ियों से उतरती हुई मैं इसी बात पर सोचती जा रही थी कि एक अद्भुत् अनुभूति हुई। ऐसा लगा कि मेरे कानों में कोई कुछ कह रहा है।
 
🔵 मैंने आवाज पहचानने की कोशिश की तो बड़ा आश्चर्य हुआ, वह गुरुदेव की ही आवाज थी। वे मुझसे कह रहे थे- तुम्हें मेरे बहुत सारे काम करने हैं। तुम जब किसी काम के लिए आगे बढ़ोगी तो मैं कदम- कदम पर तुम्हारा काम आसान करता चलूँगा।
पूज्य गुरुदेव द्वारा आधा फूल देकर आधा अपने पास रख लेने का अर्थ अब कुछ- कुछ मेरी समझ में आने लगा था।
 
🔴 अगले ही दिन वसंत पंचमी पर मैंने गुरुदीक्षा ले ली। जब विदाई का समय आया तो वंदनीया माता जी से मिलने गई। सोचकर तो चली थी कि मैं उनसे बहुत कुछ कहूँगी लेकिन कुछ भी नहीं कह सकी। एक ही साथ मन में इतनी बातें आ रही थीं कि कुछ कहते नहीं बना।   इस ऊहापोह में आँखों से आँसू बहने लगे। मेरी सबसे बड़ी चिन्ता तो यह थी कि मैं किसी को बताये बिना घर से चली आई थी। साथ की महिलाओं ने भी मुझे पूरी तरह से डरा रखा था। मन कह रहा था कि अगर माताजी आशीर्वाद दे दें, तो घर पहुँचने पर मुझे कोई कुछ नहीं कहेगा।

🔵 माताजी ने मेरे मन का भाव बिना कुछ कहे समझ लिया। उन्होंने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा- बेटा चिन्ता मत कर, सब कुछ ठीक हो जाएगा, घर के लोग तुम्हें कुछ भी नहीं कहेंगे। .....और आश्चर्य! घर पहुँचते ही डाँट- फटकार और पिटाई की आशंकाएँ निर्मूल सिद्ध हुईं। घर में सबको पहले ही पता चल चुका था कि मैं शान्तिकुञ्ज गई हूँ। माँ- पिताजी ने एक शब्द भी नहीं कहा। उल्टे सभी इस बात को लेकर खुश हो रहे थे कि मैं वन्दनीया माताजी और पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद लेकर लौटी हूँ।
 
🔴 उसी वर्ष जब २ जून को गुरुदेव ने शरीर छोड़ दिया तो हम सभी शोकाकुल हो गए। मेरे माता- पिता दुःखी मन से आपस में बातें कर रहे थे। माँ कह रही थी- हम दोनों से अच्छी किस्मत लेकर तो हमारी अन्जु ही आई है। हम कई सालों तक सोचते ही रह गए और यह लड़की अकेली जाकर भगवान के दर्शन कर आई। पिताजी ने कहा- तुम सच कह रही हो। अन्जु अपनी मर्जी से थोड़े ही गई थी। उसे तो पूज्य गुरुदेव ने शान्तिकुञ्ज बुलाकर स्वयं दर्शन दिए थे। पर, हमारा ऐसा भाग्य कहाँ!

🌹 अंजू उपाध्याय डी. एस. पी. (अरुणांचल प्रदेश
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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बुधवार, 17 मई 2017

👉 सब कुछ करता तू ही...

🔵 एक बार मेरी धर्मपत्नी बहुत गम्भीर रूप से बीमार हो गईं। उन्हें दमा की बीमारी थी। हालत इतनी खराब थी कि पानी में हाथ डालना भी मुश्किल था। कोई भी काम अपने हाथ से नहीं कर पातीं। केवल हम दो व्यक्तियों के परिवार में घर के काम- काज के लिए दो लड़कियों को रखना पड़ा। अपनी दोनों बेटियों का विवाह हो चुका था। वे अपने परिवार की जिम्मेदारियों को छोड़कर हमारे पास आकर मॉँ की सेवा नहीं कर सकतीं थी। इधर यह बीमारी थी जो छूटती ही नहीं थी। पाँच साल तक इलाज चलता रहा। मगर हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती ही चली गई।

🔴 मैं स्वयं एक होमियोपैथ चिकित्सक हूँ। होमियोपैथिक,एलोपैथी,आयु़र्वेद सब तरह का इलाज कराकर थक चुका था। हर रात किसी न किसी डॉक्टर को बुलाकर लाना पड़ता था। हुगली जिले में ऐसे कोई प्रतिष्ठित डॉक्टर नहीं बचे थे जिन्हें न दिखाया गया हो, लेकिन यह सिलसिला कभी समाप्त होता नहीं दिखता था। रात- रात भर पत्नी के बिस्तर के पास बैठकर बीतता। कभी रोते- रोते गुरु देव से प्रार्थना करता- हे गुरु देव! उनकी यह असह्य पीड़ा हमसे नहीं सही जाती। या तो ठीक ही कर दीजिए या जीवन ही समाप्त कर दीजिए।

🔵 दिन पर दिन बीतते गए। हमारे आँसुओं का कोई अंत नहीं दिखता था। एक दिन आधी रात को इसी उधेड़बुन में बैठा था कि किस नए डॉक्टर को दिखाया जाए। दिखाने से कोई लाभ है भी या नहीं। अचानक किसी की आवाज आई- इतनी चिन्ता क्यों करते हो? एक अंतिम प्रयास खुद भी तो करके देखो। मैंने चौंककर इधर- उधर देखा। यह अन्तरात्मा की आवाज थी। जैसे गुरु देव ही इलाज की नई दिशा की ओर इंगित कर रहे हों। मैंने तत्काल निर्णय कर लिया, अब जो कुछ हो उन्हीं के निर्देश पर इलाज करूँगा। किसी डॉक्टर को नहीं बुलाऊँगा।
 
🔴 यह निर्णय लेते ही मन में उत्साह की लहर आई। मन की सारी दुश्चिंताए मिट गईं। भोर होते- होते मैंने धर्मपत्नी को भी यह बात बता दी कि अब मेरे घर कोई डॉक्टर नहीं आएँगे। मैं ही इलाज करूँगा। उन्होंने भी सहमति जताई। कहा- ‘मर तो जाऊँगी ही, यह मरण अगर आपके ही हाथों लिखा हो, तो कौन टाल सकता है? पत्नी की इन निराशा भरी बातों से भी मेरा उत्साह कम नहीं हुआ। बल्कि अन्दर से जोरदार कोई प्रेरणा उठी और मैं होमियोपैथी की किताब लेकर बैठ गया।
 
🔵 गहन अध्ययन कर सारे लक्षणों को मिलाकर सटीक दवा खोजने का प्रयास करता। इसी तरह एक के बाद एक कई दवाएँ चलाईं; लेकिन स्थिति दिन- पर बुरी होती गई। बेटियाँ मुझ पर लांछन लगाने लगीं। आस- पड़ोस के लोग भी कंजूस कहकर ताने देने लगे। बेटियों ने तो यहाँ तक कह दिया कि यदि हमारी माँ को कुछ हो गया, तो हम आपको जेल भी पहुँचाने में नहीं चूकेंगी। फिर भी इस काम में गुरु देव का निर्देश समझकर मैं जुटा रहा।
 
🔴 गुरु देव को स्मरण कर एक पर एक दवा मिला- मिलाकर प्रयोग परीक्षण करता रहा। कुछ लाभ न होता देख जब मन विचलित हो उठा, हिम्मत जवाब देने लगी, तब फिर एक बार वही आवाज सुनाई पड़ी- चिन्ता मत कर, कल तू जरूर सही दवा खोज निकालेगा। मैं चारों ओर से ध्यान हटाकर किताब लेकर बैठा। सारे लक्षणों को सूचीबद्ध किया। पहले दी गई दवाओं के परिणामों को देखते हुए दुबारा अच्छी तरह अध्ययन कर दवा चुनी। गुरु देव का स्मरण कर दवा देते समय मन ही मन कहा- गुरुदेव! यह दवा मैं नहीं दे रहा। यह आपकी दी हुई दवा है। अब आप जानिए और आपका काम जाने।
 
🔵 गुरु देव की बात सच हुई। दवा सही निकली। इसी दवा से धीरे- धीरे मेरी पत्नी स्वस्थ होने लगी। हमारे घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं। इसके बाद से पूज्य गुरु देव को स्मरण कर जब- जब रोगियों को दवा दी है, रोगी को अवश्य ही आराम पहुँचा है। गुरुदेव की बड़ी कृपा रही है मुझ पर।

🌹 डॉ.टी० के० घोष हुगली (पं.बंगाल)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 छूट गयी कमर की बेल्ट और बैसाखी

🔵 बचपन से ही मैं बागवानी का शौकीन रहा हूँ। जब मैं नौकरी पेशा में था, तो मैंने अपने छोटे से आवास को तरह- तरह के फूलों और पौधों से सजा रखा था। व्यस्तताओं से भरे जीवन में भी मैं उन पौधों की देखभाल के लिए समय निकाल ही लेता था।

🔴 एक दिन मैं पौधों में पानी डाल रहा था। छुट्टी का दिन था, सो मैं सोच रहा था कि लगे हाथों बेतरतीबी से बढ़ आए पौधों की कटाई- छँटाई भी कर डालूँ। सभी तरह के औजार पास ही पड़े थे। मैंने कैंची उठाकर छँटाई शुरू कर दी। तभी मेरी नजर उस बेल पर गयी जिसे रस्सियों के सहारे छत पर पहुँचाया गया था।

🔵 एस्बेस्टस की छत पर इस लता ने अपना घना आवरण बिछा रखा था, जिससे गर्मियों में काफी ठण्डक बनी रहती थी, लेकिन धीरे- धीरे यह दीवार के पास ही इतना घना होने लगा कि आसपास की सुन्दरता में बाधक बन गया था। इसकी करीने से छँटाई करने के लिए स्टूल के सहारे दीवार पर चढ़ गया। दीवार मात्र दस इंच चौड़ी थी। सावधानी से दोनों पैर जमाकर मैंने छँटाई शुरू की। रस्सी के चारों ओर बेतरतीबी से फैली हुई लताओं को काटता हुआ अपना हाथ ऊपर की ओर उठाने जा रहा था। मेरी कोशिश थी कि छत के पास तक की छँटाई अच्छी तरह से हो जाए। छत की ऊँचाई को छूने की कोशिश में मेरा संतुलन बिगड़ा और मैं उस पार सड़क पर जा गिरा। गिरते ही पीड़ा से चीख उठा, जिससे आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई। अन्दर से पत्नी दौड़ी आई और मुझे इस तरह पड़ा देख जोर- जोर से रोने लगी और उस बेल को कोसने लगी। लोगों ने मुझे उठाकर बरामदे में पड़े बिछावन पर लिटा दिया। कई बहिनों ने पंखा झलना शुरू किया। दो भाई डॉक्टर बुलाने के लिए दौड़ पड़े। डॉक्टर आए और दवा, इंजेक्शन आदि देकर, मरहम पट्टी कर चले गए। पड़ोस से आए लोग भी एक- एक कर जा चुके थे। मैं पीड़ा से कराहता हुआ गुरुदेव को स्मरण कर रहा था। बीच- बीच में पत्नी के रोने- बिलखने की आवाज से ध्यान बँट जाता।
 
🔴 थोड़ी देर बाद फोन से सूचना पाकर मेरे सम्बन्धी डॉ. विधुशेखर पाण्डेय जी आ पहुँचे। उन्होंने मुझे अपने निजी नर्सिंग होम, आरोग्य निकेतन ले जाने का निर्णय लिया। मेरे लड़के प्रेमांकुर और डॉ. साहब के बीच मोटर साइकिल पर बिठाकर मुझे भगवानपुर ले जाया गया। वहाँ एक्स- रे करने पर पता चला कि दाएँ पैर की एड़ी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई है। दूसरे दिन अस्थि विशेषज्ञ डॉ. ए.के. सिंह को भी दिखाया गया। पैर में सूजन हो गई थी, इसलिए तत्काल प्लास्टर न कर कच्चा प्लास्टर चढ़ाया गया। एक सप्ताह बाद पक्का प्लास्टर हुआ। चिकित्सक के निर्देशानुसार डेढ़ माह तक पूरी तरह बिस्तर पर रहना था। इतनी लम्बी अवधि तक निकम्मों की तरह पड़े रहना होगा, यह सोच- सोचकर जीवन भार- सा लगने लगा। शौचादि क्रिया भी बिस्तर पर लेटे- लेटे ही करनी थी। सेवा सुश्रुषा के लिए पत्नी भी अस्पताल चली आईं।
 
🔵 निरंतर डेढ़ माह तक लेटे रहने से रीढ़ एवं कमर के नीचे बैक सोर हो गया था। निर्धारित समय पर प्लास्टर कटा और मैं बैसाखी- इंकलेट, कमर के ऊपर लगने वाले लोहे के प्लेट युक्त विशेष बेल्ट के सहारे चलनेफिरने लगा। फिर भी मन में इतना संतोष तो था ही कि गुरुवर की अनुकम्पा से मैं अपाहिज होने से बच गया। तीन दिन बाद घर आ गया। एक दिन गुरुजी ने स्वप्र में दर्शन दिए और मुझे शान्तिकुञ्ज जाने को कहा। उसी अवस्था में मैंने जाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं।
 
🔴 २ मई २००७ को मैं शान्तिकुंज आ गया। यहाँ आते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर में कोई पीड़ा, कोई क्लेश है ही नहीं। यहाँ आने के एक माह बाद एक दिन शान्तिकुञ्ज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता आदरणीय अमल कुमार दत्ता, एम.एस. ने मेरी शारीरिक परेशानियों के सम्बन्ध में विस्तार से जानकारी ली। एक्स- रे करवाया और रिपोर्ट देखकर बोले- अब बगैर छड़ी बेल्ट, इन्कलेट के चलने की आदत डालें। मुझे असमंजस में देखकर उन्होंने आश्वस्त किया, चिंता न करें- गुरुदेव सब अच्छा ही करेंगे।
 
🔵 मैंने उसी समय आँखें बन्द करके पूज्य गुरुदेव का स्मरण किया। बेल्ट, इन्क्लेट उतारे, छड़ी को बगल में दबाया और पूज्य गुरुदेव की समाधि की ओर बढ़ चला। तब से लेकर आज तक मिशन के काम से तीसरी मंजिल पर बने ढेर सारे विभागों के कार्यालयों तक जाने- आने के लिए हर रोज सैकड़ों सीढ़ियाँ आराम से चढ़ता उतरता हूँ। सब पूज्यवर की ही कृपा है।

🌹 डी.एन. त्रिपाठी पूर्व जोन, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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सोमवार, 15 मई 2017

👉 संजीवनी ने किया नवचेतना का संचार

🌹 (पग- पग पर गुरुदेव ने सिखाया, बचाया और सँवारा)

🔵 गुरु की चमत्कारिक कृपा को जीवन के क्षण- क्षण में अनुभव किया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि गुरुतत्व की अदृश्य चैतन्यशक्ति सतत मार्गदर्शन, संरक्षण, मंगलमय जीवन, हर प्रगति और हर कर्म के कुशल- क्षेम वहाम्यहम् का वचन निभाती रही है। पूर्वजन्मों के संस्कारवश योग, आसन, उपवास, आदि में अभिरुचि रही। कई एक अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ भी हुईं, लेकिन आगे के लिए गुरु की खोज रही। कई आश्रमों, मठों और चर्चित महापुरुषों के सम्पर्क में आया। अनायास ‘कादम्बिनी’ नामक पत्रिका के तंत्र- विशेषांक में आचार्य श्रीराम शर्माजी के तंत्र महाविज्ञान पर एक लेख में शान्तिकुञ्ज और ब्रह्मवर्चस् शोध- संस्थान के बारे में पढ़ने को मिला।

🔴 पत्र- व्यवहार के बाद आने की अनुमति मिली। लेकिन परिवार से जाने की अनुमति नहीं मिली। शान्तिकुञ्ज से फिर वंदनीया माताजी का पत्र पहुँचा- आयुष्यमान आए नहीं, प्रतीक्षा होती रही। यह राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए यज्ञ के राष्ट्रव्यापी अभियान का वर्ष था! दूसरी बार अकेले ही जमालपुर से हरिद्वार बगैर रिजर्वेशन के रेल यात्रा से पहुँचा। लगा, रास्ते भर कोई दिव्य शक्ति संरक्षित करती रही। पहुँचने पर शान्तिकुञ्ज का वातावरण अपूर्व, मनोरम और अलौकिक प्रतीत हुआ। वंदनीया माताजी से भेंट और परामर्श का अवसर मिला। यहाँ हालांकि प्रवचनों में गायत्री और यज्ञ की महिमा को सुना लेकिन वैज्ञानिक तर्क के स्तर पर सहमत नहीं हो पा रहा था।

🔵 क्योंकि ऐसी महिमाएँ पहले भी सुनता रहा था, किसी प्रकार का अनुभव हुआ नहीं था। कई असमंजस के साथ जब ट्रेन से लौट रहा था, सोए रहने की वजह से ट्रेन आगे बढ़ गई थी। टी.टी. किसी न किसी बहाने सबसे कुछ रकम ऐंठ रहा था। उसने मुझसे भी कुछ रकम माँगी। प्रयोग के तौर पर मैंने मन ही मन गायत्री मंत्र जपना आरंभ किया। मेरे हाथ में गुरुदेव की लिखी कोई पुस्तक थी। टीटी ने पुस्तक मेरे हाथ से लेकर पूछा- ‘कहाँ से आ रहे हैं?
 
🔴 मैंने कहा- ‘शांतिकुंज हरिद्वार से।’ टी. टी. ने कहा- ‘हाँ, मेरे एक चाचाजी भी यहाँ से जुड़े हैं, मेरी श्रद्धा है इस संस्था से।’ फिर टी. टी. ने मुझे ससम्मान सही ट्रेन में बैठाया। यह तो गायत्री मंत्र की शक्ति की एक झलक मात्र थी। आचार्य जी के उपलब्ध साहित्य को पढ़ते हुए एक जगह भावना ठहर गई। एक पुस्तक में उन्होंने लिखा था कि जिन्हें विश्वास न हो वे गायत्री मंत्र का जप करके तो देखें। गायत्री मंत्र जप कर रहा था। इसी बीच राज्य स्तर के प्रतिष्ठित विद्वान प्राध्यापक के पुत्र जिनसे मेरी मैत्री थी, अपने पिता के ब्रेन हैमरेज के आघात के बाद एक दिन राय- मशवरे के लिये अपने घर ले गए। मेरे जैसे अदना व्यक्ति के साथ नामी- गिरामी बुद्धिजीवी का आध्यात्मिक विषय पर चर्चा- परिचर्चा मेरे लिये अप्रत्याशित रोमांच था।
    
🔵 मैं लगातार सुन और पढ़ रहा था कि बिना गुरुदीक्षा के साधना फलती नहीं, मंत्र में प्राण नहीं आता। लेकिन तार्किक मन गुरुदीक्षा का अर्थ अधीनता समझ रहा था। कई बार नौ दिवसीय सत्र में दीक्षा के अवसर को टालता रहा। एक बार इसी तरह टालते हुए आश्रम की कैंटीन में बैठा। एक गुजराती महिला ने अनायास पूछा- ‘आप कितनी बार शान्तिकुञ्ज आ चुके हैं?’ मैंने कहा- ‘पाँच बार’ महिला- ‘आपने दीक्षा ली’ - ‘नहीं।’ महिला- ‘इतनी बार शान्तिकुञ्ज आ चुके हैं, दीक्षा नहीं ली?’ यह बात जैसे दिल को छू गई।
 
🔴 एक बार माँ और बहनों को लेकर शान्तिकुञ्ज आया। माँ पहली बार में ही दीक्षित हो गई। दूसरी बार माँ के साथ शान्तिकुञ्ज आया। माँ ने कहा इस बार अवश्य ही दीक्षा ले लो। मैंने दीक्षा तो ली लेकिन अभी भी बेशर्त समर्पण का भाव था नहीं। अभी भी बौद्धिक भूख के रूप में विभिन्न साधना, ध्यान मार्ग की पद्धतियों में भटक रहा था। कई बार ऐसा लगा कि स्वयं गुरुदेव ही मुझे ये सब जानने समझने की सुविधा और अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। एक बार आँवलखेड़ा के युगसंधि महापुरश्चरण की अर्द्धपूर्णाहुति के अवसर पर टूंडला किसी धार्मिक सत्संग स्थल पर गया। आगरा आते हुए बस से उतरते वक्त बुरी तरह सड़क पर गिर गया।

🔵 वहाँ के लोगों ने उठाकर सड़क के किनारे लिटाया। सामने एक बड़े पोस्टर में गुरुदेव व माताजी की आशीषमय मुद्रा में बड़ी तस्वीर थी। इस स्थिति में प्रबल आत्मविश्वास से भरी प्रार्थना के साथ इन्हें संरक्षक के रूप में स्वीकारा। अद्भुत! वहाँ के बड़े परोपकारी लोग चैरिटेबिल अस्पताल ले गए। वहाँ अस्थिरोग विशेषज्ञ, चिकित्सकों ने पूरा ख्याल किया। वहाँ सहायक सज्जनों ने बड़ी सद्भावपूर्ण भावना से कांधे पर बिठाकर ट्रेन आदि के सहारे घर पहुँचाया। गायत्री परिवार के लोगों की सामूहिक प्रार्थना के बलबूते मैं स्वस्थ हुआ। कुछ लोग मिशन के कार्य से बुलाने आते। टाल- मटोल करता रहा। एक दिन आधी रात को माँ को गंभीर रूप से बीमार होने के कारण अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। ऑक्सीजन सिलेंडर लगाना पड़ा। मुझे यह गुरुकार्य की अवहेलना का दण्ड लगा।

🔴 अस्पताल के पीछे चबूतरे पर बैठकर गुरुदेव से प्रार्थना की कि अब आपकी सेवा में पूरे तौर पर तत्पर रहूँगा। आश्चर्य! माँ ठीक होने लगी। फिर गायत्री मिशन में बेशर्त पूर्णतः सक्रिय हुआ हूँ। हमारी तीनों बहिनें मिशनरी गतिविधि में अपनी गायन- वादन प्रतिभा से सक्रिय हैं। गुरु के अनुदान स्वरूप उन्हें अच्छी शिक्षा, उत्तम वैवाहिक जीवन प्राप्त हुआ।
एक और घटना जिसने चेतना को उन्नत बनाया और शारीरिक चिकित्सा के स्तर पर अद्भुत अनुभव दे गया। हुआ यूँ, पूरबसराय शक्तिपीठ (मुंगेर) से युवा सम्मेलन के कार्यक्रम से लौटते हुए गेट के पास पथरीले रास्ते से फिसल कर इतनी बुरी तरह गिरा कि बाँये पैर के घुटने में जबरदस्त चोट आई। लाख प्रयास के बावजूद न तो पैर मुड़ पा रहा था और न ही मैं उठ पा रहा था।
  
🔵 बेहद लाचार और असहाय विवशता की स्थिति! वहाँ उपस्थित गायत्री परिजन कई सलाह- मशवरे के बाद मुंगेर के पोलो मैदान के पास एक व्यक्ति के पास ले गए। उसने गहरी चोट कहकर पट्टी बाँध दी, तीन सौ रुपये लिये, फिर मुझे घर लाया गया। भ्रम, भय, आशंका और नासमझी में कुछ दर्द निवारक गोलियों और अन्य उपचारों से मन को बहला रहा था। करवट बदल नहीं पाता था।
 
🔴 करीब पन्द्रह या बीस दिनों के बाद जब स्वतः पट्टी खोली तो मेरा घुटना मुड़ता ही नहीं था। फिर एक्स- रे से जो रिपोर्ट आई उसमें घुटने की चक्री दो टुकड़े में टूटी थी। घुटना बुरी तरह फूला हुआ था। डॉक्टर की सलाह मिली कि स्टील की चक्री प्रत्यारोपित की जाए या हड्डी काटी जाए। बेहद खर्च, सहायक लोगों की कमी, स्वयं विस्तर से भी उठ नहीं पाने की असमर्थता। उस वक्त नगर में विराट गायत्री महायज्ञ का आयोजन होने को था। अत्यंत किंकर्तव्यविमूढ़ सी अवस्था में गुरुदेव से आर्त्त स्वर में रुदन से भरी प्रार्थना ने अंधेरे में पग- पग पर रोशनी बनकर चमत्कारिक कृपाएँ बरसायीं।
  
🔵 स्टिक के साथ चलने के प्रयास में किसी झटके में असहनीय दर्द बढ़ गया। उस रात बहुत रो- रोकर गुरुदेव से प्रार्थना की। रात्रि स्वप्र में एक दिव्य पुरुष ने घुटने को हाथ से छूते हुए कहा कि आप मेरे बताए हुए प्राणायामों को थोड़ी लंबी अवधि तक और गहरे प्रार्थना भाव से करें। पहले भी प्राणायाम के अभ्यास से पेट की बीमारी से राहत पाए थी।
एक उदाहरण द्वारा तत्कालीन गायत्री शक्तिपीठ के उपजोन समन्वयक श्री त्रिवेणी प्रसाद अग्रवाल ने अपनी पत्नी के टूटी हड्डी का केस बताया जो प्राकृतिक ढंग से ठीक हो गया था। एक धार्मिक चेनल पर एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रख्यात अस्थि रोग विशेषज्ञ के १०० लोगों पर प्राणायाम के शिविर द्वारा सकारात्मक परिणाम को देखा। दोनों उदाहरणों से आए विश्वास और बिल्कुल सकारात्मक सोच के साथ प्रातः ३.३० बजे, संध्या ४.०० बजे में पर्याप्त समय तक प्रार्थना पूर्ण भाव से प्राणायम की आध्यात्मिक चिकित्सा का अभ्यास आरंभ किया। प्राणायाम- ध्यान के वक्त मैं मिलने वाले लोगों से कम मिलता था। आश्चर्य! पैर धीरे- धीरे मुड़ने लगा।
 
🔴 ढाई महिने में पैर के सहारे बैठने लगा। एक रात्रि स्वप्र में डॉ० प्रणव पण्ड्या ने निर्दिष्ट किया कि प्राणायाम के साथ- साथ रोम- रोम में, हर कोशिका में सविता संचार और सोऽहम का भाव करें। प्राणायाम करते हुए भाव रहता कि अंतरिक्ष से सर्वश्रेष्ठ ईश्वरीय चिकित्सा, औषधि की आशीषमय चेतना का प्रवाह घुटने में हो रहा है। प्रबल विश्वास के साथ हाथ के स्पर्श से ईश्वरीय चेतना को घुटनों में प्रवाहित होने का ध्यान करता। स्टिक के सहारे अब धीरे- धीरे टहलना आरंभ किया।
 
🔵 गायत्री जयंती के दिन सन् २००७ में रक्त- दान शिविर के कार्यक्रम में किसी तरह गया था। इस बीच आन्तरिक जगत में अद्भुत दिव्य अनुभूति, अलौकिक स्वप्रनों का क्रम बना रहा। स्टिक के सहारे ही यज्ञों की टोलियों में जाने, स्वाध्याय- मंडल चलाने जैसी कई गतिविधियों में सक्रियता बढ़ी। पहले तो स्थिति इतनी बुरी थी कि ह्वील चेयर ओर बैशाखी के सहारे चलने की अवसादजन्य सोच थी। लेकिन प्रार्थनामय प्राणायाम से टूटी हड्डी जुड़ने की अद्भुत चिकित्सा हुई। मिशन के लिय महत्वपूर्ण दायित्व निभाने के अवसर मिले। एकांत की साधना से संचित प्रारब्ध कटे। शांति, दिव्यता की अलौकिक अनुभूति और गुरुदेव के आशीषमय कृपाओं के प्रति अन्तरतम से चिर कृतज्ञ हूँ।

🌹 मनोज मिश्र जमालपुर (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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रविवार, 14 मई 2017

👉 अन्जान रास्ते में मिले आत्मीय बंधु

🔵 घटना उस समय की है जब मैं पटन्डा ब्लाँक के देहात बोडाम में को- ऑपरेटिव एक्सटेन्शन अफसर था। मैं टाटानगर से रोज आना- जाना करता था। उस दिन शाम चार बजे बोडाम से अपनी राजदूत मोटर साइकिल से टाटा जा रहा था।

🔴 रास्ते में पहाड़ी है, सड़क काफी टूटी हुई थी। सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा था। मैं किसी तरह से रोड क्रास कर रहा था फिर भी करीब आधा फर्लांग रह गया जिसे मैं पार नहीं कर सका। मैंने देखा कि दूर से सामने साईड से एक जीप भी आ रही थी। उसे भी वही अड़चन थी। रास्ता क्रास करने के प्रयास में वे लोग भी थे। कुछ देर बाद मैंने देखा कि उसने अपनी जीप वहीं से वापस मोड़ ली। मैं सोच में पड़ गया कि क्या करूँ? जाना तो था ही। साहस नहीं हो रहा था कि आगे रास्ता मिल पाएगा कि नहीं। मैं घर कैसे पहुँचूँगा। चिन्ता की रेखाएँ मन मस्तिष्क पर छा गईं। अतः मैंने भी मन ही मन गुरुदेव को याद करते हुए अपनी बाइक खेतों के रास्ते की ओर बढ़ा दी।

🔵 खेतों की मेढ़ों के ऊपर चल रहा था। मुझे बहुत घबराहट हो रही थी। दिमाग कुछ सोचने करने की स्थिति में नहीं था। उसी हड़बड़ाहट की स्थिति में मेरा दिमाग से कण्ट्रोल हट गया। गेयर लगाना चाहिए था, पर गलती से न्यूट्रल लग गया। नीचे गहरी खाई थी। मैं खाई में गिर गया। उसके पश्चात् मेरे ऊपर मोटर साइकिल गिर गई। उस समय वहाँ पर कोई नहीं था। मैंने पूरी तरह सोच लिया कि आज मेरा अन्त निश्चित है। जब व्यक्ति चारों तरफ से हताश एवं निराश होता है इस समय केवल भगवान को याद करता है। मैं मन ही मन अपने आराध्य गुरुदेव से प्रार्थना करने लगा।

🔴 इतने में मेरा ध्यान टूटा। मुझे जीप की आवाज सुनाई दी। मुझे लगा गुरुदेव ने मेरी प्रार्थना सुन ली। जीप में बैठे सारे लोग बाहर निकल आए और मुझे देखा। वे खाई में उतरे और पूछा ‘आपको निकाल दें खाई से?’ मेरे लिए उनके ये शब्द किसी वरदान से कम न थे। मैंने बिना समय गँवाये झट से हाँ कर दी। वे चार लोग थे, चारों ने मिलकर पहले मोटर साइकिल उठाई और किनारे कर दी फिर मुझे सहारा देकर उठा कर ऊपर लाए। मैं अपने आप उठ गया, लगा कि मुझे अधिक चोट नहीं आई है। मैंने देखा कि मैं ठीक हूँ। मैंने उन लोगों को धन्यवाद दिया।

🔵 उन लोगों ने कहा- कोई बात नहीं भाई साहब। हम लोग भी आपकी तरह रास्ता ढूँढ़ते इधर आए हैं। चलिए, आपको घर तक छोड़ देते हैं। मुझे लगा गुरुदेव ने इन लोगों को हमारे लिए ही भेजा है नहीं तो आजकल सहायता माँगने पर लोग अनसुना करके चले जाते हैं, ये लोग बिना कहे- सुने इस वीरान सुनसान स्थान पर मेरी रक्षा करने आ पहुँचे।

🔴 मैंने कहा ‘मैं खुद ही चला जाऊँगा’ तब उन लोगों ने कहा ‘पहले गाड़ी स्टार्ट करके तो देखिए’। मुझे भी लगा शायद ये लोग सही कह रहे हैं। मैंने गाड़ी स्टार्ट किया तो गाड़ी स्टार्ट हो गई। उन लोगों ने फिर कहा कि भाई साहब आपको चोट लगी होगी, जीप में चलिए। मैंने धन्यवाद करते हुए स्वयं चले जाने की बात कही। उसके बावजूद उन लोगों ने कहा- अच्छा आप बाइक से चलिए हम आपके पीछे चलते हैं।

🔵 इस प्रकार उन लोगों ने मुझे समीप के एक गाँव बहादुर- डीह तक पहुँचाया। जब उन्होंने देख लिया मैं ठीक तरीके से जा रहा हूँ, वे अपनी दिशा में वापस लौट गए। मैं गुरुसत्ता की असीम कृपा से अन्दर ही अन्दर प्रफुल्लित हो रहा था कि अनजान व्यक्तियों ने परिवार से अधिक आत्मीयता दिखाई एवं खाई से निकालकर एक गाँव तक सकुशल पहुँचाया। आज के समय में यह शायद संभव नहीं। मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि गुरुदेव ने दूत भेजकर मेरे जीवन को संकट से मुक्त कराया। अगर गुरुदेव की कृपा नहीं होती तो मेरी जीवन रक्षा न हो पाती। यह सोचकर आज भी मैं रोमांचित हो उठता हूँ।

🌹 सिद्धेश्वर प्रसाद राँची (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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शनिवार, 13 मई 2017

👉 चौथे ऑपरेशन में सूक्ष्म सत्ता का संरक्षण

🔵 मैं गुजरात प्रान्त के बलसाड़ जिले के डुंगरी ग्राम में रहता हूँ। सन् १९६२ से १९६५ तक स्थानीय हाई स्कूल में नॉन टीचिंग स्टाफ के रूप में कार्यरत रहा। इसी दौरान मेरा संपर्क पास के गाँव के गायत्री परिजनों से हुआ। उनकी युग निर्माण योजना की बातें मेरे मन- मस्तिष्क को प्रभावित कर गईं।

🔴 मैं मिशन के काम में रुचि लेने लगा। कुछ ही दिनों बाद मुझे पूज्य गुरुदेव से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनसे मुलाकात क्या हुई कि मैं उन्हीं का होकर रह गया। तब से लेकर आज तक मुझे गुरुवर के अनेक अनुदान- वरदान मिले हैं।

🔵 यह संस्मरण मेरे जीवन के ७१वें वर्ष का है। सन् २००६ में मैं हर समय सिर दर्द से परेशान रहा करता था। यह परेशानी जब बहुत अधिक बढ़ गई, तो मैं डॉक्टर से मिला।

🔴 डॉक्टर ने कई तरह की मशीनों से मेरे सिर की जाँच की। जाँच के बाद वह इस नतीजे पर पहुँचे कि हृदय की कुछ नाड़ियों के ब्लाक हो जाने के कारण ही हमेशा सिर दर्द बना रहता है। उन्होंने कहा कि बाईपास सर्जरी से ही इस रोग का निदान हो सकता है।

🔵 बाईपास सर्जरी की तैयारियाँ शुरू हुईं और २ अगस्त २००६ को नाडियाद, महागुजरात हास्पिटल में ऑपरेशन हुआ। पहले पसलियों को बीचो- बीच काटकर दो हिस्से में बॉँट दिया गया, फिर दिल को पसलियों से बाहर निकालकर उसका ऑपरेशन किया गया।

🔴 ऑपरेशन के बाद कटी हुई पसलियों को तार से जोड़कर पहले जैसा बनाया गया- इसे डॉक्टरों की भाषा में ‘कॉटन बाडी’ बोलते हैं। लेकिन मेरे शरीर ने इस कॉटन बाडी को स्वीकार नहीं किया। फलतः शरीर के अन्दर से रिस- रिसकर मवाद बाहर आने लगा।

🔵 डॉक्टर को दिखाने पर उन्होंने कहा कि कॉटन बाडी के कारण प्रायः ऐसा होता है। चिन्ता की कोई बात नहीं है। कुछ दिनों में अपने- आप ठीक हो जाएगा।

🔴 लेकिन छः महीने बीत जाने के बाद भी मवाद निकलना बन्द नहीं हुआ, तो डॉक्टर ने कहा कि पसली की हड्डियों को तार से बाँधने के कारण इन्फेक्शन हो गया है। अब दुबारा ऑपरेशन करके तार बाहर निकालना पड़ेगा।

🔵 २ अप्रैल २००७ को दूसरी बार ऑपरेशन हुआ। फिर से छाती खोलकर तार निकाला गया। लेकिन इतने दिनों में इन्फेक्शन हड्डियों को प्रभावित कर चुका था, इसलिए मवाद का निकलना बंद नहीं हुआ। थक हार कर अहमदाबाद के बड़े अस्पताल में पहुँचा। वहाँ के डॉक्टरों ने २० जून को तीसरा ऑपरेशन किया। वह भी असफल रहा।
      
🔴 सीनियर डॉक्टर ने मेरे बेटे को बताया कि मेरी मौत अब किसी भी क्षण हो सकती है, फिर भी अन्तिम प्रयास के रूप में एक और ऑपरेशन किया जाना चाहिए।
निराश होकर मैंने सीनियर डॉक्टर से कहा कि आप लोग अपना काम कीजिए, मैं अपना काम करूँगा। एक जूनियर डॉक्टर ने जिज्ञासावश पूछा कि आप क्या करेंगे। मैंने कहा- मैं गुरुदेव का स्मरण करूँगा और उन्होंने जो मंत्र दिया है, उसके जप की संख्या बढ़ा दूँगा। अब मैं अध्यात्म की ताकत को आजमाऊँगा।
      
🔵 ......और मैंने वैसा ही किया। सुबह से शाम तक गायत्री मंत्र का जप और रात में सोते समय गुरुदेव का ध्यान। इसी प्रकार तीन सप्ताह और बीत गए। चौथे सप्ताह में चौथे ऑपरेशन की तारीख तय हुई- १८ जुलाई। सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। मुझे ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया।
      
🔴 ऑपरेशन शुरू होने से पहले मैंने डॉक्टरों से अनुरोध किया कि वे मुझे पाँच मिनट प्रार्थना करने दें। मैंने गुरुदेव का फोटो अपने साथ रखा था। फोटो सामने रखकर उन्हें प्रणाम किया और आँखें बन्द कर मन ही मन उनसे प्रार्थना करने लगा- परम पूज्य गुरुदेव! ये डॉक्टर पता नहीं क्या- कैसे करेंगे। आप सूक्ष्म रूप से आकर इनका मार्गदर्शन कीजिए, जिससे ये सही तरीके से ऑपरेशन कर सकें और इनके सत्प्रयास से मेरी जीवन- रक्षा हो सके फिर मैं जल्दी से स्वस्थ होकर वापस घर पहुँच सकूँ।
      
🔵 तीन- चार दिन पहले श्रद्धेय डॉक्टर साहब (डॉ. प्रणव पण्ड्या)और आदरणीया जीजी (शैलबाला पण्ड्या) को चार पेज का पत्र लिखा था। उनका जवाब आया- ‘‘आपके उत्तम स्वास्थ्य के लिए हम सब प्रार्थना कर रहे हैं। आप चिन्ता मत करिए। पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद से सब कुछ ठीक हो जाएगा।’’
      
🔴 ऑपरेशन ५ घंटे तक चला। चौथी बार हर्ट का ऑपरेशन हो रहा था, इसलिए डॉक्टर्स ने प्लास्टिक सर्जरी की भी पूरी तैयारी कर रखी थी। टीम में प्लास्टिक सर्जरी के दो विशेषज्ञ डॉक्टर भी तैयार खड़े थे। लेकिन गुरुदेव की कृपा से प्लास्टिक सर्जरी करने की नौबत ही नहीं आई।
      
🔵 अगली सुबह जब बड़े डॉक्टर्स मुझे देखने आए, तो उन्होंने कहा- आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ। सच तो यह है कि केस हिस्ट्री और आपकी हालत देखकर मैं अन्दर से घबराया हुआ था, लेकिन लगता है कि ऑपरेशन से पूर्व आपके द्वारा की गई प्रार्थना आपके इष्टदेव ने सुन ली। ऑपरेशन के दौरान मुझे लगा कि कोई बाहरी शक्ति कदम- कदम पर मेरा मार्ग- दर्शन कर रही है, हिम्मत बढ़ा रही है।
      
🔴 इतने बड़े ऑपरेशन के बाद इतनी तेजी से रिकवरी हुई कि १५ दिनों के बाद ही मुझे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और मैं पूरी तरह से स्वस्थ होकर खुशी- खुशी घर लौट आया। तब से लेकर आज तक गुरुकृपा से मेरा स्वास्थ्य पास- पड़ोस के लोगों के लिए एक उदाहरण बना हुआ है।

🌹  दौलत भाई जीवन जी देसाई, बलसाड़ (गुजरात)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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गुरुवार, 11 मई 2017

👉 ऐसा तो भगवान से ही संभव है!

🔵 मंत्र दीक्षा मैंने सन् १९७२ में ही ले ली थी। अपने पैतृक गाँव खीर भोजना, वारसलीगंज, नवादा (बिहार) में ही वह संस्कार सम्पन्न हुआ था। १९७६ में बोकारो में गायत्री यज्ञ हुआ। आदरणीय रमेश चन्द्र शुक्ल जी वहाँ केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में थे। उनसे पत्र लेकर पू. गुरुदेव के दर्शन हेतु शान्तिकुञ्ज आया। अप्रैल का महीना था। लेकिन वसन्त पूरे वातावरण में अभी तक व्याप्त था। ब्रह्ममुहूर्त में गुलाबी जाड़े की सुखद अनुभूति होती थी। यहाँ पाँच दिनों तक के शिविर में ही मेरे विचार और चिन्तन में आमूलचूल परिवर्तन होता चला गया।

🔴 दर्शन शास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते अध्यात्म की थोड़ी बहुत जानकारी तो थी, पर कर्मकाण्डी पंडितों की तिकड़मों के कारण उस पर आस्था नहीं जम पाती। यहाँ आकर अध्यात्म को लेकर अविश्वास का वह भाव बिल्कुल खत्म हो गया। एक दृढ़ आस्था मन में पनपने लगी, कोई सत्ता अवश्य है जिसके अनुसार सब कुछ अपने समय से चलता रहता है।

🔵 मिशन के विषय में मैं अधिक से अधिक जानना चाहता था। सेवा कार्य में सहयोग देने की भी इच्छा होती। मैंने आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय भाई साहब से परामर्श किया और उनके बताए अनुसार अगले वर्ष मई, १९७७ में शान्तिकुञ्ज आकर एक मासीय सत्र किया। उसी समय संकल्प लिया कि वर्ष में छुट्टी के दो माह मैं यहाँ के कार्य में लगाऊँगा। स्थानीय समय दान के अलावा केन्द्र में समयदान १९७८ से देने लगा।

🔴 पहले छुट्टियों में घर जाता था। खेती- बाड़ी के काम में पिताजी की मदद करता था। वह सिलसिला बंद हो गया, तो पिताजी नाराज हुए। घर भेजी जाने वाली मासिक राशि में भी कटौती होती गई। अपने गाँव या आस- पास के गाँव के कोई परिचित मिल जाते, तो कहते- पिताजी तुमसे बहुत नाराज रहते हैं। कहते हैं, पता नहीं किस साधु महात्मा के चक्कर में पड़ गया है। न घर आता है, न ही पैसा दे पाता है। उसका नाम मत लीजिये। यह सब सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगता।

🔵 मैं असमंजस में था। पिताजी को मैं इस तरह से नाराज नहीं करना चाहता था। सेवा कार्य के संदर्भ में मैंने पिताजी को विश्वास में लेने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे रत्ती भर भी नहीं पिघले। अन्त में थक हार कर मैंने मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना की। मुझे पूर्ण विश्वास था कि इसका वे ही कुछ समाधान निकालेंगे। १९७९ में पिताजी बद्रीनाथ जाने के लिए राजी हुए। पहले शान्तिकुञ्ज आकर सामान रखने की व्यवस्था बनाई गई। फिर पिताजी को साथ लेकर पूज्य गुरुदेव से मिलने गया। गुरुदेव बोले- बेटा, इन्हें बद्रीनाथ घुमा लाओ। पूज्य गुरुदेव की बातें सुनकर पिताजी को आश्चर्य हुआ। नीचे आकर वे हमसे पूछने लगे- इन्हें कैसे मालूम हुआ कि हम बद्रीनाथ जा रहे हैं? मैंने कहा- मुझे क्या मालूम? मैं तो आपके साथ ही हूँ।

🔴 बद्रीनाथ से लौटकर शान्तिकुञ्ज में दो- एक दिन रुकने के लिए पिताजी से पूछा, तो वे राजी हो गए। शान्तिकुञ्ज के स्नेहिल वातावरण ने उनका मन मोह लिया था। बोले मुझे यहाँ बहुत अच्छा लग रहा है। जब तक चाहो, रुको। इसी बीच एक दिन अपने कमरे में ही आश्चर्य से उत्तेजना पूर्ण स्वर में कहने लगे- अरे? गुरुजी तुम लोगों को बुड़बक (मूर्ख) बना कर रखे हुए हैं। ये आदमी नहीं हैं। ये भगवान के सिवा कुछ हो ही नहीं सकते। साश्चर्य मैंने पूछा- क्या हुआ, ऐसा क्यों कह रहे हैं? उन्होंने कहा- आज एक लड़का, जिसको मरे हुए घंटे भर से ज्यादा हो गया था, उसे उन्होंने जिन्दा कर दिया।

🔵 घटना को पूरे विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा- मरे हुए उस लड़के को लेकर कुछ लोग गुरुजी के पास गए। गुरुजी पश्चिम वाले कमरे से निकल रहे थे। शोर सुनकर पूरब वाले कमरे में गए। आकर लोगों से पूछा- क्या बात है? लोगों ने बताया- एक बच्चा मर गया है। बच्चा जमीन पर लेटा था। बच्चे की माँ छाती पीटकर रो रही थी। गुरुजी बोले- कुछ नहीं हुआ है। इतना कहते हुए उन्होंने झटके से बच्चे का हाथ पकड़कर उठा दिया। बोले- जा, इसे माता जी के पास ले जाकर प्रसाद खिला दे। सभी आश्चर्यचकित थे। मरे हुए को जिन्दा कर देना ऐसा तो मात्र भगवान ही कर सकते हैं!

🔴 इस घटना के बाद पिताजी की दृष्टि बदल गई। इसके बाद वे हमेशा मेरे सेवा कार्य को सराहते रहे- मेरा नाम लेते ही भावुक होकर कहते- वह जो कर रहा है, करता रहे, मुझे उसके पैसे और समय की जरूरत नहीं है। वह भगवान का काम कर रहा है, वह स्वयं तो तरेगा ही, हमारे सारे खानदान को भी तार देगा।

🌹  रामनरेश प्रसाद बोकारो (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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👉 आत्म-ज्ञान को प्राप्त करो। (भाग 3)

🔵 चारों वेद एक स्वर से कहते हैं कि वास्तव में तू ही अविनाशी आत्मा अथवा अमर ब्रह्म है। शान्ति तथा चतुराई से अपने ऊपर के एक-एक आवरण को तथा मन को इन्द्रिय विषयों से हटा ले। एकान्त वास कर। इन्द्रिय विषयों को विष समझ। दूरदर्शिता एवं अनासक्ति द्वारा अपने मन को वश में कर। विवेक, वैराग्य, शत-सम्पत तथा मुमुक्षत्व को सर्वश्रेष्ठ श्रेणी तक बढ़ा। सर्वदा ध्यानस्थ रह। एक क्षण भी व्यर्थ न जाने दे।

🔴 आकाश सौम्य और सर्वव्यापक है, इसीलिए ब्रह्म की उपमा आकाश से दी जाती है। प्रारम्भ में तू सौम्य ब्रह्म पर विचार कर सकता है। पहले आकाश पर विचार कर और फिर धीरे-धीर ब्रह्म पर। इस प्रकार गूढ़ चिन्तन में लीन हो जा।

🔵 ‘ओऽम्’ ब्रह्म का चिह्न है। अर्थात् परमात्मा का चिह्न है। ओऽम् पर विचार कर। जब तू ओऽम् का चिन्तन करेगा, तब तुझे अवश्य ही ब्रह्म का ध्यान होगा क्योंकि ब्रह्म का चिह्न ओऽम् है।

🔴 यह जान ले कि मन में उठने वाले क्षणिक विचार तथा संकल्प धोखा देने वाले हैं। तू मन तथा विचारों का दर्शक है परन्तु तू अपने उन विचारों में मग्न मत हो। अपने को ब्रह्मज्ञान के बीच में स्थित कर। अपने को सर्वश्रेष्ठ और उच्च स्थिति में रख। अपने आप को संदेह रहित, दुःख-रहित, निर्भय एवं क्लेश-रहित, और भ्रम-रहित बना तथा निर्मल सुख में स्थित होना सीख। काल और मृत्यु तेरे निकट नहीं आ सकते। तेरे लिए कोई बन्धन या रुकावट नहीं है। तू यह अनुभव करेगा कि तू इस ब्रह्माण्ड की समस्त ज्योतियों से सर्वश्रेष्ठ ज्योति है। अपूर्व सुख की यह स्थिति अवर्णनीय है। इसे अनुभव कर और प्रसन्न रह।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 स्वामी शिवानन्द जी
🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1942 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/September/v1.3

बुधवार, 10 मई 2017

👉 बदल दी जीवन की दिशा

🔵  मैं एक नास्तिक प्रकृति का व्यक्ति था। मुझे धर्म में कोई आस्था नहीं थी। मैं शांतिकुंज एवं गुरुदेव के नाम को भी नहीं जानता था। मेरा जीवन बहुत ही विचित्र किस्म का था। मैं शराब छोड़कर सभी चीजों का सेवन करता था। मांसाहार भी करता था। एक दिन अचानक एक व्यक्ति से मुलाकात हुई, जो गाड़ियों के ट्राँसपोर्ट का व्यवसाय करता था। उनका नाम वीरेन्द्र सिंह था। वह चेन स्मोकर था। एक दिन मैं उसके पास बैठा था। स्मोंकिंग की वजह से उनके मुँह में छाले पड़ गए थे। लेकिन मैंने देखा कि उनके दोनों नेत्रों के बीच से प्रकाश निकल रहा है। मैं देखकर आश्चर्य से भर गया। मैंने पूछा तुम्हारी आँखों से क्या निकल रहा है? तो उसने कहा कि मैं तुमको यहाँ नहीं, बाद में बताऊँगा। बाद में उसने बताया कि मेरे गुरुदेव है श्रीराम शर्मा आचार्य जी। मैं उनका शिष्य हूँ। उसकी बातों से मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। धीरे- धीरे मुझे वह गुरुदेव के बारे में बताने लगा। मुझे मिशन की जानकारी हो गई। वह मुझे प्रत्येक कार्यक्रम में बुलाता था। उस समय मेरे क्षेत्र में आचार्य जी के मिशन का कोई प्रचार नहीं था।

🔴 १९९२ की बात है। शान्तिकुञ्ज की टोली मेरे क्षेत्र में आई थी। वीरेन्द्र सिंह जी बहुत परेशान थे। उन्होंने मुझसे कहा- भाई साहब शान्तिकुञ्ज से लोग आए हैं, कार्यक्रम कराना है। आप सहयोग करें। मैं सहर्ष तैयार हो गया। मैंने जगह आदि की व्यवस्था कर दी। कार्यक्रम बहुत अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ। जिस दिन पूर्णाहुति थी, टोली में आए भाई बोले- डॉ० साहब कुछ दक्षिणा दीजिए। उनकी बातों को सुनकर मैंने सोचा कि ये लोग भी शायद ठगने खाने वाले हैं, पता नहीं क्या माँग रहें हैं।

🔵 मैंने कहा- मेरे पास कुछ नहीं है देने के लिए तो वे बोले- आपके पास बहुत कुछ है, कुछ तो दीजिए मैंने सोचा शायद उनको पता है कि मेरे पास रुपया पैसा है। तो मैंने कहा- बोलिए क्या चाहिए? तो वे बोले अपनी कोई बुराई दीजिए उनकी बातों से मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि अजीब लोग हैं, दक्षिणा में बुराई लेते हैं। उन्होंने कहा- आप माँस छोड़ दीजिए, मैंने कहा- यह मेरे बस का नहीं है। उन्होंने कहा कि आप इसकी चिन्ता मत कीजिए। आप केवल संकल्प लीजिए। आपकी बुराई अपने- आप छूट जाएगी। उनने जबर्दस्ती मुझे अक्षत पुष्प दे दिए।

🔴 उसके पश्चात् मैंने गायत्री माता को प्रणाम किया, किन्तु उनके बगल में गुरुजी- माताजी के चित्रों को देखकर मैं बहुत हँसा कि ये कैसे भगवान? ये मेरी क्या बुराई छुड़ाएँगें? मैंने केवल गायत्री माँ को प्रणाम किया। गुरुजी- माताजी को प्रणाम भी नहीं किया। सोचा साधारण वेष- भूषा में ये मेरे ही जैसे सामान्य व्यक्ति हैं। मुझे बिल्कुल श्रद्धा नहीं हुई। इस प्रकार कार्यक्रम समाप्त हुआ। १५ दिन बीत जाने के बाद माँसाहार की ओर से मेरा मन हटने लगा और धीरे- धीरे मेरे सारे दुव्यर्सन दूर हो गए।

🔵 १९९३ के लखनऊ अश्वमेध यज्ञ में मैंने माताजी से दीक्षा ली। तीन महीने का समयदान भी दिया। आज मेरा पूरा परिवार गुरुकार्य में संलग्न है। शताब्दी वर्ष ही मेरा रिटायरमेन्ट हो चुका है। जबकि मेरा पेन्शन, प्रोविडेन्ट फंड आदि का कार्य बाकी है। लेकिन मैं यहाँ चला आया हूँ, चूँकि मेरे लिए गुरुकार्य से बढ़कर कोई कार्य नहीं है। गुरुकृपा से मेरे जीवन के सारे दुर्गुण दूर हो गए। मैं एक अच्छा इन्सान बन सका।

🌹  डॉ० के० के० खरे प्रतापगढ़ (उत्तरप्रदेश)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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सोमवार, 8 मई 2017

👉 गुरुदेव भी रो पड़े

🔵 मध्य प्रदेश में यज्ञ चल रहा था। गुरुदेव के साथ मैं भी वहाँ गया हुआ था। एक दिन एक हॉल में तीन- चार सौ बहिनें उनके साथ बैठी थीं। बातचीत के साथ- साथ हँसी के फव्वारे छूट रहे थे। गुरुदेव बात- बात में हँसाते जाते थे। सभी बहिनें उनकी बातों पर हँस रही थीं। एक बहिन उन सबमें गुमसुम बैठी थी। उसे हँसी नहीं आ रही थी। उसे दुखी देख गुरुदेव ने पास बुलाया और पूछा- बेटी तुझे क्या दुःख है?

🔴 वहाँ बैठी सभी बहिनें सज- धज कर आई थीं, अच्छे- अच्छे कपड़े- जेवर पहने हुए थीं और वह लड़की सिर्फ सफेद धोती पहनी थी। गुरुदेव की बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया, केवल सिर झुका लिया। गुरुदेव ने फिर दुलारते हुए पूछा- बेटी क्या कष्ट है तुझे, तू हँस भी नहीं रही है। उसे निरुत्तर देख गुरुदेव उसे अलग ले गए। मैं भी उनके साथ चला गया। मैं हमेशा उनकी हरेक बातचीत सुनने का प्रयास करता। उनसे काफी कुछ सीखने को मिलता था।

🔵 अलग ले जाकर उन्होंने उससे पूछा- बेटी बता तुझे क्या दु:ख है? तेरे सारे दु:ख दूर कर दूँगा। उसने लम्बी साँस ली। फिर बोली- गुरुदेव, मुझे कोई दु:ख नहीं है। उसकी आँखें आँसुओं से डबडबा आईं। गुरुदेव के बहुत दबाव डालने पर उसने बताया कि उसकी शादी बहुत बचपन में ही हो गई थी। उसके पति का स्वर्गवास हो चुका है। और अब वह स्वनिर्भर जीवन जी रही है। एक विद्यालय में शिक्षिका है और अपना सब काम स्वयं करती है।

🔴 विधवा होने का दु:ख तो वह झेल ही रही थी मगर समाज की बेरुखी से वह बुरी तरह टूट चुकी थी। वह कह रही थी ‘‘मैं 100 अखण्ड ज्योति मँगाती हूँ। उसे लेकर सुबह किसी के घर जाती हूँ तो सभी मुझसे नाराज होते हैं कि तू विधवा है। सुबह- सुबह आकर मुँह दिखला दिया, न जाने आज का दिन कैसा बीतेगा। सब गाली भी देते हैं, मैं चुप होकर सुन लेती हूँ और वापस चली आती हूँ। शाम को अखण्ड ज्योति बाँटने जाती हूँ, तब भी वे यही कहते हैं कि शाम को आकर मुँह दिखला दिया। कल से हमारे घर मत आया कर।’’ वह सिसकते हुए कह रही थी- जहाँ जाती, वहीं सब मुझसे नफरत करते हैं। पत्रिका बाँटने घरों में न जाऊँ तो उनके पैसे अपने वेतन से भरने पड़ते हैं। अपने खर्च में कटौती करनी पड़ती है। समाज की इस नफरत को लेकर जीने की इच्छा नहीं होती। कभी- कभी सोचती हूँ कि आत्महत्या कर लूँ, पर आप कहते हैं आत्महत्या पाप है। मगर मैं जीऊँ तो कैसे?

🔵 बोलते- बोलते वह फूट- फूट कर रोने लगी। उसके साथ- साथ गुरुदेव भी रोने लगे। मेरे भी आँसू नहीं रुक रहे थे। गुरुदेव ने उससे कहा- चल बेटी मेरे साथ चल। फिर हॉल में सबके बीच आकर वे कहने लगे ‘‘बेटी मैं अपनी बात नहीं कहता, वेद की बात कहता हूँ। तू तो पवित्र गंगा जैसा जीवन जीती है। श्रम करती है, लोक मंगल का कार्य करती है, ब्रह्मचर्य से रहती है। तू साक्षात् गंगा है। जो तेरे दर्शन करेगा- सीधे स्वर्ग को जाएगा और जो यह सब बैठी हैं शृंगार करती हैं, फैशन करती हैं, बच्चे पैदा करती हंै, देश के सामने अनेक प्रकार की समस्याएँ पैदा करती हैं- जो भी इनके दर्शन करेगा, सीधे नरक को जाएगा।’’

🔴 गुरुदेव को इतना क्रोधित होते मैंने कभी नहीं देखा था। वे कह रहे थे ‘‘जो दुखी है उसको और दु:ख देना पाप है। जो यह कहता है कि विधवा को देखने से पाप लगता है वह सबसे बड़ा पापी है। बेटी! तू तो शुद्ध और पवित्र है। उनकी इस बात पर वहाँ बैठी सभी बहिनों ने गर्दन नीची कर ली। थोड़ी देर बाद गुस्सा ठण्डा होने पर उन्होंने उनसे कहा- कहो बेटियों, आपको क्या कहना है? इस पर किसी ने कुछ नहीं कहा। सभी शान्त होकर बैठी रहीं। थोड़ी देर बाद जब उठकर जाने लगीं तो मैंने दरवाजे तक जाकर उनसे कहा- बहनों, गुरुदेव की बातों का बुरा नहीं मानना, वे गुस्से में हैं। लेकिन उनकी बातों पर विचार करना। वे लज्जित होकर बोलीं- भाई साहब, गुरुदेव की बातों का बुरा क्यों मानेंगे। उन्होंने तो सही बात कही है। विधवा तो शुद्ध पवित्र जीवन जीती है। आज उन्होंने हमारी आँखें खोल दीं। आज से हम जब भी किसी विधवा का दर्शन करेंगे, उसमें गंगा माता का दर्शन करेंगे और उसे कोई कष्ट हो, तो उसकी मदद करेंगे। हम दूसरों को भी बताएँगे कि विधवा का दर्शन करने से पाप नहीं होता।

🔵 वे कह रही थीं कि गुरुदेव ने हमारी आँखें खोल दीं। हम सौभाग्यशाली हैं कि ऐसे गुरु हमें मिले। ऐसे गुरु हों तो देश में फैला हुआ अज्ञान शीघ्र ही दूर हो जाए। वह दुखी बहिन भी वहीं खड़ी ये सब बातें सुन रही थी। उसके मुख पर सन्तोष के भाव थे। दु:ख के बादल छँट चुके थे। हल्की सी धूप झिलमिला रही थी।
  
🌹  पं. लीलापत शर्मा की यादोंके झरोख, मथुरा (उ.प्र.)
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रविवार, 7 मई 2017

👉 शरणागति से मिला आरोग्य

🔵 एक बार विचित्र तरीके से मेरे गले में कुछ समस्या उत्पन्न हुई। ऐसा लगता था मानो गले में काँटे जैसा कुछ चुभ रहा है। डॉक्टर को दिखाया। कुछ समझ में नहीं आया तो डॉक्टर ने गरम पानी से गरारा करने की सलाह दी। एहतीयात के तौर पर कुछ दवा भी दी। इन सब से कोई लाभ न होते देख मैंने बड़े डॉक्टर से दिखाने की सोची। एक डॉक्टर का पता चला कि वे पूरे एशिया में छठे स्थान पर माने जाते हैं।

🔴 उनके पास गया। उन्होंने पूरी गम्भीरता के साथ मेरी तकलीफें सुनीं। खून, थूक- खखार की जाँच करवाई। मशीन से गले की जाँच की। इतनी जाँच- पड़ताल के बाद उन्होंने बताया कोई बीमारी नहीं है। संदेह की कोई गुँजाइश नहीं रह गई थी। लेकिन मेरी तकलीफ का क्या करूँ ,, जो सोते- जागते हर क्षण याद दिला रही थी कि कुछ तो अवश्य ही है। धीरे- धीरे तकलीफ इतनी बढ़ गई कि खाना खाने और पानी पीने में भी तकलीफ होने लगी। आखिरकार हार कर दूसरे डॉक्टरों के पास गई। जिनके पास भी जाती, जाँच के बाद सब यही बताते कि कोई बीमारी नहीं है। टी.एम.एच, डॉ.भटनागर, फिर परसूडीह के चिकित्सक अनिल कुमार ठाकुर सबने देखा- जाँचा, गले की चुभन दूर करने के लिए सभी ने कोई- न कोई नुस्खे दिए, पर मुश्किल दूर न हो सकी।

🔵 कहड़गोड़ा में दिखाया। वहाँ बताया गया, कटक में एक बहुत बड़े डॉक्टर हैं डॉ. सनातन रथ- वहाँ दिखाइए। उनके क्लीनिक और डायग्रोस्टिक सेन्टर में गया। वहाँ डॉक्टर ने कुरेद- कुरेद कर काफी सवाल पूछे। इसी दौरान मुझे याद आया कि मुझे दोनों स्तनों में अक्सर दर्द रहता है, जिस पर पहले बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया, लेकिन डॉक्टर के पूछने पर मैंने बताया। उन्होंने संभावना जताई कि संभव है इसी के प्रभाव से गले की समस्या आ रही हो। उन्होंने कहा- कैन्सर की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। कई तरह की जाँच करवाई गई, लेकिन रोग का निदान नहीं हो सका। इस बीच मेरी हालत और खराब होती गई। कमजोरी के कारण गले की चुभन इतनी अधिक बढ़ गई कि खाना पीना भी बन्द होने की नौबत आ गई।

🔴 जीवन का अन्त बहुत नजदीक दिखाई देने लगा। इन्हीं दिनों आध्यात्मिकता की ओर मेरा कुछ रुझान होने लगा। पड़ोस में एक भाई गायत्री परिवार के थे। कभी- कभार उनसे कुछ पुस्तकें मिल जाया करती थीं। पढ़कर आकर्षण अनुभव करती थी। अचानक तबीयत के बिगड़ जाने से ऐसा आभास होने लगा कि जिन्दगी के इतने दिन काट लिए, लेकिन परलोक के बारे में कुछ सोचा ही नहीं। कहते हैं, दीक्षा से सद्गुरु का मार्गदर्शन मिलता है, जिससे मृत्यु के बाद सद्गति मिलती है, आत्मा को भटकना नहीं पड़ता। कुछ इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर मैंने गुरुदीक्षा ले ली। पड़ोस के वे सज्जन गुरु भाई के नाते कभी- कभार हाल- चाल पूछ लिया करते थे। एक दिन शक्तिपीठ से लौटते समय मेरे पति से भेंट हुई तो उन्होंने साधारण तौर पर कुशल समाचार पूछे। पति ने मेरी हालत बताई तो उन्होंने कहा- ऐसी समस्याओं में एलोपैथी की तुलना में आयुर्वेदिक दवाएँ अधिक कारगर होती हैं। उन्होंने मुसालनी में डॉ.एम.एन.पाण्डेय (आयुर्वेदिक चिकित्सक) के यहाँ दिखाने की सलाह दी। वैसे भी इसके अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं था। इतने दिनों से इस अजीब रोग के इलाज के पीछे इतने पैसे बहा चुके थे कि अब अधिक सामर्थ्य भी नहीं रह गई थी। कैन्सर की सम्भावना जानने के बाद से ही मैं सोच रही थी कि वैलूर में चेकअप करवा लूँ। वहाँ की काफी प्रसिद्धि सुन रखी थी। लेकिन पैसे के अभाव में वैसा सम्भव नहीं था। डॉ. पाण्डेय से ही दिखाना तय हुआ।

🔵 डॉ. पाण्डेय ने केस हिस्ट्री पढ़कर और यह सुनकर कि मैं पैसे के अभाव में वैलूर न जा सकी, वहाँ जाने के लिए खर्च स्वयं देने की पेशकश की और तात्कालिक तौर पर कुछ दवाएँ दीं। बोले जब तक अच्छी तरह चेकअप नहीं हो जाता तब तक इन्हें लेते रहिए। उन्होंने दवा की कीमत भी नहीं ली। अभी इलाज शुरू ही हुआ था कि अचानक एक दिन घर में आग लग गई। इलाज भी बन्द हो गया। अब डॉक्टर के यहाँ जाती भी कैसे! एक बार दवा मुफ्त में दे दी तो दुबारा कैसे माँगी जाय- इस पशोपेश में कई दिन गुजर गए। वैलूर जाने की बात भी अधर में रह गई। दीक्षा के बाद से मैं नियमित साधना करने लगी थी। एक दिन साधना के बाद यों ही अनमनी- सी बैठकर मैं अपनी समस्याओं के बारे में सोच रही थी। अचानक ध्यान आया कि आजकल पहले जैसा दर्द और गले की चुभन अनुभव नहीं हो रही। पता नहीं वह बीमारी अपने आप कैसे छूट गई और आज तक में ठीक हूँ। ऐसा मात्र गुरुकृपा से सम्भव हुआ है।
  
🌹  विभा देवी परसूडीह, टाटानगर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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शनिवार, 6 मई 2017

👉 अनजानी बीमारी से बचाई गयी बालिका

🔵 मेरी बेटी वंदना को अचानक बेहोशी का दौरा पड़ने लगा। इस बीमारी की शुरुआत तब हुई, जब वह ननिहाल में थी। वहीं पर इलाज शुरू हुआ। एक एक कर कई डॉक्टरों की दवाएँ चलीं, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ।

🔴 दो- तीन महीने बीतते- बीतते बीमारी बहुत बढ़ गई। अब बेहोशी के बाद पैरों में असहनीय दर्द की शिकायत भी रहने लगी और धीरे- धीरे चलना- फिरना भी कठिन हो गया। ऐसी हालत में वंदना को औरंगाबाद लाकर डॉ. गुंजन सिन्हा को दिखाया गया, लेकिन उनका इलाज भी कोई काम नहीं आया।

🔵 उन्हीं दिनों घर पर आए एक रिश्तेदार ने राँची के प्रसिद्ध डॉक्टर के.के. सिंह को दिखाने की सलाह दी। इन्हें एशिया के अन्य देशों से भी कन्सल्टेन्ट के रूप में बुलाया जाता है। डॉ. सिंह ने भी कई तरह की जाँच करवाई, लेकिन किसी भी जाँच की रिपोर्ट से बीमारी पकड़ में नहीं आई।

🔴 बेहोशी के दौरे अब और भी जल्दी- जल्दी आने लगे। इस लम्बी चिकित्सा प्रक्रिया से थककर मेरी बच्ची जीवन के प्रति कुछ निराश- सी हो चली थी। दिन भर गुम- सुम सी बैठी रहती थी। अकेले में ‘गायत्री माता- गायत्री माता’ बुदबुदाया करती थी। एक ही रट लगाए रहती- मुझे गायत्री मन्दिर ले चलो।

🔵 गायत्री मन्दिर के पास हमारी थोड़ी- सी जमीन थी। उसमें घर बनाने की तैयारी चल रही थी। हमने उसे दिलासा दे रखी थी कि भूमि पूजन के दिन गायत्री मन्दिर ले चलेंगे। निर्धारित तिथि को हम सब भूमि पूजन के लिए घर से चले। वंदना भी हमारे साथ थी। गायत्री मन्दिर जाने के नाम पर वह बहुत खुश थी। साइट पर पहुँचते ही उसने कहा- अब चलो गायत्री मंदिर। हमने कहा- पूजा हो जाने दो, हम सब साथ- साथ चलेंगे। लेकिन वह जिद करने लगी कि अभी चलो। भूमि पूजन में व्यवधान होते देखकर मैंने उसे जोर से डाँट दिया। वह रो- रोकर बेहोश हो गई।

🔴 हम सभी घबरा उठे। भूमिपूजन को बीच में ही रोककर उसे गायत्री मंदिर ले जाकर माँ गायत्री की मूर्ति के आगे लिटा दिया गया। कुछ मिनटों बाद ही उसे होश आ गया। वह आँखें मलते हुए उठ बैठी। स्वयं को मन्दिर में पाकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह एक ही झटके में गायत्री माता की मूर्ति के पास पहुँची और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी। थोड़ी देर बाद हम लोग भूमि पूजन के लिए वापस चल पड़े। वंदना तो उछलती- कूदती इस प्रकार आगे भागी जा रही थी मानो उसे पंख लग गए हों।

🔵 उसी दिन से उसका दौरा पड़ना हमेशा के लिए बन्द हो गया। माँ गायत्री की असीम अनुकम्पा से आज वह पूरी तरह से स्वस्थ है।
  
🌹 आशा देवी औरंगाबाद (बिहार)
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शुक्रवार, 5 मई 2017

👉 जीवन दान मिला

🔵  दिनांक 2 दिसम्बर 2000 को मैं बीमार पड़ा। टाटा मेन अस्पताल में मुझे उपचार हेतु भर्ती किया गया। लगभग बारह दिनों तक इलाज चला किन्तु हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ता चली गई। मेरे पुत्र सुनील कुमार ने टाटा मेन अस्पताल के डॉक्टरों से लड़- झगड़ कर मेरी छुट्टी करा ली। 14 दिसम्बर को टाटा के एक प्रसिद्ध डॉक्टर ए.के.दत्ता को दिखाया। डॉक्टर दत्ता ने खून और पेशाब की जाँच कराने के बाद बताया कि मेरी जिन्दगी मात्र सात दिनों की है। मेरी किडनी बिल्कुल खराब हो गयी है। मुझे तुरन्त वैलूर ले जाना होगा। मेरा लड़का घबरा गया। वैलूर का रेलवे टिकट बनवाया परन्तु बर्थ नहीं मिली। वह घबरा कर गायत्री शक्तिपीठ टाटानगर गया। वहाँ श्री कमल देव भगत को सारी बातें बताई। कमलदेव भगत जी के अथक प्रयास से किसी तरह दो बर्थ मिलीं।

🔴 गायत्री परिवार के अनेक परिजनों को मेरी बीमारी की जानकारी श्री भगत जी द्वारा मिल गई थी। अगले दिन वैलूर जाने की गाड़ी शाम को 2:40 मिनट में थी। लगभग ग्यारह बजे दिन में कमलदेव भगत जी, परिव्राजक श्री मुन्ना पाण्डे के साथ मेरे निवास स्थान पर आए और मेरे सामने एक प्रस्ताव रखा कि शायद मेरे जीवन का यह अंतिम समय है; अतः मैं अपने- आपको पूज्य गुरुदेव को दान दे दूँ। पहले तो मैं समझा नहीं। फिर कमलदेव बाबू ने बताया कि अगर गुरुदेव आप से युग निर्माण का काम लेना चाहें तो वे आप को जीवनदान दे सकते हैं। चूँकि जीवन का वह समय गुरुदेव का अनुदान होगा, इसलिए वह समय आप सिर्फ युग निर्माण के कार्य में लगाएँगे। मैं उनकी बात से सहमत हो गया। तब परिव्राजक मुन्ना पांडे जी ने मुझे जीवन अर्पण का संकल्प कराया। मेरी हालत काफी बिगड़ चुकी थी। पेट में हमेशा भयंकर दर्द रहता था और उल्टी होती थी। एक महीने में मैंने अन्न का एक दाना नहीं खाया था। अपने से करवट बदलने की भी शक्ति शरीर में नहीं थी।

🔵 निश्चित समय पर हम लोग रेलवे स्टेशन पहुँचे। स्टेशन पर गायत्री परिवार के सैकड़ों परिजन मुझे विदाई देने आए थे। स्टेशन पहुँचने तक मेरे पेट का दर्द आधा हो गया। मुख्य ट्रस्टी श्री दौलत राम चाचरा और ट्रस्टी श्री इन्दु भूषण झा जी मुझे सहारा देकर रेलगाड़ी के डिब्बे तक ले आए। पता नहीं मुझमें कहाँ से शक्ति आ गई कि मैं पैदल चल सका। श्री चाचरा साहब बार- बार मुझे हिम्मत देते रहे और कहते रहे कि आप पूज्य गुरुदेव पर विश्वास रखें और हिम्मत नहीं हारें। आप अवश्य ही गुरुदेव के आशीर्वाद से स्वस्थ होकर लौटेंगे तथा पुनः शक्तिपीठ में समय देंगे। ट्रेन में बैठते ही उल्टी बन्द हो गए।

🔴 18 तारीख को सायं पाँच बजे मुझे वैलूर अस्पताल के नेफरो वार्ड में भर्ती करा दिया गया। मेरी हालत देखकर वैलूर के डॉक्टर भी गंभीर हो गए। लगातार सात दिनों तक तरह- तरह की जाँच होती रही। इस बीच मुझे कोई दवा नहीं दी गए। सिर्फ भोजन की कमी को दूर करने के लिए एक सुई दी गई। नौवें दिन २६ तारीख को मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई और मैं लाज में आ गया। लगभग पाँच दिनों के बाद डॉक्टर से मिलने और अंतिम रिपोर्ट प्राप्त करने का समय निश्चित हुआ। मेरी पत्नी श्रीमती सरोजिनी देवी मेरे साथ रहती थी। वह नित्य ब्रह्ममुहूर्त में होटल की छत पर जाकर चौबीस माला गायत्री महामंत्र का जप करती थी।

🔵  जिस दिन रिपोर्ट मिलने वाली थी, उस दिन मेरी पत्नी जप उपासना कर मेरे पास आई तो बड़ी प्रसन्न दिखाई पड़ी। प्रसन्नता का कारण पूछा तो कहने लगी- आज उपासना के समय पूज्य गुरुदेव और वंदनीया माता जी आए थे, उन्होंने ध्यान में दर्शन दिए। अचानक मेरे मुँह से निकल गया कि आज अंतिम रिपोर्ट मिलने वाली है। अतः ऋषियुग्म हम दोनों को आशीर्वाद देने आए थे। रिपोर्ट अवश्य ही अच्छी होगी। गुरुदेव का स्मरण कर हम दोनों की आँखें डबडबा गईं। दोपहर तीन बजे जब हम लोग डॉक्टर से मिलने गए तो मुझे देख कर डॉक्टर मुस्कुरा दिए। डॉक्टर के मुख से पहला वाक्य निकला मिस्टर भगत यु आर लक्की। आपकी किडनी बिलकुल ठीक है। आपको कोई बड़ी बीमारी नहीं है। सिर्फ पुराना इन्फेक्शन है। कुछ दिनों के इलाज से ठीक हो जाएगा। आज भी मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ। गायत्री शक्तिपीठ टाटानगर के साहित्य केन्द्र में नियमित समय देता हूँ।
  
🌹 कामिनी मोहन भगत जमशेदपुर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
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गुरुवार, 4 मई 2017

👉 एक भयानक घटना टली

🔵 दिसम्बर २००८ की बात है। उन दिनों मैं नए वर्ष के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ एवं ‘युग निर्माण योजना’ के सदस्य बनाने में व्यस्त थी। उसी समय मेरे साथ एक भयानक किन्तु आश्चर्यजनक घटना घटी। मैं नया सिलेण्डर भरवाकर बाजार से लाई थी, शायद वह कहीं से लीकेज था। पास में रखे लैम्प से उसमें आग लग गई। मैंने बुझाने का बहुत प्रयास किया परन्तु लपटें बढ़ती ही गईं। किसी तरह रसोई से घसीट कर सिलेण्डर को मैं बरामदे तक ले आयी। आगे खुले स्थान पर ले जाना संभव न था, क्योंकि लपटें अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थीं। मैंने अपनी माँ को घर से बाहर ले जाकर बैठा दिया।

🔴 बाहर निकलकर पड़ोसियों से सहायता के लिए चिल्लाई। सारे पड़ोसी एकत्र होकर अपनी- अपनी राय देने लगे और अपनी तरह से आग बुझाने का प्रयास करने लगे, पर किसी को कोई भी कामयाबी नहीं मिली। किसी ने फायर ब्रिगेड को सूचना भी दे दी, लेकिन स्टेशन पास न होने के कारण शीघ्र सहायता न मिल सकी। मेरे सामने विषम परिस्थिति थी। सामने साक्षात् तबाही का दृश्य था। देखने वालों की भीड़ लगी थी। सभी त्राहि- त्राहि कर रहे थे। परन्तु सहानुभूति के अलावा किसी के पास कोई उपाय न था। मैं बहुत घबराई हुई थी। जाड़े की शाम जल्दी ही गहरा जाती है। सायं पाँच बजे का समय था, अँधेरा छाने लगा था। लपटें अपना उग्र रूप धारण करती जा रही थीं। सिलेण्डर पूरा भरा होने के कारण देर तक जलता रहा। मैंने भीड़ की ओर एक बार फिर देखा कि शायद कोई कुछ उपाय कर सके, परन्तु इस भौतिक संसार में इतनी सामर्थ्य कहाँ जो किसी का कष्ट हर ले।

🔵 कुछ ही पलों में एक भयानक दुर्घटना होने वाली थी, सभी विवश थे, उस भयानक स्थिति में सहसा मुझे गुरुदेव याद आये। मैं आर्त स्वर में रो पड़ी, गुरुदेव मेरी रक्षा करो, आप ही इस तबाही से मेरी रक्षा कर सकते हैं। गुरुदेव! यदि कुछ अनिष्ट हुआ तो मन टूट जाएगा, मैं इस समय आपका कार्य कर रही हूँ। उसमें व्यवधान आ जाएगा। इतना परिपक्व नहीं हूँ जो इतनी बड़ी घटना को सह सकूँ। गुरुदेव! क्षति मेरी नहीं आपकी होगी। लोग कहेंगे कि लोगों को गायत्री उपासना की सलाह देती हैं और कहती हैं गायत्री मंत्र सबका कल्याण करने वाला अनिष्ट निवारक मंत्र है। अपना ही अनिष्ट नहीं रोक पाई। इस घटना से बहुत लोगों की आस्था टूट जाएगी। लोग कहेंगे कि गायत्री उपासना में कोई शक्ति नहीं है। ज्यों- ज्यों लपटें बढ़ रही थीं मेरी प्रार्थना और आर्त होती जा रही थी। परन्तु गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास था कि अब कुछ नहीं होगा। जब गुरुदेव याद आ गए तो निश्चित है कि परोक्ष में वे साथ दे रहे हैं। मन में विश्वास जागा कि गुरुदेव आ गए, अब कोई अनिष्ट नहीं होगा।

🔴 बहनों ने कहा- सिलेण्डर से तेज आवाज होने लगी है, घर से बाहर निकल आओ, बस फटने ही वाला है। घर की छत उड़ जाएगी, दरवाजे दीवारें गिर जाएँगी। बड़ा भयानक विस्फोट होगा। सामान का नुकसान हो जाएगा कोई बात नहीं, जान तो बच जाएगी। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे यह आभास हो रहा था कि मेरी करुण पुकार सुनकर मेरे गुरुदेव आ गए हैं अब कुछ नहीं होगा। मैंने उनसे यही बात कही भी। भीड़ से कुछ लोग व्यंग्यात्मक हँसी हँसकर बोले- यह विज्ञान का सत्य है कि सिलेण्डर फटेगा तो दीवार दरवाजे टूट जाएँगे, भयानक हादसा होगा। विज्ञान के नियमों में कच्ची श्रद्धा न रखो, इसमें तुम्हारे गुरु क्या कर पायेंगे। मेरा मन शांत था जैसे सब कुछ सामान्य हो। सहसा मेरे मन में विचार आया- जैसे किसी ने आदेश दिया हो कि तुम गायत्री मंत्र का जप शुरू करो। मैंने तुरंत आँखें बंद करके जप शुरू कर दिया। मेरे इस क्रिया- कलाप को सभी देख रहे थे और यह कह रहे थे कि मानती नहीं है। अंधी श्रद्धा भक्ति इसको ले डूबेगी।

🔵 एक बुजुर्ग हितैषी बाहर ले जाने के लिए मेरा हाथ पकड़कर घसीटने लगे। मैंने कहा- मामा जी चिन्ता न करें मेरा मन शांत है। यहाँ पर अदृश्य में गुरुदेव उपस्थित हैं। अब मुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मैंने पुनः आँखें बंद कर गायत्री मंत्र का जप शुरू कर दिया। अभी ११ मंत्र ही हुए होंगे कि सिलेण्डर से साँय- साँय की तेज आवाज आने लगी। लोग चिल्लाने लगे कि अब सिलेण्डर फटने वाला है, ये बाहर निकल नहीं रही है। इसके बाद मैं भीड़ के कोलाहल से बेखबर, आँखें बंद किए, ध्यानावस्थित होकर मंत्र जप करती रही। एक भयानक धमाके के साथ सिलेण्डर फट गया। घर की दीवारें, छत व पृथ्वी हिल गई। साथ ही मैं भी डगमगा गई। मन मस्तिष्क को धमाके ने हिला दिया। सिलेण्डर फटने का दृश्य मैंने नहीं देखा, क्योंकि मैं आँखें बंद किए हुए थी। धमाके की आवाज सुनकर सभी रोने लगे। मेरी माँ का रोते- रोते बुरा हाल था, लोग समझ रहे थे कि मेरा अंत हो चुका है। धमाके से मेरी आँखें खुलीं तो देखा पूरा घर धूल से भर गया है। चारों तरफ धूल ही धूल थी। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने अपने शरीर को स्पर्श किया कि कहीं मुझे चोट वगैरह तो नहीं आई! अपने को सुरक्षित पा मैं जोर से चिल्लाई- परेशान मत होओ मुझे कुछ नहीं हुआ। जब मैं घर से बाहर निकली तो मुझे सुरक्षित देख मेरी माँ मुझसे लिपट गई। सबकी आँखों में आँसू आ गए।

🔴 मेरा मन गुरु के प्रति कृतज्ञ हो उठा। लगभग १ घंटे तक चर्चा चलती रही। धमाके की आवाज सुनकर दूर- दूर के लोग भी एकत्रित हो गए। एक घंटे बाद जब घर की धूल बैठ गई तो कुछ लोगों के साथ घर के अन्दर गई। देखा टमाटर, संतरे, अंगूर, कपड़े सभी धमाके से छत पर चिपक गए थे। अलमारी से बरतन नीचे गिर गए थे। इधर- उधर बिखर गए थे। सारे घर में धूल ही धूल थी, सभी कुछ आश्चर्यचकित कर देने वाला था। सबसे अधिक आश्चर्य तो लोगों को तब हुआ जब उन्होंने देखा कि बरामदे में रखा सिलेण्डर धरती में १ फुट नीचे धँस गया, और उसके ऊपर का हिस्सा टूटकर मात्र १ से २ फुट की दूरी पर बिखरे हुए थे, जैसे किसी ने उन्हें जान बूझकर समेट दिया हो। सिलेण्डर के पास रखी चारपाई, दरवाजे बॉक्स, सब सुरक्षित थे और कहीं भी कुछ नुकसान नहीं हुआ। छत दीवार सब सही सलामत थे, जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। रात्रि हो गई थी, घर को वैसी स्थिति में छोड़कर हम सब सो गए। दूसरे दिन जब सवेरा हुआ तो लोगों का जमावड़ा होने लगा। इस अद्भुत घटना को देखने के लिए जन समूह उमड़ पड़ा। लोगों ने कई सिलेण्डर फटते देखे, जिसमें छत दीवारें, दरवाजों के काफी नुकसान हुए, सिलेण्डर को जमीन में धँसते किसी ने नहीं देखा था। सभी लोग कह रहे थे कि यह अद्भुत लीला तो सर्वोच्च सत्ता की ही हो सकती है, जो असंभव को संभव कर दे। यह तो विज्ञान को अध्यात्म की जबरदस्त चुनौती है। गुरु पर श्रद्धा विश्वास का फल देखकर सभी परम पूज्य गुरुदेव और माँ गायत्री के चरणों में नतमस्तक हो गए। 
  
🌹 ममता सिंह रायबरेली (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/bha.1

बुधवार, 3 मई 2017

👉 प्रभु इच्छा सर्वोपरि

🔵 घटना १४ जुलाई १९८९ की है। विनोदानंदजी की शादी शांतिकुंज के यज्ञशाला प्रांगण में होना निश्चित हुई। श्रद्धेय आचार्यगण द्वारा विवाह संस्कार के वेदमंत्रों के छन्दबद्ध उच्चारण और उनकी सारगर्भित व्याख्याएँ श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर रही थीं। शांतिपाठ- विसर्जन के उपरांत वर- वधू को वंदनीया माताजी एवं परम पूज्य गुरुदेव के आशीर्वचनों के लिये उनके कक्ष में जाना था। तब पूज्य गुरुदेव के कक्ष में उनसे मिलने हेतु आवश्यक अनुमति लेनी पड़ती थी। परिजन दूर झरोखे से ही गुरुवर के दर्शन कर लिया करते थे। वर- वधू के आर्शीवचन हेतु गुरुवर के कक्ष में जाने की अनुमति तो मिली, लेकिन फोटो लेने की नहीं अनुमति मिली। अब हमारे मन में मचलती सी भावना थी कि शादी के इतने फोटो खींचे गए पर हमारे परम आराध्य के सान्निध्य के बिना तो वर- वधू के सारे फोटो अधूरे ही माने जाएँगे।

🔴 अब गुरुदेव के आशीर्वाद वाले पल के फोटो कैसे लिये जाएँ? यह प्रश्र हम सब के मन में बार- बार कौंधने लगा- बुद्धि उपाय ढूँढ़ने लगी। हृदय कचोटने लगा कि गुरुदेव के फोटो नहीं लेंगे तो सब चौपट। तुरंत मेरे पति (विजय कुमार शर्मा) के मन में एक उपाय सूझा कि अगर श्रद्धेय शिव प्रसाद मिश्रा जी के द्वारा फोटो लेने की अनुमति स्वीकार करवा ली जाय तो यह संभव हो सकता है। मैं और मेरे पतिदेव गुरुवर के फोटो लेने की अभिलाषा को पूर्ण करना चाहते थे। लेकिन मिश्रा जी ने स्पष्ट कहा कि गुरुदेव की अनुमति के बिना फोटो लेना संभव नहीं है। उन्होंने भी फोटो लेने से मना कर दिया।

🔵 निराश होकर हम सब वंदनीया माताजी के कमरे की ओर वर- वधू के साथ बढ़े। नीचे के कमरे में वंदनीया माताजी से आशीर्वाद लेकर ऊपर के कमरे में गुरुदेव के आशीष हेतु जाना था। मेरे पति भी कैमरा लेकर वर- वधू के साथ गुरुवर के पास पहुँच गए। गुरुदेव ने बड़े प्यार से भावभरे आशीष वचन कहे। तभी मेरे पति ने कैमरे से दो फोटो फटाफट खींच लिए। गुरुदेव एक भेदक दृष्टि डालकर मुस्कुराए भी। हम सब बड़े प्रसन्न थे कि गुरुदेव की यादगार हमारे साथ होगी। हम सब खुशी- खुशी घर लौटे।

🔴 अपने घर जमालपुर (मुंगेर) पहुँचकर जब मेरे पति ने कैमरे की रील साफ कराई तो वे स्तब्ध रह गए। मैं भी देखकर हैरान थी कि वंदनीया माताजी के फोटो तो कैमरे में स्पष्ट आए थे, पर गुरुदेव के लिये गए दोनों चित्र बिल्कुल सादे आए थे। तब मैं गुरुदेव की उस भेदक दृष्टि और मुस्कुराहट का अर्थ समझी। वस्तुतः जाग्रत चेतना के प्रज्ञा- पुरुष की इच्छा से भौतिक (कैमरा) भी नियंत्रित हुआ। उनकी आज्ञा की अवहेलना कर कैमरा भी फोटो नहीं ले पाया। सच ही कहा गया है- संसार में प्रभु की इच्छा ही सर्वोपरि है। परमात्मा की इच्छा ही विजयी होती है। तब ये भौतिक यंत्र और संसार उनकी इच्छा को कैसे टाल सकते हैं।  
  
🌹 आशा देवी शर्मा जमालपुर, मुंगेर (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/prabhu

मंगलवार, 2 मई 2017

👉 ऋषियुग्म से मिला अभयदान

🔵 मेरा जन्म स्थान झारखण्ड प्रांत के पूर्वी सिंहभूम जिले के ग्राम चाकुलिया में है। रोजी- रोटी के सिलसिले में मैं अपने बच्चों के साथ कटक (उड़ीसा) में बस गया। मुझे अपने चाचा श्री कैलाश चन्द्र जी, जो युग निर्माण मिशन के समर्पित कार्यकर्ता हैं, की प्रेरणा से पू.गुरुदेव से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

🔴 वर्ष २०११ के जनवरी- फरवरी के महीने में मेरे दाहिने पैर में अचानक असह्य वेदना शुरू हो गयी। इधर- उधर बहुत सारे चिकित्सकों से इलाज कराने के क्रम में चिकित्सकों द्वारा शल्य चिकित्सा की सलाह दी गयी, जिसका खर्च लगभग तीन लाख था। यह मेरे लिए दुष्कर ही नहीं, असंभव था। आशा की एकमात्र किरण पू.गुरुदेव ही थे।

🔵 मैं जहाँ काम करता था वहाँ के लोगों से बात की। उन्होंने सुझाव दिया कि ई.एस.आई. को लिखने पर आपकी समस्या का समाधान हो सकता है। ई.एस.आई. को पत्र लिखा गया और गुरुदेव की कृपा से मेरे ऑपरेशन के लिए आदित्य केयर हॉस्पिटल में व्यवस्था हो गयी। दिनांक १३ जुलाई को ऑपरेशन की तारीख रखी गयी। मुझे ऑपरेशन के नाम से ही डर लगता था। हमारे घर के सभी लोग बहुत घबड़ाये हुए थे। मैं भी ऑपरेशन के नाम से बहुत भयभीत था।

🔴 ऑपरेशन के एक दिन पहले घर के सभी परिजन बहुत परेशान थे। क्या होगा? कैसे होगा? मेरे चाचाजी ने रात्रि ८ बजे शांतिकुंज में आदरणीय विनय बाजपेयी जी भाई साहब से फोन पर मेरे ऑपरेशन की बात बताई और आध्यात्मिक उपचार हेतु प्रार्थना की। भाई साहब ने तुरन्त आश्वासन दिया कि जैसा आप चाहते है मैं व्यवस्था कर रहा हूँ। आप परेशान न हों, हम गुरुसत्ता से प्रार्थना करेंगे। उनके आश्वासन पर हम सभी को बहुत राहत मिली। लग रहा था, सचमुच गुरुदेव का ही संरक्षण मिल रहा है, अब कुछ अनिष्ट नहीं होगा। १३ जुलाई को मुझे एडमिट कर लिया गया। एडमिट होते ही डॉक्टर ने कहा कि पेशेन्ट के ग्रुप का २ बोतल खून चाहिए। मेरे जामाता एवं मेरे एक मित्र के खून का ग्रुप मुझसे मिलता था। दोनों लोगों को खून देने के लिए समय पर हॉस्पिटल पहुँचना था। लेकिन दुर्भाग्यवश मित्र महोदय समय पर नहीं पहुँचने के कारण उनके आने की राह देख रहे थे।

🔵 सभी चिन्तित थे और सभी मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना कर रहे थे। अचानक एक अपरिचित सज्जन हम सबके बीच आये और कहने लगे कि आप लोग परेशान न हों मैं खून दूँगा। मेरे खून का ग्रुप इनके खून से मैच करता है। इनके इतना कहते ही जिन मित्र महोदय का खून लेना था वे भी वहाँ पहुँच गये। सभी लोग उनके देर होने आदि के सम्बन्ध में बातचीत करने लगे। जब हम उस अपरिचित सज्जन को धन्यवाद देने के लिए पीछे मुड़े तो देखा, उनका कहीं कोई पता नहीं था। सभी ने पता करने की कोशिश की, मगर वे नहीं मिले। बाद में अनुभव हुआ कि हम जिस समर्थ सत्ता से जुड़े हैं वे हमारी कष्ट कठिनाइयाँ देख नहीं सकते, वे किसी न किसी रूप में सहायता कर ही देते हैं।

🔴 इस घटना से हम सभी के मन में गुरुदेव के प्रति श्रद्धा और विश्वास बढ़ गया कि अब हमें परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जिसके ऊपर महाकाल की छत्रछाया हो उसका काल क्या बिगाड़ेगा?

🔵 ऑपरेशन की सारी व्यवस्थाएँ हो चुकी थीं। मैं और मेरे परिवार के सभी लोग केवल गुरुदेव को मन ही मन स्मरण कर रहे थे। मेरा विश्वास इतना सघन हो गया था कि ऑपरेशन थियेटर में जाते समय मेरा भय समाप्त सा हो गया था। मेरा ऑपरेशन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। मुझे दो दिन तक गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया। उसके पश्चात् मुझे जनरल वार्ड वी.के.सी. बेड पर स्थान दिया गया। मुझे यहाँ कुछ असुविधा हो रही थी। मैं तीन- चार दिन जनरल वार्ड में रहा। इसके पश्चात् मैंने अपनी सुविधा हेतु अपना स्थानान्तरण बेड सं. ए में करवा लिया। लेकिन यहाँ पर मेरा सोचना गलत था। यहाँ स्थान सुविधा की दृष्टि से तो अच्छा था, किन्तु यहाँ पर आने के पश्चात् मेरे साथ अजीबोगरीब घटनाएँ होने लगीं, जो असामान्य थी।

🔴 मुझे चौबीसों घण्टे बेचैनी छाई रहती। नींद बिल्कुल नहीं आती थी। मैं एक मिनट के लिए भी सो नहीं पाता था। रात्रि तो मेरे लिए काल बन कर आती थी। मैं सुबह होने का इन्तजार करता। रात्रि के आते ही मेरी परेशानी बढ़ने लगती। लगता था, कमरे के सारे परदे अपने आप हिल रहे हों। लगता कोई मेरा गला दबा रहा हो। मैं बोलने का प्रयास करता तो मेरा कण्ठ अवरुद्ध हो जाता। मैंने अपनी धर्मपत्नी से यह बात कही तो उसने कहा ऐसा कुछ नहीं है। मेरी धर्मपत्नी ऑपरेशन के समय से ही मेरे साथ थीं और मेरी देखभाल करती थीं। मैं असहाय था और मेरी परेशानी का हल किसी के पास नहीं था। पत्नी ने दिलासा दिया ताकि मैं घबरा न जाऊँ।

🔵 घबराहट की ऐसी मनोदशा में मुझे भय और निराशा के विचारों ने बुरी तरह घेर लिया। अवसादजन्य भावना से वशीभूत होकर मेरे अंदर बुरी आत्मा के चंगुल में आ जाने और अपना अंत होने का आभास होने लगा। लेकिन इस क्षण मुझे गायत्री मंत्र का आश्रय और गुरुदेव की कृपा अनन्य रूप से एक मात्र सहायक और संबल प्रतीत हुआ। पूरी व्याकुलता के साथ मैं पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र जपने लगा। जप करते- करते लगभग चार बजे ब्राह्ममुहूर्त में क्षणिक निद्रा में मुझे गुरुदेव- माताजी के दिव्य दर्शन हुए। मैंने देखा उनके चरण कमलों में नतमस्तक हो चरण स्पर्श कर रहा हूँ एवं वे मुझे आशीर्वाद के साथ अभयदान दे रहे हैं। मुझे अनुभव हो रहा था कि अब मेरे सारे कष्ट दूर हो गए हैं।

🔴 चेतना आने पर मैंने अपनी धर्मपत्नी से इस बात को बताया कि मुझे ऐसा स्वप्न हुआ है। आज मुझे यहाँ से छुट्टी मिल जाएगी। जबकि सच तो यह था कि उस दिन छुट्टी मिलने का प्रश्र ही नहीं था। डॉक्टर ने पहले ही कह दिया था कि २९ जुलाई से पूर्व आपको रिलीज नहीं किया जा सकता।

🔵 लेकिन मुझे गुरु के ऊपर विश्वास था कि आज मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। २७ तारीख को जब डॉक्टर विजिट में आए तो मैंने उनसे रिलीज कर देने के लिए आग्रह किया। वे कुछ देर तक मौन रहे और बाद में अनुमति दे दी। मैं उसी दिन रात्रि ७ बजे रिलीज होकर अपने घर आ गया। मेरे गुरुदेव ने मुझे उस अतृप्त आत्मा से बचाकर नया जीवन दिया। अगर मैं वैसी विषम स्थिति में दो दिन और रह जाता तो मेरी मौत निश्चित थी।              
  
🌹 पवन कुमार शर्मा कटक (उड़ीसा)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/mila.1

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...