रविवार, 5 अगस्त 2018

👉 स्वर्ग का द्वार:-

🔷 सुबह का समय था। स्वर्ग के द्वार पर चार आदमी खड़े थे। स्वर्ग का द्वार बंद था। चारों इस इंतजार में थे कि स्वर्ग का द्वार खुले और वे स्वर्ग के भीतर प्रवेश कर सकें।
थोड़ी देर बाद द्वार का प्रहरी आया। उसने स्वर्ग का द्वार खोल दिया। द्वार खुलते ही सभी ने द्वार के भीतर जाना चाहा- लेकिन प्रहरी ने किसी को भीतर नहीं जाने दिया।

🔶 प्रहरी ने उन आदमियों से प्रश्र किया- ‘‘तुम लोग यहां क्यों खड़े हो?’’ उन चारों आदमियों में से तीन ने उत्तर दिया- ‘‘हमने बहुत दान-पुण्य किए हैं। हम स्वर्ग में रहने के लिए आए हैं।’’ चौथा आदमी मौन खड़ा था। प्रहरी ने उससे भी प्रश्न किया- ‘‘तुम यहां क्यों खड़े हो?’’

🔷 उस आदमी ने कहा- ‘‘मैं सिर्फ स्वर्ग को झांक कर एक बार देखना चाहता था। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं स्वर्ग में रहने के काबिल नहीं हूँ क्योंकि मैंने कोई दान-पुण्य नहीं किया।’’

🔶 प्रहरी ने चारों आदमियों की ओर ध्यान से देखा। फिर उसने पहले आदमी से प्रश्र किया- ‘‘तुम अपना परिचय दो और वह काम बताओ, जिससे तुम्हें स्वर्ग में स्थान मिलना चाहिए।’’

🔷 वह आदमी बोला- ‘‘मैं एक राजा हूँ। मैंने तमाम देशों को जीता। मैंने अपनी प्रजा की भलाई के लिए बहुत से मंदिर, मस्जिद, नहर, सड़क, बाग-बगीचे आदि का निर्माण करवाया तथा ब्राह्मणों को दान दिए।’’

🔶 प्रहरी ने प्रश्र किया- ‘‘दूसरे देशों पर अधिकार जमाने के लिए तुमने जो लड़ाइयां लड़ीं, उनमें तुम्हारा खून बहा कि तुम्हारे सैनिकों का? उन लड़ाइयों में तुम्हारे परिवार के लोग मरे कि दोनों ओर की प्रजा मरी?’’

🔷 ‘‘दोनों ओर की प्रजा मरी।’’ उत्तर मिला। ‘‘तुमने जो दान किए, प्रजा की भलाई के लिए सड़कें, कुएं, नहरें आदि बनवाई, वह तुमने अपनी मेहनत की कमाई से किया या जनता पर लगाए गए ‘कर’ से?’’

🔶 इस प्रश्न पर राजा चुप हो गया। उससे कोई उत्तर न देते बना। प्रहरी ने राजा से कहा- ‘‘लौट जाओ। यह स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए नहीं खुल सकता।’’ अब बारी आई दूसरे आदमी की। प्रहरी ने उससे भी अपने बारे में बताने को कहा।

🔷 दूसरे आदमी ने कहा- ‘‘मैं एक व्यापारी हूँ। मैंने व्यापार में अपार धन संग्रह किया। सारे तीर्थ घूमे। खूब दान किए।’’ ‘‘तुमने जो दान किए, जो धन तुमने तीर्थों में जाने में लगाया, वह पाप की कमाई थी। इसलिए स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।’’ प्रहरी ने व्यापारी से कहा।

🔶 अब प्रहरी ने तीसरे आदमी से अपने बारे में बताने को कहा- ‘‘तुम भी अपना परिचय दो और वह काम भी बताओ जिससे तुम स्वर्ग में स्थान प्राप्त कर सको।’’ तीसरे आदमी ने अपने बारे में बताते हुए कहा- ‘‘मैं एक धर्म गुरु हूँ। मैंने लोगों को अच्छे-अच्छे उपदेश दिए। मैंने हमेशा दूसरों को ज्ञान की बातें बताई एवं अच्छे मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया।’’

🔷 प्रहरी ने धर्मगुरु से कहा- ‘‘तुमने चंदे के पैसों से पूजा स्थलों का निर्माण करवाया। तुमने लोगों को ज्ञान और अच्छाई की बातें तो जरूर बताईं मगर तुम स्वयं उपदेशों के अनुरूप अपने आपको न बना सके। क्या तुमने स्वयं उन उपदेशों का पालन किया? स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।’’

🔶 अब चौथे आदमी की बारी आई। प्रहरी ने उससे भी उसका परिचय पूछा। उस आदमी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया- ‘‘मैं एक गरीब किसान हूँ। मैं जीवन भर अपने परिवार के भरण-पोषण हेतु स्वयं पैसों के अभाव में तरसता रहा। मैंने कोई दान-पुण्य नहीं किया। इसलिए मैं जानता हूँ कि स्वर्ग का द्वार मेरे लिए नहीं खुल सकता।’’

🔷 प्रहरी ने कहा- ‘‘नहीं तुम भूल रहे हो। एक बार एक भूखे आदमी को तुमने स्वयं भूखे रह कर अपना पूरा खाना खिला दिया था, पक्षियों को दाना डाला और प्यासे लोगों के लिए पानी का इंतजाम किया था।’’

🔶 ‘‘हां मुझे याद है- लेकिन वे काम तो कोई बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थे। मुझे बस थोड़ा सा स्वर्ग में झांक लेने दीजिए।’’ किसान ने विनती की। प्रहरी ने किसान से कहा- ‘‘नहीं तुम्हारे ये काम बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। आओ! स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए ही खुला है।’’

🔷 गुरुदेव ने हमेशा यही कहा कि अपनी मेहनत की कमाई से भलाई के कार्य करो, दूसरों का सुधार करने की अपेक्षा स्वयं का सुधार करो। हम सब गुरु के वचनों को अपने जीवन में उतारे।

👉 महाराज सगर की न्यायशीलता

🔷 सूर्य वंश में महा सगर बड़े प्रतापी और विख्यात नरेश हो गये है। संतान के लिए उन्होंने अनेक साधु सन्तों की सेवा की तो उनको संतान की प्राप्ति हुई। पर भाग्यवश उनका बड़ा पुत्र बड़े दुष्ट स्वभाव का निकला। वह बालकों को पकड़कर अकारण ही सरयू नदी में डुबा देता था। जब प्रजा ने इस बात की शिकायत राजा से की तो उन्होंने राजपुत्र को न्यायालय के समक्ष बुलाया। यद्यपि मंत्रियों ने उसे पागल बताकर क्षमा करने का आग्रह किया, पर राजा ने उसे दोषी पाकर अपने राज्य से निकाल दिये जाने का दण्ड दिया। साथ ही उन्होंने यह भी आज्ञा दे दी कि “जो कोई उसे ठहरा कर उसकी किसी प्रकार की सहायता करेगा वह भी दण्डनीय होगा।”

🔶 राजा की दूसरी रानी से और भी बहुत से पुत्र हुये थे पर वे कपिल मुनि से दुर्व्यवहार करने के कारण भस्म किये जा चुके थे। रानियों ने इस पुत्र को क्षमा करने के लिए बहुत कहा पर सगर न्याय पथ से विचलित न हुए उनने पुत्र को देश निकाला दे ही दिया। राजा सगर ने असमंजस के पुत्र अंशुमान् को बुलाकर अपने पराये का विचार न करते हुए उसे अच्छी तरह शिक्षा दी और राज्य सिंहासन का उत्तराधिकारी नियत किया। अन्याय मूलक काम चाहे अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा ही क्यों न किया जाय, उसे सहन करना अन्याय को प्रोत्साहन देना है।

📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 21)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔷 देवताओं ने सिद्धार्थ को राजकुमार न रहकर धर्म-चक्र-प्रवर्तन में संलग्न होने का परामर्श दिया था। सिद्ध पुरुष माने जाने वाले गोरखनाथ, मत्स्येंद्र नाथ के तप-वैभव के अधिकारी बने थे। रामानंद ने, कबीर को स्वर्ण खान कहीं नहीं सौंपी थी वरन् वह प्रतिभा प्रदान की थी जिसके कारण कुलीनता और विद्वत्ता के अभाव में भी अपने समय के प्रचंड प्रवर्तक के रूप में प्रख्यात हुए। भगवान के भक्तों में सर्वोपरि नारद माने जाते हैं। उन्हें वह ललक मिली थी कि जन-जन में भाव-संवेदना का बीजारोपण करते हुए अनवरत रूप से संलग्न रह सकें। पवन ने अपने पुत्र हनुमान् को वह वर्चस प्रदान किया था कि रामचरित्र में मेरुदंड जैसी भूमिका का निर्वाह कर सके।
  
🔶 गाँधी ने अपने प्रिय बिनोवा को महान प्रयोजनों के लिए मर मिटने की भाव-संवेदना प्रदान की थी। उनके संपर्क में आने वाले अन्य लोगों ने भी जुझारू प्रतिभा पाई और अपने चरित्र तथा कर्तृत्व से जनमानस पर गहरी छाप छोड़ने में सफल हो सके।
  
🔷 महर्षि अगस्त्य ने भगीरथ को राज-पाट छोड़कर गंगावतरण के महाप्रयास में संलग्न होने के लिए नियोजित किया था। लक्ष्य इतना उच्चस्तरीय था कि उनकी सफलता में योगदान देने के लिए स्वयं शंकर जी को कैलाश छोड़कर आना पड़ा था। योगी भर्तृहरि ने अपने भाई विक्रमादित्य को आदर्श शासक और भाँजे गोपीचंद को तत्त्वदर्शन के अवगाहन में संलग्न किया था। इससे अधिक और कुछ कोई अपने स्वजन संबंधियों को दे ही क्या सकता है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 26

👉 Generous Like the Clouds

🔷 Stingy fellows, who keep their resources only to themselves and remain apathetic to others’ sufferings, are in fact accounting sins for their future destiny. Those who have stocked heaps of wealth in their possession but never use it are mere ‘guards’ of money. Such fellows are burden on this earth that can do nothing for anyone. Even materialistically, they don’t enjoy anything; the thirst of gaining more, the worries and tensions of safeguarding the possession and the miserly attitude do not let them live in peace; they neither eat well nor can give anything to others. Despite having millions or billions of riches, they remain poor, beggars… Thirst for more and more of selfish possession does not even let one see what are the right or wrong means of piling the stocks of wealth. Prosperity earned by unfair means cannot let one prosper… One dies empty handed and later one all that ‘dead property’ possessed by him does no good to even to those who grabs it afterwards…

🔶 On the contrary, those who earn honestly and spend magnanimously and wisely in good, constructive and auspicious activities are always prospering. They are like clouds, which enshower generously; even if emptied today, the clouds are filled again and return back tomorrow with same dignity.

🔷 Integrity, benevolence, caring and helping sociability – are virtues of greatness, which can make the entire world your own. No one can forget the warmth of meeting such amicable personalities. But, the selfish fellows, howsoever talented and affluent they might be, remain aloof and virtually isolated; their state is like that of milk kept in a dirty pot, which is thrown without use…

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1943

👉 आत्म निर्माण-जीवन का प्रथम सोपान (अन्तिम भाग)

🔷 दूसरा आध्यात्मिक तथ्य है- मानव जीवन को ईश्वर का सर्वोपरि उपहार मानना। इसे लोकमंगल के लिए दी हुई परम पवित्र अमानत स्वीकार करना। स्पष्ट है कि प्राणिमात्र को ईश्वर की सन्तान मानना। निष्पक्ष न्यायकारी पिता समान रूप से ही अपने सब बालकों को अनुदान देता है। मनुष्य को इतने सुविधा साधन वह विलासिता और अहन्ता की पूर्ति के लिए देकर पक्षपाती और अन्यायी नहीं बन सकता। जो मिला वह खजांची के पास रहने वाली बैंक अमानत की तरह है। संसार को सुखी समुन्नत बनाने के लिए ही मनुष्य को विभिन्न सुविधाएँ मिली हैं। उनमें से निर्वाह के लिए न्यूनतम भाग अपने लिये रखकर शेष को लोकमंगल के लिए ईश्वर के इस सुरम्य उद्यान को अधिक सुरम्य सुविकसित बनाने के लिए खर्च किया जाना चाहिए।

🔶 तीसरा महासत्य है- अपूर्णता को पूर्णता तक पहुँचाने का जीवन लक्ष्य प्राप्त करना। दोष-दुर्गुणों का निराकरण करते चलने और गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता बढ़ाते चलने से ही ईश्वर और जीव के बीच की खाई पट सकती है। इन्हीं दो कदमों को साहस और श्रद्धा के साथ अनवरत रूप से उठाते रहने पर जीवन लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव हो सकता है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की नीति अपनाकर ही आत्मा को परमात्मा बनने और नर को नारायण स्तर तक पहुँचाने का अवसर मिल सकता है। स्वर्ग, मुक्ति, आत्मदर्शन, ईश्वर प्राप्ति आदि इसी अपूर्णता के निराकरण का काम है।

🔷 चौथा महासत्य है-इस विश्व ब्रह्माण्ड को ईश्वर की साकार प्रतिमा मानना। श्रम सीकरों और श्रद्धा सद्भावना के अमृत जल से उसका अभिषेक करने की तप साधना करना। दूसरों के दुःख बटाने और अपने सुख बाँटने की सहृदयता विकसित करना। आत्मीयता का अधिकाधिक विस्तार करना। अपनेपन को शरीर परिवार तक सीमित न रहने देकर उसे विश्व सम्पदा मानना और अपने कर्तव्यों को छोटे दायरे में थोड़े लोगों तक सीमित न रख कर अधिकाधिक व्यापक बनाना।

🔶 यह चार सत्य-चार तथ्य ही समस्त अध्यात्म विज्ञान के, साधना विधान के केन्द्र बिन्दु हैं। चार वेदों का सार तत्व यहीं है। इन्हीं महासत्यों को हृदयंगम करने और उन्हें व्यवहार में उतारने से परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है। जीवनोद्देश्य पूर्ण होता है। इन महासत्यों को जितनी श्रद्धा और जागरूकता के साथ अपनाया जायेगा आत्म-निर्माण उतना ही सरल और सफल होता चला जायेगा। युग निर्माण की दिशा में बढ़ते हुए हमें सर्वप्रथम आत्म-निर्माण पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 जीवन-साधना से लाभ?

🔷 मनुष्य विद्युत-शक्ति का भण्डार है। उसमें प्राण तत्व इतनी प्रचुर मात्रा में भरा हुआ है कि उसके आधार पर असम्भव और आश्चर्यजनक कार्यों को भी पूरा किया जा सकता है, किन्तु हम उसका सदुपयोग करना सीख जायें, तो जीवन की दिशा दूसरी हो सकती है। मानवीय विद्युत का समुचित उपयोग करना, सीखना वैसा ही उपयोगी है, जैसे बैंक में जमा हुए रुपये को निकालने की जानकारी रखना। वे मनुष्य बड़े अभागे हैं, जिनकी विपुल सम्पत्ति बैंक में जमा है, किन्तु उसे निकालने की विधि नहीं जानते और पैसे-पैसे को मुहताज फिरते हैं। आध्यात्मिक साधना का यह प्रथम फल बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि अपनी अपरिमेय शक्ति का समुचित उपयोग करना मालूम हो जाय।
  
🔶 दु:खों को दूर करने और सुख प्राप्त करने का हम सतत प्रयत्न करते हैं, सारा जीवन इन्हीं दोनों की उलट-पुलट में व्यतीत हो जाता है, किन्तु मनोकामना पूरी नहीं होती। यदि कोई ऐसा उद्ïगम प्राप्त हो जाय, जहाँ से सुख और दु:ख का उदय होता है और वहाँ अपनी इच्छानुसार चाहे जिसे ले लेने की सुविधा हो, तो क्या इसे मामूली चीज समझना चाहिए? विद्या, धन, स्वास्थ्य, स्त्री, सन्तान प्राप्त करने पर भी जिस सुख को हम नहीं प्राप्त कर सकते उसकी सच्ची स्थिति प्राप्ति का सच्चा मार्ग केवल आध्यात्मिक साधना द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।
  
🔷 अपनी शक्ति को विकसित करना यह कितना महान लाभ है। मानवीय अन्त:स्थल में ऐसे-ऐसे अस्त्र-शस्त्र छिपे पड़े हैं जो भौतिक विज्ञान द्वारा अब तक न तो बन सके हैं और न भविष्य में बनने की संभावना है। यह हथियार वाल्मीकि जैसे डाकुओं को ऋषि के रूप में परिणित करने की भी शक्ति रखते हैं। सुदामा और नरसी जैसे दरिद्रों के सामने क्षण भर में स्वर्ण सम्पदा के पर्वत खड़े कर सकते हैं, कोढिय़ों को स्वर्णकाय बना सकते हैं और डूबते दरिद्रों को पार कर सकते हैं। यह दिव्य शक्तियाँ भी आत्म-साधना द्वारा ही सम्भव हैं।
  
🔶 हम स्वयं क्या हैं? संसार क्या है? स्वर्ग और मुक्ति क्या है? इनका ठीक ज्ञान के बजाय साधना तत्व के बारे में जान लिया जाय। कारण हजारों मन सिद्धान्तों के ज्ञान से एक छटाक भर साधनों का आचरण अधिक लाभप्रद है। इसलिए अपने दैनिक जीवन में योग, धर्म एवं दर्शन शास्त्रों में बताए हुए साधनों का अभ्यास कीजिए, जिससे मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य- ‘आत्म-साक्षात्कार’ की शीघ्र प्राप्ति हो।
  
🔷 इस साधनपट में उपरोक्त साधनों का तत्व एवं सनातन धर्म का विशुद्ध स्वरूप ३२ शिक्षाओं द्वारा दिया गया है। उनका अभ्यास वर्तमान काल के अत्यन्त कार्यग्रस्त स्त्री पुरुषों के लिए भी सुशक्य है। उनके समय और परिमाण में यथानुकूल परिवर्तन कर लीजिए और उनकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाते जाइये। आप अपने चरित्र या स्वभाव में एकाएक परिवर्तन नहीं कर सकेंगे, इसलिए आरम्भ में इनमें थोड़ी ऐसी शिक्षाओं के आचरण का संकल्प कीजिए, जिनसे आपके वर्तमान स्वभाव और चरित्र में थोड़ा निश्चित सुधार हो। क्रमश: इन साधनों का समय और परिमाण बढ़ाते जाइये। यदि किसी दिन बीमारी, सांसारिक कार्यों की अधिकता या किसी अनिवार्य कारणों से आप निश्चित साधनाओं को न कर सकें तो उनके बदले पूरे समय या यथासम्भव ईश्वर नाम स्मरण या जप कीजिए, जो चलते-फिरते या अपने सांसारिक कर्म करते हुए भी किया जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य