बुधवार, 16 सितंबर 2020

👉 माँ तो माँ होती है

आज फिर से साहब का दिमाग उचट गया था ऑफिस में! बाहर बारिश हो रही थी, मन किया कि पास वाले ढाबे पर चलकर कुछ खाया जाए! सो ऑफिस का काम फटाफट निपटा कर पहुँच गए साहब ढाबे में!

रामू दौड़ता हुआ आया, हाथ  में पानी का गिलास मेज पर रखते हुए साहब को नमस्ते की और बोला "क्या बात है साहब काफी दिनों बाद आये हैं आज आप ?"

"हाँ  रामू , मैं शहर से बाहर गया था!" साहब ने जबाब दिया!
"आप बैठो साहब, मैं आपके लिए कुछ खाने को लाता हूँ!"

वो एक साधारण सा ढाबा था, मगर पता नहीं इतने बड़े साहब को वंहा आना बड़ा ही अच्छा लगता था! साहब को कुछ भी आर्डर देने की जरुरत नहीं पड़ती थी, बल्कि उनका  मनपसंद  भोजन अपने आप ही रामू ले आता था! स्वाद भी बहुत भाता था साहब को यहां के खाने का! पता नहीं रामू को कैसे पता लग जाता था की साहब को कब क्या अच्छा लगेगा! और पैसे भी काफी कम लगते थे यहां पर!

साहब बैठे सोच ही रहे थे की चिर-परिचित पकोड़ों की खुशबु से साहब हर्षित हो गए!

"अरे रामू, तू बड़ा जादूगर है रे! इस मौसम में इससे  अच्छा और कुछ हो ही नहीं सकता है!" साहब पकोड़े खाते हुए बोले!

"अरे साहब, पैट भर के खाईयेगा, इसके बाद अदरक वाली चाय भी लाता हूँ!" रामू बोला!

साहब का मूड एकदम फ्रेश हो गया था!

"देखो आज मैं तुम्हारे ढाबे के कुक से मिलकर ही जाऊँगा, बड़ा ही अच्छा खाना बनाता है वो!" साहब ने फिर से अपनी पुरानी जिद्द दोहरा दी!

हर बार रामू टाल देता था, मगर आज साहब ने भी जिद्द पकड़ ली थी कि रसोइये से मिलकर ही रहूँगा, उसका शुक्रिया अदा करूँगा!
साहब जबरदस्ती रसोई में घुस गए! आज रामू की एक ना चल पायी!
अंदर का नजारा साहब ने  देखा की एक बूढी सी औरत चाय बना रही थी, वो बहुत खुश थी!

"माँ" साहब के मुंह से निकला,

"मैने तो आपको वृद्धाश्रम में डाल दिया था.....!"

"हाँ बेटा, मगर जो सुख मेरे को यहाँ तुझे खाना खिला कर मिलता है वो वहां नहीं है!"

आज साहब को पता लग गया कि रामू को उसकी पसंद की डिशेज कैसे पता है और वहां पर पैसे कम क्यों लगते हैं!

👉 चुनौती को कौन स्वीकार करे?

यों इस देश में छप्पन लाख धर्म का व्यवसाय करके अपनी रोटी कमाने वाले पेशेवर धर्मसेवक मौजूद हैं जो दान दक्षिण के ऊपर अपना निर्वाह करते हैं और जिनसे स्वभावतः यह आशा की जानी चाहिए कि वे मनुष्य जाति के भौतिक एवं आत्मिक उत्कर्ष में कुछ योग दें। पर उस ओर तो अन्धेरा ही दीखता है। उजाला हमें अपने हृदय का तेल जलाकर करना पड़ेगा। कार्यव्यस्त गृहस्थ लोगों के द्वारा ही अब तक संसार की बड़ी प्रवृत्तियाँ चली हैं। युग-निर्माण के लिए भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं।

अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों से इस प्रकार की आशा की जा सकती है। उत्कृष्टता और भावना की दृष्टि से हम लोग संख्या में थोड़े होते हुए भी एक बड़ी शक्ति के रूप में संगठित हैं। परमार्थ का लक्ष हमें प्रिय है। आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश उत्पन्न करने के लिए हम लोग अपने को साधना और तपश्चर्या के द्वारा इस योग्य बना चुके हैं कि जो कुछ कहें उसे दूसरे सुनें, जो कुछ करें उसका दूसरे अनुकरण करें, कुछ प्रेरणा करें तो दूसरे उस पर चलना शुरू करें। हमारा लक्ष सत्य है, हमारे साधन शुद्ध हैं, हमारा कर्तृत्व  भावना पूर्ण है तो क्यों हमारी बात सुनी न जायगी? क्यों हमारी प्रेरणा मानी न जायगी?

युग-निर्माण के लिए हमें ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करना है। जिन दुर्बलताओं और बुराइयों ने जन-मानस पर आधिपत्य जमा रखा है उनकी बुराइयों और हानियों को यदि मनुष्य भली प्रकार समझ ले तो उन्हें छोड़ने कि लिए अवश्य उत्सुक होगा। यदि प्रगति और शान्ति का सच्चा मार्ग उसे विश्वासपूर्वक उपलब्ध हो जाय तो अनैतिक, अपराधपूर्ण, खतरे से भरे हुए दुखदायी रास्ते पर वह क्यों चलेगा? संसार में जितनी भी क्रान्तियाँ हुई हैं उनमें सर्वप्रथम विचार विस्तार ही हुआ है। ज्ञान ही क्रिया का पूर्व रूप है। कोई तभी दृश्य रूप में आता है जब पहले वैसे विचार मन में गहराई तक अपनी जड़ जमा लेते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २७)

कल्पना में भी है अक्षय ऊर्जा का भंडार

काव्य कला सहित विश्व-वसुधा की समस्त कलाएँ प्रायः इसी रीति से जन्मी, पनपी एवं विकसित हुई हैं। विश्व को चमत्कृत कर देने वाली शोध सृष्टि भी कल्पनाओं के तर्कपूर्ण विवेकयुक्त विचार से सम्बद्ध होने से हुई है। अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण विचार से कल्पना के जुड़ने से इन दोनों के अलावा एक अन्य सुखद परिणति भी होती है और वह परिणति है- जीवन जीने की कला का विकास। जीवन में एक अपूर्व कलात्मकता,लयबद्धता का  सुखद् जन्म। इस सत्य से प्रायः बहुत कम लोग परिचित हो पाते हैं, लेकिन जो परिचित हो जाते हैं-उनका जीवन सुमधुर काव्य की भाँति सुरीला, संगीत की तरह लययुक्त एवं नवीन शोध की भाँति आश्चर्यजनक उपलब्धियों का भण्डार हो जाता है।

उचित कल्पना का संस्पर्श पाकर जीवन बड़े ही आश्चर्य रीति से बदल जाता है। यह बदलाव ऐसा होता है, जैसे कि पारस लोहे के काले-कलूटे टुकड़े का छूकर सुगन्धित स्वर्ण बना दिया हो। कहानी एमिली जेन की है, जो पहले अपने बचपन में कूड़ा-करकट बीनती थी और बाद में विश्व विख्यात अभिनेत्री बन गयी। उसकी जीवन कथा-‘वन्डर ऑप वर्ड्स’ के लेखक जेम्स एलविन का कहना है कि एमिली जब छोटी थी एक दिन वह कूड़ा-करकट से कुछ बीन रही थी। बीनती-बीनती वह थक गयी। साथ कुछ लड़के-लड़कियाँ और भी थे। मनोरंजन के लिए सब मिलकर नाचने लगे। तभी वहाँ से अनविन रोजर्ट का गुजरना हुआ।
  
रोजर्ट ने बच्चों के बीच नृत्य करती हुई एमिली को देखा। उसे संकेत से पास बुलाया और धीरे से कहा—प्यारी बच्ची! तुम अद्वितीय हो, सौंदर्य और कला का अपूर्व मिश्रण तुममें है। तुम चाहो तो क्या नहीं कर सकती? सचमुच ही मैं कुछ भी कर सकती हूँ? एमिली ने पूछा। हाँ, तुम कुछ भी कर सकती हो। इस एक कल्पना ने अन्तः भावनाओं एवं तर्कपूर्ण, विवेक-युक्त विचारों से मिलकर एमिली को नया जन्म दिया, वह एमिली जो कला की देवी मानी जाने लगी। तभी तो परम पूज्य गुरुदेव कहते थे-कल्पना को ख्याली पुलाव मत बनाओ। उसे अपनी शक्ति समझो। अपना ऊर्जा स्रोत बनाओ।
  
कल्पनाओं को यूँ भटकने देना, यूँ ही बहकने देना और उस बहाव में स्वयं भी भटकने व बहने लगना न केवल कल्पना शक्ति की बर्बादी है, बल्कि इससे जीवन भी बर्बाद होता है। ऐसे में विकल्प की यह वृत्ति क्लेश उत्पादक बन जाती है। लेकिन इसका सदुपयोग होने से यह क्लेश निवारक बन जाती है। बस, सब कुछ हम साधकों पर है कि उसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाते हैं या फिर उसे बाधक बने रहने देते हैं। हमारी योग साधना के खरे होने की कसौटी इसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाने में है। इस विकल्प वृत्ति की साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें सांसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले, तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ५०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रह...