रविवार, 16 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 17 July 2017


👉 मुठ्ठी खोलो बंधन मुक्त हो जाओ:-

🔴 एक बार एक संत अपनी कुटिया में शांत बैठे थे, तभी उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया जा कर देखा तो एक बंदर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था. उसका एक हाथ एक घड़े के अंदर था और वह बंदर अपना हाथ छुड़ाने के लिए चिल्ला रहा था।

🔵 संत को देख वह बंदर संत से आग्रह करने लगा के महाराज कृपया कर के मुझे इस बंधन से मुक्त करवाए संत ने बंदर को कहा के तुमने घड़े के अंदर हाथ डाला तो वह आसानी से उसमे चला गया....

🔴 परन्तु अब इसलिए बाहर नहीं निकल रहा है क्यूंकी तुमने अपने हाथ में लड्डू पकड़ा हुआ है जो की उस घड़े के अंदर है, अगर तुम वह लड्डू हाथ से छोड़ दो तो तुम आसानी से मुक्त हो सकते हो।

🔵 बंदर ने कहा के महाराज, लड्डू तो मैं नहीं छोड़ने वाला, अब आप मुझे बिना लड्डू छोड़े ही मुक्त होने की कोई युक्ति सुझाए।

🔴 संत मुस्कुराए और कहा के या तो लड्डू छोड़ दो अन्यथा तुम कभी भी मुक्त नही हो सकते।

🔵 हज़ार कोशिशों के बाद बंदर को इस बात का एहसास हुआ कि बिना लड्डू छोड़े मेरा हाथ इस घड़े से बाहर नही निकल सकता और मैं मुक्त नही हो सकता।

🔴 आख़िरकार बंदर ने वो लड्डू छोड़ा और सहजता से ही उस घड़े से मुक्त हो गया।

🔵 यह कहानी सिर्फ़ उस बंदर की ही नहीं बल्कि आज के हर उस इंसान की है जो की उस घड़े में (संसार में) फँसा बैठा है।

🔴 लड्डू (संसारिक वस्तुओं) को छोड़ना भी नहीं चाहता और उस घड़े (84 के फेरे से) से मुक्त भी होना चाहता है।

🔵 संत (सदगुरु) ने समझानें का कार्य कर दिया...... अब किसे कब समझ आए और वह कब मुक्त होगा यह उसकी समझ है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 July 2017


👉 अपनी स्थिति के अनुसार साधना चाहिए।

🔴 साधु, संत और ऋषियों ने लोगों को अपने-अपने ध्येय पर पहुँचने के अनगिनत साधन बतलाये हैं। हर एक साधन एक दूसरे से बढ़कर मालूम होता है, और यदि वह सत्य है, तो उससे यह मालूम होता है कि ये सब साधन इतनी तरह से समझाने का अर्थ यह है कि ज्यादातर एक कोई भी साधन उपयोग में आ सकता है। और यह है भी स्वाभाविक ही कि वह किसी एक के लिए उपयोगी हो।

🔵 परन्तु बहुधा ऐसा होता है कि बहुत से साधन अपने अनुकूल नहीं होते। कठिनाई यह है कि हम लोगों में वह शक्ति नहीं है कि उस साधन को खोज निकालें जिसके कि हम सचमुच योग्य हैं। इसके विपरीत हम दूसरे ऐसे साधन अनिश्चित समय के लिए अपनाते हैं जो हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुकूल नहीं होते। आज ऐसे अनुभवी पथ-प्रदर्शकों की भी भारी कमी है जो अपनी सूक्ष्म दृष्टि से यह जान लें कि किस व्यक्ति के अनुकूल क्या साधन ठीक होगा।

🔴 जो व्यक्ति जिस साधना का अधिकारी है, उसी के अनुकूल कार्यक्रम उसके सामने रखा जाना चाहिए। बालकों का शिक्षण और अध्ययन भी इसी आधार पर होना चाहिए। रुचि के अनुकूल दिशा में शिक्षा मिलने पर बालक थोड़े ही समय में आश्चर्यजनक उन्नति कर लेता है। इसके विपरीत जो कार्यक्रम उसकी रुचि न होते हुए भी लादा जाता है वह बड़ी कठिनाई से जैसे-तैसे पार पड़ता है।

🔵 हमें चाहिए कि अपना एक ध्येय निर्धारित करें और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ऐसे साधन चुनें जो निर्धारित उद्देश्य की ओर तेजी से हमें बढ़ा ले चलें, साथ ही उन साधनों का अपनी रुचि, प्रकृति और स्थिति के अनुकूल होना भी आवश्यक है। यदि ऐसा न हुआ तो उत्साह थोड़े ही समय में शिथिल हो जाता है और दुर्गम मार्ग पर चलने का अभ्यास न होने से बीच में ही यात्रा तोड़ने को विवश होना पड़ता है।

🔴 लक्ष्य-लक्ष्य के अनुकूल, साधन-साधन के अनुकूल, अपनी स्थिति- इन तीन बातों का जहाँ समन्वय हो जाता है यहाँ सफलता मिलने में संशय नहीं रहता। हमें अपना विवेक इतना जाग्रत करना चाहिए जो इस दिशा में समुचित ज्ञान रखता हो और अपने उज्ज्वल प्रकाश में हमें अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर कर सके।

🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आपत्कालीन धर्म

 🔴 श्रावस्ती में भयंकर अकाल पड़ा। निर्धन लोग भूख मरने लगे। भगवान् बुद्ध ने संपन्न लोगों को बुलाकर कहा- भूख से पीड़ितों को बचाने के लिए कुछ उपाय करना चाहिये। संपन्न व्यक्तियों की कमी नहीं थी, पर कोई कह रहा था- मुझे तो घाटा हो गया, फसल पैदा ही नहीं हुई आदि।

🔵 उस समय सुप्रिया नामक लड़की खड़ी हुई और बोली- मैं दूँगी, सबको अन्न। लोगों ने कहा- लड़की तू! तू तो भीख माँगकर खाती है, दूसरों को क्या खिलाएगी? सुप्रिया ने कहा- हाँ मैं आज से इन पीड़ितों के लिए घर- घर जाकर भीख माँगकर लाऊँगी, पर किसी को मरने नहीं दूँगी। उसकी बात सुनकर दर्शक स्तब्ध रह गए और सबने उसे धन एवं अन्न देना प्रारंभ कर दिया।

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६
🌹  सुख- दु:खों के ऊपर स्वामित्व

🔵 तुम सुख, दु:ख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रसयुक्त बनाओ। जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्तव्य है इसलिए तुम भी उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्तव्य को सिद्ध करो। 

🔴 प्रतिकूलताओं से डरोगे नहीं और अनुकूलता ही केा सर्वस्व मान कर बैठे रहोगे तो सब कुछ कर सकोगे। जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाओ। यह जीवन ज्यों- ज्यों उच्च बनेगा त्यों- त्यों आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है वह सब अनुकूल दिखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर दु:ख मात्र की निवृत्ति हो जावेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/07/blog-post_31.html


👉 Lose Not Your Heart Day 16
🌹  Control over Happiness and Unhappiness

🔵 Instead of being controlled by happiness and unhappiness, establish your mastery over them. This will render your life more interesting and meaningful. It is every person's responsibility to uplift himself and better his life, and you should fully involve yourself in this task.

🔴 You can achieve a great deal if you take full advantage of favorable circumstances, and are not afraid of adverse ones. Learn from every circumstance and move forward. As you progress, whatever seemed adverse will seem favorable, and then when that time comes you will be free from your sadness.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
http://awgpskj.blogspot.in/2017/07/lose-not-your-heart-day-16.html

👉 Lose Not Your Heart Day 16

🌹  Control over Happiness and Unhappiness

🔵 Instead of being controlled by happiness and unhappiness, establish your mastery over them. This will render your life more interesting and meaningful. It is every person's responsibility to uplift himself and better his life, and you should fully involve yourself in this task.

🔴 You can achieve a great deal if you take full advantage of favorable circumstances, and are not afraid of adverse ones. Learn from every circumstance and move forward. As you progress, whatever seemed adverse will seem favorable, and then when that time comes you will be free from your sadness.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १६

🌹  सुख- दु:खों के ऊपर स्वामित्व

🔵 तुम सुख, दु:ख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रसयुक्त बनाओ। जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्तव्य है इसलिए तुम भी उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्तव्य को सिद्ध करो। 

🔴 प्रतिकूलताओं से डरोगे नहीं और अनुकूलता ही केा सर्वस्व मान कर बैठे रहोगे तो सब कुछ कर सकोगे। जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाओ। यह जीवन ज्यों- ज्यों उच्च बनेगा त्यों- त्यों आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है वह सब अनुकूल दिखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर दु:ख मात्र की निवृत्ति हो जावेगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ऊंचा क़द

चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई ...