सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

👉 वरिष्ठता: -

एक बगीचे में एक बाँस का झुरमुट था और पास ही आम का वृक्ष उगा खड़ा था।

ऊँचाई में बाँस ऊपर था और आम नीचा। बाँस ने आम से कहा- "देखते नहीं मैं तुमसे कितना ऊँचा हूँ। मेरी वरिष्ठता तुम्हें स्वीकार करनी चाहिए।"

आम कुछ बोला नहीं- चुप होकर रह गया।

गर्मी का ऋतु आई। आम फलों से लद गया। उसकी टहनियाँ फलों के भार से नीची झुक गई।

बाँस तना खड़ा था। वह आम से बोला- "तुम्हें तो इन फलों की फसल ने और भी अधिक नीचे गिरा दिया अब तुम मेरी तुलना में और भी अधिक छोटे हो गए हो।"

आम ने फिर भी कुछ नहीं कहा। सुनने के बाद उसने आंखें नीची कर ली।

उस दिन थके मुसाफिर उधर से गुजरे। कड़ाके की दुपहरी आग बरसा रही थी सो उन्हें छाया की तलाश थी। भूख-प्यास से बेचैन हो रहे थे अलग। पहले बाँस का झुरमुट था। वही बहुत दूर से ऊंचा दीख रहा था। चारों ओर घूमकर देखा उसके समीप छाया का नाम भी नहीं था। कंटीली झाड़ियां सूखकर इस तरह घिर गई थी कि किसी की समीप तक जाने की हिम्मत न पड़े।

निदान वे कुछ दूर पर उगे आम के नीचे पहुँचे। यहाँ दृश्य ही दूसरा था। सघन छाया की शीतलता और पककर नीचे गिरे हुए मीठे फलों का बिखराव। उन्होंने आम खाकर भूख बुझाई। समीप के झरने में पानी पिया और शीतल छाँह में संतोषपूर्वक सोये।

जब उठे तो बाँस और आम की तुलनात्मक चर्चा करने लगे।

उस खुसफुस की भनक बाँस के कान में पड़ी। उसने पहली बार उस समीक्षा के आधार पर जाना कि ऊँचा होने में और बड़प्पन में क्या कुछ अंतर होता है।

"दोस्तों..! हम सभी में अपने तरह की खूबियाँ और ख़ामियाँ मौजूद हैं...कुछ हमने अपनी मेहनत से पाईं हैं और कुछ हमें ईश्वर की देन हैं..। पर कोई भी पूरी तरह न सर्वश्रेष्ट है न निकृष्ट... इसलिए घमंड या निराशा का भी कोई कारण नहीं है..। हमें बस अपनी ख़ामियों/ख़ूबियों का जानने, स्वीकार करने और तराशने की आवश्यकता है..और यह तभी संभव है जब हम औरों की खूबियों से ईर्ष्या करने और खराबियों की आलोचना करने की बजाय खुद को जानने और तराशने में अपना वक्त और उर्जा लगाएं

हमें दुनिया से अपनी श्रेष्ठता स्वीकार करवाने की कोई आवश्यकता नहीं... आवश्यकता है तो खुद को 'कल जो हम थे' या 'आज जो हम हैं' उससे बेहतर बनाने का प्रयास करते रहने की..। समाज आपकी श्रेष्ठता तभी स्वीकार करेगा जब वो आपको दिन ब दिन निखरता देखेगा और आपकी खूबियों से लाभान्वित होगा..। तब आपको कुछ कहने की जरूरत न पडेगी आपके कर्म ही आपकी श्रेष्ठता का बयान होंगे...। कर्मों से बोला हुआ चरित्र ही देर तक याद रखा जाता है..॥"

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जुलाई-1975

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 14 Oct 2019



👉 आलस्य एक प्रकार की आत्म-हत्या ही है (भाग २)

शरीर की सुरक्षा श्रम द्वारा ही की जा सकती है। आलस्य में निष्क्रिय पड़े रहने से इसके सारे कल-पुर्जे ढीले तथा अशक्त हो जाते हैं, अनेक व्याधियाँ घेर लेती हैं। आरोग्य चला जाता है। अस्वस्थ शरीर आत्मा को भी अस्वस्थ कर डालता है। आत्मा चेतनास्वरूप परमात्मा का पावन अंश है, उसे इस प्रकार निस्तेज, निश्चेष्ट अथवा अपावन बनाने का अधिकार किसी जीव को नहीं है। और जो अबुद्धिमान ऐसा करता है वह नास्तिक जैसा ही माना जायेगा। आलसी निश्चय ही इस पाप का दोषी होता है।

परमात्मा ने शरीर दिया, शक्ति दी, चेतना दी और बोध दिया। इसलिये कि मनुष्य अपनी उन्नति करें और जीवन-पथ पर आगे बढ़े। स्वयं सुख पाये और उसके प्यारे अन्य प्राणियों को सुखी होने में सहयोग दे। मनुष्य का कर्तव्य है कि ईश्वर की इस अनुकम्पा को सार्थक करे और अपने उपकारी के प्रति भक्ति- भावना से कृतज्ञता प्रकट करे। पर क्या आलसी अपने इस कर्तव्य को पूरा करता है? निश्चय ही नहीं। वह दिन-रात प्रमाद में पड़ा ऊँघता रहता है। औरों को सुखी करना तो दूर, उल्टा उन्हें दुःख ही देता रहता है और स्वयं भी दीनता, दरिद्रता, रोग तथा निस्तेजता का दुःख भोगा करते हैं। क्या इस प्रकार की अकर्तव्य शालीनता पाप नहीं कही जायेगी?

जो अभागा आलसी अपने साधारण जीवन-क्रम का निर्वाह प्रसन्नता, तत्परता तथा कुशलता से नहीं कर पाता वह स्वस्थ तन, प्रसन्न मन एवं उज्ज्वल आत्मा द्वारा कृतज्ञता प्रदर्शन रूप, पूजा-पाठ, जप-तप, सेवा-उपासना, भजन-कीर्तन का नियमित आयोजन कहाँ निभा सकता है? दोपहर तक सोते रहने, दिन में खाकर पड़े रहने और कष्टपूर्वक कोई आवश्यक कार्य कर सकने वाला प्रमाद उन्मादी भगवत्-भक्ति करता अथवा कर सकता है, ऐसा सम्भव नहीं। नियमित रूप से, भक्ति-भावना से भरी उपासना न करना उस अनुग्राहक ईश्वर के प्रति कृतघ्नता है। कृतघ्नता का पाप जघन्यता की कोटि का पाप है जिसका सबसे पहले अपराधी आलसी ही होता है। जिसके पास समय ही समय रहता हो वह परमात्मा की उपासना न करे उससे बढ़कर पापी और कौन हो सकता है जबकि व्यस्त जीवन में से भी समय निकाल कर प्रभु की याद न करने वाले आत्मधारी तक आलोचना एवं निन्दा के पात्र बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 24


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.24

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८०)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि

इसका सत्य यह है कि ‘अथर्वा’ और ‘आङ्गिरस’ ये दो अलग- अलग ऋषि थे। इन्होंने ही सर्वप्रथम अग्रि को प्रकट करके यज्ञ चिकित्सा का आविष्कार किया था। अथर्ववेद में अथर्वा ऋषि द्वारा दृष्ट ऋचाएँ अध्यात्मपरक, सुखकारक, अभ्युदय प्रदान करने वाली और श्रेय- प्रेय देने वाली हैं। और अंगिरस ऋषि द्वारा दृष्ट ऋचाएँ अभिचार परक, शत्रुसंहारिणी, कृत्यादूषण, शापनिवारिणी, मारण, मोहन, वशीकरण आदि प्रधान हैं। सार तथ्य यह है कि आथर्वण मंत्र सृजनात्मक हैं और अंगिरस मंत्र संहारात्मक हैं। अथर्ववेद में आथर्वण और अंगिरस दो प्रकार की चिकित्सा विधियाँ होने के कारण अथर्ववेद को ‘अथर्वाङ्गिरस’ कहा जाता है।

शब्द व्युत्पत्ति की दृष्टि से हम अथर्वा का मर्म तो जान चुके अब यदि ‘आङ्गिरस’ का मर्म अनुभव करें तो शब्द व्युत्पत्ति ‘आङ्गिरस’ का अर्थ अंगों में प्रवाहित होने वाला रस बताती है। मनुष्य शरीर के प्रत्येक अंग अवयव में ‘प्राणरस’ प्रवाहित होता रहता है। इसी प्राणरस का प्रवाह प्रत्येक अंग- अवयव को सक्षम व सशक्त बनाया करता है। इस रस के सूखने पर या अवरूद्ध होने पर अथवा इसका अभाव होने पर इन्द्रियाँ शिथिल और निष्क्रय हो जाती हैं। और इनका कार्य- व्यापार ठप्प पड़ जाता है। जब मनुष्य के शरीर की यह स्थिति होती है, तब उसे लकवा, फालिज और मधुमेह आदि रोग हो जाया करते हैं।

शरीर में प्रवाहित होने वाले इस रस में जब विकार उत्पन्न हो जाते हैं, तब अनेकों तरह की विकृतियाँ व व्याधियाँ पनपने लगती हैं। मनुष्य के मन- मस्तिष्क व हृदय रोगी हो जाते हैं। शरीर के इस तरह रोगग्रस्त होने पर अथर्ववेद के आध्यात्मिक चिकित्सा विधान द्वारा जलावसेचन, हस्तामिमर्श, मणिबन्धन, हवन एवं उपस्थान आदि करने से यथा अथर्ववेदीय मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित औषधि, भेषज उपचार से मनुष्य रोग- दोष मुक्त होकर स्वस्थ और निरोग बनता है। जलावसेचन, मणिबन्धन, औषधि, भेजष आदि उपचार से शरीर के अंगों के विकृत या शुष्क रस सजीव व सशक्त बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११२

👉 गुरुवर की वाणी

★ मेरी चाह है कि हाथ से सत्य न जाने पाये। जिस सत्य को तलाशने और पाने के लिए मैंने कंकरीले, रेतीले मार्ग पर चलना स्वीकार किया है, वह आत्म-स्वीकृति किसी भी मूल्य पर, किसी भी संकट के समय डगमगाने न पाये। सत्य का अवलम्बन बना रहे, क्योंकि उसकी शक्ति असीम है। मैं उसी के सहारे अपनी हिम्मत संजोये रहूंगा।
(अखण्ड ज्योति 1985, मई)

◆ प्रज्ञा परिवार को अन्य संगठनों, आन्दोलनों, सभा-संस्थाओं के समतुल्य नहीं मानना चाहिए। वह युग सृजन के निमित्त अग्रगामी मूर्धन्य लोगों का एक सुसंस्कारी परिकर-परिसर है। उन्हें केवल एक ही बात सोचनी चाहिए कि समय की जिस चुनौती ने जाग्रत् आत्माओं को कान पकड़कर झकझोरा है, उसके उत्तर में उन्हें दांत निपोरने हैं या सीना तानना है?
(वाङ्मय क्र.1, पेज-6.1)

■ यह क्षुद्रता कैसी, जो अग्रदूतों की भूमिका निभाने में अवरोध बनकर अड़ गई है। समर्थ को असहाय बनाने वाला यह व्यामोह आखिर कैसा भवबन्धन है? कुसंस्कार है? दुर्विपाक है या मकड़ी का जाल? कुछ ठीक से समझ नहीं आता। यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है। इस विषम वेला में युग के अर्जुनों के हाथों से गांडीव क्यों छूटे जा रहे हैं? सिद्धान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई विनोद मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखी जाने का कभी अवसर ही न आये?
(वाङ्मय क्र.1, पेज-6.1)

★नवनिर्माण के कंधे पर लदे उत्तरदायित्व मिल-जुलकर संपन्न हो सकने वाला कार्य था, सो समझदारों में कोई हाथ न लगा तो अपने बाल परिवार-गायत्री परिवार को लेकर जुट पड़े। बात अगले दिनों की आती है। इस सम्बन्ध में स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकांक्षा और आवश्यकताओं को भुला न दिया जाय। समय विकट है। प्रत्येक परिजन का भावभरा सहयोग हमें चाहिए।
(हमारी वसीयत और विरासत-174)