सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

👉 गुरुवर की वाणी

★ मेरी चाह है कि हाथ से सत्य न जाने पाये। जिस सत्य को तलाशने और पाने के लिए मैंने कंकरीले, रेतीले मार्ग पर चलना स्वीकार किया है, वह आत्म-स्वीकृति किसी भी मूल्य पर, किसी भी संकट के समय डगमगाने न पाये। सत्य का अवलम्बन बना रहे, क्योंकि उसकी शक्ति असीम है। मैं उसी के सहारे अपनी हिम्मत संजोये रहूंगा।
(अखण्ड ज्योति 1985, मई)

◆ प्रज्ञा परिवार को अन्य संगठनों, आन्दोलनों, सभा-संस्थाओं के समतुल्य नहीं मानना चाहिए। वह युग सृजन के निमित्त अग्रगामी मूर्धन्य लोगों का एक सुसंस्कारी परिकर-परिसर है। उन्हें केवल एक ही बात सोचनी चाहिए कि समय की जिस चुनौती ने जाग्रत् आत्माओं को कान पकड़कर झकझोरा है, उसके उत्तर में उन्हें दांत निपोरने हैं या सीना तानना है?
(वाङ्मय क्र.1, पेज-6.1)

■ यह क्षुद्रता कैसी, जो अग्रदूतों की भूमिका निभाने में अवरोध बनकर अड़ गई है। समर्थ को असहाय बनाने वाला यह व्यामोह आखिर कैसा भवबन्धन है? कुसंस्कार है? दुर्विपाक है या मकड़ी का जाल? कुछ ठीक से समझ नहीं आता। यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है। इस विषम वेला में युग के अर्जुनों के हाथों से गांडीव क्यों छूटे जा रहे हैं? सिद्धान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई विनोद मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखी जाने का कभी अवसर ही न आये?
(वाङ्मय क्र.1, पेज-6.1)

★नवनिर्माण के कंधे पर लदे उत्तरदायित्व मिल-जुलकर संपन्न हो सकने वाला कार्य था, सो समझदारों में कोई हाथ न लगा तो अपने बाल परिवार-गायत्री परिवार को लेकर जुट पड़े। बात अगले दिनों की आती है। इस सम्बन्ध में स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकांक्षा और आवश्यकताओं को भुला न दिया जाय। समय विकट है। प्रत्येक परिजन का भावभरा सहयोग हमें चाहिए।
(हमारी वसीयत और विरासत-174)

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 द्वेष का कुचक्र

द्रोणाचार्य और द्रुपद एक साथ ही गुरुकुल में पढ़ते थे। द्रुपद बड़े होकर राजा हो गये। एक बार किसी प्रयोजन की आवश्यकता पड़ी। वे उनसे मिलने ...