सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

प्रेरणादायक प्रसंग 7 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 7 Feb 2017


👉 रैदास के पैसे गंगाजी ने हाथ मे लिए

🔴 सन्त रैदास मोची का काम करते थे। काम को वें भगवान् की पूजा मानकर पूरी लगन एवं ईमानदारी से पूरा करते थे। एक साधु को सोमवती अमावस्या के दिन गंगा स्नान करने को साथ- साथ चलने के लिए उन्होंने आश्वासन दिया था। साधु सदा जप- तप में तल्लीन रहते थे।

🔵 अमावस्या के स्नान का दिन निकट था। साधु रैदास के पास पहुँचे। गंगा स्नान की बात याद दिलायी। रैदास लोगों के जूते सीने का काम हाथ में ले चुके थे। समय पर देना था। अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए रैदास ने कहा 'महात्मन्! आप मुझे क्षमा करें। मेरे भाग्य में गंगा का स्नान नहीं है। यह एक पैसा लेते जाँय और गंगा माँ को मेरे नाम पर चढा देना। '

🔴 साधु गंगा सान के लिए संमय पर पहुँचे। स्नान करने के बाद उन्हें रैदास की बात स्मरण हो आयी। मन ही मन गंगा से बोले 'माँ यह पैसा रैदास ने भेजा है- स्वीकार करें। ' इतना कहना था कि गंगा की अथाह जल राशि से दो विशाल हाथ बाहर उभरे और पैसे को हथेली में ले लिया। साधु यह दृश्य देखकर विस्मित रह गये और सोचने लगे मैंने इतना जप- तप किया, गंगा आकर स्नान किया तो भी गंगा माँ की कृपा नहीं प्राप्त हो सकी, जब कि गंगा का बिना स्नान किए ही रैदास को अनुकुम्पा प्राप्त हो गयी।

🔵 वे रेदास के पास पहुँचे और पूरी बात बतायी। रैदास बोले- 'महात्मन्! यह सब कर्त्तव्य धर्म के निर्वाह का प्रतिफल है। इसकें मुझ अकिंचन के तप, पुरुषार्थ की कोई भूमिका नहीं।


🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 8

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 30) 7 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र-   

🔴 शरीर में मल, मूत्र, पसीना, कफ आदि के द्वारा सफाई होती है। स्नान का उद्देश्य भी यही है। सफाई से सम्बन्धित अनेक उपक्रम भी इसीलिये चलते हैं कि विषाणुओं का आक्रमण न होने पाये। सर्दी-गर्मी से बचने के लिये अनेक प्रयत्न भी इसी उद्देश्य से किये जाते हैं कि हानि पहुँचाने वाले तत्त्वों से निपटा जाता रहे। जीवन भी एक शरीर है, उसे गिराने के लिये पग-पग पर अनेकानेक संकट, प्रलोभन, दबाव उपस्थित होते रहते हैं। उनसे निपटने के लिये सतर्कता न बरती जाये तो बात कैसे बने? चोर-उचक्कों ठगों, उद्दण्डों की उपेक्षा न होती रहे, तो वे असाधारण क्षति पहुँचाये बिना न रहेंगे।                     

🔵 दुष्प्रवृत्तियाँ जन्म-जन्मान्तरों से संचित पशु-प्रवृत्तियों के रूप में स्वभाव के साथ गुँथी रहती है। फिर निकटवर्ती लोग जिस राह पर चलते और जिस स्तर की गतिविधियाँ अपनाते हैं, वे भी प्रभावित करती हैं और अपने साथ चलने के लिये ललचाती हैं। जो कुछ बहुत जनों द्वारा किया जाता दीखता है, अनुकरणप्रिय स्वभाव भी उसकी नकल बनाने लगता है। इतना विवेक तो किन्हीं विरलों में ही पाया जाता है कि वे उचित-अनुचित का विचार करें, दूरवर्ती परिणामों का अनुमान लगायें और सन्मार्ग पर चलने के लिये बिना साथियों की प्रतीक्षा किये एकाकी चल पड़ने का साहस जुटायें। आमतौर से लोग प्रचलित ढर्रे पर चलते देख गये हैं। पत्ते और धूलिकण हवा के रुख के साथ उड़ने लगते हैं। दिशाबोध उन्हें कहाँ होता है? यही स्थिति लोकमानस के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। नीर-क्षीर की विवेक बुद्धि तो कम दीख पड़ने वाले राजहंसों में ही होती है। अन्य पक्षी तो ऐसे ही कूड़ा-कचरा और कीड़े-मकोड़े खाते देखे गये हैं।

🔴 किसी वस्तु को प्राप्त कर लेना एक बात है और उसका सदुपयोग बन पड़ना सर्वथा दूसरी। स्वास्थ्य सभी को मिला है, पर उसे बनाये रखने में समर्थ विरले ही होते हैं। अधिकांश तो असंयम अपनाते और उसे बरबाद ही करते हैं। बुद्धि का सदुपयोग कठिन है, चतुर कहे जाने वाले लोग भी उसे कहाँ कर पाते हैं? धन कमाते तो सभी हैं, पर उसका आधा चौथाई भाग भी सदुपयोग में नहीं लगता। उसे जिन कामों में जिस तरह खरचा जाता है, उससे खरचने वालों की, उनके सम्पर्क में आने वालों की तथा सर्वसाधारण की बरबादी ही होती है। प्रभाव का उपयोग प्राय: गिराने, दबाने, भटकाने में ही होता रहता है। इसे समझदार कहे जाने वाले मनुष्य की नासमझी ही कहा जायेगा। यह व्याधि सर्वसाधारण को बुरी तरह ग्रसित किये हुए है। इसी को कहते हैं राजमार्ग छोड़कर मृगतृष्णा में, भूल-भुलैयों में भटकना। जीवन सम्पदा के सम्बन्ध में भी यही बात है। जन्म से मरणपर्यन्त पेट प्रजनन जैसी सामयिक बातों में ही आयुष्य बीत जाता है। आवारागर्दी में दिन कट जाता है।        

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 शैतानियत से इस तरह निपटा जाए

🔴 अल कैपोन जिस रास्ते निकल जाता लोग रास्ता छोड देते। जिस पदाधिकरी से भेंट से जाती, उसके प्राण सूख जाते। पुलिस और न्यायाधीश उसकी दृष्टि से उसका बचाव करते थे। बड़ा खूंखार और बेईमान था वह व्यक्ति। उसके गिरोह में कितने बदमाश थे, इसका पता भी नहीं चल सकता था। वह अकेले अवैध शराब के धंधे में ही ३ करोड डालर प्रतिवर्ष कमाता था, पर क्या मजाल कि कोई अधिकारी उस पर चूँ कर जाए। सब उसकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहा करते थे।

🔵 स्वस्थ और बलवान् रहा होगा पर वह कोई भूत नहीं था जो उससे घबराया जाता, पर जब मनुष्य की संघर्ष और बुराइयों से मुकाबले की शक्ति समाप्त हो जाती है, तब कोई छोटा-सा साहसी बालक भी रौब गालिब कर सकता है। यदि १००-५० व्यक्ति भी संगठित होकर खड़े हो जाते तो अल कोपेन जैसे २० दुष्टों को मार कर रख देते पर प्राणों का अकारण मोह और पस्त हिम्मत खा जाती है मनुष्य को। जिस समाज के लोग बुराइयों से डरते है उनसे लड नहीं सकते वे उन अमेरिकनों की भाँति ही सताए जाते रहते है। चाहे चीनी हो या भारतवासी। हम भी तो आए दिन अवांछनीय लोगों द्वारा सताए जाते है, पर कही यह हिम्मत होती है उनसे लड पडने की ?

🔴 बात धीरे-धीरे अमेरिकन राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर के कानों तक पहुंच गई। हर्बर्ट हूवर हैरान थे कि एक व्यक्ति का मुकाबला करना भी लोगों को कठिन है, फिर यदि चारों तरफ ऐसे लोगो का फैलाव हो जाये तो क्या हो ? उन्होंने निश्चय कर लिया जो भी हो एक अमेरिकन राष्ट्रपति और भी गोली का शिकार हो जलेगा ? पर शैतानियत को खुलकर खेलने का अवसर नहीं दिया जायेगा। यदि कोपेन कुछ बुरे लोगो का मार्गदर्शन कर सकता है तो हम हजारो अच्छे लोगों को किस तरह बुराइयों से निबटा जाता है ? यह सिखाने की जिंदादिली भी रखते है।

🔵 अभी वे नये-नये ही राष्ट्रपति चुने गए हैं। जब लोगों को विजयोल्लास की सूझ रछ थी, तब राष्ट्रपति की आँखों में देशवासियों के इस संकट की किरकिरी खटक रही थी, मियामी के एक होटल में राष्ट्रपति के सम्मान में स्वागत दिया गया था। उनके हजारों प्रशंसक और पार्टीमेन सम्मिलित हुए थे। दैवयोग से राष्ट्रपति और अल-कोपेन की भेंट वहीं हो गई। उपस्थित अधिकारियों की उपेक्षा करता हुआ वह सिगरेट का धुँआ अभद्रता से छोड़ता हुआ निकल गया; सबकी आँखे उधर गई पर किसी को मी टोकने की हिम्मत न पडी़। उन्हें पता था उसे छेड़ने का मूल्य प्राणों से चुकना पड़ सकता है।

🔴 राष्ट्रपति हूवर ने पूछा-कौन है यह ?
'अल कैपोन' लोगों ने बताया। राष्ट्रपति का उबलकर आया हुआ क्रोध दब तो गया, पर वह इस निश्चय में बदल गया कि अब इस धूर्त को जल्दी से मिट्टी चखाना चाहिए।

🔵 साथियों, सलाहकारों ने समझाया कि उससे मोर्चा लेना आसान बात नहीं है। वह कोई भी कांड कर सकता है। इस पर राष्ट्रपति ने कहा मैं कब चाहता हूँ कि मैं केवल आसान बातें ही निबटाता रहूँ। मनुष्य को परमात्मा ने ऐसी शक्ति दी है कि हर किसी को असाधारण कार्य के लिए तैयार रहना चाहिए।

🔴 राष्ट्रपति ने सूचना विभाग का एक पूरा दस्ता उसके पीछे लगा दिया। उसे पता भी चल गया और किसी अपराध की पुष्टि नहीं हो रही थी, पर इनकम टैक्स के मामले में वह पकड़ में आ गया और राष्ट्रपति ने आगे आकर उसे गिरफ्तार करा दिया। इस बार न्यायधीशों के पास राष्ट्रपति की हिम्मत थी, सो उसे ११ वर्ष की कडी सजा दी गई। कैपोन जब जेल से छूटा तब एक ढी़ला डाला मजदूर मात्र रह गया था। उसके गिरोह का पता भी न था।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 11, 12

👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है।

🔵 अनेक बार छोटी-मोटी असफलता मिलने तथा अभाव ग्रस्त होने पर लोग ऐसा कहने लगते हैं-”क्या करें, हमारे भाग्य में ही ऐसा लिखा है, हमें ऐसी ही हीन स्थिति में रहना पड़ेगा। यदि हमारे भाग्य में सफलता बंधी होती तो अब तक के प्रयत्न असफल क्यों होते?” ऐसे अदूरदर्शी मनुष्य भाग्यवाद के गूढ़ सिद्धान्तों को नहीं समझते और न यह समझते हैं कि इस प्रकार की मान्यता बना लेने के कारण वे किस प्रकार अपने भविष्य के निर्माण में भारी बाधा उपस्थित कर रहे हैं। ऐसे लोग मार्ग की बाधाओं का मुकाबला नहीं कर सकते।

🔴 सफलता की देवी का प्रसन्न करने के लिए पुरुषार्थ की भेंट चढ़ानी पड़ती है। जो मनुष्य पुरुषार्थी नहीं है, प्रयत्न और परिश्रम में दृढ़ता नहीं रखता वह स्थायी सफलता का अधिकारी नहीं हो सकता। यदि अनायास किसी प्रकार कोई सम्पत्ति उसे प्राप्त हो भी जाय तो वह उससे संतोषजनक लाभ नहीं उठा सकता। वह ऐसे ही अनायास चली जाती है जैसे कि अनायास आई थी।

🔵 रोटी का स्वाद वह जानता है जिसने परिश्रम करने के पश्चात् क्षुधार्त होकर ग्रास तोड़ा हो। धन का उपयोग वह जानता है जिसने पसीना बहाकर कमाया हो। सफलता का मूल्याँकन वही कर सकता है जिसने अनेकों कठिनाइयों, बाधाओं और असफलताओं से संघर्ष किया हो। जो विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं के बीच मुस्कराते रहना और हर असफलता के बाद दूने उत्साह से आगे बढ़ना जानता है। वस्तुतः वही विजयलक्ष्मी का अधिकारी होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ 30

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Feb 2017

 
🔵 तू सूर्य और चन्द्र को अपने पास नहीं उतार सका इसका कारण उनकी दूरी नहीं, तेरी दूरी की भावना है। तू संसार को बदल नहीं पाया इसका कारण संसार की अपरिवर्तनशीलता नहीं, वरन् तेरे प्रयासों की शिथिलता है। जब तू यह कहता है कि मैं अपने में परिवर्तन नहीं कर सकता, तो इसे स्थिति और विवशता कहकर न टाल, साफ-साफ अपनी कायरता और अकर्मण्यता कह; क्योंकि इच्छा की प्रबलता ही कार्य की सिद्धि है।

🔴 गलती करना बुरा नहीं है; बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। संसार के महान् पुरुषों ने अनेक प्रकार की गलतियाँ की हैं। रावण जैसा विद्वान् अपने दुष्कृत्यों से राक्षस जैसा बन गया। वाल्मीकि डकैत रहे हैं। सुर, तुलसी, कबीर, मीरा, रसखान आदि सांसारिक जीवन में गलती करते रहे थे, लेकिन इन्होंने गलती को सुधारा और आगे बढ़कर महापुरुष बने। स्मरण रखिए कि एक गलती को सुधारकर आप किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाते हैं।

🔵 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 3) 7 Feb

🌹 मानव जीवन विचारों का प्रतिविम्ब

🔴 संसार एक शीशा है। इस पर हमारे विचारों की जैसी छाया पड़ेगी वैसा ही प्रतिविम्ब दिखाई देगा विचारों के आधार पर ही संसार सुखमय अनुभव होता है। पुरोगामी उत्कृष्ट उत्तम विचार जीवन को ऊपर उठाते हैं, उन्नति, सफलता, महानता का पथ प्रशस्त करते हैं तो हीन, निम्नगामी, कुत्सित विचार जीवन को गिराते हैं।

🔵 विचारों में अपार शक्ति है। जो सदैव कर्म की प्रेरणा देती है। वह अच्छे कार्यों में लग जाय तो अच्छे, और बुरे मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाय तो बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं। विचारों में एक प्रकार की चेतना शक्ति होती है। किसी भी प्रकार के विचारों में एक स्थान पर केन्द्रित होते रहने पर उनकी सूक्ष्म चेतन शक्ति घनीभूत होती जाती है। प्रत्येक विचार आत्मा और बुद्धि के संसर्ग से पैदा होता है। बुद्धि उसका आकार-प्रकार निर्धारित करती है तो आत्मा उसमें चेतना फूंकती है। इस तरह विचार अपने आप में एक सजीव किन्तु सूक्ष्म तत्व है।

🔴 मनुष्य के विचार एक तरह की सजीव तरंगें हैं जो जीवन संसार और यहां के पदार्थों को प्रेरणा देती रहती हैं। इस सजीव विचारों का जब केन्द्रीयकरण हो जाता है तो एक प्रचण्ड शक्ति का अनुभव होता है। स्वामी विवेकानन्द ने विचारों की इस शक्ति का उल्लेख करते हुए बताया है— कोई व्यक्ति भले ही किसी गुफा में जाकर विचार करे और विचार करते-करते ही वह मर भी जाय तो वे विचार कुछ समय उपरान्त गुफा की दीवारों का विच्छेद कर बाहर निकल पड़ेंगे, और सर्वत्र फैल जायेंगे।

🔵 वे विचार तब सबको प्रभावित करेंगे।’’ मनुष्य जैसे विचार करता है, उनकी सूक्ष्म तरंगें विश्वाकाश में फैल जाती हैं। सम स्वभाव के पदार्थ एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं, इस नियम के अनुसार उन विचारों के अनुकूल दूसरे विचार आकर्षित होते हैं और व्यक्ति को वैसे ही प्रेरणा देते हैं। एक ही तरह के विचार घनीभूत होते रहने पर प्रचण्ड शक्ति धारण कर लेते हैं और मनुष्य के जीवन में जादू की तरह प्रकाश डालते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 10)

🌹 तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे  
🔵 तीसरा उद्यान है- अन्त:करण क्षेत्र का, जिसमें भाव संवेदनाएँ मान सरोवर की तरह लहराती और गंगा भागीरथी की तरह उत्ताल तरंगों के साथ बहती हैं। मात्र निष्ठुरता ही एक ऐसी चट्टान है, जो इन उद्गमों का द्वार बन्द किये रहती है। यही है वह उल्लास उद्गम जिसमें देवता रहते, महामानव विकसते और ऋषि मनीषियों की चेतना निवास करती है। संकीर्ण स्वार्थपरता ही एक ऐसी बाधा है, जो मनुष्य को उदारमना बनकर उच्चस्तरीय सेवा साधना के लिए अजस्र अवसर उपलब्ध नहीं होने देेती है।

🔴 मनुष्य भटका हुआ देवता है। यदि वह अपने इस भटकाव से छुटकारा पा सके और महानता के राजमार्ग पर चलते रहने की विवेकशीलता अपना सके, तो उतने भर से ही स्वयं पार उतरने और अनेकों को पार उतारने की स्थिति अनायास ही बन सकती है। इसके लिए विद्वान या पहलवान होना आवश्यक नहीं। कबीर, दादू, रैदास, मीरा, शबरी आदि ने विद्वता या सम्पन्नता के आधार पर वह श्रेय प्राप्त नहीं किया था, जिससे अब भी असंख्यकों को उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ उपलब्ध करते देखा जाता है। 

🔵 मनुष्य के पास शरीर, मन और अन्त:करण यह तीन ऐसी खदानें हैं, जिनमें से इच्छानुसार मणिमुक्तक खोद निकाले जा सकते हैं। बाहरी सहयोग भी सत्पात्रों को अनायास ही मिल जाता है। अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों को सहज छात्रवृत्तियाँ मिल जाती हैं। मात्र कुपात्र ही कभी भाग्य पर, कभी ग्रह नक्षत्रों पर और कभी जो भी सामने दीख पड़ते हैं, उसी पर दोष मढ़ते रहते हैं। गतिवानों को किसी ने रोका नहीं है। गंगा का प्रवाहमान सङ्कल्प, उसे महासागर के मिलन तक पहुँचाए बिना बीच में कहीं रुका नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 संकल्पवान्-व्रतशील बनें (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 आपका दुश्मन नम्बर एक-आपका मन और आपका दोस्त नम्बर एक-आपका मन। दुश्मन को दोस्त के रूप में बदलने के लिये जिस दबाव की जरूरत है, जिस आग की भट्ठी में नया औजार ढालने की जरूरत है, उस भट्ठी का नाम है-संकल्प, आत्मानुशासन। अपने आपका आत्मानुशासन स्थापित करने के लिये आपको व्रतशील होना चाहिए, संकल्पवान् होना चाहिए और संकल्पों में व्यवधान उत्पन्न न हो, इसलिये आपको कोई न कोई ऐसे नियम और व्रत समय-समय पर लेते रहना चाहिए। इसका अर्थ ये होता है कि जब तक अमुक काम न हो जायेगा, तब तक हम अमुक काम नहीं करेंगे।

🔵 संकल्पवान् बनिए। संकल्पवान् ही महापुरुष बने हैं, संकल्पवान् ही उन्नतिशील बने हैं, संकल्पवान् ही सफल हुए हैं और संकल्पवानों ने ही संसार की नाव को पार लगाया है। आपको संकल्पवान् और व्रतशील होना चाहिए। नेकी आपकी नीति होनी चाहिए। उदारता आपका फर्ज होना चाहिए। आपने अगर ऐसा कर लिया हो तब फिर आप दूसरा कदम ये उठाना कि हम ये काम नहीं किया करेंगे।

🔴 समय-समय पर सोच लिया कीजिए कि गुरुवार के दिन, नमक न खाने की बात, ब्रह्मचर्य से रहने की बात, दो घण्टे मौन रहने की बात, आप भी ऐसे व्रतशील होकर के कुछ नियम पालन करते रहेंगे और उसके साथ में किसी श्रेष्ठ कर्तव्य और उत्तरदायित्व का ताना-बाना जोड़ के रखा करेंगे तो आपके विचार सफल होंगे, आपका व्यक्तित्व पैना होगा और आपकी प्रतिभा तीव्र होगी और आप एक अच्छे व्यक्ति के रूप में शुमार होंगे। अगर आप आत्मानुशासन और अपनी व्रतशीलता का महत्त्व समझें और उसे अपनाने की हिम्मत बढ़ायें।

🌹 आज की बात समाप्त।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 96)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴  (7) सुधार प्रतिरोध और असहयोग— जहां विवाहों में अपव्यय करने का पागलपन गहराई तक जड़ जमाये बैठा हो, वहां यह आशा नहीं की जा सकती कि प्रचार से ही सब कुछ ठीक हो जायगा। इसके लिए उस किसान या माली से प्रेरणा लेनी पड़ेगी जो अवांछनीय झाड़-झंखाड़ों को उखाड़ फेंकने के लिए उनकी जड़ों पर अपने पैने औजारों के तीव्र प्रहार करता है। कूड़ा-करकट अपने आप नहीं हटता उसे झाड़ू से घसीट कर बाहर करना होता है। कुरीतियां अपने आप मिटने वाली नहीं हैं उनके विरुद्ध संघर्ष करना पड़ेगा। उस संघर्ष में अपने को कुछ चोट पहुंचती हो तो उसे धर्म वीरों की परम्परा के अनुसार त्याग बलिदान का छोटा-सा सौभाग्य मानने के लिए तैयार रहना चाहिए।

🔵 हम में से जिनका प्रभाव जहां हो, वहां उस प्रभाव का उपयोग करके इन कुरीतियों से बचने का प्रयत्न करना चाहिए। अपने घर, कुटुम्ब, मित्र एवं रिश्तेदारों में तो ऐसा सुझाव बलपूर्वक भी किया जा सकता है और यदि वे न मानें तो अपने असहयोग की, उस विवाह में सम्मिलित न होने की बात भी कही जा सकती है।

🔴 जिन विवाहों में अपने को सम्मिलित होने का अवसर मिले उनमें पूर्णतया न सही, जितना कुछ वश चले, 24 में से जितने भी सूत्र जितने अंशों में भी कार्यान्वित किये जा सकें उसके लिए जोर देना चाहिये, प्रयत्न करना चाहिये। जो अन्य प्रभावशाली व्यक्ति उस उत्सव में आते हों उनमें से कोई विचारवान दीखें तो उनके माध्यम से प्रभाव डलवाना चाहिये ताकि जितने अंशों में कुरीतियां हट सकें उतना तो किया ही जाय। आदर्श विवाह आन्दोलन के सम्बन्ध में छपे ट्रैक्ट भी ऐसे अवसरों पर रखने चाहिये और उन्हें पढ़ा सुनाकर ऐसा वातावरण बनाना चाहिये कि सुधारवादी विचारधारा के लिए कोई स्थान उनके मन में बने। यह सब काम बिना कटु संघर्ष के चतुरता एवं बुद्धिमत्ता द्वारा मधुरता के वातावरण में भी सम्पन्न हो सकते हैं।

🔵 असहयोग वहीं करना चाहिए जहां अपना दबाव हो। अन्य विवाहों में सम्मिलित होकर अपनी विचारधारा के पक्ष में जितना भी वातावरण बन सके उतना बनाना चाहिये। रूठ बैठना या ऐसे पुराने ढर्रे से जहां विवाह हो रहा हो वहां जाना ही नहीं इस प्रकार का असहयोग व्यर्थ है। वहां तो भीतर घुस कर ही कुछ काम हो सकता है।

🔴 यों कानून द्वारा भी दहेज, अधिक बारात ले जाने पर कड़े प्रतिबन्ध लगे हुए हैं, पर उनका प्रयोग न करे जहां तक सम्भव हो सके प्रेम, मधुरता, प्रचार, समझाना, धमकी, नाराजी आदि शस्त्रों से ही काम लेना चाहिये। जहां अनिवार्य हो जाय वहीं कानूनी सहायता ली जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 44)

🌹 गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴 गंगोत्री तक राहगीरों के लिए बना हुआ भयंकर रास्ता है। गोमुख तक के लिए उन दिनों एक पगडण्डी थी। इसके बाद कठिनाई थी। तपोवन काफी ऊँचाई पर है। रास्ता भी नहीं है। अंतःप्रेरणा या भाग्य भरोसे चलना पड़ता है। तपोवन पठार चौरस है। फिर पहाड़ियों की ऊँची शृंखला है। इसके बाद नंदन वन आता है। हमें यहीं बुलाया गया था। समय पर पहुँच गए। देखा तो गुरुदेव खड़े थे। प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। हमारा भी और उनका भी। वे पहली बार हमारे घर गए थे, इस बार हम उनके यहाँ आए। यह सिलसिला जीवन भर चलता रहे, तो ही इस बँधे सूत्र की सार्थकता है।

🔵 तीन परीक्षाएँ इस बार होनी थीं, बिना साथी के काम चलाना-ऋतुओं के प्रकोप की तितिक्षा सहना, हिंस्र पशुओं के साथ रहते हुए विचलित न होना। तीनों में ही अपने को उत्तीर्ण समझा और परीक्षक ने वैसा ही माना।

🔴 बात-चीत का सिलसिला तो थोड़े ही समय में पूरा हो गया। ‘‘अध्यात्म शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रचण्ड मनोबल सम्पादित करना, प्रतिकूलताओं को दबोचकर अनुकूलता में ढाल देना, सिंह व्याघ्र तो क्या-मौत से भी न डरना, ऋषि कल्प आत्माओं के लिए तो यह स्थिति नितांत आवश्यक है। तुम्हें ऐसी ही परिस्थितियों के बीच अपने जीवन का बहुत सा भाग गुजारना है।’’

🔵 उस समय की बात समाप्त हो गई। जिस गुफा में उनका निवास था, वहाँ तक ले गए। इशारे में बताए हुए स्थान पर सोने का उपक्रम किया, तो वैसा ही किया। इतनी गहरी नींद आई कि नियत क्रम की अपेक्षा दूना तीन गुना समय लग गया हो तो कोई आश्चर्य नहीं। रास्ते की सारी थकान इस प्रकार दूर हो गई, मानो कहीं चलना ही नहीं पड़ा था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur.3

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 44)

🌞  हिमालय में प्रवेश (तपोवन का मुख्य दर्शन)

🔵 इस झोंपड़ी के चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ है। प्रकृति स्तब्ध। सुनसान का सूनापन अखर रहा था। दिन बीता, रात आई। अनभ्यस्त वातावरण के कारण नींद नहीं आ रही थीं। हिंस्र पशु, चोर, सांप, भूत आदि तो नहीं पर अकेलापन डरा रहा था। शरीर के लिये करवटें बदलने के अतिरिक्त कुछ काम न था। मस्तिष्क खाली था, चिन्तन की पुरानी आदत सक्रिय हो उठी। सोचने लगा—अकेलेपन का डर क्यों लगता है?

🔴 भीतर से एक समाधान उपजा—मनुष्य समष्टि का अंग है। उसका पोषण समष्टि द्वारा ही हुआ है। जल तत्त्व से ओत-प्रोत मछली का शरीर जैसे जल में ही जीवित रहता है वैसे ही समष्टि का एक अंग, समाज का एक घटक, व्यापक चेतना का एक स्फुल्लिंग होने के कारण उसे समूह में ही आनन्द आता है। अकेलेपन में उस व्यापक समूह चेतना से असंबद्ध हो जाने के कारण आन्तरिक पोषण बन्द हो जाता है, इस अभाव की बेचैनी ही सूनेपन का डर हो सकता है।

🔵 कल्पना ने और आगे दौड़ लगाई। स्थापित मान्यता की पुष्टि में उसने जीवन के अनेक संस्मरण ढूंढ़ निकाले। सूनेपन के, अकेले विचरण करने के अनेक प्रसंग याद आये, उनमें आनन्द नहीं था, समय ही काटा गया था। स्वाधीनता संग्राम में जेल यात्रा के उन दिनों की याद आई जब काल कोठरी में बन्द रहना पड़ा था। वैसे उस कोठरी में कोई कष्ट न था पर सूनेपन का मानसिक दबाव बहुत पड़ा था एक महीने बाद जब कोठरी से छुटकारा मिला तो शरीर पके आम की तरह पीला पड़ गया था। खड़े होने में आंखों तले अंधेरा आता था।

🔴 चूंकि सूनापन बुरा लग रहा था, इसलिए मस्तिष्क के सारे कल पुर्जे उसकी बुराई साबित करने में जी जान से लगे हुये थे। मस्तिष्क एक जानदार नौकर के समान ही तो ठहरा। अन्तस् की भावना और मान्यता जैसी होती है उसी के अनुरूप वह विचारों का, तर्कों, प्रमाणों, कारणों और उदाहरणों का पहाड़ जमा कर देता है। बात सही है या गलत यह निर्णय करना विवेक बुद्धि का काम है। मस्तिष्क की जिम्मेदारी तो इतनी भर है कि अभिरुचि जिधर भी चले उसके समर्थन के लिये, औचित्य सिद्ध करने के लिए आवश्यक विचार सामग्री उपस्थित कर दें अपना मन भी इस समय वही कर रहा था।।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...