शनिवार, 14 जुलाई 2018

👉 अपने खानदान का परिचय

🔶 एक गाँव मे एक संत आये हुये थे श्री रामदास कुछ दिनो तक वो वही पर सत्संग का प्रवचन करने के लिये ठहरे हुये थे वो बहुत ही शालीन स्वभाव के थे और स्वयं के हाथों से सात्विक आहार बनाकर ग्रहण करते थे!

🔷 एक बार एक युवक आया और उसने रामदास जी से अपने घर भोजन ग्रहण करने के लिये कहा तो महात्मा जी ने कहा वत्स मैं अन्यत्र कही भोजन नही करता हूँ ये मेरा नियम है पर वो युवक बड़ी जिद्दी करने लगा और बार बार समझाने पर भी जब वो न समझा तो रामदास जी ने उसका दिल रखने के लिये अपनी स्वीकृति दे दी!

🔶 अगले दिन महात्मा जी उसके घर भोजन करने को गये तो उस युवक ने भोजन का थाल लगाया नाना प्रकार के व्यंजन बनाये और उस थाल मे परोसकर महात्माजी के आगे रखे और फिर महात्माजी ने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया और जैसे ही महात्माजी ने आँखे खोली तो उस युवक ने महात्मा जी से कहा रे ढोंगी तु तो कही भोजन नही करता फिर यहाँ क्यों आया और उसने उन्हे काफी अपशब्द कहे फिर महात्मा जी वहाँ से मुस्कुराकर चले गये और बारम्बार भगवान श्री राम का शुक्रिया अदा कर रहे थे!

🔷 श्री रामदास जी की वो मुस्कुराहट और उनके द्वारा भगवान श्री राम जी को शुक्रिया अदा करना उस युवक के समझ मे न आया और बारबार श्री रामदास जी की वो मुस्कुराहट एक तीर की तरह उसके सीने मे उतर गई और फिर जिस दिन कथा की पूर्णाहुति थी वो युवक श्री रामदास जी के पास गया और क्षमा प्रार्थना करने लगा तो महात्माजी ने उन्हे तत्काल क्षमा कर दिया!

🔶 युवक ने कहा देव उसदिन जब मैंने आपको इतने असभ्य शब्द बोले तो आपने वापिस प्रति उत्तर क्यों न दिया ? और रामजी का शुक्रिया अदा क्यों कर रहे थे?

🔷 हॆ वत्स दो कारण थे एक तो मेरे गुरुदेव ने मुझसे कहा था की बेटा रामदास जब भी कोई तुझे असभ्य शब्द बोले तो अपने नाम को उल्टा कर के समझ लेना अर्थात सदा मरा हुआ समझ लेना वो जो कहे उसे सुनना ही मत! और यदि तु सुन भी ले तो तु यही समझना की ये अपने असभ्य खानदान का परिचय दे रहा है और जब कोई सामने वाला अपना परिचय दे तो तु भी अपना परिचय देना और हर परिस्तिथि मे मुस्कुराहट और सभ्यता के साथ पेश आना और चुकी तुम्हे संत बनना है तो संयम ही संत का और उसके खानदान का परिचय है तो तु संयम से अपना परिचय देना कही तु अपना आपा मत खो देना कही तु भी उसकी तरह असंयमितता का परिचय मत दे देना!

🔶 और मैं श्री राम जी का इसलिये शुक्रिया अदा कर रहा था की हॆ मेरे राम तुने नियम भी बचा लिया और गूरू आदेश भी! और आज मैं संतुष्ट होकर तुम्हारे गाँव से जा रहा हूँ और एक बार फिर से रामजी का आभार प्रकट करता हूँ!

🔷 युवक ने कहा पर आप अब क्यों आभार प्रकट कर रहे है?

🔶 रामदास जी ने कहा बेटा तेरा ह्रदय परिवर्तन हो गया और तेरे गाँव मे आना मेरा सार्थक हो गया और वो युवक संत श्री के चरणों मे गिर गया!

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👉 आज का सद्चिंतन 14 July 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 July 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 1)


👉 सार-संक्षेप

🔶 भगवत्सत्ता का निकटतम और सुनिश्चित स्थान एक ही है, अंतराल में विद्यमान प्राणाग्नि। उसी को जानने-उभारने से वह सब कुछ मिल सकता है, जिसे धारण करने की क्षमता मनुष्य के पास है। प्राणवान् प्रतिभा संपन्नों में उस प्राणाग्नि का अनुपात सामान्यों से अधिक होता है। उसी को आत्मबल-संकल्पबल भी कहा गया है।

🔷 पारस को छूकर लोहा सोना बनता भी है या नहीं? इसमें किसी को संदेह हो सकता है, पर यह सुनिश्चित है कि महाप्रतापी-आत्मबल संपन्न व्यक्ति असंख्यों को अपना अनुयायी-सहयोगी बना लेते हैं। इन्हीं प्रतिभावानों ने सदा से जमाने को बदला है-परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाई है। प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह तो अंदर से जागती है। सवर्णों को छोड़कर वह कबीर और रैदास को भी वरण कर सकती है।

🔶 बलवानों, सुंदरों को छोड़कर गाँधी जैसे कमजोर शरीर वाले व चाणक्य जैसे कुरूपों का वरण करती है। जिस किसी में वह जाग जाती है, साहसिकता और सुव्यवस्था के दो गुणों में जिस किसी को भी अभ्यस्त-अनुशासित कर लिया जाता है, सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल जाता है। प्रतिभा-परिष्कार -तेजस्विता का निखार आज की अपरिहार्य आवश्यकता है एवं इसी आधार पर नवयुग की आधारशिला रखी जाएगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 2

👉 हम दो ही बात आपसे कहना चाहते हैं

🔶 ईसाई मिशन की महिलाएँ भी घर-घर जाती हैं और यह कहती हैं कि हमारी एक पैसा की किताब जरूर खरीदिये। अगर अच्छी न लगे तो कल मैं वापस ले लूँगी। अरे यह किताब बेचना नहीं है बाबा, मेरे विचार को घर-घर पहुँचाना है। आप लोगों के जिम्मे हमारा एक सूत्रीय कार्यक्रम है। आप जाइये, अपने को निचोड़िये। आपका घर का खर्च यदि 1000 रुपये है तो निचोड़िये इसको और उसमें से बचत को ज्ञानयज्ञ के लिए खर्च कीजिये। हमारी आग को बिखेर दीजिये, वातावरण को गरम कर दीजिये, उससे अज्ञानता को जला दीजिये। आप लोग जाइये और अपने आपको निचोड़िये। ज्ञानघट का पैसा खर्च कीजिये तो क्या हम अपनी बीबी को बेच दें? बच्चे को बेच दें? चुप कंजूस कहीं के ऊपर से कहते  हैं हम गरीब हैं। आप गरीब नहीं कंजूस हैं।

🔷 हर आदमी के ऊपर हमारा आक्रोश है। हमें आग लग रही है और आप निचोड़ते नहीं हैं। इनसान का ईमान, व्यक्तित्व समाप्त हो रहा है। आज शक्तिपीठें, प्रज्ञापीठें जितनी बढ़ती जा रही हैं, उतना ही आदमी का अहंकार बढ़ता जा रहा है। आपस में लड़ाई-झगड़े बढ़ते जा रहे हैं। सब हविश के मालिक बनते जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि अब पन्द्रह-बीस हजार में फूस के शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ बन जाते तो कम से कम लोगों का राग-द्वेष, अहंकार तो नहीं बढ़ता। आज आप लोगों से एक ही निवेदन कि आप हमारी आग स्वयं बिखेरिये, नौकरी से नहीं, सेवा से।

🔶 आप जाइये एवं हमारा साहित्य पढ़िये तथा लोगों को पढ़ाइये और हम क्या कहना चाहते थे। हम दो ही बात आपसे कहना चाहते हैं- पहली हमारी आग को घर-घर पहुँचाइये, दूसरी ब्राह्मण एवं सन्त को जिन्दा कीजिये ताकि हमारा प्याऊ एवं अस्पताल चल सके, ताकि लोगों को-अपने बच्चों को खिला सकें तथा उन्हें जिन्दा रख सकें तथा मरी हुई संस्कृति को जिन्दा कर सकें। आप 11 माला जप करते हैं-आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। यह जादूगरी नहीं है। किसी माला में कोई जादू नहीं है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि मनोकामना की मालाएँ, जादूगरी की माला में आग लगा दीजिये, आप मनोकामना की माला, जादूगरी की माला, आज्ञाचक्र जाग्रत करने की माला को पानी में बहा दीजिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय-नं-68-पेज-1.12

👉 मन का मैल-वहम

🔶 हमारी अनेक बातें केवल वहम की प्रतिक्रियाएँ हैं। वहम मन का मैल है। यह अज्ञान अविश्वास एवं मूढ़ता का प्रतीक है। अमुक तिथि को गृह से प्रस्थान न होना चाहिए। छींकने पर कोई भयंकर घटना घटित होने वाली है। छिपकली शरीर पर गिर गई, अतः मृत्यु अवश्यंभावी है, जन्मपत्री नहीं मिलती अतः दाम्पत्य जीवन में रोग शोक कटुता होनी ही चाहिए-हमारी ऐसी ही अनेक वहमी धारणाएँ मानसिक निर्बलता की द्योतक हैं। भारतवासी अभी इतने ज्ञान सम्पन्न नहीं हो पाये हैं कि अपनी पुरानी विचार धाराओं को तिलाँजलि दे दें। वस्तुतः वे रोग और व्याधि को किसी अदृष्ट शक्ति का व्यापार मान लेते हैं।

🔷 अनेक व्यक्ति चिंता, क्रोध, भय इत्यादि मनोवेगों द्वारा अपने मनोबल को इतना निर्बल बना लेते हैं कि इनके द्वारा उनकी मानसिक स्थिति अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठती हैं। ऐसे व्यक्तियों का मन सर्वदा किसी अज्ञात भय से उत्तेजित, गिरा हुआ और प्रकम्पित रहता है, चित्त में निरंतर अस्थिरता वर्तमान रहती है, विचार क्षिप्र गति से परिवर्तित होते रहते हैं, स्मरण शक्ति का ह्रास होता है, जरा-जरा सी बातों में उद्विग्नता, कटुता, कर्कशता उत्पन्न होती है, मन कुत्सित कल्पनाओं का अड्डा बन जाता है, और अन्त में अनेक मनो जनित रोग उन्हें धर दबाते हैं। कभी-कभी यह मानसिक दुर्बलता पागलपन में प्रकट होकर अनेक उपद्रव करती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-फर. 1946 पृष्ठ 4

👉 स्वार्थ छोडिये

एक छोटे बच्चे के रूप में, मैं बहुत स्वार्थी था, हमेशा अपने लिए सर्वश्रेष्ठ चुनता था। धीरे-धीरे, सभी दोस्तों ने मुझे छोड़ दिया और अब मेरे...