शनिवार, 7 अप्रैल 2018

👉 आनन्द की खोज

🔷 मित्रो! आनन्द की खोज में भटकता हुआ इन्सान, दरवाजे-दरवाजे पर टकराता फिरता है। बहुत-सा रुपया जमा करें, उत्तम स्वास्थ्य रहे, सुस्वाद भोजन करें, सुन्दर वस्त्र पहनें, बढिय़ा मकान और सवारियाँ हों, नौकर-चाकर हों, पुत्र, पुत्रियों, बंधुओं से घर भरा हो, उच्च अधिकार प्राप्त हो, समाज में  प्रतिष्ठा हो, कीर्ति हो। ये चीजें आदमी प्राप्त करता है। जिन्हें ये चीजें उपलब्ध नहीं होती, वे प्राप्त करने की कोशिश करते है। जिनके पास हैं, वे उससे अधिक लेने का प्रयत्न करते हैं।

🔶 इन सब तस्वीरों में आनन्द खोज करते-करते चिरकाल बीत गया, पर राजहंस को ओस ही मिली। मोती! उसकी तो खोज ही नहीं की, मानसरोवर की ओर तो मुँह ही नहीं किया, लम्बी उड़ान भरने की तो हिम्मत ही नहीं बाँधी। मन ने कहा-जरा इसे और देख लूँ। आँखों से न दीख पडऩे वाले मानसरोवर में मोती मिल ही जाएँगे, इसकी क्या गारंटी है। फिर ओस चाटी और फडफ़ड़ाया, फिर यही पहिया चलता रहता है। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूँदें ठहरीं, वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ी और धूल में समा गईं।
  
🔷 यही नष्ट होने की आशंका अधिक संचय के लिए प्रेरित करती रहती है, फिर भी नाशवान चीजों का नाश होता ही है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 7 April 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 April 2018

👉 Family Balance

🔷 Not all members of the family have the same nature. Each one of them carries their own nature and habits. No matter how much we may want to, we simply cannot mold everyone to our liking. The intelligent thing is to be close to people with whom behavioral harmony is possible, with whom we can stay mutually bound with the soft yet strong strands of love and compassion.

🔶 A compromising yet idealistic middle path is what we need in order to infuse love, harmony, and progressive energy into the small community that is the family. Those who practice this crucial balance do not lack in familial happiness, even if there may be plenty of room for growth and improvement in their personality

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:3.35

👉 परिवारिक संतुलन

🔷 कुटुम्ब में सब लोग एक प्रकृति के नहीं होते। जन्म-जन्मान्तरों से संग्रहीत उनके अपने स्वभाव-संस्कार होते हैं इसलिए अपनी रूचि के ढॉंचे में सबको मिट्टी के खिलौने की तरह नहीं ढाला जा सकता, अस्तु, बुद्धिमान लोग उस व्यक्ति को स्वीकार करते हैं जिससे अधिकाधिक सामंजस्य बना रहे। स्नेह-सदभाव और सहयोग की सौम्य-श्रृंखला में वे परस्पर बॅंधे-जकड़े रहें। अवांछनीय दोष-दुर्गुणों के निराकरण और सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन का उत्तरदायित्व चतुर लोग इस प्रकार निबाहते हैं कि साँप मरे न लाठी टूटे। सुधार की उग्रता इतनी न हो कि जिससे स्नेह-सद्भाव का धागा टूटने और दाने बिखरने की ही स्थिति बन जाय। उतनी उपेक्षा भी न बरती जाय कि हर कोई अनियन्त्रित होकर मनमानी करने लगे और परिवार-संस्था का उद्देश्य ही नष्ट हो जाय।

🔶 कुटुम्ब के छोटे समूह को स्नेहसिक्त, संतुलित, प्रगतिशील, और सुसंस्कारी बनाने के लिए मध्यमार्गी किन्तु आदर्शवादी विधि-व्यवस्था अपनानी पड़ती है। जो इस सन्तुलन का अभ्यस्त है उसे परिवार सुख की कमी नहीं रहती। भले ही सम्बद्ध व्यक्ति उतने सुसंस्कारी एवं सुविकसित नहीं भी हों।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.३५)

👉 Lost Confidence Led to Karna's Defeat

🔷 In the epic war of Mahabharat, the great warrior Karna was on Duryodhan's side. He had a very clever charioteer, Shalya. Since, Duryodhan was fighting for an evil cause, Lord Krishna secretly told Shalya, "Although you have given your word to support Duryoudhan by becoming Karna's charioteer, you can still help the righteous cause by constantly, discouraging and demoralizing Karna during the battle."

🔶 Although, Karna was a great warrior, he ultimately lost the battle with Arjuna, just because he lost his confidence, due to constant demoralizing and discouragement by Shalya. Success can not be achieved if one looses his confidence. Self-confidence guarantees success provided the objective is morally correct.

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 6)

🔷 आध्यात्मिकता के रास्ते पर, जहाँ भगवान का पल्ला पकड़ना पड़ता है, वहाँ दूसरा वाला कदम ये उठाना पड़ता है कि हमारी जीवन की साधना क्रमबद्ध है कि नहीं, हमने अपने को साध लिया है कि नहीं। साध लेने से आदमी का मूल्य बढ़ जाता है। आप जानते हैं न! साँप को मदारी लोग पाल लेते हैं और सिखा लेते हैं। वो साँप जो आमतौर से हर आदमी को काट खाता है, वही साँप मदारी के बाल-बच्चों के गुजारे का माध्यम बन जाता है। बन्दर के बारे में आप जानते हैं न। बन्दर कितना वाहियात! किसी के कपड़े उठा के भाग जाता है, किसी को काट खाता है, किसी को क्या करता है; लेकिन वही बन्दर पाल लिया जाता है, सिखा लिया जाता है, साध लिया जाता है, तो मदारी के बाल-बच्चों का गुजारा करने के लिए वही सबसे बड़ा स्त्रोत हो जाता है।

🔶 रीछ जानते हैं, कैसा खौफनाक होता है। लेकिन रीछ जब पाल लिये जाते हैं, साध लिये जाते हैं, तब रीछ ही अपने पालने वाले का गुजारा कर देता है। सर्कस के बारे में आप जानते हैं न। शेर कितना भयंकर और दूसरे जानवर कितने भयंकर! लेकिन रिंगमास्टर के द्वारा जब साध लिए जाते हैं, तो सर्कस के मालिक को एक-एक दिन में हजारों रुपये कमा करके देते हैं। शेर, जो किसी को भी मार डाल सकते हैं, मालिक को दो-दो हजार रुपया रोज कमा करके देते हैं। ये कैसे हो सका? साधना के द्वारा। साधना जैसे जंगली जानवरों की, की जा सकती है। साधना अगर न की जाए तब? आदमी प्राकृतिक रूप से बड़ा वाहियात है, वनमानुष है।

🔷 डारविन ने कहा था कि इनसान बन्दर की औलाद है; बन्दर नहीं है, वह बन्दर का भाई-बन्धु है। वनमानुष होते हैं, जंगलों में रहते हैं, देखे हैं न आपने? न इनको कपड़ा पहनना आता है, न इनकी कोई सभ्यता है, न इनकी कोई बातचीत है। ऐसे किसी तरीके से जैसे बन्दर पाल लिये जाते हैं, ऐसे एक वनमानुष के तरीके से वे लोग भी गुजारा कर लेते हैं, जिनको लोग जंगली कहते हैं। जंगली लोग को नर-पशुओं में गिना जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 83)

👉 सबसे सच्ची सिद्धि : गुरुभक्ति
🔷 विद्यार्थी जीवन में उसका परिचय एक अघोर साधक से हुआ। यह अघोर साधक जिसे सभी अघोरी कहते थे, कई आश्चर्यजनक सिद्धियों-शक्तियों का स्वामी था। एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में बदल देना उसके लिए साधारण कौतुक भर था। मिठाई को विष्ठा बना देना और सड़े मांस को सुगन्धित, सुरभित मिष्टान्न में परिवर्तित कर देना उसके लिए पलक झपकाने भर का काम था। पंचभूतों के अणु-परमाणु को अपने संकल्प बल से एकत्रित करके किसी भी वस्तु को साकार कर देना भी उसके लिए सामान्य सी बात थी और भी अनेकों आश्चर्यजनक सिद्धियाँ उसके पास थीं। अपनी इन सारी शक्तियों के बावजूद यह अघोर साधक बड़ा व्यथित, पीड़ित रहा करता था। यहाँ तक कि कभी-कभी शून्य में तकते हुए उसकी आँखों से आँसुओं की धार बह निकलती।
  
🔶 एक दिन इस विद्यार्थी ने उससे पूछा- बाबा! आप बीच-बीच में इतने दुःखी क्यों हो जाते हैं? आपके पास तो इतनी सिद्धियाँ हैं, फिर भी आप रोने लगते हैं? जवाब में उसने लगभग बिलखते हुए कहा- बेटा! तू शायद अभी समझेगा नहीं। पर चल तुझे बताकर अपना मन हलका कर लेता हूँ। तू पूछता है तो सुन ले- मेरा भगवान् मुझसे रूठ गया है। मेरा गुरु मुझसे नाराज है। उसने मुझे एक हजार साल तक भटकते रहने का शाप दिया है। बाबा की ये अटपटी बातें इस विद्यार्थी के पल्ले नहीं पड़ीं। उसने बस यूँ ही पूछा- तब कितने साल हो गए आपको भटकते हुए। ७५० साल, उसने बड़े इत्मिनान से जवाब दिया।
  
🔷 इस जवाब ने पूछने वाले को गहरी हैरानी में डाल दिया। उसने कहा—पर आप तो केवल ५०-६० साल के लगते हैं। यह बात सुनकर वह जोर से हँसा और बोला- अरे, मैं शरीर की बात थोड़े ही करता हूँ। इस शरीर की तो यही उम्र होगी। मैं तो अपनी बात करता हूँ। शरीर तो  जब भी पुराना हो जाता है, मैं उसे छोड़कर किसी युवा मृत शरीर में प्रवेश कर जाता हूँ। साँप काटे हुए व्यक्ति को प्रायः लोग बहा देते हैं। ऐसे ही किसी शरीर को मैं अपना बना लेता हूँ।
  
🔶 पर आपके गुरु नाराज क्यों हुए? गुरु तो बड़े कृपालु होते हैं। सिद्धियों के घमण्ड से? अरे बेटा! मुझे अपनी साधना और सिद्धियों का भारी घमण्ड हो गया था। इस घमण्ड के कारण मैं किसी को कुछ नहीं समझता था। यहाँ तक कि लोगों के बहकावे में आकर मैं स्वयं को भगवान् मानने लगा था। इसी अहं के कारण एक दिन मैंने अपने गुरु को भी खरी-खोटी सुना दी। इस पर गुरुदेव ने कहा- तू क्या समझता है सिद्धियों से कोई भगवान् हो जाता है। जा तू अब १००० साल तक भटक और सिद्धियों के दंश को झेल। बस, बेटा तब से मैं नए-नए शरीरों में रहते हुए सिद्धियों के शाप को झेल रहा हूँ।
  
🔷 अपनी बात कहते हुए उसने पूछने वाले के सिर पर प्यार से हाथ रखा और बोला- बेटा! आगे कुछ सालों के बाद तुझे तेरे गुरु मिलेंगे। तू कभी भी उनकी बात की अवहेलना न करना। उनकी सब बातें मानना और सिद्धियों के जाल में मत उलझना। सबसे सच्ची सिद्धि तो गुरुभक्ति है। जिसे यह मिल गई, उसे समझो सब कुछ मिल गया। इस सिद्धि का उपाय क्या है? यह अगले मंत्र में स्पष्ट किया गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 127