सोमवार, 29 जनवरी 2018

👉 गलती को भी मानें

🔷 अक्सर हम आवेश में आकर ऐसी प्रतिक्रिया दे देते हैं जो बाद में जाकर हमें दुःख देती है। कई बार परिवार के भीतर या कंपनी में ही हम अपने वरिष्ठों ये कनिष्ठों की बात को पूर्ण सुने बिना ही अपनी प्रतिक्रिया दे देते हैं। हम दूसरों में खोट, कपट, बेईमानी के लक्षण ढूँढते रहते हैं पर स्वयं की गलतियाँ मानने में हमारा ही अहं हमें रोकता है।

🔶 एक छोटी-सी कहानी है जिसके माध्यम से हम जान सकते हैं कि जल्दबाजी में प्रतिक्रिया देने का असर क्या होता है। कॉलेज में अच्छे नंबरों से पास होने के बाद एक युवा की अच्छी कंपनी में नौकरी लगती है। वह एक बहुत ही बड़े बिजनेसमैन का लड़का रहता है और कॉलेज में जाने से पूर्व से उसकी इच्छा रहती है कि उसके पास महँगी कार होना चाहिए।

🔷 अपने युवा पुत्र को उन्होंने यह वादा किया था कि अगर वह अच्छे नंबरों से पास हो जाता है और अपने बल पर नौकरी प्राप्त कर लेता है तब उसे वे कार जरूर लेकर देंगे। उस लड़के ने काफी दिनों से एक विशेष मॉडल की कार के सपने देखे थे और वह चाहता था कि पिता वही कार उसे दें।

🔶 पिता को भी यह बात पता थी। पास होने के बाद एक दिन पिता ने पुत्र को बुलाया। पुत्र समझ गया था कि आज उसे निश्चित रूप से कार मिलेगी। उसने अपने सभी साथियों से पहले ही कह दिया था कि सभी कार से लांग ड्राइव पर चलेंगे। वह पिता से मिलने जाता है। पिता उसे शाबासी देते हैं, साथ ही एक प्रेरक पुस्तक बक्से में रखकर देते हैं और कहते हैं कि बेटा तुम पास हो गए हो और अब आगे की जिंदगी बड़ी कठिनाई भरी होगी इस कारण तुम इस किताब को जरूर पढ़ो।

🔷 कार के सपनों में खोया युवा साथी किताब की बात सुनकर ही भड़क जाता है और उस बक्से को फेंक देता है और वहाँ से बाहर आ जाता है। वह काफी मायूस होता है कि क्या सोचा था और क्या हो गया? उसके मन में ऐसे विचार आने लगते हैं कि क्यों न घर ही छोड़ दे? काफी विचार करने के बाद वह नौकरी करने दूसरे शहर चले जाता है और पिता के काफी संपर्क करने के बाद भी वापस नहीं आता।

🔶 कई वर्षों तक वह पिता से संपर्क हीं नहीं करता। एक दिन उसके पास खबर आती है कि पिता की मृत्यु हो गई है। अपनी पत्नी के कहने पर वह पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने जाता है। अंतिम संस्कार के बाद वह पिता के कमरे में जाता है जहाँ पर वहीं बक्सा रखा होता है जिसमें किताब रहती है।

🔷 वह उस बक्से को उठाता है और किताब के पन्ने पलटता है तब उसमें से चाबी गिरती है। यह उसी कार की चाबी होती है जो उसके पिता ने वर्षों पूर्व खरीदी रहती है और यह वही कार होती है जिसके सपने वह देखा करता था। साथ ही किताब के नीचे कुछ कागजात रहते हैं जिनमें संपूर्ण संपत्ति व जायदाद उसके नाम की होती है। यह देखकर युवा लड़के की आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं और वह स्वयं से ही कहने लगता है कि मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाऊँगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 Jan 2018


👉 संकल्प शक्ति

🔶 संकल्प का अपना विज्ञान है। उसे कर्म का बीजारोपण कह सकते हैं। संकल्प की चरणबद्ध रूपरेखा बनाई जाती है। इसमें सोच विचार कर निश्चय किये जाते हैं। निश्चय को मन में छिपाकर नहीं रखा जाता है, वरन् प्रकट किया जाता है। उसकी क्रमबद्ध योजना बनाई जाती है। तत्परतापूर्वक और तन्मयतापूर्वक मन लगाने के लिए साहस जुटाया जाता है। साधन एवं सहयोग एकत्रित करने का ताना-बाना बुना जाता है और उसके लिए समुचित दौड़-धूप की जाती है। कठिनाइयाँ आ सकती हैं और उनका सामना अथवा समाधान करने के लिए पहले से ही क्या तैयारी रखी जा सकती है, इन सब प्रश्रों पर गंभीरता एवं दूरदर्शिता के साथ विचार किया जाता है। जानकारों के साथ परामर्श किया जाता है। सामयिक परिवर्तनों की गुंजाइश रहती है। ऐसे सुनिश्चित प्रयत्नों को संकल्प कहते हैं।
  
🔷 संकल्प और असंकल्प का अन्तर समझने वालों को असफलता से बचने और सफलता के लक्ष्य तक पहुँचने में विशेष कठिनाई नहीं होती। संकल्पवान् हर परिस्थिति का सामना करने के लिए साहस उभारते हैं। आंतरिक और परिस्थितिजन्य अवरोधों से जूझने का पराक्रम करते हैं। फलत: असमंजस हटता है और पुरुषार्थ की गतिशीलता प्रखर होती चली जाती है। लक्ष्य तक पहुँचने का यही राजमार्ग है।
  
🔶 श्रेष्ठता की साधना संकल्प से ही संभव होती है। संकल्प को ही व्रत कहते हैं। व्रतधारी ही तपस्वी और मनस्वी कहलाते हैं। लक्ष्य की ओर शब्दवेधी बाण की तरह सनसनाते हुए चल पडऩे की क्षमता उन्हीं में होती है। संकल्प का कार्य है- अमुक कार्य करने का अमुक लक्ष्य तक पहुँचने का दृढ़ निश्चय। दृढ़ निश्चय का अर्थ है- काम करने की सुव्यवस्थित योजना बनाना, उसके लिए समुचित श्रम, साधना और मनोयोग लगाने की प्रतिज्ञा। प्रतिज्ञा का अर्थ है- आत्म गौरव को दाँव पर लगा देना, प्रयास को चरम पुरुषार्थ के साथ पूरा करना। मन:संस्थान की संरचना कर सकना संकल्प का ही काम है। इसी से कहा जाता है कि संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते।
  
🔷 संकल्प को जड़ और सफलता को तना कहा जा सकता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए तत्त्ववेत्ताओं ने व्रतशील संकल्प के निर्धारण के कार्य को आधी सफलता माना है। यह मान्यता अक्षरश: सत्य है, जिसे संदेह हो वह इस सच्चाई की परीक्षा स्वयं करके देख सकता है।
  
🔶 सृष्टि का प्रादुर्भाव भी प्रजापति ब्रह्म की संकल्पशक्ति के  द्वारा ही हुआ है। जागरूकता पुरुषार्थ का प्रथम संकल्प है। हममें से प्रत्येक को कुछ सृजनात्मक संकल्प करना चाहिए। अब हमें जागरूक होने की आवश्यकता है। मनगढंत हवाई उड़ानें भरते रहने से हम कहीं के न रहेंगे। कहा भी गया है- ख्वाब कभी पूरे नहीं होते, संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते।
  
🔷 संकल्प शक्ति के प्रचण्ड सामथ्र्यवान-व्रतशील व्यक्ति उच्च आदर्शों को लेकर अपने कार्य क्षेत्र में उतरे और तुच्छ सामथ्र्य के रहते हुए भी महान् कार्य करने में सफल हुए हैं। भगवान् ने मनुष्य को जहाँ अन्य प्राणियों की तुलना में अनेकों शारीरिक-मानसिक विशेषताएँ प्रदान की हैं, वहाँ एक और विलक्षण अनुदान भी दिया है, जिसका नाम है संकल्प बल। इसकी सामथ्र्य का कोई पारावार नहीं है। संकल्प बल ही है, जो सन्मार्ग पर चल पड़े, तो व्यक्तित्व को इतना ऊँचा उठा सकता है, जिस पर देवता भी ईष्र्या करने लगें। नर हो या नारी, बालक हो या वृद्ध, स्वस्थ हो या रुग्ण, धनी हो या निर्धन, परिस्थितियों से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। प्रश्र संकल्प शक्ति का है। मनस्वी व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ बनाते और सफल होते हैं। समय कितना लगा और श्रम कितना पड़ा, उसमें अंतर हो सकता है, पर आत्म निर्माण के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति अपनी आकांक्षा को सक्रियता एवं प्रखरता के अनुरूप देर-सबेर में सफल करके ही रहता है। यदि मनुष्य अपनी साहसिकता को जगा लें, संकल्प शक्ति का सदुद्देश्य के लिए उपयोग करने लगे, तो कोई कारण नहीं कि वह अपनी गौरव- गरिमा का सिक्का जमाने में किसी से पीछे रहे।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 1)

🔷 बादलों का पानी जमीन पर गिरता है। जमीन से ढलान पर बहने वाली नदियों में जाता है और नदियाँ समुद्र के गहरे गर्त में जा गिरती हैं। पतन का यही स्वाभाविक क्रम है। मन को यदि रोका न जाये तो वह भी इसी दिशा में स्वभावतः चल पड़ेगा। इसलिए वर्षा के पानी को समुद्र के गर्त में से बचाकर किसी उपयोगी कार्य में लगाना या दिशा विशेष में बहाना हो तो उस पर भी रोकथाम लगानी होगी। पशुओं को खूँटे से बाँध कर ही निर्धारित कामों में लगाया जा सकता है अन्यथा वे छुट्टल छोड़ देने पर जिस-तिस का खेत उजाड़ेंगे। निरर्थक घूमेंगे और आपस में लड़ेंगे। इसलिए उन्हें अनुशासन में रखने के लिए मर्यादाओं का घेरा डालना और बंधन बाँधना पड़ेगा। मजबूत और ऊँचा बाँध बनाकर ही नदियों से सिंचाई के काम की नहरें निकाली जाती हैं।

🔶 मन को चिन्तन पक्ष में प्रशिक्षित करने के लिए उसे संयम के अनुबन्ध अपनाने के लिए प्रशिक्षित करना पड़ेगा। इन अनुबंधों को संयम कहते हैं। संयम के चारों पक्षों को गत अंक में अवगत कराया जा चुका है। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, और विचार संयम सीख लें तो समझना चाहिए कि अबोध मन वयस्क हो गया और उसने नहाने, कपड़ा धोने, दाँत माँजने, बिस्तर उठाने, बुहारी लगाने जैसे उपक्रम अपनाकर साफ-सुथरा रहना सीख लिया। उन्हें न अपनाने पर कल्पनाएँ और इच्छाएँ ऐसा नटखटपन करती रहेंगी जैसा अबोध बालक करते हैं। वे चन्दा मामा से लेकर तारा गणों की गेंदें बनाने के लिए मचल सकते हैं। इन अभिलाषाओं को- माँगों को- कोई पूरा नहीं कर सकता। तृष्णा की खाई इतनी गहरी है कि उसके लिए अनेकों जन्मों का परिश्रम खपाया जाये तो भी उसको पाटा नहीं जा सकता। अन्ततः अब या फिर कभी उन विडम्बनाओं में से कल्पनाओं को उबारना पड़ेगा तो उसके लिए चिन्तन पर अंकुश लगाने, इच्छाओं पर अंकुश लगाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग मिलेगा नहीं।

🔷 चिन्तन के उपरान्त मनुष्य की बड़ी शक्ति है- प्रयास श्रम एवं समय का सुनियोजन। जीवन का तात्पर्य वर्षों की लम्बाई नहीं, वरन् यह है कि उसके समय घटकों का किस प्रकार, किस निमित्त उपयोग किया गया। अनेकों थोड़े दिन जीते हैं, किन्तु अभिमन्यु और भगतसिंह की तरह, विवेकानन्द और रामतीर्थ की तरह अल्प आयु में ही अपने को, अपने समाज को कृत्य-कृत्य कर जाते हैं। कितने ही ऐसे होते हैं जो परम अवधि सौ वर्ष तक जी लेते हैं, पर रहते दूसरों पर भार बनकर ही हैं। ऐसे दीर्घ जीवन से क्या अपना और क्या दूसरों का लाभ?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.3

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 5)

🔷 करना क्या चाहिए? यदि इस प्रश्न का उत्तर गम्भीरता और दूरदर्शिता के सहारे उपलब्ध करना हो तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि शरीर को जीवित रखने भर के साधन जुटा देने के उपरान्त जो सामर्थ्य शेष रहती है, उसे आत्मा का कल्याण कर सकने वाले परमार्थ में लगा देने का साहस करना चाहिए। मात्र औचित्य अपनाने की इस समझदारी को साहस इस अर्थ में कहा जा रहा है, कि जन समुदाय के अधिकांश सदस्य अनर्थरत ही देखे जाते हैं उन्हें लोभ मोह की आग भड़काने और उसे बुझाने के लिए ईंधन जुटाने में ही निरन्तर कार्यरत देखा जाता है।

🔶 सुना है कि तेल या ईंधन डालने से आग भड़कती है, पर मनुष्य है जो तृष्णा को भड़काता और उसकी पूत के लिए, रावण जितना वैभव जुटाने के लिए अहर्निश श्रम करता है। अपना ही नहीं पड़ोसियों का सामान समेट कर भी उसी दावानल में झोंकता रहता है। यही है असफल और उद्विग्न जीवन का स्वरूप, जिसे अपनाने के लिए अधिकांश लोग उन्मादियों की तरह दौड़-धूप करते रहते हैं। यही है प्रवाह जिसमें जन समुदाय को तिनके पत्तों की तरह बहते देखा जाता है। इस भगदड़ भेड़चाल से भिन्न दिशा में कोई अपना मार्ग निर्धारित करता है तो उसे साहस ही कहना चाहिए। दिग्भ्रान्तों के झुण्ड को चुनौती देकर सही रास्ते का सुझाव देने वाला मूर्ख कहलाता और उपहासास्पद बनता है। तथाकथित जन समुदाय का विशेषतया कुटुम्बियों, हितैषियों का उपहास, तिरष्कार सहने की क्षमता सँजोना निस्संदेह साहस भरा कदम है। इसी से कहा जा रहा है कि आदर्शवाद को, सत्य और तथ्य को अपनाना भी इस अवांछनीयता के माहौल में साहस ही नहीं दुस्साहस भरा कदम है।

🔷 औचित्य कहा जाय या साहस। जीवन की सार्थकता का रास्ता एक ही है कि अमीरी और लिप्सा पर अंकुश लगाकर औसत नागरिक स्तर का निर्वाह क्रम अपनाया जाय। उतना जुट जाने पर पूरा-पूरा संतोष किया जाय। इसके उपरान्त जो भी बचा रहता है उस समूचे को ऐसे उपक्रम में नियोजित किया जाय, जिससे मानवी गरिमा का अभिवर्धन होता हो। आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण का उभय पक्षीय प्रयोजन सधता है। इस निर्धारण में भी यह देखना होता है कि सामयिक आवश्यकता पर ध्यान रखते हुए जो सर्वप्रथम सँभालने सुधारने योग्य है उसी को हाथ में लिया जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 30 Jan

🔷 There is somewhere oneness in visible different forms. And this is the base of development and progress. When we divide or break in pieces. The power is reduced and the collective power of any material thing makes it strong and useful. A drop of water is same as a glass of water qualitatively, but drop can not quench the thirst. The law exists for human development as well.
 
🔶 My dear sons,
You can do a lot for me and for the mission I am committed if you decide so. You must grow sacredness and selfless love in life not only you will be my beloved son but you will be blessed by Rishis of Himalaya and saints who are our guide for the success of the mission of Yug Nirman Yojna.
 
🔷 The whole progress in life is right thinking and developing that in action. The objects of all religions are proper guidance to do good for self and others. God showers his grace to give you more courage to stick to right path. If that courage does not develop in one’s life is meant that his religion and spiritual path in simply a mimic.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 8)

🔷 मित्रो! क्या करना पड़ेगा? अधिक से अधिक लोग जो इस मिशन के विचारों को सुनने में समर्थ हों, उन तब हमारा संदेश पहुँचाया जा सके जिसको हमने आस्तिकता कहा है, जिसको हमने अध्यात्मवाद कहा है, जिसको हमने धर्म परम्पराएँ कहा है, उसका संदेश अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच जाय, तो अच्छा है। लेकिन अगर अधिक संख्या में लोग इकट्ठा नहीं होते, तो आप कभी सफलता-असफलता का अंदाज मत लगाना। हमने संख्या की दृष्टि से क्रियाकलापों को महत्त्व नहीं दिया है। बहिरंग रूप से कितना बड़ा पंडाल बना, कितना खर्च हुआ, कितने लोग आये-आदि की दृष्टि से आप सफलता-असफलता का अन्दाज कभी मत लगाना। आपको अन्दाज लगाना है, तो इस तरह से लगायें कि जहाँ और जिस कार्य के लिए आपको भेजा गया था, वहाँ जा करके आपने लोगों के अंदर भावनायें उत्पन्न करने में कितनी सफलतायें प्राप्त की। लोगों की भावनाओं को जाग्रत करके उन्हें ऊँचा उठाने में कदाचित आपने सफलता प्राप्त कर ली, तो मैं यह समझूँगा कि आपने अपना काम पूरा कर लिया और आपका काम पूरा हो गया। तब मैं समझूँगा कि आपका उद्देश्य सही था और आप यह समझते थे कि आपको किस काम के लिए भेजा गया है।

🔶 मित्रो! आप जिन लोगों के संपर्क में आयें, उनसे बराबर बात करना, सलाह देना, परामर्श देना, उनके साथ रहना, उनसे हिलना-मिलना और खासतौर से उन लोगों से जिनको हम अपना कार्यकर्ता कहते हैं। जनता हमारे कार्यों में भाग लेती है कि नहीं लेती है, अभी हमको उसकी फिकर नहीं है। अभी हमको यह फिकर है कि जिन लाखों आदमियों को हमने अब तक की अपनी लम्बी जिंदगी में कितनी मेहनत करने के बाद और कितना परिश्रम करने के बाद तैयार किया है और अपने संपर्क में लाया है। उनको हमारे उद्देश्यों की सही बात मालूम न हो सकी और उन सब को हमारी क्रियाओं का आभास न हो सका और उन सब तक हमारी गतिविधियों की कोई बात मालूम न हो सकी। यह कैसी मुसीबत है और कैसी कठिनाई है और कैसी दिक्कत है? सबसे बड़ी कठिनाई, सबसे बड़ी दिक्कत और सबसे बड़ी मुसीबत इस बात की है कि हम अपनी टीमवालों को ही नहीं समझा सके, तो बाहर वालों को कैसे समझाएँगे?

🔷 साथियो! अभी तक लोग हमें मैजेशियन-जादूगर समझते हैं। संतोषी माता समझते हैं। गुरुजी के मायने वे समझते हैं-मनोकामनाएँ पूरी करने की मशीन। गुरुजी के गले में माला डालो और उनके मुँह से आशीर्वाद निकालो। स्टेशनों पर यही होता है। हर स्टेशन पर वेट करने की-तौलने की मशीन लगी होती है। लोग उस पर खड़े हो जाते हैं और दस पैसे का सिक्का डालते हैं। दस पैसा डालते ही मशीन घूमी और वजन लिखा हुआ टिकट बाहर आ जाता है। गुरुजी क्या हैं? वही हैं जो स्टेशन पर मशीन लगी है। किसकी मशीन? वेट जानने की मशीन। वेट जानने में क्या करना पड़ता है? उनके गले में माला पहनानी पड़ती है और क्या करना पड़ता है? पैर छूने पड़ते हैं। पैर छूने के बाद में और माला पहनाने के बाद में और क्या करना पड़ता है? उनके पेट में से, उनके मुँह में से जाकर खट से टिकट आ जाता है। किसका टिकट आ जाता है? आशीर्वाद का टिकट आ जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 26)

👉 आओ, गुरु को करें हम नमन
🔶 यह घटना समर्थ गुरु रामदास और उनके शिष्य शिवराम के सम्बन्ध में है। उन दिनों स्वामी रामदास अपनी तेरह वर्षीय कठोर साधना को पूर्ण करके सारे देश में अलख जगा रहे थे।
  
🔷 इस क्रम में उन्हें बनारस आना था। अपनी बनारस यात्रा की चर्चा उन्होंने अपने शिष्यों से करते हुए कहा कि इस बार की यात्रा मैं अकेले ही करूँगा। सब शिष्यों ने उनका आदेश स्वीकार कर लिया, पर बालभक्त शिवराम ने जिद्द पकड़ ली कि वह भी उनके साथ जाएगा। शिवराम की आयु बारह साल थी। समर्थ गुरु ने बहुत समझाया कि बेटा तुम इतनी लम्बी यात्रा पैदल कैसे करोगे? पर बालहठ पर कोई असर नहीं हुआ। अन्त में स्वामी रामदास ने उससे कहा- अच्छा बेटा! तुम अपनी मां से आज्ञा ले लो। अगर वह आज्ञा दे देगी, तो हम तुम्हें ले चलेंगे। शिवराम की मां एक भक्तिमती विधवा महिला थी। शिवराम उनकी इकलौती सन्तान था। सन्तान के प्रति उनका जितना गहरा ममत्व था, समर्थ गुरु के चरणों में उतनी ही गहरी भक्ति थी। पुत्र की बात सुनकर उन्होंने एक पल की देर लगाये बिना आज्ञा दे दी।
  
🔶 शिवराम की भक्ति और उसकी मां की आस्था से द्रवित होकर समर्थ गुरु उसे अपने साथ काशी ले आए। काशी आने पर गुरु आज्ञा से शिवराम भिक्षा मांगने के लिए निकला। समर्थ रामदास और उनके शिष्यों का भिक्षा हेतु एक नियम था। वह किसी के द्वार पर खड़े होकर केवल तीन बार पुकारते थे- जय-जय रघुवीर समर्थ। तीन बार पुकारने पर यदि किसी ने भिक्षा दी तो ठीक अन्यथा आगे बढ़ जाते थे। इस तरह तीन घरों में भिक्षा मांगना उनका नियम था। तीन घरों में यदि भिक्षा न मिली तो वे उस दिन उपवास कर लेते थे। शिवराम ने भी इसी नियम के अनुसार एक द्वार पर आवाज लगायी। यह द्वार काशी के महातांत्रिक भैरवानन्द का था। भैरवानन्द को अनेकों तामसी तान्त्रिक क्रियाएँ सिद्ध थीं। यह महातांत्रिक होने के साथ महाक्रोधी भी था।
  
🔷 अपने द्वार पर जय-जय रघुवीर समर्थ की आवाज सुनते ही वह भड़क उठा। क्रोधावेश में वह द्वार पर निकलकर आया और बालक शिवराम को डांटते हुए बोला कि कौन है, जो अपने को समर्थ कहता है। शिवराम ने बिना किसी भय के कहा कि समर्थ हैं मेरे गुरु और उनकी सामर्थ्य का स्रोत उनके आराध्य भगवान् राम हैं। छोटे बालक को अपने सामने इस तरह बोलते हुए देख उस क्रोधी तांत्रिक ने कहा, जा मैं भैरवानन्द तुझसे कहता हूँ कि तू कल प्रातःकाल तक मर जाएगा, तेरे गुरु में सामर्थ्य है, तो तुझे बचा लें। शिवराम ने समर्थ रामदास के पास उपस्थित होकर उस तांत्रिक की सारी बातें बतायी। उन बातों से भी उन्हें अवगत कराया, जो रास्ते में बनारस के लोगों ने उसे महातांत्रिक की आश्चर्यजनक शक्तियों के बारे में बतायी थी। इन सारी बातों को सुनकर समर्थ रामदास हंसे और बोले बेटा- समर्थ रघुवीर के होते डर कैसा? तू तो बस आराम से गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु वाला मन्त्र पढ़ता रह और आराम से मेरे पांव दबाए जा। इतना कहकर समर्थ रामदास लेट गए।
  
🔶 बालक शिवराम ने उनके पांव दबाते हुए गुरु नमन के मंत्र पढ़ने शुरू किए। इधर भैरवानन्द ने भी उसके मारण के लिए महाकृत्या का प्रयोग किया था। पूरी रात महाकृत्या ने शिवराम को मारने के लिए अनेकों रूप धरे, उसको कई तरह से गुरु नमन से विरत करना चाहा, परन्तु शिवराम की अटल गुरुभक्ति के सामने उसकी एक न चली। अन्त में असफल होकर उसने भैरवानन्द पर ही अपना आक्रमण किया। महातांत्रिक अपनी क्रिया को इस तरह उलटते देखकर घबरा गया। वह भागा-भागा आकर समर्थ के चरणों में गिर गया। समर्थ रामदास ने उसे अभय देते हुए कृत्या का शमन किया और उसे चेताया—गुरुगीता के गुरु नमन मंत्र साधारण नहीं हैं। जिसकी वाणी में ये मंत्र हैं और हृदय में गुरुभक्ति है, वह गुरुकृपा के कवच से सदा सुरक्षित है। कोई अभिचार क्रिया उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। गुरु नमन के इन नमन मंत्रों की शृंखला में आगे कहा गया है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 47

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 Jan 2018


👉 हृदय का संस्कार

🔶 बुद्धि का संस्कार करना उचित है। पर हृदय का संस्कार करना तो नितान्त आवश्यक है। बुद्धिमान और विद्वान बनने से मनुष्य अपने लिए धन और मान प्राप्त कर सकता है। पर नैतिक दृष्टि से वह पहले दर्जे का पतित भी हो सकता है। आत्मा को ऊँचा उठाना और मानवता के आदर्शों पर चलने के लिए प्रकाश प्राप्त करना हृदय के विकास पर ही निर्भर है। बुद्धि हमें तर्क करना सिखाती है और आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन खोजती है। जैसी आकाँक्षा और मान्यता होती है उसके अनुरूप दलील खोज निकालना भी उसका काम है पर धर्म कर्तव्यों की ओर चलने की प्रेरणा हृदय से ही प्राप्त होती है।

🔷 जब कभी बुद्धि और हृदय में मतभेद हो, दोनों अलग अलग मार्ग सुझाते हो तो हमें सदा हृदय का सम्मान और बुद्धि का तिरस्कार करना चाहिए। बुद्धि धोखा दे सकता है पर हृदय के दिशासूचक यंत्र (कुतुबनुमा) की सुई सदा ठीक ही दिशा के लिए मार्ग दर्शन करेगी।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 कर्म का फल

🔶 यदि कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता, तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गये। कर्मफल एक ऐसा अमिट तथ्य है, जो आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिए होता है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कत्र्तव्य धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचय कर सका या नहीं। जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझना है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की ओर बढऩे का शुभारंभ कर दिया।
  
🔷 दंडमय से तो विवेक रहित पशु को भी अवांछनीय मार्ग पर चलने से रोका जा सकता है। मानवीय अंत:करण की विकसित चेतना तभी अनुभव की जा सकेगी, जब वह कुमार्ग पर चलने से रोके और सन्मार्ग के लिए प्रेरणा प्रदान करे। लाठी के बल पर भेड़ों को इस या उस रास्ते पर चलाने में गड़रिया सफल रहता है। सभी जानवर इसी प्रकार दंड भय दिखाकर उसे जोते जाते हैं। यदि हर काम का तुरंत दंड मिलता और ईश्वर बलपूर्वक किसी मार्ग पर चलने के लिए विवश करता, तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, उसकी स्वतंत्र आत्म चेतना विकसित हुई या नहीं, इसका पता ही नहीं चलता।
  
🔶 ईश्वर या खुदा ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अंतर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनंद लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो। उन्नति को अपनाने वाला विवेक और कर्त्तव्य परायणता यह दो ही कसौटी मनुष्यता का आत्मिक स्तर विकसित होने की है। इस आत्म विकास पर ही जीवनोद्देश्य की पूर्ति और मनुष्य जन्म की सफलता निहित है। ईश्वर खुदा चाहता है कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र चेतना का विकास करे और विकास के क्रम से आगे बढ़ता हुआ पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने की सफलता प्राप्त करे।
  
🔷 यदि ईश्वर को यह प्रतीत होता कि बुद्धिमान बनाया गया मनुष्य पशुओं जितना मूर्ख ही बना रहेगा, तो शायद उसने दण्ड के बल पर चलाने की व्यवस्था उसके लिए भी सोची होती। तब झूठ बोलते ही जीभ में छाले पडऩे, चोरी करते ही हाथ में फोड़ा उठ पडऩे, बेईमानी करते ही बुखार आ जाने, कुदृष्टिï डालते ही आँख दु:खने लगने, कुविचार आते ही सिर दर्द होने जैसे दण्ड मिलने की तुर्त-फुर्त व्यवस्था बनी रही होती, तो किसी के लिए भी दुष्कर्म करना संभव ही न होता। लोग जब उसमें लाभ की अपेक्षा प्रत्यक्ष हानि देखते तो दुष्कर्म करने की हिम्मत न करते। ऐसी स्थिति में मनुष्य की स्वतंत्र चेतना, विवेक बुद्धि और आंतरिक महानता के विकसित होने का अवसर ही नहीं आता और आत्म विकास के बिना पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकने की दिशा में प्रगति ही न होती। अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा, सबसे बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व संभाल सकने में समर्थ है या नहींï? परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें (भाग 2)

🔷 उपरोक्त हाथ पैरों की हरकतों की तरह मुँह से भी कितने ही लोग ऐसे ही बेतुके कार्य करते रहते हैं। बात-बात में गालियाँ देना, असम्मान सूचक भाषा का प्रयोग करना, अकारण निन्दा चुगली करना, तम्बाकू पान के कारण अथवा ऐसे ही जहाँ-तहाँ थूकते रहना, जोर-जोर से बोलना, जल्दी-जल्दी अथवा अस्पष्ट भाषा में बोलना, इस तरह बोलना कि मुँह से थूक उड़े, होठों की अगल-बगल में थूक जमा लेना अथवा दाँतों से थूक के तार उठाना, खाते समय मुँह खुला रखना और चप-चप की आवाज करना, घूमते-फिरते खाना, जब-तब गाने लगना, अपनी शेखी बघारते रहना, बात को अतिशयोक्तिपूर्ण करके कहना, जैसी बुरी आदतें अशिष्टता की गणना में आती हैं और ऐसे व्यक्ति को असंस्कृत माना जाता है।

🔶 बुरी आदतें तब पड़ती हैं जब आवेश ही प्रधान बन जाता है और निरीक्षण नियंत्रण को ध्यान में रखने की बात भुला दी जाती है। साधारण बुद्धि के लोग भी अपने कार्य व्यवसायों में निरीक्षण और नियन्त्रण की आवश्यकता समझते हैं, पर न जाने क्यों लोग अपनी आदतों और हरकतों के बारे में असावधानी बरतते हैं और आवेश में अंग संचालन का जो उत्साह आता है उसे मर्यादित रखने की बात भुला देते हैं फलतः उन्हें उपहासास्पद और छिछोरा बनना पड़ता है। अपनी शक्ति नष्ट होती है और दूसरे उसे असामाजिकता मानकर नाक भौं सिकोड़ते हैं इस असम्मान के कारण उन्हें अव्यवस्थित, असावधान एवं अप्रमाणिक तक मान लिया जाता है। दूसरे लोग उनके हाथ कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते या सहयोग देते हुए झिझकते हैं और सोचते हैं जो अपनी आदतों का निरीक्षण नियन्त्रण नहीं कर सकता वह किसी बड़े कार्य को पूरा करने में या दिये हुए सहयोग का सदुपयोग करने में कैसे समर्थ हो सकेगा?

🔷 किसी भी क्षेत्र में प्रगति का मूल आधार व्यवस्था बुद्धि होती है। जीवन जीना भी एक बड़ा कार्य क्षेत्र है इसमें व्यवस्था बुद्धि का उपयोग इस दिशा में भी सतर्कतापूर्वक किया जाना चाहिए कि अपनी आदतें बिगड़ने न पायें। निरर्थक और अनर्थ उत्पन्न करने वाली बुरी आदतें असावधानी के कारण हमारे स्वभाव का अंग बन जाती हैं और परिपक्व होने पर जड़ें इतने गहरी जमा लेती हैं कि उन्हें हटाना बहुत ही कठिन एवं प्रयत्न साध्य होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 पृष्ठ 31

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1975/January/v1.31

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 4)

🔷 अन्यान्य प्राणियों के पेट बहुत बड़े हैं, जबकि मनुष्य का छै इंच चौड़ाई का इतना छोटा पेट है जो मुट्ठी भर अनाज से भर सके। अन्य प्राणी केवल जो सामने है उसी को पाते और मुख के द्वारा खाते है। जबकि मनुष्य अगणित सुविधा साधन अपने कौशल और पराक्रम से चुटकी बजाते उपार्जित कर सकता है। ऐसी दशा में किसी को भी अभाव ग्रस्त होने जैसी शिकायत करने की गुंजाइश नहीं है। मनुष्य जीवन असीम सुविधाओं से भरा-पूरा है। उसकी दुनियाँ इतनी साधन सम्पन्न है कि अभाव जन्य कठिनाइयाँ अनुभव करने की किसी को कभी आवश्यकता ही न पड़े। दूषित अव्यवस्था ही है जिसमें ग्रसित होकर उसे अभावों का रोना रोते हुए समय गुजारना पड़ता हैं।

🔶 शरीर और आत्मा की भिन्नता अनुभव करने के लिए दूर जाने की आवश्यकता नहीं। किसी श्मशान में थोड़ी देर बैठकर वहाँ के दृश्य का अवलोकन करते हुए यह पाठ भली प्रकार पढ़ा जा सकता है। आत्मा के पृथक होते ही हृष्ट-पुष्ट शरीर की भी कैसी दुर्गति होती है, इसे देखते हुए समझा जा सकता है कि शरीर ही आत्मा नहीं है, जीवधारी का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व भी है, जो मरण के उपरान्त भी बना रहता है। यही है वास्तविक ‘स्व’ इसी का हित साधन करने को स्वार्थ कहा जाता है।

🔷 जब आत्मा को संकीर्णता की कीचड़ से बाहर निकाल कर उसे व्यापक क्षेत्र में विचरण कर सकने की स्थिति में लाया जाता है, तो उसे सबमें अपना ही आत्मा दिखता है। तब सर्वजनीन हित साधन परमार्थ बन जाता है। जिससे न स्वार्थ सधता है न परमार्थ, उसे अनर्थ ही कहना चाहिए। लगता है लोग अनर्थ को ही अपनाते और उसी के नियोजन में अपने चातुर्य को संलग्न रखे रहते हैं। अन्ततः यह तथाकथित बुद्धिमत्ता मूर्खता से भी मँहगी पड़ती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 29 Jan

🔷 Oh God, I pray you that I should always be ready to face the adversities of life. So I pray you to save me in my hard days. It is not that I don’t face probles but I request to prepare me for facing them bravely and positively. I offer myself to you. And wish that I should win and come out safely without being envolved negatively.
 
🔶 Worship never completes unless other important dimensions of self rectification good life and service to others is also covered with that, the seed bears the total tree no doubt but it need a land to grow well enriched with its neutrition and time factor to grow. Worship is not only the ritual part of it but also compassion and ideality of life are important discipline to be followed, otherwise rituals will not make any effect.

🔷 To be ambicious is good subject to conditional makes you great and not only rich. There is always only one highway to attain Honest and object in life. High thinking and behaviour in accordance to that and high moral character is the triadent dimensions for true growth of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 8)

🔷 मित्रो! कष्ट बस एक ही बात का है कि मनुष्य अपने विचार करने के तरीके को भूल गया। आचार, विचार और व्यवहार को ठीक करने के लिए, गुण, कर्म एवं स्वभाव में उत्कृष्टता, शालीनता एवं उदारता को समाविष्ट करने के लिए हम आपको भेजते हैं। यह इतना बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य है कि जिस तरीके से फायर ब्रिगेड वालों को आग बुझाने के लिए भेजा जाता है हम आपको फायर ब्रिगेड वालों के तरीके से उस समाज में भेजते हैं, जहाँ चारों ओर से आग लग रही है और चारों ओर से लपटें उठ रही हैं।

🔶 आप अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए वहाँ जाना। वहाँ जाकर आप क्या काम करेंगे? बहिरंग रूप से हमने आपको बहुत सारे काम सौंपे हैं। उन बहिरंग कार्यों में आपको कितनी सफलता मिली और कितनी असफलता मिली, इस पर आप ध्यान मत देना। आपको जहाँ भेजा जाता है, वहाँ के सम्मेलन की रूपरेखा, सफलता और असफलता के मामले में देखना शुरू कर दिया, तो आप बहुत बड़ी गलती पर होंगे। वहाँ आपको सभा-सम्मेलन में कितने लोग इकट्ठे हुए। इस तरह लोगों के इकट्ठा करने की संख्या के आधार पर हम सफलता असफलता का अन्दाज नहीं करते।

🔷 मित्रो! लोगों की संख्या के आधार पर यदि हमने सफलता-असफलता के मूल्यांकन किये होते, तो सोमवती अमावस्या के दिन गंगा जी के एक-एक घाट पर लाखों आदमी स्नान करते हैं। अगर हम यह मान लें कि हिन्दुस्तान में गंगा जी के घाट करीब सौ हैं और एक-एक घाट पर एक-एक लाख आदमी स्नान करते हैं। तब यह माना जा सकता है कि एक करोड़ आदमी धर्मात्मा हैं। भीड़ को देखकर हम क्या अन्दाज लगा सकते हैं, नहीं लगा सकते।

🔶 रामलीला होती रहती है और उसमें औरतें, बच्चे और दूसरे आदमी आते रहते हैं। अरे साहब! रामलीला हुई थी, उसमें दस हजार आदमी आये थे। बेटे, मैं क्या करूँ दस हजार आदमी थे तो? उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। कुंभ में बारह लाख आदमी आये थे, तो मैं क्या करूँ? आप भीड़ से क्या मतलब लगाते हैं? नहीं साहब! बड़ा कुंभ का मतलब है कि हिन्दुस्तान में बड़ा धर्म फैल रहा है और यहाँ पर बड़े अध्यात्मवादी लोग हैं। बेटे, ऐसा नहीं है। अध्यात्मवादी लोग यहाँ कहाँ हैं? संख्या की दृष्टि से हम भीड़ में यह अंदाज भी नहीं लगा सकते। आप भी मत लगाना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 25)

👉 आओ, गुरु को करें हम नमन

🔶 गुरु नमन की महिमा को अगले महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती को समझाते हैं-

संसारवृक्षमारूढा पतन्तो नरकार्णवे।     येन चैवोद्धृताः सर्वे तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३१॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३२॥
हेतवे जगतामेव संसारार्णवसेतवे। प्रभवे सर्वविद्यानां शंभवे गुरवे नमः॥ ३३॥
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३४॥
त्वं पिता त्वं च मे माता त्वं बंधुस्त्वं च देवता। संसारप्रतिबोधार्थं तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३५॥

🔷 उन सद्गुरुदेव भगवान् को शिष्य नमन करे, जो संसारवृक्ष पर आरूढ़ जीव का नरक सागर में गिरने से उद्धार करते हैं॥ ३१॥ नमन उन श्रीगुरु को, जो अपने शिष्य के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर होने के साथ परब्रह्म परमेश्वर हैं॥ ३२॥ शिव रूपी उन सद्गुरु को नमन, जो समस्त विद्याओं का उदय स्थान हैं। इस संसार का आदिकारण हैं और संसार सागर को पार करने के लिए सेतु हैं॥ ३३॥ नमन उन श्री गुरु को, जो अज्ञान के अन्धकार से अन्धे जीव की आँखों को ज्ञानाञ्जन की शलाका से खोलते हैं॥ ३४॥ नमन उन श्री गुरु को, जो अपने शिष्य के लिए पिता हैं, माता हैं, बन्धु हैं, इष्ट देवता हैं और संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं॥ ३५॥

🔶 इन महामंत्रों में सद्गुरु के नमन का विज्ञान-विधान है। गुरुतत्त्व को जान लेने पर, उनकी महिमा का साक्षात्कार कर लेने पर शिष्य को कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता। उसे किसी का भी भय नहीं रहता। शिष्य के हृदय में जब अपने सद्गुरु के प्रति नमन के भाव उपजते रहते, तब उसका सर्वत्र मंगल होता है, उसे अमंगल की छाया स्पर्श भी नहीं कर सकती। सद्गुरु को नमन शिष्य के लिए महाअभेद्य कवच है। इस सम्बन्ध में एक सत्य घटना का उल्लेख करने के लिए भावनाएँ आतुर हो रही हैं।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 46

👉 वास्तविक सौंदर्य

राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कईं राजकुमार व राजा उसके साथ विवाह करना चाहते थे, लेकिन वह किसी को पसन्द नहीं करती थी। आखिरकार उन र...