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गुरुवार, 5 जनवरी 2017

👉 सतयुग की वापसी (अन्तिम भाग) 6 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें  

🔴 दोष-घटनाओं को ही देखकर निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए। सोचना यह भी चाहिए कि यह अवांछनीयताओं का प्रवाह प्रचलन, जिस भावना क्षेत्र की विकृति के कारण उत्पन्न होता है, उस पर रोक थाम के लिए भी कुछ कारगर प्रयत्न किया जाए।           

🔵 संवेदनाओं में करुणा का समावेश होने पर दूसरे भी अपने जैसे दीखने लगते हैं। कोई समझदारी के रहते, अपनों पर आक्रमण नहीं करता, अपनी हानि सहन नहीं करता। इसी प्रकार यदि वह आत्मभाव समूचे समाज तक विस्तृत हो सके तो किसी को भी हानि पहुँचाने, सताने की बात सोचते ही हाथ-पैर काँपने लगेंगे। अपने आपे को दैत्य स्तर का निष्ठुर बनाने के लिए ऐसा कोई व्यक्ति तैयार न होगा, जिसकी छाती में हृदय नाम की कोई चीज है। जिसने अपनी क्रिया को, विचारणा को मात्र मशीन नहीं बनाया होता, वरन् उनके साथ उस आत्मसत्ता का भी समावेश किया होता; तो आत्मीयता करुणा, सहकारिता और सेवा-साधना के लिए निरन्तर आकुल-व्याकुल रहती।    

🔴 समस्याओं का तात्कालिक समाधान तो नशा पीकर बेसुध हो जाने पर भी हो सकता है। जब होश-हवास ही दुरुस्त नहीं, तो समस्या क्या? और उसका समाधान खोजने का क्या मतलब? पर जब मानवी गरिमा की गहराई तक उतरने की स्थिति बन पड़े तो फिर माता जैसा वात्सल्य हर आत्मा में उभर सकता है और हितसाधना के अतिरिक्त और कुछ सोचते बन ही नहीं पड़ता। तब उन उलझनों में से एक भी बच नहीं सकेगीं, जो आज हर किसी को उद्विग्न-आतंकित किए हुए हैं। 

🔵 प्रस्तुत पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने एवं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का अनुरोध है।

🔴 १९८८-९० तक लिखी पुस्तकें (क्रान्तिधर्मी साहित्य पुस्तकमाला) पू० गुरुदेव के जीवन का सार हैं- सारे जीवन का लेखा-जोखा हैं। १९४० से अब तक के साहित्य का सार हैं। इन्हें लागत मूल्य पर छपवाकर प्रचारित प्रसारित करने की सभी को छूट है। कोई कापीराइट नहीं है। प्रयुक्त आँकड़े उस समय के अनुसार है। इन्हें वर्तमान के अनुरूप संशोधित कर लेना चाहिए।   

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 4 जनवरी 2017

👉 सतयुग की वापसी (भाग 29) 5 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें  

🔴 युद्धोन्माद का वातावरण बनाने और सरंजाम जुटाने में किसी वर्ग विशेष को लाभ-ही-लाभ सूझा होगा अन्यथा उस आक्रमण-प्रत्याक्रमण के माहौल से असंख्यों मनुष्यों की, परिवारों की भयंकर बरबादी सूझ ही न पड़ती, ऐसी बात नहीं है। अपने को सर्वसमर्थ, सर्वसम्पन्न बनाने के लिए उभरे उन्माद ने शोषण से लेकर आक्रमण तक के अनेकों कुचक्र रचे हैं। इतना दुस्साहस तभी बन पड़ा, जब उसने अपनी चेतना को इतना निष्ठुर बना लिया। अन्यान्यों को इस त्रास से भारी कष्ट सहना पड़ सकता है, इसको दरगुजर करने के उपरान्त ही अपराधी, आक्रामक एवं आतंकवादी बना जा सकता है।          

🔵 नशों के उत्पादक एवं व्यवसायी, तस्कर आदि यदि अनुमान लगा सके होते कि उनका व्यक्तिगत लाभ किस प्रकार असंख्य अनजानों का विनाश करेगा, यदि संवेदना उनके अन्तराल में उमगी होती तो निश्चय ही वे इस अनर्थ से हाथ खींच लेते और गुजारे के लिए हजार साधन खोज लेते।   

🔴 पशु-पक्षियों को उदरस्थ करते रहने वालों के मन में यदि ऐसा कुछ सूझ पड़ा होता कि उन निरीहों की तरह हम इतनी भयंकर पीड़ा सहते हुए जान गँवाने के लिए बाधित किए गए होते, तो कैसी बीतती? उस छटपटाहट को निजी अनुभूति से जोड़ सकने वाला कदाचित् ही छुरी का निर्दय प्रयोग कर पाता।

🔵 नारी पर प्रजनन का असाधारण भार लादने वाले तथाकथित पति महोदय, यदि अपनी सहचरी के प्रति किए जा रहे उत्पीड़न को भी ध्यान में रख सके होते, तो उन्हें अपने इस स्वेच्छाचार पर अंकुश लगाना ही पड़ता। निजी मस्ती उतारने से पूर्व उसका भावी परिणाम क्या होगा, यह भी विचारना पड़ता। अपनी आर्थिक बरबादी और बच्चों की अनगढ़ जिन्दगी के लिए भी अपने को उत्तरदायी ठहराते हुए स्वेच्छाचार पर अंकुश लगाने के लिए सहमत होते।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

👉 सतयुग की वापसी (भाग 28) 4 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें  

🔴 क्रियाएँ, शरीर के माध्यम से बन पड़ती हैं। उनके सम्बन्ध में सोचने की खिचड़ी मस्तिष्क में पकती है किन्तु इन दोनों को आवश्यक प्रेरणा देने, ऊर्जा प्रदान करने की प्रक्रिया अन्तराल की गहराई से आरम्भ होती है। ज्वालामुखी फूटने, धरती हिलने जैसी घटनाओं का उद्गम स्रोत वस्तुत: भूगर्भ की गहराई में ही कहीं होता है। बादल बरसते तो अपने खेत या आँगन में ही हैं, पर वस्तुत: उनका उद्गम समुद्र से उठने वाली भाप है।         

🔵 भली-बुरी परिस्थितियों के सम्बन्ध में भी ऐसा ही सोचा जा सकता है। क्रिया करने और योजना बनाने में शरीर एवं मस्तिष्क को बहुत कुछ करते देखा जा सकता है, पर यह सारा तन्त्र कहाँ से खड़ा हुआ, यह जानने की उत्कण्ठा हो तो अन्त:चेतना में अवस्थित आकांक्षाओं को ही सूत्रधार मानना पड़ेगा।  

🔴 विज्ञान ने प्रदूषण उगलने वाले विशालतम कारखाने बनाए सो ठीक है, पर उसके द्वारा उत्पन्न होने वाली विषाक्तता और बेरोजगारी के सम्बन्ध में भी तो विचार किया जाना चाहिए था। यह प्रश्न उभरा न हो, सो बात नहीं, पर उस योजना को कार्यान्वित करने वालों के अन्तराल में अधिक कमाने की ललक ही प्रधान रही होगी। हानिकारक प्रतिक्रिया के विचार उठने पर उन्हें यह कहकर दुत्कार दिया गया होगा कि सर्वसाधारण से हमें क्या लेना-देना अपने लाभ को ही सब कुछ मान लेने में ही भलाई है।

🔵 जिन्होंने साहित्य सृजा और फिल्में बनाईं, उनको अपना लाभ प्रधान दीखा होगा अन्यथा प्रचार साधनों में अवांछनीयता का समावेश करते समय हजार बार विचार करना पड़ता है कि निजी लाभ कमाने के अत्युत्साह से लोकमानस को विकृत करने का खतरा उत्पन्न नहीं किया जाना चाहिए।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 2 जनवरी 2017

👉 सतयुग की वापसी (भाग 27) 2 Jan

🌹 दानव का नहीं देव का वरण करें

🔴 सृजन और विनाश की, उत्थान और पतन की शक्तियाँ इस संसार में निरन्तर अपने-अपने काम कराती रहती हैं। इन्हीं को देव और दानव के नाम से जाना और उनकी प्रतिक्रियाओं को स्वर्ग-नरक भी कहा जाता है। मनुष्य को यह छूट है कि दोनों में से किसी का भी वरण अपनी समझदारी के आधार पर कर ले और तदनुरूप उत्पन्न होने वाली सुख-शान्ति अथवा पतन-पराभव की प्रतिक्रिया सहन करे। उठने या गिरने का निश्चय कर लेने पर तदनुरूप सहायता-सुविधा भी इसी संसार में यत्र-तत्र बिखरी मिल जाती है, इच्छानुसार उन्हें बीना-बटोरा अथवा धकेला-भगाया भी जा सकता है। इसी विभूति के कारण मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता एवं भविष्य का अधिष्ठाता भी कहा जाता है। अपने या अपने समुदाय, संसार के लिए विपन्नता अथवा सुसम्पन्नता अर्जित कर लेना उसकी अपनी इच्छा-आकांक्षा पर निर्भर है।       

🔵 आम आदत पाई जाती है कि मनुष्य सफलताओं का श्रेय स्वयं ले, किन्तु हानि या अपयश का दोषारोपण किन्हीं दूसरों पर मढ़ दे। इतने पर भी यथार्थता तो अपनी जगह पर अटल ही रहती है। यह आत्म प्रवंचना भर कहला सकती है, पर सुधार-परिवर्तन कर सकने जैसी क्षमता उसमें है नहीं। 

🔴 प्रसंग इन दिनों की परिस्थितियों के सन्दर्भ में उनका कारण जानना और समाधान निकालने का है। गहरी खोजबीन इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि जनमानस ही है जो अपने लिए इच्छित स्तर की परिस्थितियाँ न्यौत बुलाता है। कोई क्या कर सकता है, यदि हानि को लाभ और लाभ को हानि समझ बैठने की मान्यता बना ली जाए? कुरूप चेहरा दर्शाने के लिए दर्पण को आक्रोश का भाजन बनाया जा सकता है, पर इससे चेहरे पर छाई कुरूपता या कालिख को भगाया नहीं जा सकता। अच्छा हो, हम कठिनाइयों के कारण-समाधान अपने भीतर खोजें और यदि उत्कर्ष अभीष्ट हो, तो इसकी तैयारी के रूप में आत्मसत्ता को तदनुरूप बनाने के लिए अपने पुरुषार्थ नियोजित करें।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 26) 1 Jan

🌹 बस एक ही विकल्प — भाव-सम्वेदना  

🔴  अनावश्यक सम्पन्नता की ललक ही बेकाबू होने पर उन अनर्थकारी संरचनाओं में प्रवृत्त होती है, जिनके कारण अनेकानेक रंग रूप वाले अनाचारों को व्यापक, विस्तृत और प्रचण्ड होते हुए देखा जा रहा है। लिप्साओं में किसी प्रकार कटौती करते बन पड़े, तो ही वह जुझारूपन उभर सकता है, जो अवांछनीयताओं से गुँथे और पटकनी देकर परास्त कर सके। जिन अभावों से लोग संत्रस्त दीखते हैं, उनसे निपटने की प्रतिभा उनमें उभारी जाए ताकि वे अपने पैरों खड़े होकर, दौड़कर स्पर्द्धा जीतते देखे जा सकें।       

🔵 आर्थिक अनुदान देने की मनाही नहीं है और न यह कहा जा रहा है कि गिरों को उठाने में, सहयोग देने में कोताही बरती जानी चाहिए। मात्र इतना भर सुझाया जा रहा है कि मनुष्य अपने आप में समग्र और समर्थ है। यदि उसका आत्मविश्वास एवं पुरुषार्थ जगाया जा सके , तो इतना कुछ बन सकता है जिसके रहते याचना का तो प्रश्न ही नहीं उठता, बल्कि इतना बचा रहता है, जिसे अभावों और अव्यवस्थाओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में लगाया जा सके।

🔴 इक्कीसवीं सदी भाव-संवेदनाओं के उभरने-उभारने की अवधि है। हमें इस उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान माली की भूमिका निभानी चाहिए। यह विश्व उद्यान इसी आधार पर हरा-भरा फला-फूला एवं सुषमा सम्पन्न बन सकेगा। आश्चर्य नहीं कि वह स्वर्ग लोक वाले नन्दन वन की समता कर सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 25) 31 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴  इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। इसलिए यदि परिस्थितियों की विपन्नता को सचमुच ही सुधारना हो, तो जनसमुदाय की मन:स्थिति में दूरदर्शी विवेकशीलता को उगाया, उभारा और गहराई तक समाविष्ट किया जाए। यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि मन:क्षेत्र एवं बुद्धि संस्थान भी स्वतन्त्र नहीं हैं। उन्हें भावनाओं, आकांक्षाओं, मान्यताओं के आधार पर अपनी दिशाधारा विनिर्मित करनी होती है। उनका आदर्शवादी उत्कृष्ट स्वरूप अन्त:करण में भाव-संवेदना बनकर रहता है।         

🔵 यही है वह सूत्र, जिसके परिष्कृत होने पर कोई व्यक्ति ऋषिकल्प, देवमानव बन सकता है। यह एक ही तत्त्व इतना समर्थ है कि अन्यान्य असमर्थताएँ बने रहने पर भी मात्र इस अकेली विभूति के सहारे न केवल अपना वरन् समूचे संसार की शालीनता का पक्षधर कायाकल्प किया जा सकता है। इक्कीसवीं-सदी के साथ जुड़े उज्ज्वल भविष्य का यदि कोई सुनिश्चित आधार है तो वह एक ही है कि जन-जन की भाव-संवेदनाओं को उत्कृष्ट, आदर्श एवं उदात्त बनाया जाए। इस सदाशयता की अभिवृद्धि इस स्तर तक होनी चाहिए कि सब अपने और अपने को सबका मानने की आस्था उभरती और परिपक्व होती रहे।

🔴 सम्पदा संसार में इस अनुपात में ही विनिर्मित हुई है कि उसे मिल-बाँटकर खाने की नीति अपनाकर सभी औसत नागरिक स्तर का जीवन जी सकें। साथ ही बढ़े हुए पुरुषार्थ के आधार पर जो कुछ अतिरिक्त अर्जन कर सकें, उससे पिछड़े हुओं को बढ़ाने, गिरते हुओं को उठाने एवं समुन्नतों को सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन हेतु प्रोत्साहित कर सकें।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 24) 30 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴 अपने-अपनों के लाभ के लिए ही उनकी उपलब्धियाँ खपती रहती हैं। प्रदर्शन के रूप में ही यदाकदा उनका उपयोग ऐसे कार्यों में लग पाता है, जिससे सत्प्रवृत्ति संवर्धन में कदाचित् कुछ योगदान मिल सके। वैभव भी अन्य नशों की तरह कम विक्षिप्तता उत्पन्न नहीं करता, उसकी खुमारी में अधिकाधिक उसका संचय और अपव्यय के उद्धत् आचरण ही बन पड़ते हैं। ऐसी दशा में इस निश्चय पर पहुँचना अति कठिन हो जाता है कि उपर्युक्त त्रिविध समर्थताएँ यदि बढ़ाने-जुटाने को लक्ष्य मानकर चला जाए तो प्रस्तुत विपन्नताओं से छुटकारा मिल सकेगा।     

🔵 सच तो यह है कि समर्थता का जखीरा हाथ लगने पर तथाकथित बलिष्ठों ने ही घटाटोप की तरह छाए हुए संकट और विग्रह खड़े किए हैं। प्रदूषण उगलने वाले कारखाने सम्पन्न लोगों ने ही लगाए हैं। उन्हीं ने बेरोजगारी और बेकारी का अनुपात बढ़ाया है। आतंक, आक्रमण और अनाचार में संलग्न बलिष्ठ लोग ही होते हैं। युद्धोन्माद उत्पन्न करना, खर्चीले माध्यमों के सहारे उन्हीं के द्वारा बन पड़ता है। प्रतिभा के धनी कहे जाने वाले वैज्ञानिकों ने ही मृत्यु किरणों जैसे आविष्कार किए हैं।

🔴 कामुकता को धरती से आसमान तक उछाल देने में तथाकथित कलाकारों की ही संरचनाएँ काम करती हैं। अनास्थाओं को जन्म देने का श्रेय बुद्धिवादी कहे जाने वालों के ही पल्ले बँधा है। नशेबाजी को घर-घर तक पहुँचाने में चतुरता के धनी लोग ही अपने स्वेच्छाचार का परिचय दे रहे हैं। इस प्रकार आँकलन करने पर प्रतीत होता है कि मूर्द्धन्यों बलिष्ठों, सम्पन्न और प्रतिभाशालियों की छोटी-सी चौकड़ी ने ही ये अनर्थ थोड़े समय में खड़े किए हैं।

🔵 यहाँ साधन-सम्पन्नता की निन्दा नहीं की जा रही है और न दुर्बलता के सिर पर शालीनता का सेहरा बाँधा जा रहा है। कहा इतना भर जा रहा है कि पिछड़ेपन को हटाने-मिटाने का एकमात्र यही उपाय नहीं है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 23) 29 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴 काँच को हथौड़े से तोड़ा जाए तो वह छर-छर होकर बिखर तो सकता है, पर सही जगह से इच्छित स्तर के टुकड़ों में विभाजित न हो सकेगा। चट्टानों में छेद करना हो, तो सिर्फ हीरे की नोंक वाला बरमा ही काम आता है। पहाड़ में सुरंगें निकालने के लिए डायनामाइट की जरूरत पड़ती है। कुदालों से खोदते-तोड़ते रहने पर तो सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।     

🔵 वर्तमान में संव्याप्त असंख्यों अवांछनीयताओं से जूझने में प्रचलित उपाय पर्याप्त नहीं हैं। दरिद्रता को सभी संकटों की एकमात्र जड़ बताने से तो बात नहीं बनती। समाधान तो तब हो, जब सर्वसाधारण को मनचाही सम्पदाओं से सराबोर कर देने का कोई सीधा मार्ग बन सके। यह तो सम्भव नहीं दीखता। इसी प्रकार यह भी दुष्कर प्रतीत होता है कि उच्च शिक्षित चतुर कहलाने वाला व्यक्ति अपनी विशिष्टताओं का दुरुपयोग न करेगा और उपार्जित योग्यता का लाभ सर्वसाधारण तक पहुँचा सकेगा। प्रपंचों से भरी कठिनाइयाँ खड़ी न करेगा। सम्पदा के द्वारा मिलने वाली सुविधाओं से कोई इनकार नहीं कर सकता, पर यह विश्वास कर सकना कठिन है कि जो पाया गया, उसका सदुपयोग ही बन पड़ेगा। उसके कारण दुर्व्यसनों का, आतंकवादी अनाचार का जमघट तो नहीं लग जाएगा। 

🔴 वर्तमान कठिनाइयों के निराकरण हेतु आमतौर से सम्पदा, सत्ता और प्रतिभा के सहारे ही निराकरण की आशा की जाती है। इन्हीं तीनों का मुँह जोहा जाता है। इतने पर भी इनके द्वारा जो पिछले दिनों बन पड़ा है, उसका लेखा-जोखा लेने पर निराशा ही हाथ लगती है। प्रतीत होता है कि जब भी, जहाँ भी वे अतिरिक्त मात्रा में संचित होती हैं, वहीं एक प्रकार का उन्माद उत्पन्न कर देती हैं। उस अधपगलाई मनोदशा के लोग सुविधा संवर्धन के नाम पर उद्धत् आचरण करने पर उतारू हो जाते हैं और मनमानी करने लगते हैं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 22) 28 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴 विकृतियाँ दीखती भर ऊपर हैं, पर उनकी जड़ अन्तराल की कुसंस्कारिता के साथ जुड़ी रहती है। यदि उस क्षेत्र को सुधारा, सँभाला, उभारा जा सके, तो समझना चाहिए कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बदला और साथ ही उच्चस्तरीय परिवर्तन भी सुनिश्चित हो गया।       

🔵 भगवान् असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों का भांडागार है। उसमें संकटों के निवारण और अवांछनीयताओं के निराकरण की भी समग्र शक्ति है। वह मनुष्य के साथ सम्बन्ध घनिष्ठ करने के लिए भी उसी प्रकार लालायित रहता है, जैसे माता अपने बालक को गोद में उठाने, छाती से लगाने के लिए लालायित रहती है। मनुष्य ही है जो वासना, तृष्णा के खिलौने से खेलता भर रहता है और उस दुलार की ओर से मुँह मोड़े रहता है, जिसे पाकर वह सच्चे अर्थों में कृतकृत्य हो सकता था। उसे समीप तक बुलाने और उसका अतिरिक्त उत्तराधिकार पाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके बैठने के लिए साफ-सुथरा स्थान पहले से ही निर्धारित कर लिया जाए। यह स्थान अपना अन्त:करण ही हो सकता है।   

🔴 अन्त:करण की श्रद्धा और दिव्य चेतना के संयोग की उपलब्धि, दिव्य संवेदना कहलाती है, जो नए सिरे से, नए उल्लास के साथ उभरती है। यही उसकी यथार्थता वाली पहचान है, अथवा मान्यता तो प्रतिमाओं में भी आरोपित की जा सकती है। तस्वीर देखकर भी प्रियजन का स्मरण किया जा सकता है, पर वास्तविक मिलन इतना उल्लास भरा होता है कि उसकी अनुभूति अमृत निर्झरिणी उभरने जैसी होती है। इसका अवगाहन करते ही मनुष्य कायाकल्प जैसी देवोपम स्थिति में जा पहुँचता है। उसे हर किसी में अपना आपा हिलोरें लेता दीख पड़ता है और समग्र लोकचेतना अपने भीतर घनीभूत हो जाती है। ऐसी स्थिति में परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ बन जाता है। दूसरों की सुविधा अपनी प्रसन्नता प्रतीत होती है और अपनी प्रसन्नता का के न्द्र दूसरों की सेवा-सहायता में घनीभूत हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने चिन्तन और क्रियाकलापों को लोक-कल्याण में, सत्प्रवृत्ति-संवर्धन में ही नियोजित कर सकता है। व्यक्ति के ऊपर भगवत् सत्ता उतरे, तो उसे मनुष्य में देवत्व के उदय के रूप में देखा जा सकता है। यदि यह अवतरण व्यापक हो, तो धरती पर स्वर्ग के अवतरण की परिस्थितियाँ ही सर्वत्र बिखरी दृष्टिगोचर होंगी।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 22) 27 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴 तात्त्विक दृष्टि से यह प्रगतिशीलता, कुटिलता की पक्षधर बुद्धिवादी मानसिकता को तनिक भी नहीं सुहाती। इसमें उसे प्रत्यक्षत: घाटा ही घाटा दीखता है। अपना और दूसरों का जो कुछ भी उपलब्ध हो, उस सब को हड़प जाना या बिखेर देना ही उस भौतिक दृष्टि का एकमात्र निर्धारण है, जो जनमानस पर प्रमुखतापूर्वक छाई हुई है। संकीर्ण स्वार्थपरता, स्वच्छन्द उपयोग की ललक उभारती है। उसी की प्रेरणा से वह निष्ठुरता पनपती है, जो मात्र हड़पने की ही शिक्षा देती है, जिसके लिए भले ही किसी भी स्तर का अनाचार बरतना पड़े। निष्ठुरता इसी स्थिति की देन है। वही है जो अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग के लिए हर समय उकसाती-उत्तेजित करती रहती है। यही है वह मानसिकता जिसकी छाप जहाँ भी पड़ी है, वहीं चित्र-विचित्र संकट एवं विग्रह उत्पन्न होते चले गए हैं। इसी मानसिकता को दूसरे शब्दों में कुटिलता, नास्तिकता अथवा शालीनता को पूरी तरह समाप्त कर देने में समर्थ ओले की वर्षा के समतुल्य भी समझा जा सकता है।     

🔵 प्रदूषण, विकिरण, युद्धोन्माद, दरिद्रता, पिछड़ापन, अपराधों का आधार खोजने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि उपलब्धियों को दानवी स्वार्थपरता के लिए नियोजित किए जाने पर ही यह संकट उत्पन्न हुए हैं। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को चौपट करने में असंयम और दुर्व्यसन ही प्रधान कारण हैं। मनुष्यों के मध्य चलने वाले छल-छद्म प्रपंच एवं विश्वासघात के पीछे भी यही मानसिकता काम करती है। इनमें जिन अवांछनीयताओं का अभ्यास मिलता है, वस्तुत: वे सब विकृत मानसिकता की ही देन हैं।   

🔴 दोष न तो विज्ञान का है और न बुद्धिवाद का। बढ़ी-चढ़ी उपलब्धियों को भी वर्तमान अनर्थ के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि विकसित बुद्धिवाद का, विज्ञान का, वैभव का, कौशल का उपयोग सदाशयता के आधार पर बन पड़ा होता तो खाई-खन्दकों के स्थान पर समुद्र के मध्य प्रकाश स्तम्भ बनकर खड़ी रहने वाली मीनार बनकर खड़ी हो गई होती। कुछ वरिष्ठ कहलाने वाले यदि उपलब्धियों का लाभ कुछ सीमित लोगों को ही देने पर आमादा न हुए होते, तो यह प्रगति जन-जन के सुख सौभाग्य में अनेक गुनी बढ़ोत्तरी कर रही होती। हँसता-हँसाता खिलता-खिलाता जीवन जी सकने की सुविधा हर किसी को मिल गई होती। पर उस विडम्बना को क्या कहा जाए, जिसमें विकसित मानवी कौशल ने उन दुरभिसन्धियों के साथ तालमेल बिठा लिया, जो गिरों को गिराने और समर्थों को सर्वसम्पन्न बनाने के लिए ही उतारू हों।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 25 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 21) 26 Dec

🌹 समग्र समाधान—  मनुष्य में देवत्व के अवतरण से

🔴 पदार्थ-सम्पदा की उपयोगिता और महत्ता कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, पर यदि उसका दुरुपयोग चल पड़े तो अमृत भी विष बनकर रहता है। कलम बनाने के काम आने वाला चाकू किसी के प्राण हरण का निमित्त कारण भी बन सकता है। बलिष्ठता, सम्पदा, शिक्षा के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनके सत्परिणाम तभी देखे जा सकते हैं, जब सदुपयोग कर सकने वाली सद्बुद्धि सक्रिय हो। यहाँ इतना और भी समझ लेना चाहिए कि नीतिनिष्ठा और समाजनिष्ठा का अवलम्बन लेना भी पर्याप्त नहीं है, उसमें भाव-संवेदनाओं का पावन प्रवाह ही भले-बुरे लगने वाले ज्वार-भाटे लाता रहा है।    

🔵 मस्तिष्क आमतौर से सभी के सही होते हैं। पागलों और सनकियों की संख्या तो सीमित ही होती है। फिर अच्छे खासे मस्तिष्क , आदर्शवादी उत्कृष्टता क्यों नहीं अपनाते? उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है? उनसे सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पड़ना तो दूर, उलटे संकटों, विपन्नताओं, विभीषिकाओं का ही सृजन होता रहा है। इस तथ्य का पता लगाने के लिए हमें भाव-संवेदनाओं की गहराई में उतरना होगा। यह तथ्य समझना होगा कि अन्त:करण में श्रद्धा, संवेदना की शीतलता, सरसता भरी रहने पर ही सदाशयता का वातावरण बनता है। मानसिकता तो उस चेरी की तरह है, जो अन्त:श्रद्धा रूपी रानी की सेवा में हर घड़ी हुक्म बजाने के लिए खड़ी रहती है।   

🔴 स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और उससे हुई बचत को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान् के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है। लोकमंगल के लिए, आत्म परिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण-कण समर्पित करना पड़ा है। इसी मूल्य को चुकाने पर किसी को दैवी अनुग्रह और उसके आधार पर विकसित होने वाला उच्चस्तरीय व्यक्तित्व उपलब्ध होता है। महानता इसी स्थिति को कहते हैं। इसी वरिष्ठता को चरितार्थ करने वाले देवमानव या देवदूत कहलाते हैं। उन्हीं के प्रबल पुरुषार्थों के आधार पर शालीनता का वातावरण बनता और समस्त संसार इसी आधार पर सुन्दर व समुन्नत बन पड़ता है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 20) 25 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 मुड़कर देखने पर प्रतीत होता है कि जब तथाकथित शिक्षा का, सम्पदा का, विज्ञान स्तर की चतुरता का इतना अधिक विकास नहीं हुआ था, तब मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ, सुखी, सन्तुष्ट और हिल-मिलकर मोद मनाने की स्थिति में था। बढ़ी हुई समृद्धि ने तो वह सब भी छीन लिया, जिसे मनुष्य ने लाखों वर्षों के अध्यवसाय के सहारे, सभ्यता और सुसंस्कारिता के उच्चस्तरीय संयोग से दूरदर्शिता के साथ अर्जित किया था।    

🔵 यहाँ सुविधा-साधनों को दुर्गति का कारण नहीं बताया जा रहा है, वरन् यह कहा जा रहा है कि यदि उनका सदुपयोग बन पड़ा होता, तो स्थिति उस समय की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छी होती, जिस समय साधन कम थे। तब विकसित भावचेतना के आधार पर स्वल्प उपलब्धियों का भी श्रेष्ठतम उपयोग कर लिया जाता था और अपने साथ समूचे समुदाय को, वातावरण को, सच्चे अर्थों में समृद्ध-समुन्नत बनाए रहने में सफलता मिल जाती थी। ऐसे ही वातावरण को सतयुग कहा जाता रहा है।  

🔴 तथाकथित प्रगति का विशालकाय सरंजाम जुट जाने पर भी, भयानक स्तर की अवगति का वातावरण क्यों कर बन गया? इसका उत्तर यदि गम्भीरता से सोचा जाए तो तथ्य एक ही हाथ लगेगा कि बुद्धि भ्रम ने ही यह अनर्थ सँजोए हैं। फिर क्या बुद्धि को कोसा जाए? नहीं, उसका निर्धारण तो भाव-संवेदनाओं के आधार पर होता है। भावनाओं में नीरसता, निष्ठुरता जैसी निकृष्टताएँ घुल जाए तो फिर तेजाबी तालाब में जो कुछ गिरेगा, देखते-देखते अपनी स्वतन्त्र सत्ता को उसी में जला-घुला देगा।

🔵 उस क्षेत्र में विकृतियों का जखीरा जम जाना ही एकमात्र ऐसा कारण है, जिसके रहते समृद्धि और चतुरता का विकास-विस्तार होते हुए भी, उल्टी सर्वतोमुखी विपन्नता ही हाथ लग रही है। सुधार तलहटी का करना पड़ेगा। सड़ी कीचड़ के ऊपर तैरने वाला पानी भी अपेय होता है। दुर्भावनाओं के रहते दुर्बुद्धि ही पनपेगी और उसके आधार पर दुर्गति के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगेगा नहीं।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 19) 24 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 समर्थता, व्यायामशालाओं में या टॉनिक बेचने वालों की दुकानों में नहीं पाई जा सकती। उसके लिए संयम, साधना और सुनियोजित दिनचर्या अपनाने से ही अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। दूसरों का रक्त अपने शरीर में प्रवेश करा लेने पर भी उस उपलब्धि का अन्त थोड़े ही समय में हो जाता है। अपने निजी रक्त उत्पादन के सुव्यवस्थित हो जाने पर ही काम चलता है।   

🔵 अधिक उत्पादन, अधिक वितरण के लिए किए गए बाहरी प्रयास तब तक सफल न हो सकेंगे, जब तक कि मनुष्य का विश्वास ऊँचे स्तर तक उभारा न जाए। भूल यही होती रहती है कि मनुष्य को दीन, दुर्बल, असहाय, असमर्थ मान लिया जाता है और उसकी अनगढ़ आदतों को सुधारने की अपेक्षा, अधिक साधन उपलब्ध कराने की योजनाएँ बनती और चलती रहती हैं। लम्बा समय बीत जाने पर भी जब स्थिति यथावत् बनी रहती है, तब प्रतीत होता है कि कहीं कोई मौलिक भूल हो रही है।  

🔴 एक भ्रम यह भी जनसाधारण पर हावी हो गया है कि सम्पदा के आधार पर ही प्रगति हो सकती है। यह भ्रम इसलिए भी पनपता और बढ़ता गया है कि धनियों को ठाठ-बाट से रहते, गुलछर्रे उड़ाते देखकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि वह सुखी और समुन्नत भी हैं। पर लबादा उतारकर जब इस वर्ग को नंगा किया जाता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक अस्थिपंजर ही किसी प्रकार साँसें चला रहा है। प्रसन्नता के नाम पर उन्हें चिन्ताएँ ही खाए जा रही हैं। ईर्ष्या आशंका से लेकर अपने एवं अपनों के दुर्गुण-दुर्व्यसन स्थिति को पूरी तरह उलटकर रख दे रहे हैं। यह स्थिति उन्हें औसत नागरिक की तुलना में कहीं अधिक उद्विग्न, रुग्ण और चिन्तित बनाए रहती है। जीवन के आनन्द का बुरी तरह अपहरण कर लेती है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 18) 23 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 वस्तुत: उन सफलताओं के पीछे एक रहस्य काम कर रहा होता है कि उनने अपनी उपलब्धियों का सुनियोजन किया और बिना भटके, नियत उपक्रम अपनाए रहे। जनसहयोग भी उन्हीं के पीछे लग लेता है, जिनमें सद्गुणों का, सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य होता है। इसी विधा का अनुकरण करने के लिए यदि तथाकथित दरिद्रों को भी सहमत किया जा सके, तो वे आलस्य-प्रमाद की, दीनता-हीनता की केंचुली उतारकर, अभीष्ट दिशा में अपने बलबूते ही इतना कुछ कर सकते हैं, जिसे सराहनीय और सन्तोषप्रद कहा जा सके।   

🔵 इसके विपरीत यदि बाहरी अनुदानों पर ही निर्भर रहा जाए तो जो मिलता रहेगा, वह फूटे घड़े में पानी भरते जाने की तरह व्यर्थ रहेगा और कुछ पल्ले पड़ेगा नहीं। दुर्व्यसनों के रहते, आसमान से बरसने वाली कुबेर की सम्पदा भी अनगढ़ व्यक्तियों के पास ठहर न सकेगी। अनुदानों का वांछित लाभ न मिल सकेगा।  

🔴 अशिक्षा का कारण यह नहीं है कि पुस्तकें, कापियाँ, कलमें मिलना बन्द हो गई हैं या इतनी निष्ठुरता भर गई है कि पूछने पर कुछ बता देने के लिए कोई तैयार नहीं होता, वरन् वास्तविक कारण यह है कि शिक्षा का महत्त्व ही अपनी समझ में नहीं आता और उसके लिए उत्साह ही नहीं उमगता। पिछड़े क्षेत्रों में खोले गए स्कूल प्राय: छात्रों के अभाव में खाली पड़े रहते हैं और नियुक्त अध्यापक रजिस्टरों में झूठी हाजिरी लगाकर, खाली हाथ वापस लौट जाते हैं। यदि उत्साह उमगे तो जेल में लोहे के तसले को पट्टी और कंकड़ को कलम बनाकर विद्वान् बन जाने वालों का उदाहरण हर किसी के लिए वैसा ही चमत्कार प्रस्तुत कर सकता है। उत्कण्ठा की मन:स्थिति रहते, सहायकों की सहायता की कमी भी रहने वाली नहीं हैं।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 17) 22 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 इन दिनों की सबसे बड़ी तात्कालिक समस्या यह है कि समाज परिकर में छाई विपन्नताओं से किस प्रकार छुटकारा पाया जाए और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या किया जाए, जिससे निरापद और सुविकसित जीवन जी सकना सम्भव हो सके?   

🔵 समाज विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों का कारण अभावग्रस्तता को मान लिया गया है। इसी मान्यता के आधार पर यह सोचा जा रहा है कि साधन-सुविधाओं वाली सम्पन्नता की अधिकाधिक वृद्धि की जाए, जिससे अभीष्ट सुख-साधन उपलब्ध होने पर प्रसन्नतापूर्वक रहा जा सके। मोटे तौर पर अशिक्षा, दरिद्रता एवं अस्वस्थता को प्रमुख कारणों में गिना जाता है और इनके निवारण के लिए कुछ नए नीति निर्धारण का औचित्य भी है, पर देखना यह है कि वस्तुस्थिति समझे बिना और वास्तविक व्यवधानों की तह तक पहुँचे बिना जो प्रबल प्रयत्न किए जा रहे हैं या किए जाने वाले हैं वे कारगर हो भी सकेंगे या नहीं? 

🔴 दरिद्रता को ही लें। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक समर्थता इतनी अधिक है कि उसके सहारे अपना ही नहीं, परिकर के अनेकों का भली प्रकार गुजारा किया जा सके और बचत को सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकने वाले पुण्य परमार्थ में भी लगाया जा सके। प्रगतिशील जनों में से असंख्यों ऐसे हैं, जिनके पास न तो कोई पैतृक संपदा थी और न बाहर वालों की ही कोई कहने लायक सहायता मिली, फिर भी वे अपने मनोबल और पुरुषार्थ के आधार पर आगे बढ़ते और ऊँचे उठते चले गए, सफलता के उस उच्च शिखर पर जा पहुँचे जो जादुई जैसा लगता है।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 16) 21 Dec

🌹 संवेदना का सरोवर सूखने न दें  

🔴 प्रस्तुत समस्याएँ अगणित हैं। उलझनों, संकटों, विग्रहों का कोई अन्त नहीं। यह सब कहाँ से उत्पन्न होते हैं और क्यों कर निपट सकते हैं? इसकी विवेचना करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मात्र अपने आपे तक, गिने-चुने अपनों तक सीमित रहने वाला किन्हीं अन्यों की चिन्ता नहीं कर सकता और न उदार न्यायनिष्ठा का ही परिचय दे सकता है। ऐसी दशा में अनाचार के अतिरिक्त और कुछ बन ही न पड़ेगा और उसका प्रतिफल अनेकानेक विग्रहों के रूप में ही आकर रहेगा। यही दुष्प्रवृत्ति जब बहुसंख्यक लोगों द्वारा अपनाई जाती है, तो उसका परिणाम वातावरण को विक्षुब्ध किए बिना नहीं रहता।  

🔵 संवेदना, आत्मीयता के रूप में विकसित होती है। तब मनुष्य दूसरों के दु:ख को अपना दु:ख, अन्यों के सुख को अपना सुख मानने लगता है। सहानुभूति के रहते ऐसा व्यवहार करना सम्भव नहीं होता है, जिनसे किसी के अधिकारों का अपहरण होता हो अथवा किसी को शोषण का शिकार बनना पड़ता हो। जब प्रचलन इसी प्रकार का रहेगा तो न दुर्व्यवहार ही बन पड़ेगा और न किन्हीं को अकारण त्रास सहना पड़ेगा।

🔴 आमतौर से अपना, अपनों का हितसाधन ही अभीष्ट रहता है। यदि यह आत्मभाव सुविस्तृत होता चला जाए, जनसमुदाय को अपने अंचल में लपेट ले, अन्य प्राणियों को भी अपने कुटुम्बी जैसा माने, अपने जैसा समझे; फिर वैसा ही सोचते रहते बन पड़ेगा, जिससे सुख-शान्ति का पथ प्रशस्त होता हो। मात्र आतुरता और निष्ठुरता ही ऐसी दुष्प्रवृत्ति है जो अनाचार के लिए उकसाती है और उसके फलस्वरूप अगणित संकटों का परिकर विनिर्मित करती है। यदि भाव-संवेदना जीवन्त और सक्रिय बनी रहे तो सृजन और सहयोग के आधार पर उत्थान और कल्याण का सुयोग सर्वत्र ही बन पड़ेगा।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 15) 20 Dec

🌹 संवेदना का सरोवर सूखने न दें  

🔴 करुणा उभरे बिना दूसरों की स्थिति और आवश्यकता का भान ही नहीं होता। इस अभाव की स्थिति में लकड़ी चीरना और किसी निरपराध की बोटी-बोटी नोंच लेना प्राय: एक जैसा ही लगता है। किसी के साथ अन्याय बरतने में, सताने-शोषण करने में कुछ भी अनुचित प्रतीत नहीं होता। भावना के अभाव में मनुष्य का अन्तराल चट्टान की तरह नीरस-निष्ठुर हो जाता है। संवेदना शून्यों को नर-पशु भी तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पशुओं की भी अपनी मर्यादाएँ होती हैं, जो प्राकृतिक अनुशासन के विपरीत एक कदम भी नहीं उठाते, भले ही मनुष्य की तुलना में उन्हें असमर्थ-अविकसित माना जाता रहे।   

🔵 लगता है भाव-श्रद्धाविहीनों के लिए नर-पिशाच ब्रह्म राक्षस, मृत्युदूत, दुर्दांत दैत्य जैसे नामों में से ही किसी का चयन करना पड़ेगा, क्योंकि उन्हीं की आपा-धापी उस स्तर तक पहुँचती है, जिनमें दूसरों के विकास-विनाश से, उत्पीड़न एवं अभिवर्धन से कोई वास्ता नहीं रहता। उनके लिए ‘स्व’ ही सब कुछ बनकर रह जाता है। बस चले तो वे हिरण्याक्ष दैत्य की तरह दुनिया की समूची सम्पदा समेटकर ले उड़ें, भले ही उसे समुद्र में छिपाकर निरर्थक बनाना पड़े। जिनके लिए सभी विराने हैं, वे किसी का कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं। 

🔴 ऐसा ही पिछले दिनों होता भी रहा है। स्वार्थान्धों से इतना भी सोचते न बन पड़ा कि इस सृष्टि में दूसरे भी रहते हैं और उन्हें भी जीवित रहने दिया जाना चाहिए। सब कुछ अपने लिए समेट लेने, हड़प जाने को ही विशिष्टता का फलितार्थ नहीं मान बैठना चाहिए।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 18 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 14) 19 Dec

🌹 संवेदना का सरोवर सूखने न दें  

🔴 गहरी डुबकी लगाने पर इस उलटी रीति का निमित्त कारण भी समझ में आ जाता है। भाव-संवेदनाओं का स्रोत सूख जाने पर सूखे तालाब जैसी शुष्कता ही शेष बचती है। इसे चेतना क्षेत्र की निष्ठुरता या नीरसता भी कह सकते हैं। इस प्रकार उत्पन्न संकीर्ण स्वार्थपरता के कारण मात्र अपना ही वैभव और उपभोग सब कुछ प्रतीत होता है। उससे आगे भी कुछ हो सकता है, यह सूझता ही नहीं। दूसरों की सेवा-सहायता करने में भी आत्मसन्तोष और लोकसम्मान जैसी उपलब्धियाँ संग्रहित हो सकती हैं, इसका अनुमान लगाना, आभास पाना तक कठिन हो जाता है। आँख खराब हो जाने पर दिन में भी मात्र अन्धकार ही दीख पड़ता है। कान के परदे जवाब दे जाएँ तो कहीं से कोई आवाज आती सुनाई नहीं पड़ती। ऐसी ही स्थिति उनकी बन पड़ती है, जिनके लिए अनर्थ स्तर की स्वार्थ पूर्ति ही सब कुछ बनकर रह जाती है। 

🔵 शरीर से चेतना निकल जाने पर मात्र लाश ही पड़ी रह जाती है, जिसे ठिकाने न लगाया जाए तो स्वयं सड़ने लगेगी, घिनौना वातावरण उत्पन्न करेगी। जब तक कि शरीर में चेतना विद्यमान थी, वह जीवित शरीर को समर्थ एवं सुन्दर बनाए हुए थी। निर्जीव तो नीरस और निष्ठुर ही हो सकता है। मुरदा तो समीप बैठे आश्रितों या स्वजनों का विलाप भी नहीं सुनता, उस पर कुछ ध्यान भी नहीं देता। मानो उन सबसे उसका कभी दूर का सम्बन्ध भी न रहा हो। भाव-संवेदनाओं का स्रोत सूख जाने पर मनुष्य भी ऐसा ही घिनौना हो जाता है। अपना हित-अनहित तक उसे नहीं सूझता, तो दूसरों की सेवा-सहायता करने की उत्कण्ठा उठने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। 

🔴 जीवितों और मृतकों की अलग-अलग दुनिया है। मुरदे श्मशान, कब्रिस्तान में जगह घेरकर जा बैठते हैं और उधर से निकलने वालों को भूत-प्रेतों की तरह डराते-भगाते रहते हैं। जीवितों में से भला कोई ऐसी हरकत करता है? उन्हें तो आवश्यक प्रयासों में ही निरत देखा जाता है। इन दिनों संवेदनाहीनों को प्रेतों जैसी और संवेदनशीलों को जीवितों जैसी गतिविधियाँ अपनाए हुए प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 13) 18 Dec

🌹 संवेदना का सरोवर सूखने न दें  
🔴 संग्रह और उपभोग की ललक-व्याकुलता इन दिनों ऐसे उन्माद के रूप में लोकमानस पर छाई हुई है कि उसके कारण धन ही स्वार्थ सिद्धि का आधार प्रतीत होता है। ऐसी दशा में यदि उलटा मार्ग अपनाने का निर्णय करते बन पड़े तो इसमें आश्चर्य ही क्या?  

🔵 मानवी दिव्य चेतना के लिए इस प्रचलन को अपनाना सर्वथा अवांछनीय है। ऐसा कुछ तो कृमि-कीटक और पशु-पक्षी भी नहीं करते। वे शरीरचर्या के लिए आवश्यक सामग्री प्राप्त करने के उपरान्त, प्रकृति के सुझाए उन कार्यों में लग जाते हैं जिसमें उनका स्वार्थ भले ही न सधता हो, पर विश्व व्यवस्था के सुनियोजन में कुछ तो योगदान मिलता ही है। संग्रह किसी को भी अभीष्ट नहीं, उपभोग में अति कोई नहीं बरतता। सिंह, व्याघ्र तक जब भरे पेट होते हैं तो समीप में ही चरने वाले छोटे जानवरों के साथ भी छेड़खानी नहीं करते। 

🔴 मनुष्य का दरजा इसलिए नहीं है कि वह अपनी विशिष्टता को साधनों के संग्रह एवं उपभोग की आतुरता पर विसर्जित करता रहे। उसके लिए कुछ बड़े कर्तव्य निर्धारित हैं। उसे संयम साधना द्वारा ऐसा आत्म परिष्कार करना होता है, जिसके आधार पर विश्व उद्यान का माली बनकर वह सर्वत्र शोभा-सुषमा का वातावरण विनिर्मित कर सके। जब सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ अपनाते हैं तो मनुष्य के लिए ऐसी क्या विवशता आ पड़ी है, जिसके कारण उसे अनावश्यक संग्रह और उच्छृंखल उपभोग के लिए आकुल-व्याकुल होकर पग-पग पर अनर्थ सम्पादित करते फिरना पड़े।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

👉 सतयुग की वापसी (भाग 12) 17 Dec

🌹 महान् प्रयोजन के श्रेयाधिकारी बनें  

🔴 शरीर और उनकी शक्तियों के भले-बुरे पराक्रम आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। समर्थता, कुशलता और सम्पन्नता की जय-जयकार होती है, पर साथ ही यह भी मानना ही पड़ेगा कि इन्हीं तीन क्षेत्रों में फैली अराजकता ने वे संकट खड़े किए हैं जिनसे किसी प्रकार उबरने के लिए व्यक्ति और समाज छटपटा रहा है।  

🔵 इन तीनों से ऊपर उठकर एक चौथी शक्ति है-भाव-संवेदना यही दैवी अनुदान के रूप में जब मनुष्य की स्वच्छ अन्तरात्मा पर उतरती है तो उसे निहाल बनाकर रख देती है। जब यह अन्त:करण के साथ जुड़ती है तो उसे देवदूत स्तर का बना देती है। वह भौतिक आकर्षणों, प्रलोभनों एवं दबावों से स्वयं को बचा लेने की भी पूरी-पूरी क्षमता रखती है। इस एक के आधार पर ही साधक में अनेकानेक दैवी तत्त्व भरते चले जाते हैं।

🔴 युग परिवर्तन के आधार को यदि एक शब्द में व्यक्त करना हो तो इतना कहने भर से भी काम चल सकता है कि अगले दिनों निष्ठुर स्वार्थपरता को निरस्त करके उसके स्थान पर उदार भाव-संवेदनाओं को अन्त:करण की गहराई में प्रतिष्ठित करने की, उभारने की, खोद निकालने की अथवा बाहर से सराबोर कर देने की आवश्यकता पड़ेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...